Tuesday, December 6, 2011
उम्मीद है ‘लंका’ का बजेगा डंका
‘लंका’ से मैं बहुत खुश हूं। मुख्य धारा की फिल्म को यथार्थ के साथ दिखाने की जो परंपरा है, उसे यह फिल्म कहीं न कहीं आगे ले जाती है। और ये बताती है कि हम ‘रिएलिज्म’ के साथ रहकर भी मुख्यधारा की फिल्म बना सकते हैं। मुझे आशा है कि लोगों को भी ऐसा ही लगेगा और इस फिल्म को सभी पसंद करेंगे। मुझे इस फिल्म को बनाने के पूरे अनुभव से बहुत खुशी मिली है। अपने काम में तो कमियां मैं हमेशा निकालता ही रहता हूं। अभी तीन चार शहरों का दौरा करके हम लौटे हैं, जहां ‘लंका’ के बारे में प्रचार-प्रसार जोर शोर से किया। चिल्ला चिल्का कर लोगों को बताया कि लंका आ रही है। ये हमारे कांट्रेक्ट का हिस्सा भी होता है।
चूंकि छोटी फिल्म है तो प्रचार के लिए बजट भी कम होता है। तो जितनी मेहनत खुद से होती है तो वो करते हैं बाकी ऊपरवाले और दर्शक के हाथ मे छोड़ देते हैं। अब आशा यह है कि अच्छी फिल्म देखने के लिए दर्शक दूसरी फिल्मों के जोर शोर के प्रचार प्रसार पर न जाकर ‘लंका’ जरुर देखने आएं। लोगों को फिल्म पसंद आएगी। वैसे, ये एक उम्मीद है, जिस पर मैं हमेशा खरा नहीं उतरा हूं। क्योंकि फिर अपनी बात को दोहराते हुए कहता हूं कि अच्छी फिल्म से ज्यादा दर्शक उन फिल्मों को देखना पसंद करते हैं, जिनका प्रचार बहुत पैसे लगाकर होता है।
मीडिया से भी हम लोगों को ज्यादा सहायता नहीं मिलती। वहां भी अपने कुछ दोस्तों को खोजना पड़ता है और उनसे कुछ मदद लेनी पड़ती है। नहीं तो अमूमन यह वर्ग ऐसा है,जो जल्दी छोटी फिल्मों की गतिविधि को रिकॉर्ड करने में हिचकिचाता है। उनके पास शायद अपने कारण हैं। लेकिन छोटी और अच्छी फिल्मों को करने की जिद मैं नहीं छोड़ूंगा। कभी न कभी तो लोग मेरे साथ आएंगे। स्वभावत: जिद्दी हूं। अब उसमें सफलता मिले या विफलता यह स्वीकार्य है। उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए और मैं भी नहीं छोड़ूंगा।
फिलहाल, 9 तारीख को लंका प्रदर्शित हो रही है और मैं चाहूंगा कि आप सब न सिर्फ खुद आएं बल्कि दोस्तों और परिजनों को साथ लेकर आएं। आपको मजा आएगा।
इसी उम्मीद के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी
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Manoj Bajpayee
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12:06 PM
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Wednesday, November 16, 2011
'लंका' का इंतजार और कुछ दूसरी बातें
मैं चाहता हूं कि लंका के साथ ऐसा कुछ न हो क्योंकि फिल्म बहुत की अनोखी बन पड़ी है। ये दुर्भाग्य उन फिल्मों के साथ हमेशा रहता है,जो छोटी होती है लेकिन बहुत अच्छी होती है। जो किसी भी बड़ी से बडी फिल्म को टक्कर देने के काबिल हैं। लेकिन दर्शक हैं कि जब तक हो- हंगामा न देंखे, किसी फिल्म का टिकट लेते ही नहीं। ऐसे में उत्साह कैसे बढ़े कि इस तरह की फिल्म की जाए। दर्शक नहीं मिलते तो निर्माता इन फिल्मों से भागना शुरु करता है और अगर वो बनाता भी है तो फिल्म शुरु करने से लेकर प्रदर्शित करने तक अपनी मजबूरियां ही गिनाता है। बहुत ही संकट का समय रहता है ऐसी फिल्मों को बनाकर प्रदर्शित करने में।
खैर, लंका जब प्रदर्शित होगी तब देखा जाएगा। अभी कई राज्यों में चुनाव की सरगर्मियां तेज होती जा रही हैं। टेलीविजन पर आरोप-प्रत्यारोप के दौर शुरु हो चुके हैं। नेतागण ज्यादा से ज्यादा बात कम समय में रखने की होड़ में लग चुके हैं। बस एक दूसरे को गाली देना ही बाकी है। ये सत्ता भी कमाल की चीज है। चाहे वो राजनीति हो या व्यक्तिगत जीवन-हर कोई उसे पाने में लगा हुआ है या दबोचने में। कोई उस कुर्सी पर बैठना चाहता है तो कोई उस कुर्सी को जाने नहीं देना चाहता। इस सारी खींचतान में अगर जनता का भला हो या उनके कल्याण पर काम होता रहे तो कोई समस्या नहीं है। लेकिन मुश्किल तो तब होती है जब राजनीति सिर्फ खींचतान से ही भरी रहती है। कल्याण कहीं पीछे छूट जाता है।
एक अच्छी बात यह रही है कि जनता के बीच से ही जनांदोलन छोटे से बड़े होते जा रहे हैं। जिससे राजनीतिक पार्टियों में एक जिज्ञासा भी है और हड़कंप भी मचा हुआ है। जनांदोलन अपने आप में प्रजातंत्र के होने का सबूत है। और ये जितना जोर पकड़े, इस डेमोक्रेसी को और आगे मजबूत ही करता जाएगा। नए से नए कानून बने, नए नए विचार सामने आएं, इससे अच्छी बात इस जनंतत्र के लिए कुछ हो ही नहीं सकती।
इस बीच मुझे अचानक याद आया कि मुंबई शहर के जिस इलाके में मैं रहता हूं,वहां पर आसपास बहुत सारी जगहों पर या यूं कहें कि खुले में खोमचों पर नकली फिल्म सीडी बिकती है। उसमें से छह खोमचे वालों को तो मैंने भगाया। पुलिसवालों से बात भी की। लेकिन ये अपने आप में चिंता का विषय है। ये नकली सीडी बड़ी फिल्मों से ज्यादा छोटी फिल्मों का नुकसान कर रही हैं। बड़ी फिल्में तो टेबल पर ही बिक जाती है या यूं कहें कि बनने से पहले ही वितरक उन्हें खरीद लेते हैं। छोटी फिल्मों के प्रदर्शन में सांस ऊपर नीचे हो जाती है। और अगर रिलीज भी होती है तो चुनिंदा दर्शक थिएटर में बैठे होते हैं क्योंकि ज्यादातर नकली सीडी पर ही उसे देखना पसंद करते हैं। ये एक सच्चाई है। और हर वो दर्शक, जो सीडी खरीद रहा है कही न कहीं गैरकानूनी काम में शरीक हो रहा है या उसे बढ़ावा दे रहा है। तो हम छोटी फिल्म के कलाकारों और तकनीशियनों की तरफ से मैं आप सभी से निवेदन करता हूं कि ऐसी गैरकानूनी गतिविधि को बढ़ावा न दें। नकली सीडी बिकने की सूचना पुलिस को दें ताकि हम जैसे लोग, जो छोटी और अच्छी फिल्मों में विश्वास रखते हैं, उनका उत्साह बना रहे और अच्छी फिल्म की एक नयी परंपरा हम बना सकें।
आपके सहयोग की अपेक्षा में
मनोज बाजपेयी
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10:54 PM
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Wednesday, October 12, 2011
‘लंका’ से खुश हूं
मैं अपने घर आया हूं। अपने माता पिता के पास। अपने भाई बहनों के पास। वे लोग मेरी बच्ची के साथ समय बिता रहे हैं और हमें थोड़ा आराम दे रहे हैं। इन दिनों वक्त बड़ा आरामदायक है। परिवार वाले अलग अलग तरीके के व्यंजन बनाकर हमारे सामने रख देते हैं। हर दिन कुछ नया। बचपन में जिस स्वाद को चखा था, उसके फिर से वापस आने का लुत्फ ले रहा हूं। रिश्तेदारों का आना लगा है। सबके साथ भूली बिसरी यादों पर हंसते हंसते कभी कभी दम घुटा जा रहा है। ऐसा मौका मेरे जीवन में बहुत कम आता है। क्योंकि मैं बहुत में और वे बहुत दूर। न उनक काम मुंबई लेकर आता है और न मेरा काम उनके पास लेकर जाता है। समय मिलता है तो उनके साथ थोड़ा वक्त बीताकर वापस जाना होता है। अब जबकि पूरे दस दिन के लिए उनके साथ हूं तो ऐसा लगता है कि इस बडे शहर दिल्ली में ही गांव बस गया है।
अब यहां से निकल जाऊंगा। अपनी पत्नी और बच्ची को अपने ससुराल पहुंचाकर मुंबई की तरफ मेरी रवानगी हो जाएगी। क्योंकि ‘लंका’ का बचा खुचा काम भी मुझे खत्म करना है। बहुत सारी स्क्रिप्ट्स सुननी हैं और आगे आने वाले समय के लिए अपनी योजना तैयार करनी है। पहले दूर जाता था तो माता पिता पत्नी याद आती थी। अब बच्ची से पंद्रह बीस दिन दूर रहने का जो दर्द है, शायद मेरे लिए सह पाना थोड़ा मुश्किल होगा। और शायद यह दर्द हर माता पिता महसूस करते हैं। मैं अकेला ऐसा नहीं हूं। अब अहसास होता है कि आप कैसे अपने ही बनाए हुए परिवार में बसते चलते जाते हैं कि आपको न दाए कि सूझ रहती है और न बाएं की बूझ। लेकिन जाना तो है। कब तक अपने ही घर को बंद करके रखेंगे। मुंबई से वापस मैं कुछ न कुछ लिखता रहूंगा। तब तक आप लोगों को मेरी ढेर सारी दुआएं। आप सभी आपका आशीर्वाद मेरे व परिवार के ऊपर बनाए रखें।
इसकी आशा के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी
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4:49 PM
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Monday, September 5, 2011
खुश हूं अन्ना का आंदोलन सफल हुआ और ‘आरक्षण’ भी
आरक्षण के प्रचार के दौरान अधिकतर जगहों पर मेरा और श्री अमिताभ बच्चन जी का साथ जाना हुआ। उनके अपार प्रशंसक समुदाय को देखने-सुनने का मौका मिला। कई बार ये सोचता भी रहा कि श्री बच्चन की लोकप्रियता का जो दौर मैंने अपने बचपन में देखा था, वो आज तक कहीं रुका नहीं है बल्कि बढ़ता ही गया है। पटना पहुंचने के बाद तो ऐसा लगा कि पूरा शहर ही श्री अमिताभ बच्चन के आने के इंतजार में था।
‘आरक्षण’ ने कई बहस को जन्म दिया। कई सारी पुरानी बहस भी नयी हो गईं। इस कारण कुछ एक राज्यों में फिल्म को नुकसान भी उठाना पड़ा। अंतत: फिल्म ने अच्छा व्यापार किया। लोगों ने काफी सराहना की और इससे फिल्म से जुड़े सभी लोगों को संतोष है। बड़ी फिल्म करने का यह फायदा अवश्य है कि प्रचार प्रसार में बहुत अधिक खर्चा किया जाता है, जिससे दर्शक वर्ग उस फिल्म को देखने के लिए उत्सुक रहता है। लेकिन कहीं न कहीं दुख भी होता है उन छोटी और अच्छी फिल्मों के लिए, जिनके पास इतना पैसा नहीं होता जो बड़े स्तर पर प्रचार प्रसार कर सकें। इसके कारण दर्शक वर्ग कई बार उनमें रुचि ही नहीं दिखाता। यह अपने आप में विडंबना है। फिर भी मैं बहुत खुश हूं। न सिर्फ अपने लिए बल्कि प्रकाश झा जी के लिए भी, जिनकी मेहनत सफल हुई।
इस फिल्म के बाद लगातार घर पर रहना हुआ। अन्ना हजारे जी के आंदोलन को देखने सुनने समझने का मौका हाथ लगा। खुशी इस बात की है कि आंदोलन सफल रहा। और भ्रष्टाचार आज हमारे समाज और हमारे देश में सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। इस मुद्दे को अभी तक मुद्दा माना ही नहीं जाता था। अन्ना हजारे ने एक बड़ी अच्छी बात कही। वह यह कि सिर्फ टोपी ही नहीं पहनों बल्कि अपने चरित्र को भी बदलो। यह अपने आपमें बहुत बड़ी बात है। बदलाव हम सब को अपने घर से और अपने आप से ही शुरु करने हैं। फिर हमें ताकत मिलेगी हर उस सरकार से अपनी मांग करने की, जो सत्ता में है।
अभी मेरी बेटी फिर से मेरे साथ होने की मांग कर रही है और मैं उसके पास जा रहा हूं। लेकिन वादा करता हूं कि जल्द ही फिर से लिखूंगा।
इसी के साथ
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मनोज बाजपेयी
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11:23 AM
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Monday, July 11, 2011
अद्भुत अनुभव है हिन्दुस्तान के सबसे बड़े कलाकार से मिलना !
कल रात मैं अपने डॉक्टर त्रासी की बेटी की शादी में शामिल होने गया था। दरवाजे पर हिन्दुस्तान के सबसे बड़े कलाकार से मेरी मुलाकात हुई। और वह हैं श्री दिलीप कुमार। जिस तरह इस अवस्था में भी वह मुझसे मिले, मैं धन्य हो गया। मेरे हिसाब से हिन्दुस्तान में अभिनय के लिहाज से कोई जीवित लीजेंड है तो वह हैं श्री दिलीप कुमार। बाकी सारे अभिनेताओं ने अभिनय की शुरुआत उन्हें देखकर ही की। उन्हें देखकर मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या बोलूं। मेरे होंठ सिल गए थे। सायरा जी ने मेरी ऊहापोह को समझा और मुझे विदा होने में मदद की। लेकिन, इस अनुभव से मैं जितना लाभान्वित हुआ और जितनी खुशी हुई, वह बहुत कम मौकों पर होती है। जो लोग श्री दिलीप कुमार के बारे में नहीं जानते, मैं उनसे कहना चाहूंगा कि वह उनकी फिल्में देखें। उनकी समझ में आएगा कि अभिनय क्या होता है। भाषा क्या होती है। अगर दिलीप साहब के बाद मैं किसी अभिनेता को चाहता और सराहता हूं तो वह हैं श्री मोतीलाल जी। उनसे इस जन्म में मिलना नहीं हुआ। लेकिन उनकी फिल्मों को देखकर विभोर होता रहता हूं। पर आज जो सामने देखा, उसे भूल पाना असंभव है। और मैं यह बता दूं कि श्री दिलीप कुमार साहब से यह मेरी कोई पहली मुलाकात नहीं थी। मैं जब भी उनस मिलता हूं, मेरा यही हाल रहता है। वह जिस तरह मेरा अभिवादन करते हैं, मुझे दुनिया का सबसे बड़ा उपहार मिल जाता है।
इससे अलग अभी 'आरक्षण' के प्रचार प्रसार में शामिल हो रहा हूं। फिल्म के प्रोमो आ रहे हैं। उसकी चर्चा हो रही है, यह देखकर अच्छा लगता है। यह देखकर और अच्छा लगता है कि श्री प्रकाश झा जिस तरह अपनी फिल्म पर मेहनत करते हैं, उसे सराहना मिल रही है। 'आरक्षण' मेरे लिए इसलिए अधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह मेरी उनके साथ दूसरी फिल्म है। इसमें राजनीति से बिलकुल उलट मेरा किरदार है। और इस फिल्म में मैं अमित जी के साथ दोबारा काम कर रहा हूं। फिल्म के जरिए उनसे मिलने का मौका मिला। उनकी संगत में हर बार कुछ नया सीखने को मिलता है।
फिलहाल आप लोग खुद को तैयार रखें। फिल्म 12 अगस्त को प्रदर्शित हो रही है। आपको फिल्म कैसी लगी, मुझे ब्लॉग पर बताए। विस्तार में बताएंगे तो और अच्छा होगा।
इस बार के लिए इतना ही
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी
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10:47 AM
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दिलीप कुमार
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Thursday, June 2, 2011
बहुत हुआ आराम, अब काम
मेरे साथ कुछ ऐसा संयोग रहा है कि यहां के निर्माता-निर्देशक मुझे उन फिल्मों में ही लेते हैं, जिनकी शूटिंग हिन्दुस्तान की जमीन पर ही हो सके। स्विटजरलैंड और इंग्लैंड में शूटिंग होने वाली फिल्मों में मेरे लिए कभी ज्यादा जगह नहीं रही। वैसे, यह अपने आप में सौभाग्य है कि मैं अपनी जमीन से जुड़ी फिल्मों का हिस्सा आज तक रहा हूं। मुझे गर्व होता है अपनी फिल्मों की सूची देखकर, जिसमें ज्यादातर फिल्में यहां के लोग और यहां के जीवन के बारे में बात करती दिखती है। मेरी फिल्में यहां के द्वंद और यहां के संघर्ष की बात करती दिखती हैं। यहां के हंसी मजाक को पर्दे पर लेकर आती हैं।
विदेश में शूटिंग करने का फायदा यह होता है कि आपको एक नया देश, एक नयी संस्कृति देखने का मौका मिलता है। लेकिन तभी एक दोस्त का कहा हुआ याद आता है। वह कहता था-जिसने अपने देश को नहीं देखा, उसे विदेश जाने का कोई हक नहीं । व्यक्ति बाहर के लोगों को नहीं समझ पाएगा, जब तक वह अपने देश के लोगों से न जुड़ा रहा हो। संयोगवश ही सही लेकिन मेरी फिल्मों ने मुझे यह सौभाग्य प्रदान किया है कि मैं देश के कोने कोने में घूम कर आ चुका हूं। बस बाकी है तो अतिपूर्व का इलाका। वहां जाने की बड़ी मंशा है। वहां के लोग, वहां की संस्कृति और वहां का खाना नजदीक से देखने की बड़ी इच्छा है। मैं लगातार ब्लॉग के जरिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनुभव आप लोगों के साथ बांटता रहूंगा। अपनी फिल्म के किस्से भी ब्लॉग पर लिखता रहूंगा। आप दुआ कीजिए कि यह फिल्म अच्छी बनी, जिसे देखकर आप सभी मेरे चाहने वाले मुझ पर गर्व करें। कोशिश भी मेरी यही रही है क्योंकि कहीं न कहीं मेरा मानना कि सारी सफल फिल्में अच्छी नहीं होती और सारी विफल फिल्में बुरी नहीं होती। कोशिश इस बात की होनी जाहिए कि ऐसी फिल्म बनायी जाए, जिसे देखकर आपके बच्चों को भी गर्व हो सके। इस कोशिश में ही जुटने जा रहा हूं। आपसे लगातार ब्लॉग के जरिए मिलना होता रहेगा। तब तक आप सभी लोग अपना ख्याल रखें।
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी
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9:18 PM
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Tuesday, March 29, 2011
बहुत याद आएंगे आलोक तोमर
इस दौर में जहां पत्रकारिता की दुनिया बाजारु हो चुकी है, उस दौर में आलोक तोमर जैसे पत्रकार के जाने से गंभीर पत्रकारिता को एक और झटका लगा। मैं भगवान से दुआ करता हूं कि आलोक आप जहां भी रहें ऊपर वाला आपकी आत्मा को भरपूर शांति दे और आपके परिवार को इस दुःख को सहने की शक्ति दे।
लेकिन सबसे बड़ा दुःख उन लोगों को हुआ है, जो अधिकांश चैनलों की बेहद सतही और रंगीन अखबारों की पीत पत्रकारिता के बीच गंभीर किस्म की पत्रकारिता को खोज रहे हैं। हिन्दी भाषा में सार्थक पत्रकारिता की आस की लगातार कोशिश करते रहने वाले आलोक के जाने से बहुत दुःख है। मुझे उनके साथ मंडी हाऊस में बिताए कई पल याद हैं। इसी तरह, उनके जनसत्ता के दिन भी मुझे आज भी याद आते हैं। मैं अपने शब्दों में यह लिख नहीं पा रहा हूं कि आलोक तामोर के निधन की खबर ने मुझे कितना हतोत्साहित किया है। फिर भी बकौल बच्चन साहब-जो बीत गई सो बात गई। जीवन में एक सितारा था, माना वो बेहद प्यारा था, वो टूट गया सो टूट गया। अंबर के तारों को देखो, जाने कितने तारे टूटे, जाने कितने प्यारे छूटे, जो छूट गए फिर कहां मिले, पर बोलो टूटे तारों पर कब अंबर शोक मनाता है !
लेकिन अंबर शोक मनाए न मनाए हम गमगीन हैं। आलोक के जाने का शोक पता नहीं हम कब तक मनाते रहेंगे। आप सबसे भी यही निवेदन है कि अपनी प्रार्थना में आलोक की आत्मा की शांति के लिए दुआएं जरुर करें। अपने प्यारे आलोक तोमर को भारी मन से अलविदा।
आपका
मनोज बाजपेयी
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Manoj Bajpayee
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11:36 AM
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