Friday, February 5, 2010
घातक है संकीर्ण राजनीति का विष
लेकिन,सवाल यह है कि क्या देश आपका नहीं है। राज्य आपका नहीं है। अब इस सवाल का संवैधानिक जवाब भले हां हो, लेकिन मायानगरी में रहते हुए कई बार अहसास होता है कि जवाब हां मानना आसान नहीं है। वैसे, ये सिर्फ मेरा सोचना नहीं है। बहुत से लोग यही सोचते हैं। दरअसल, क्षेत्रवाद का ज़हर कुछ लोग इस कदर फैला रहे हैं कि उसके बीच से निकलता हर रास्ता विषैला लगने लगता है।
इन दिनों क्षेत्रवाद का यह विषैला डंक फिर मुंबई की नसों को जहरीला कर रहा है। कलाकार और मजदूर सॉफ्ट टारगेट हैं। दरअसल, उत्पातियों का पहला नारा है-डराओ-धमकाओ कलाकारों को। मारो मजदूरों को। वो भागेंगे तो मीडिया के कैमरे देखेंगे। इससे निश्चित तौर पर उनकी दहशत बढ़ेगी। और उन लोगों को मानना है कि इससे उनका वोट बैंक बढ़ेगा।
लेकिन,लाख टके का सवाल यह है कि क्या कुछ लोग यह गुंडई करते रहेंगे? क्या हाथ में लाठी लिए लोग किसी को भी सरेराह पीट सकते हैं? घसीट सकते हैं? क्या सरकार नाम की कोई चीज आम लोगों के लिए है या नहीं? ये मासूम सवाल मेरे और मेरे जैसे हजारों आम लोगों के हैं,क्योंकि वो हिंसा के खौफ के बीच दो जून की रोटी की जुगाड़ के साथ अपने बचने का रास्ता खोज रहे हैं।
दरअसल, क्षेत्रीय अस्मिता की बात को इस तरह पेश किया जा रहा है,मानो दूसरे राज्य का हर शख्स स्थानीय निवासियों का दुश्मन है। हालांकि, संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक उत्तर भारतीयों के साथ मारपीट और क्षेत्रवाद के नारे को अलोकतांत्रिक करार दे चुके हैं। राज्य सरकार ने भी इसे घातक करार दिया है। लेकिन, आम लोगों के बीच खौफ बढ़ता जा रहा है। आम लोगों के जेहन में भी अब एक बात घर करने लगी है कि सरकार उन्हें नहीं बचाएगी क्योंकि उसे अपने वोट बैंक खोने का डर है। क्योंकि, अगर सरकार को आम लोगों की चिंता होती तो कुछ उपद्रवी तत्व इस तरह दशहत फैला ही नहीं पाते।
लेकिन, फिर वही सवाल सामने है कि अगर सरकार बेबस है तो आम लोग जाएं तो जाए कहां? संविधान निर्माताओं ने देश का संघीय ढांचे तय किया तो राष्ट्र के वैविध्य के मद्देनजर शक्तियों के संतुलन के तहत लॉ एंड ऑर्डर को राज्य का विषय बनाया। लेकिन, आज राज्य हाथ पर हाथ धरे बैठा है तो लगता है कि संविधान ही बदल डालो। आखिर, कब तक यूं ही डराया-धमकाया जाएगा।
एक कलाकार होने के नाते मेरी और मेरे जैसे कई कलाकारों की अलग पीड़ा है। संविधान में आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, लेकिन हालात इतने निरंकुश हैं कि आप सिनेमाई पर्दे पर भी विचारों के पंख नहीं फैला सकते। आप सिनेमा में भी कुछ कहेंगे तो किसी को बुरा लग सकता है। और अगर ये किसी खास दल से संबंधित हुआ तो आपकी फिल्मों के पोस्टर फाड़े जाएंगे। थिएटरों में आग लगाई जा सकती है और दर्शकों की पिटाई भी हो सकती है। यानी जिस फिल्म को बनाने में आपने महीनों लगाए और निर्माता ने करोड़ों रुपए खर्च किए वो सिर्फ इसलिए दर्शकों तक नहीं पहुंच सकती क्योंकि किसी दल को अपने मिजाज से मेल खाती नहीं दिखी। हाल के दिनों में हम कई फिल्मों के साथ ऐसा देख चुके हैं।
फिर, सिनेमाई पर्दे पर ‘लार्जर दैन लाइफ’ की इमेज लोगों के बीच हमें एक उम्मीद की तरह पेश करती है। मीडिया मुझसे कई बार सवाल पूछता है कि आप कुछ कहते क्यों नहीं? लेकिन, मैं बोलता हूं तो बाकी लोग चुप रहते हैं। मेरे अकेले बोलने से क्या होगा? मैं तो बोलता रहता हूं। लेकिन,क्या कोई साथ आया। देखना यही है कि क्या अब इस वीभस्त मानसिकता के खिलाफ कोई आंदोलन खड़ा हो पाएगा?
वैसे,सोचने वाली बात यह भी है कि दुनिया के नक्शे पर सबसे बड़े वित्तीय शहर के रुप में पहचान रखने वाले मुंबई शहर को सिर्फ ‘मराठीमानुस’ के नाम पर अलग किया जा सकता है? इस शहर पर आतंकवादियों का हमला होता है,तो हर धर्म-हर क्षेत्र के लोग शहीद होते हैं। इसी तरह आतंकियों को ढेर करने वाले पुलिसकर्मी और कमांडो के जवान भी सिर्फ एक राज्य के नहीं। यह शहर हम कलाकारों के ही नहीं, यहां रहकर दो जून की रोटी कमाने वाले लाखों लोगों के लिए अपना घर है- और इस लिहाज से हम सभी मुंबईकर हैं। फिर, जिन धंधों पर मराठी मानुस की राजनीति तले निशाना साधा जा रहा है, वह हमेशा से गैर-महाराष्ट्रीयन करते रहा है।
दरअसल, सवाल उत्तर भारतीय और महाराष्ट्रीयनों का नहीं है। सवाल है, उस संकीर्ण राजनीति का,जो क्षेत्रवाद की राजनीति को पनपने देती है। निश्चित तौर पर मायानगरी का अपना आकर्षण है,जो न सिर्फ महाराष्ट्र के भीतर से बल्कि पूरे देश से लोगों को मुंबई जाने के लिए विवश करता है, पर मुंबई पर आबादी के बढ़ते बोझ के बीच दूषित राजनीति ने गंभीर सवाल को खौफ और आतंक के खांचे में डाल दिया है। इस तरह सवाल का जवाब मिलना मुश्किल है,क्योंकि खांचा हमेशा अपने आकार में पदार्थ को ढलने के लिए विवश करता है। ऐसे में सवाल यही है कि आम लोग क्या करें। मैं बोल रहा हूं। मैं बोलता रहूंगा, लेकिन देखते है कि क्या सबके सब साथ बोलेंगे। शायद नहीं, क्योंकि हम सब डरे हुए हैं, सहमे हुए हैं। वो बोलते रहेंगे। घसीटते रहेंगे-पीटते रहेंगे क्योंकि उनके पास भीड़ है। और हमारी भीड़ तो कबकी तितर बितर हो चुकी है। सब घरों के भीतर हैं। बाहर नहीं निकलना चाहते। निकलते हैं तो सन्नाटे के बीच दबे कदमों के साथ। इस माहौल को जल्द बदलना होगा।
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Manoj Bajpayee
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Monday, January 25, 2010
जिसे ज़रुरत उसे नसीब नहीं उनका ‘प्यार’
कभी मैंने इस तरह से काम नहीं किया था। लेकिन कभी इस तरह से एक के बाद एक अच्छी फिल्में भी मेरे पास नहीं आई थीं। भागना तो अच्छा लग रहा हैं। काम करना तो हमेशा ही अच्छा लगा। और उस पर अगर अच्छा काम है तो बहुत ही अच्छा लगता है।
इस बार मेरा परिवार गांव गया। और वायदे के बावजूद व्यस्त होने के कारण मैं नहीं जा पाया। गांव की याद तो बहुत आती रही। हर बार फोन करके अपने भाई बहनों को पूछता रहा कि क्या खाया, कहां हो ? उनसे जलन भी हो रही थी और खुशी भी हो रही थी कि सब के सब गांव में हैं। शायद मेरा बुढ़ापा गांव में बीतना तय है।
कितने दिनों बाद फिर टेलीविजन देखने बैठा तो चैनल बदल बदल कर प्रोग्राम टटोल रहा हूं। लेकिन टेलीविजन पर वही पुराने घिसे पिटे प्रोग्राम हैं। टेलीविजन चैनल हर बड़ी नयी फिल्म को इस तरह से सजा संवारकर पेश करते हैं, जैसे उन बड़े निर्माताओं और अभिनेताओं से इन्हें पैसा मिलता हो। किसी छोटी अच्छी फिल्म के आने पर ये आधे घंटे का प्रोगाम नहीं बनाते। ये उसके हिट होने पर या सफल होने पर ही उसकी बात करते हैं। दुखद है। बड़ी फिल्मों को मुफ्त में ये चैनल बड़ा प्रचार देते हैं और जिन्हें आवश्यकता है, उसके लिए ये टीआरपी की दुहाई देते हैं। कृपया मुझसे कोई सवाल न करे कि ये भ्रम है। क्योंकि मैंने ऐसी बाते करते हुए अपने कई सारे दोस्तों को सुना है, जो बेचारे मीडिया से जुड़े हैं। बहुत सारे पत्रकार मित्रों के साथ आज भी संबंध कायम हैं जो कि रंगमंच के समय से जारी हैं। इस बारे में भी उन्हें सोचना चाहिए। ये मैं जली कटी नहीं सुना रहा हूं। सिर्फ मन के दर्द को अपने ब्लॉग के जरिए आप तक पहुंचा रहा हूं। बाकी वो अपने मालिक खुद हैं।
आज कुछ दोस्त मेरे घर आने वाले हैं। उनके आवाभगत की तैयारी में हूं। इसलिए आपसे विदा लूंगा। इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी
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Sunday, January 10, 2010
नए साल का संकल्प
मौसम का हाल यह है कि सब एक दूसरे पर ही तोहमत मढ़े जा रहे हैं। लोग एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं तो देश मिलते हैं तो वो भी आपस में जिम्मेदारी डाल रहे हैं ग्लोबल वार्मिंग की। कुल मिलाकर बात ये है कि इस संकट से उबरने का कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। लेकिन जो संकट आने वाला है, वो सबको दिखेगा और दिखना शुरु हो चुका है।
लोग चीख चीख कर कहते रहे कि प्लास्टिक बंद करो, पेड़ लगाओ, प्रदूषण न फैलाओ, मोटर गाड़ी की जगह अन्य विकल्प तलाशो,लेकिन हर व्यक्ति स्वार्थी है। चाहे वो उद्योगपति हो या उपभोक्ता। सब केवल अपने घर को ही साफ रखने में लगे हैं। बाहर की गली में कचरे की बदबू से बचने के लिए खिड़की भी बंद कर लेते हैं। और अब तो कमरे को खुशबूदार करने के लिए तरह तरह के परफ्यूम भी मिल रहे हैं। लेकिन,जिस समस्या की शुरुआत अभी हुई है-वो एक दैत्य का रुप लेता हुआ दिखायी देगा। उससे बचने का क्या रास्ता हो सकता है। इस पर बात करने के लिए समय भी नहीं बचेगा। संभलिए। शायद आप बच जाएं और ये दुनिया बच जाएं। शायद नए वर्ष पर यही संकल्प लेने की आवश्यकता है।
इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी
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Tuesday, December 22, 2009
कब साफ रखना सीखेंगे अपने समुन्दर के किनारों को....
एक तरफ विदेशों के समुन्दरी किनारे हैं, जो शहरों से लगे हुए हैं। उनकी खूबसूरती देखिए। दूसरी तरफ मुंबई के समुन्दर के किनारे, जो गंदगी से लबालब है। साफ सुथरी जगह तक नहीं मिलती, जहां आप पांव रख सकें।
खैर ये बात रही मेरे शूटिंग स्थल की। अभी बस फोन ही आया था भाई का कि वो गांव जा रहे हैं। मेरे माता पिता और बाकी लोग जा चुके हैं। छुट्टियां बिताने दिल्ली से। मन कर रहा है कि सब छोड़कर कुछ दिनों के लिए गांव जाऊं। लेकिन ऐसी कुछ परिस्थितियां बन पड़ी हैं कि कुछ भी छोड़ नहीं सकता। अपने घर-गांव और राज्य की याद तो खैर सबको आती है और वैसे ही मुझे भी आती है। शायद मार्च अप्रैल में जाने का अवसर मिले। लेकिन, इस गांव जाने के विचार के साथ ही न जाने कहां से ये विचार भी आता है कि हम बड़े क्यों हुए। रोजी रोटी का चक्कर इतना बड़ा कैसे हो गया कि हमें सबकुछ छोड़ना पड़ा।
लेकिन, फिर दिमाग में एक बात कौंधती है कि बात दाने पाने की नहीं थी। बात अभिनय से लगाव की थी। प्यार की थी। एक जुनून की थी। फिर भी,गांव बहुत याद आता है।
आज शूटिंग के बीच से वक्त निकाला है,इसलिए ज्यादा कुछ लिख नहीं पा रहा। लेकिन,अगली बार जरुर कुछ ज्यादा बातें होंगी।
इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी
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Monday, December 7, 2009
अधूरा रह गया दुबई देखने का ख़्वाब
आप सोच सकते हैं कि मैं कितना उदास रहा होऊंगा। एक छोटा और बहुत ही छोटा सा शहर जो अभी विकसित हो नहीं पाया है। लेकिन शूटिंग वहीं होनी थी। छह सात दिन की शूटिंग करके वापस दुबई हवाई अड्डे पर उतरा और फिर दिल्ली आ गया। दुबई देखने और घूमने की इच्छा अधूरी ही रह गई।
इधर,दिल्ली में प्रवासी भारतीय फिल्म फेस्टीवल की योजना बन रही है। जिसके अवॉर्ड की ट्रॉफी के अनावरण के उपलक्ष्य में समारोह रखा गया था, मुझे उसमें भाग लेना था। बहुत अच्छा समारोह रहा। श्री अशोक चक्रधर, श्री राजीव शुक्ला, श्री साबिर अली इन सभी लोगों ने अपने अपने भाषण से लोगों का मन मोह लिया। लेकिन जो सबसे बड़ी उपलब्धी थी इस समासोह की तो वो मॉरिशस के राष्ट्रपति महामहिम अनिरुद्ध जगन्नाथ की उपस्थिति। वो इस समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में मौजूद थे। उनकी सादगी देखकर मैं आश्चर्यकित और भौचक रह गया।
ऐसे लोगों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। बचपन से सादगी मुझे लुभाती रहती है। ऐसे ही जीने की इच्छा है। जब बड़े पद पर बैठे लोग आपके सामने उदाहरण पेश करते हैं तो फिर व्यक्ति अपनी ही सादगी पर सवाल खड़े करना शुरु करता है और अपने आप को सुधारने की दिशा में काम करना शुरु करता है।
मुझे जीवन में आराम चाहिए। आधारभूत सुविधाओं की इच्छा रखता हूं। लेकिन, सादगी से एक सम्मोहन और एक आकर्षण रहा है। और आशा करता हूं कि मैं इसी तरह से आगे का जीवन भी व्यतीत करता रहूं। आप पाठकों की प्रतिक्रियाएं लगातार उत्साह बढ़ाती हैं, और मैं देखता हूं कि कुछ पाठक लगातार उत्साहवर्धन करते हैं। सभी की प्रतिक्रियाओं को लेकर बातचीत जल्दी ही।
फिलहाल, सादगी भर अभिनंदन के साथ आपका और आपका
मनोज बाजपेयी
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9:46 AM
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Wednesday, November 25, 2009
26/11 की याद कर दहल उठता है दिल
ख्याल आया कि टेलीविजन ऑन करुं और देखू कि कहीं कोई हादसा तो नहीं हो गया। और जो देखा और जो गुजरा वो आज तक दम निकालता है। कई जवान शहीद हुए। सैकड़ों बच्चे अनाथ हुए। कई औरतें विधवा हुईं। कितनों की रोजी रोटी का सिलसिला ही खत्म हो गया। और पता नहीं कितनों ने इस जख्म को अपने भीतर आज तक हरा रखा है और न जाने कितने सालों तक रखेंगे।
वैसे,हादसे के बाद मुंबई सड़कों पर भी आया था। उसने विरोध भी किया। उसने अपनी मांगें भी रखीं। नेता पहली बार सहमे से नजर आए। डरे हुए दिखे। ऐसा लगा कि अब जिम्मेदारी तय होगी। लेकिन नेता तो नेता है। ऐसे लोग भय से बहुत जल्दी ऊपर उठ जाते हैं। अब वो समाज में घूमते हैं, तो फिर अपनी जोडतोड़ में लगे हैं। उन्होंने कई चुनाव देख लिए और आगे देखने भी हैं, लिहाजा अब उसी जोड़तोड में लगे हैं।
मुझे अभी भी याद है कि 26/11 के हादसे के करीब एक हफ्ते बाद मैं सिनेमाघर में एक फिल्म देखने गया था। उस वक्त हम चार पांच लोग थिएटर में फिल्म देख रहे थे। और हर बार ऐसा लगता था कि फिल्म छोड़कर चले जाएं। ऐसा डर समाया था कि लगता था कि कभी भी कुछ भी हो सकता है। मुंबई की सड़कें सुनसान हो गई थीं। और ये बहुत दिनों तक रहा था। धीरे धीरे जीवन सामान्य होता गया और आज हम फिर उस जगह आ पहुंचे हैं कि जब हम बेफिक्र हैं।
लेकिन, सच यही है कि कहीं न कहीं वो भय अंदर तक समाया हुआ है। शायद सभी लोगों के भीतर और लोग बरसों तक उससे बाहर आ पाएंगे, ऐसा मुझे नहीं लगता। हर कोई ये दुआ कर रहा है कि ऐसा फिर न हो। लेकिन कौन जाने ? जब व्यक्ति ही व्यक्ति को मारने में तुला है और जब कारण अंजान हो चुका है, अपरिचित हो चुका है तो फिर ऐसा पता नहीं कितनी बार होगा और कहां-कहां होगा।
आज मैं दुबई में शूटिंग कर रहा हूं। एक एयरपोर्ट पर। एयरपोर्ट के इस कोने में उस तरह के विमान रखे गए हैं,जो सड़-गल गए हैं और जिनका कोई काम नहीं है। वो अब उड़ना भूल चुके हैं या फिर यूं कहें कि उड़ते-उड़ते थक चुके हैं। इनकी शक्ल कुछ वैसी ही दिखायी दे रही है,जैसी की हवाई दुर्घटना के बाद किसी विमान की शक्ल होती है। यहां पहुंचने के साथ ही ये जरुर अंदर आया कि अब अगर आप उड़ना चाहें तो बिना भय के नहीं उड़ सकते। भय-दहशत आज हमारे जीवन का हिस्सा हो चुका है। और पता नहीं कब तक रहेगा।
लेकिन इसी डर के बीच मैं उन सारे शहीदों को श्रद्दांजलि अर्पित करता हूं, जिन्होंने 26 नवंबर 2008 को लोगों की जिंदगी बचाते हुए अपनी जिंदगी कुर्बान की थी। मैं उन सारे परिवार के लोगों को अपनी सहानुभूति प्रकट करता हूं, जिन्होंने इस हादसे में अपने किसी न किसी को खोया है। हमें उन पर गर्व है, और उनका कर्ज हम यकीकन उतार नहीं सकते। बाकी देश वासियों और दुनियावालों से यही कहूंगा कि अपने आसपास की चीजों और व्यक्तियों से सजग रहें। चौकन्ने रहें। आंखें खुली रखें ताकि हम स्वयं इस समाज को लंबे वक्त तक भयमुक्त रख पाएं।
26/11 के आने से पहले भय में लिप्त लेकिन चौकन्ना और सजग रहने की कोशिश करते हुए मैं मनोज बाजपेयी आपसे फिर यही गुजारिश करता हूं कि हमारी सुरक्षा हमारे हाथ है, इसलिए जिम्मेदार बनें,सजग बनें।
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मनोज बाजपेयी
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Friday, November 13, 2009
देश को टुकड़े करने वाले बयानों को प्रमुखता न दे मीडिया
हाल फिलहाल में कई लोग मुझसे भाषा को लेकर कई सवाल कर रहे हैं। कुछ एक राजनेताओं ने भाषा और क्षेत्र को ही अपने राजनीतिक एजेंडा में रखा है। मीडिया भी उनके बयानों और उनकी करतूतों और हरकतों को दिखाए जा रही है। सुबह छह बजे से लेकर रात के 10-11 बजे तक उन्हीं राजनेताओं के बयान हेडलाइन की तरह आते रहते हैं और फिर आपसे उनपर कमेंट करने को कहा जाता है। मैंने दो साल पहले ही इस मुद्दे पर अपना कमेंट दे दिया था,जहां पूरे मीडिया को बुलाकर अपनी बात कही थी। उस वक्त मैंने मीडियाकर्मियों और राजनेताओं से आग्रह किया था कि न तो इस तरह की बयानबाजी करें जो देश को टुकडे-टुकड़े करने वाला है और न मीडिया इसे हर दिन हमारे चेहरे पर थोपती रहे। और हर दिन हमसे उस पर एक कमेंट की अपेक्षा करती रहे।
लेकिन मैं तो सिर्फ निवेदन ही कर सकता हूं। बाकी निर्णय उन राजनेताओं को लेना है और मीडिया को भी लेना है। मैं कौन होता हूं ? लेकिन यह अवश्य है कि मैं इस तरह के राजनीतिक एजेंडा और बयानबाजी पर अपने कमेंट कभी नहीं दूंगा। मैं विरोध जता चुका हूं। इस तरह के भाषा और क्षेत्र की मानसिकता के खिलाफ। अब इस तरह की हेडलाइन के खिलाफ हर दिन अपनी राय नहीं दूंगा क्योंकि मुझे लगता है कि रोज कुछ न कुछ ऐसा घट रहा है, जो हेडलाइन बन सकता है।
खैर, आपसे बात होती रहेगी। बहुत दिनों से पाठकों के कमेंट पर बात करने की इच्छा है। कोशिश करुंगा कि अगली पोस्ट में सिर्फ कमेंट पर बात करुं।
पुन: निवेदन कि जेल अवश्य देखें। हमने बहुत मेहनत से फिल्म बनायी है। आपको पसंद आए अथवा न आए, इसके बारे में अपनी राय मुझे जरुर दें।
इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी
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