Sunday, November 30, 2008

नशे में धुत है घर का रखवाला

इस वक़्त सिवाय क्रोध के कोई और भाव मन में नहीं आ रहा। क्या लिखें और क्या कहें, जो हुआ क्या वो रुक सकता था? वो ज़रुर रुक सकता था। क्या अब सब कुछ सही होगा? हमेशा की तरह सिर्फ़ उम्मीद कर सकते हैं। भरोसा तो अब रहा नहीं।

टेलीविज़न पर बहस शुरु हो चुकी है। अख़बारों में प्रतिक्रियाएँ और एडिटोरियल आना शुरु हो गए हैं। दान, चंदा और मदद देने की होड़ लग रही है। फिर से वही बीरबल के चोंचले। अब ये सब एक ऐसा चुटकुला लग रहा है, जो आप कई बार सुन चुके हैं और जिस पर अब हँसी भी नहीं आती। लोग गाजर-मूली की तरह मारे गए। लेकिन कुछ राजनीतिज्ञों के कान पर अभी भी जू नहीं रेंग रही है क्योंकि उनके घर का कोई नहीं मरा है, ये बात अब समझ में आ रही है। वो अब भी बयानबाज़ी कर रहे हैं क्योंकि वो ख़ुद सुरक्षा के घेरे में रहते हैं।

हम सबकी हालत आज ऐसी है कि हम अपने ही घर में चारदीवारी को लेकर चिंतित हैं। क्योंकि घर का रखवाला उस चारदीवारी पर बैठकर उसकी रक्षा करने की बजाय हम सबका मज़ाक उड़ाते हुए नशे में धुत है।

वो सारे दृश्य देखकर कितनी ही बार मन विचलित हुआ। और अब मैं सुन्न-सा बैठा हूँ। क्या मैं गर्व के साथ कह सकता हूँ कि मैं इस देश का नागरिक हूँ। जिस देश में किसी भी नागरिक की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं। लोग ऐसे मरे और मारे गए जैसे रोज़ बकरे हलाल होते हैं। लानत है, लानत है, लानत है।

सिर्फ़ ग़ुस्सा है मेरे मन में। कोई शब्द नहीं सूझ रहे हैं। शायद ढंग की बात अगली पोस्ट में ही कर पाऊंगा। मेरी श्रद्धांजलि श्रीकांते, हेमंत करकरे और विजय सालस्कर, संदीप उन्नीकृष्णन और सिपाही गजेन्द्र को। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को इस कठिन समय में शक्ति दे। मैं इस कठिन समय में चुप हूँ, ख़ामोश हूँ और यही प्रार्थना करता हूँ कि जो लोग इस हादसे में मारे गए भगवान उनकी आत्मा को सुकून दे। और उनके परिवार को भविष्य के लिए शक्ति दे।

अब सिर्फ़ एक वाक्य कि हमें इससे बहुत कुछ सीखना होगा।

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Monday, November 10, 2008

शूटिंग की व्यस्तता से ब्लॉगिंग पर ब्रेक

मित्रों,

सबसे पहले सभी पाठकों से माफी। मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था कि शूटिंग के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका जा रहा हूं। सोचा तो ये था कि वहां से भी नियमित लिखूंगा लेकिन दिन-रात का व्यस्त कार्यक्रम और इंटरनेट की सुचारु व्यवस्था न होने से यह काम नहीं कर पाया।

फिलहाल, 'एसिड फैक्ट्री' की शूटिंग में ही व्यस्त हूं। अब मलेशिया के लिए निकल रहा हूं। वहां कुछ दिनों का शिड्यूल है। उम्मीद है कि तय वक्त में काम निपट जाएगा और इस महीने के आखिरी हफ्ते में फिर मुंबई में आ जाऊंगा।

केपटाउन में शूटिंग के दौरान मेरी पत्नी भी साथ थीं। उनकी भी इस फिल्म में एक मेहमान भूमिका है। वैसे,जब भी हम दोनों साथ किसी दूसरे देश जाते हैं तो वहां के प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने के साथ वहां की संस्कृति को समझने की कोशिश करते हैं। इस बार भी यही हुआ। शूटिंग के दौरान भी कुछ रोचक वाक्ये हुए। जिन्हें मैं विस्तार से लिखूंगा।

फिलहाल, क्षमा याचना के साथ

आपका और आपका

मनोज बाजपेयी

Monday, October 13, 2008

क्रिकेट और मैं

क्रिकेट का बुखार शुरु हो चुका है। अब ये उतरने का नाम नहीं लेगा, जब तक सीजन खत्म न हो जाए। और तब तक मेरी पत्नी मुझसे चिड़ती- नाराज होती घर में घूमेंगी क्योंकि उन्हें ये खेल बिलुकल पसंद नहीं है। इस खेल,जिमें गतिविधि के नाम पर एक बॉल डाल रहा होता है और एक बल्ला लिए गेंद को मारने की कोशिश कर रहा होता है,उसके रोमांच को मैं तमाम तर्कों के बावजूद समझा नहीं पाया। लेकिन,इन दिनों उनमें एक अजीब बदलाव देख रहा हूं। कभी-कभी जब मैं मैच देखता हूं तो कुछ रुचि दिखती है उनके चेहरे पर। भगवान से यही दुआ करता हूं कि कभी कभी की ये रुचि ठोस भाव ले ले। वैसे, उन्हें फुटबॉल के अलावा कोई भी खेल समझ नहीं आता। वो अपनी जगह सही हैं।

11 तारीख को सुबह श्री अमिताभ बच्चन जी को उनके जन्मदिन पर बधाई संदेश भेजा। पर दोपहर तक पता चला कि वो हॉस्पीटल में हैं। अपनी आंत की समस्या के कारण। मेरी उन्हें जन्मदिन पर हार्दिक बधाई। साथ यह कामना कि वो जल्द स्वस्थ होकर लौट आएं।

आजकल मुंबई के सारे काम निपटा रहा हूं। क्योंकि लगभग एक महीने के लिए तीन चार दिनों में विदेश जाना होगा। एसिड़ फैक्ट्री की शूटिंग के लिए। बारिश के कारण इस फिल्म की शूटिंग मे कुछ रुकावट आ गई थी। एक शिड्यूल खत्म कर चुके थे हम तीन ङफ्ते पहले और अब अंतिम शिड्यूल पूरा करने जा रहे हैं।

बहुत खुशी है कि यूनिट के सारे दोस्त दोस्तों और साथी कलाकारों से फिर मिलना है। अभी भी प्रोडक्शन हाउस से कैपटाउन के मौसम की जानकारी ली है ताकि उसी हिसाब से कपडे ले जा सकूं। अपने सचिव श्री त्रिपाठी से बाकी फिल्मों और उनकी तारीखों के बारे में जानकारी लेकर यह पोस्ट लिखने बैठा। मुंबई की ऊमस ने बड़ा परेशान कर रखा है। इतना कि कुछ करने का मन नहीं करता। एक खीज सी रहती है। लेकिन फिर भी काम में लगे रहना पड़ता है। और काम है कि जिसे छोड़ने का मन नहीं करता। लेकिन अंतत: अगर मौसम भी साथ दे तो काम करने का मजा भी दोगुना हो जाए।

खैर,फिर बात क्रिकेट की। आशा करता हूं कि दूसरी पारी में सहवाग का बल्ला चलेगा और इंडिया टेस्ट मैच जीतेगी। तेंदुलकर वैसे मेरे चहेते हैं लेकिन उनकी ऊहापोह की स्थिति देखकर बहुत दुख होता है।

टेस्ट में जीतने की आशा के साथ ये भी आशा करता हूं कि एक या दो दिन में श्री अमिताभ बच्चन स्वस्थ होकर अपने घर लौट आएंगे। उनसे एक कार्मिक रिश्ता है, जो हमेशा चाहता रहेगा कि वो सदा सुखी और स्वस्थ रहें और हमें अपना आशीर्वाद देते रहें।

इसी के साथ आपका और आपका
मनोज बाजपेयी।

Monday, October 6, 2008

क्यों रोज़ सवालों के घेरे में आता है हमारा प्रजातंत्र?

वैसे तो मन बिलकुल नहीं कर रहा कुछ भी लिखने का। दरअसल, कभी-कभी लगता है कि अपने बारे में क्या लिखना। ऐसा कुछ भी तो नहीं है, जो दूसरों से अलग हो। दिनचर्या भी वही, दिनचर्या की नियति भी वही। सुबह काम पर जाना, वापस आना और सो जाना। वैसे, सपने देखना कभी नही छोड़ता - एक आदर्श देश, आदर्श परिवार और आदर्श व्यक्तिगत जीवन के। निजी जीवन और परिवार में कभी-कभी वो हासिल कर भी पाता है आदमी, लेकिन समाज और देश में तो करोड़ो लोग हैं और करोड़ों के मन का मिलना मुश्किल ही नहीं, कभी-कभी असंभव भी लगता है।

टीवी पर एक बहस देख कर उठा हूँ। थोड़ा झुंझलाया और थोड़ा निराश हूँ। एक तरफ़ जामिया नगर में एनकाउंटर का राजनीतिकरण और दूसरी तरफ़ कंधमाल में बलात्कार और हिंसा की घटनाओं के बाद उठती हुई राजनीति की बू। घिन आने लगी है उन चेहरों से भी, जो इस तरह की प्रकिया में लीन हैं। ग़ुस्सा आता है कभी-कभी अपने होने पर भी, और इन सबका परिणाम है आज की पोस्ट। लिखने का मन नहीं था तो सोचा कि भड़ास ही निकाल लूँ।

हिंसा, बलात्कार और शोषण को आप किसी भी तर्क से दबा नहीं सकते। न सही ठहरा सकते हैं। जो समुदाय या व्यक्ति हिंसा करता है, उसे उसी वक़्त सज़ा देने का प्रावधान भी होना चाहिए। लेकिन ऐसा न होने से लगातार प्रजातंत्र का मखौल उड़ाया जाता है। आज देश एक होते हुए भी बँट गया है। हिंसा के कारणों से, भाषा के कारणों से, जात-पात के कारणों से। लेकिन फिर भी हम हैं कि सिर्फ़ काम पर जाते हैं, आते हैं और सो जाते हैं। लेकिन कहीं-न-कहीं कुछ लोग हैं, जो आपको विश्वास दिलाते हैं कि सब सही होगा। उन लोगों के होने के कारण शायद एक आशा बंधी हुई है। प्रजातंत्र पहले कभी-कभी सवालों के घेरे में आता था, आज हर दिन सवालों के घेरे में खड़ा होता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम सब पहले अपने आप को मानव समुदाय का मानकर और देश का नागरिक मानकर एक क़दम चलने की कोशिश करें। धर्म, क्षेत्र, भाषा - इन सबकों थोड़ा किनारे करें। मानव जाति और देश को सर्वप्रथम रखें। ख़ैर, भड़ास निकालनी थी सो निकाल दी। इसी के साथ -

आपका और सिर्फ़ आपका

मनोज बाजपेयी

Wednesday, October 1, 2008

कैसा दुःखद आरंभ नवरात्र का

जब अपने बस में कुछ नहीं रह जाता, तब व्यक्ति सरकार और तंत्र पर भरोसा जताता है। सरकार और तंत्र ही असफल हो जाएँ तो भगवान के दर पर जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। लेकिन, जब भगवान ही रखवाली न कर पाएँ तो किसके दर पर जाएँ? इच्छा थी कि इस बार कुछ और विषयों पर लिखूँ, लेकिन जोधपुर के चामुंडादेवी मंदिर के हादसे के एक-एक दृश्य ने मुझे झकझोर कर रख दिया। कुछ ऐसी ही छोटी-सी घटना इलाहाबाद के एक मंदिर में भी हुई। फिर मालेगांव और साबरकांठा में एक दिन पहले ब्लास्ट भी हुआ। जान-माल की क्षति अगर गिनने जाएँ तो जिह्वा थक-हार जाए, पर मरने वालों की गिनती न पूरी हो सके। कैसा दुःखद आरंभ नवरात्रि का। मैं पूरी तरह से हिला हुआ हूँ। मेरी तरफ़ से सभी मृतकों को भावभीनी श्रद्धांजलि। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिजनों को दुःख के इस क्षण में शक्ति दे।

अब तो ऐसा लग रहा है कि व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। 120 करोड़ लोगों का विश्वास टूटता जा रहा है। पहले वो भरे बाज़ार में सुरक्षित नहीं थे, अब वो भगवान के दरबार में भी सुरक्षित नहीं हैं। सबने इनको बेसहारा छोड़ दिया है। कहीं परमाणु संधि वार्ता सफल होने की ख़ुशी मनायी जा रही है, कहीं पर कई सारे घरों में इस साल दीवाली के दीए नहीं जलाए जाएंगे। नैना देवी, चामुंडा देवी, बिहार की बाढ़, बम ब्लास्ट जैसे तमाम हादसों के बाद इस बार कम-से-कम मैं तो घर में दीवाली नहीं मना पाऊंगा। दीवाली नहीं मनाना, मारे गए लोगों के प्रति संवेदना जताने की वजह से, और कहीं-न-कहीं विरोध में भी। दरअसल, अब समय आ चुका है कि हम करोड़ों लोगों की अपेक्षा पर तंत्र खरा उतरे।

मैं एक कलाकार हूँ। अपनी कला के प्रति पूरा समर्पण है। लेकिन इस समाज में रहते हुए मेरा कर्तव्य है कि मेरे साथ इस समाज में जो भी लोग रह रहे हैं, उनकी सुख और भलाई के लिए कुछ न सही तो अपने ब्लॉग पर ही अपनी बात रख सकूँ। अपना विरोध जता सकूँ।

उफ़... कैसा रहा ये साल! कैसे कोई उत्सव मनाए! किसी पत्रकार मित्र से मैंने कहा कि ब्लॉग से एक बात अच्छी हुई कि मैं अपने दिल की बात कह सकता हूँ। अपनी भड़ास निकाल सकता हूँ। उन्होंने कहा कि ये आपकी भड़ास नहीं, आपकी चिंता ज़्यादा नज़र आ रही है। लेकिन शायद चिंता भी एक भड़ास के रुप में बाहर आना आवश्यक है। मैंने हमेशा यह माना है कि हम अमेरिका के अभिनेता नहीं है, जो अपने आप को देश के मौजूदा हालात से अलग रख पाएँ। हम ऐसा कर ही नहीं सकते। हमारा देश अभी ग़रीब देश की संज्ञा से उबर ही रहा है। कुछ न सही तो किसी-न-किसी माध्यम से मौजूदा भ्रष्टाचार, महंगाई, ग़रीबी के ख़िलाफ़ आवाज़ तो उठा ही सकते हैं। और कुछ नहीं तो ऐसा करके लगता है कि मैं अपने होने के साथ न्याय कर रहा हूँ। पता नहीं कितने लोग मेरी बात से सहमत होंगे क्योंकि जो हालात हैं, अभी वहाँ पर Escapism ही सफलता का मूल मंत्र है। अगर है तो फिर यही सही। कौन घर से बंगला निकालने निकला था। आज अगर एक अभिनेता के तौर पर अपने मन का काम कर लेता हूँ, और अपने घर को अच्छी तरह चला लेता हूँ तो यही बहुत है। मैंने हमेशा माना कि मैंने अपने सपने से ज़्यादा ही पाया। अभिनय छोड़ नहीं सकता। ये मेरा ऑक्सीजन है। लेकिन, ब्लॉग पर अपनी चिंता को लोगों के साथ बाँट तो सकता ही हूँ। और अपनी चिंता की भड़ास तो निकाल ही सकता हूँ।

आज की पोस्ट ख़त्म करने से पहले सिर्फ़ इतना कहना चाहूंगा कि शाम को बहुत सारे चैनलों पर मैं चामुण्डादेवी की त्रासदी के बारे में कुछ और जानना चाह रहा था, लेकिन 95 प्रतिशत चैनल पर सिर्फ़ कॉमेडी से जुड़े कार्यक्रम ही दिखाए जा रहे थे। अब तो इन 185 लोगों का मरना भी कोई समाचार नहीं बना सकता। वाह रे टीआरपी, वाह रे बॉक्स ऑफ़िस।

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Saturday, September 27, 2008

अब तो डर लगता है..

कई साल पहले की बात है। मैं पांचवी क्लास में पढ़ता था। अपनी गर्मियों की छुट्टियों में स्कूल के एक टूर पर निकला था - कश्मीर की तरफ़। रास्ते में हम दिल्ली में भी रुके थे। लाल क़िला, क़ुतुब मीनार वगैरह तमाम दिलचस्प जगह हमें दिखायी गईं। क़ुतुब मीनार के नीचे खड़े होकर अलग-अलग दिशा से, अलग-अलग एंगल से फ़ोटो खिंचवाए हमनें। शायद वो फ़ोटोग्राफ आज भी कहीं किसी कोने में रखे होंगे। उस समय ये अंदाज़ भी नहीं था कि इसी के पास कोई बहुत ही शैतानी दिमाग़ एक बम का धमाका करेगा और बिना किसी कारण एक बच्चे की जान ले लेगा। इसी धमाके में कुछ लोगों को जख़्मी कर देगा। अब तो डर लग रहा है। हर उस शख़्स के लिए डर लग रहा है, जो बाज़ार घूमने जाता है। जो स्कूल पढ़ने जाता है। जो सिनेमा देखने जाता है। जो मेला घूमने जाता है। जो भी व्यक्ति भीड़-भाड़ वाले इलाक़े में तफ़रीह करने या ज़रुरी सामान लेने जाता है।

आज हमें भी अपनी जान का ख़तरा लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि शायद मौत अचानक किसी बीमारी से न आकर किसी बम के धमाके के बीच होगी। क्यों मर रहे हैं लोग? क्या कसूर है इनका? जो मार रहे हैं उनके पास कारण क्या है? बहुत समझने की कोशिश की मारने वाले के कारण के बारे में समझने की। लेकिन, मेरी समझ से तो यह परे है। किसी को क्या अधिकार है कि वो मासूमों पर बम फेंकना शुरु करे? आज ज़रुरत इस बात की है कि हम अपनी जान बचाने के लिए सजग रहें। ज़रुरत इस बात की है कि हम जहाँ भी रहें उसकी रखवाली खुद करें। आज आवश्यक हो गया है कि हम सब ही मिलकर इस जंग को लड़ें। क्योंकि लगता तो नहीं है कि कोई और हमारी लड़ाई लड़ने वाला है।

मेरी श्रद्धांजली उस मासूम के लिए और उन सभी के लिए, जिनकी जान महरौली के धमाके में गई। संवेदना उन सभी लोगों के साथ है, जो हताहत हुए हैं।

इस दुःखद हादसे के बाद अचानक लिखने का मन हो बैठा। हाँ, अंत में अपने दोस्त इमदाद को कहना चाहूंगा कि भई उम्र हो गई है, बच्चों की तरह रुठा न करें। और रुठ ही गए हो तो क्षमा चाहूंगा। बहुत साल पहले की बात है। बहुत सारी बातें अब जल्दी याद नहीं आती हैं। आप जहाँ हैं ख़ुश रहें। ऊपर वाले का आशीर्वाद आप पर और आपके परिवार पर बना रहे।

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, September 25, 2008

आराम का आनंद ले रहा हूं मैं

पिछली कुछ पोस्ट पर भेजी आप लोगों की प्रतिक्रियाएं पढ़ीं। आश्चर्य इस बात का है बहुत सारे लोग आज भी धर्म की वजह से एक दूसरे से घृणा भी करते हैं। कोफ्त इसलिए नहीं होती क्योंकि अपनी बात कहने का सभी को अधिकार है। हां,मैंने पिछली पोस्ट या अभी तक ब्लॉग में जो भी लिखा है,वो मेरे विचार हैं। दूसरो का इससे सहमत होना या न होना, आवश्यक नहीं है।

खैर, इन दिनों मैं कुछ खाली हूं क्योंकि बारिश की वजह से फिल्मों की शूटिंग कैंसिल हो गई हैं। एक शूटिंग के सिलसिले में हैदराबाद जाना था,लेकिन वहां भी यूनियन की हड़ताल के चलते शूटिंग रद्द हो गई। वैसे अच्छा है,घर भी जितना ज्यादा वक्त बिताने का मौका मिल जाए, उतना अच्छा है।

वैसे भी मैं थोड़ा आलसी प्रवृत्ति का व्यक्ति हूं। काम कम करना मेरी फितरत रही है। इस बीच,कुछ मीटिंग्स कीं। बहुत स्क्रिप्ट भी पढ़ीं। लेकिन, मज़ा नहीं आया। एक साहब की स्क्रिप्ट अच्छी लगी तो उनके पास प्रोड्यूसर नहीं है। और अब वो एक निर्माता खोजने निकले हैं।

जिन निर्माताओं की फिल्म की शूटिंग रद्द हुई है, समझ नहीं आ रहा कि उनकी डेट से तालमेल कैसे बैठाऊं। इसी ऊहापोह में समय गुजर रहा है। दिल्ली जाने की इच्छा हो रही है,लेकिन लगता है कि यहां जो काम हैं, उन्हें निपटा लिया जाए। बस, उन्हीं कामों को पूरा करने में लगा हूं और सामान सूटकेस से वापस निकालकर अलमारी में ऱखता जा रहा हूं।

अभी, सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि दिल्ली में आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ में हुए शहीद हुए इंस्पेक्टर स्वर्गीय मोहन चंद शर्मा को मेरी तरफ से श्रद्धांजलि। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को इस कठिन समय में शक्ति दे।

इसी के साथ,
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी