Thursday, July 9, 2009

सिर्फ लिखता नहीं, ब्लॉग पढ़ता भी हूं

मैंने माइकल जैक्सन से बड़ा सितारा इस उम्र में न तो देखा और न सुना। एक ऐसा सितारा, जो मेरे गांव से लेकर अमेरिका की गली गली में जाना पहचाना गया। विवादों से घिरी जिंदगी, परिवार से दूर जिंदगी, अकेलेपन से घिरी जिंदगी, प्यार की खोज में भटकती जिंदगी और बहुत सारी सफलताओं से भरी जिंदगी। वो अचानक अकेलेपन में ही खो गई। माइकल जैक्सन के जाने के बाद लोगों को अहसास हो रहा है कि उन्होंने कितनी बड़ी प्रतिभा को खोया है। ऐसा मशहूर सितारा शायद आने वाले कई सालों तक हमें देखने और सुनने को नहीं मिलेगा। मेरी तरफ से माइकल जैक्सन को श्रद्धांजलि। भगवान उनके बच्चों को स्वस्थ और सुरक्षित रखे।

पिछली पोस्ट में मैंने लिखा था कि पाठकों की प्रतिक्रियाओं का उत्तर देने की कोशिश करुंगा। मुझे अच्छा लगता है कि लोग ब्लॉग पढ़ते हैं, और अपनी राय रखते हैं।

मेरी पिछली पोस्ट “मुंबई में खुली जगह कहां” पर कई पाठकों ने सहमति जताई। इसका शुक्रिया। वैसे,मैं सिविल इंजीनियरिंग के मामले में बिलकुल नादान हूं, इसलिए इसका सटीक हल मेरे पास नहीं है,लेकिन इतना विश्वास है कि अगर एक्सपर्ट लोग इस गंभीर समस्या के हल के बारे में सोचें तो कुछ हल जरुर निकल सकता है।

किसी पोस्ट की प्रतिक्रिया में भाई इरशाद अली और विजय वडनेरे ने पूछा है कि आप दूसरों के ब्लॉग भी पढ़ते हैं या सिर्फ अपना ब्लॉग देखते हैं? मैं कहना चाहूंगा कि शायद सभी ब्लॉग नहीं पढ़ पाता हूं,लेकिन जब मौका मिलता है कि तो खास और आम सभी के ब्लॉग देखने की कोशिश करता हूं।

संध्या आर्य ने भी एक पोस्ट की प्रतिक्रिया में क्षेत्रवाद के बाबत बात की है। मुझे लगता है कि बढ़ता क्षेत्रवाद गंभीर विषय है। इसकी जितनी निंदा की जाए,उतनी कम है। राजनेता अपने बैंक को सुरक्षित रखने के लिए इस तरह की बातों को हवा दे रहे हैं। मेरे बहुत सारे मराठी दोस्त हूं। मैं आम लोगों में भी घूमता फिरता हूं। वो इस सारी घटना पर अफसोस जताते हैं। और हम सभी ने खुले शब्दों में इसकी निंदा भी की है। टेलीविजन के माध्यम से और समाचार पत्रों के जरिए भी। अगर कोई कानून हाथ में लेता है तो कानून उसे सजा दे। हम और आप एक दूसरे से झगड़ा करके, उसका निदान नहीं निकाल पाएंगे।

जिन दिनों मैं करजत में जेल की शूटिंग कर रहा था, कुछ पोस्ट मैंने वहीं से लिखीं। उन पोस्ट में करजत का लगातार जिक्र आया था। इस दौरान रानी पात्रिक ने एक कमेंट में लिखा कि करजत से आगे की बात कीजिए। तो लीजिए मैं उन्हें बता दूं कि अब मैं करजत में नहीं हैदराबाद में हूं। अपने एक तमिल मित्र की तेलुगु फिल्म के सिलसिले में। अनुभव बहुत अच्छा है। यहां के लोग बहुत मेहनती हैं। यहां का खाना बहुत अच्छा लग रहा है। ढाई साल पहले, जब से सिगरेट छोड़ी है, अलग-अलग तरीके के खाना खोजने और खाने में मजा आने लगा है। क्योंकि मेरा मानना है कि भोजन भी एक क्षेत्र की संस्कृति का हिस्सा होता है। वो संस्कृति की बात भी कहता है और खुद में इतिहास भी समेटे रहता है। रानी जी, कभी हैदराबाद आना हो, तो एक रेस्तरां है अंजपर। पंचगुटा में। वहां खाना जरुर खाइएगा। केले के पत्ते पर खाना खाने का जो मजा आपको आएगा,वो आप कई दिनों तक याद रखेंगी।

वैसे, प्रतिक्रियाओं को देखते हुए एक बात अच्छी लगी कि कई पाठक बहस को आगे बढ़ाते हैं,तो कई किसी समस्या का हल खोजने की कोशिश में आगे आते दिखते हैं। हेमंत कुमार, गिरजेश राव, राजीव रंजन, अनिल कांत, सतीश पंचम, अजय कुमार झा, सागर नाहर, पुखराज, यायावर जैसे कई पाठक लगातार कमेंट कर हौसला बढ़ा रहे हैं। सभी का नाम लेना संभव नहीं है,लेकिन आप सभी का शुक्रिया।

कई पाठकों ने मेरी आने वाली फिल्मों के बारे में पूछा है कि तो मैं कहना चाहूंगा कि मेरी आने वाली फिल्में हैं-एसिड़ फैक्ट्री, जेल और राजनीति। इन सभी पर काम चल रहा है। सितंबर से ये फिल्में रीलिज होना शुरु होंगी। अवश्य देखें। मुझे काम करने में मजा आया। उम्मीद है कि आपको देखने में भी मजा आएगा।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, June 23, 2009

मुंबई में अब कहां बची है खुली जगह

शाम को टहलने निकला तो बहुत अच्छा लग रहा था। आज पहली बार यहां रहते हुए सुंदर से पार्क में अलग अलग से चेहरों को देखते हुए, उनकी गतिविधियों और हावभाव को निहारते हुए अपनी वॉक पूरी कर रहा था। यहां ठीक मेरी बिल्डिंग के सामने टहलने के लिए एक बहुत ही कम जगह में पार्क बनाया गया है। इसमें आसपास के लोग वर्जिश करने या टहलने के लिए उमड़ पड़ते हैं। आखिर क्यों न करें। यहां पर खुली जगह की कितनी कमी है !

लेकिन, टहलते वक्त ही अचानक मुझे ख्याल आया है कि इस पूरे मुंबई शहर में अब खुलापन बचा ही नहीं है। बच्चों के पार्क खत्म हो गए हैं। पेड़-पौधे भी जा रहे हैं। शहर बढ़ता ही जा रहा है। विकास के नाम पर इमारतें खड़ी हो रही हैं। खाली जगहों को गगनचुंबी ढांचों से भरा जा रहा है। एसईजेड बन रहे हैं, जिसके बारे में मैं थोड़ा अज्ञानी हूं। वर्जिश और टहलने के नाम पर जिम बनाए जा रहे हैं। मतलब ये कि अब हरे भरे पेड़, खेत-खलिहान सब धीरे धीरे विकास की भेंट चढ़ा दिए जाएंगे। कितना भयावह दृश्य होगा-पूछिए मत! सरकार को, लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए।

इस बीच हिंसा का तांडव चारों ओर लगातार दिख रहा है। लोग जितने उदास थे। नाखुश थे। अब गुस्सा हो रहे हैं। सोफियान हो या फिर लालगढ़। इन सबका निदान ढूंढना अब सरकार के ही हाथ में है। ऐसा क्यों होता है, जब हिंसा से लोग अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं, तभी सरकार सुनती है। वोट बैंक की राजनीति कम होने का नाम ही नहीं लेती। पहले लोकसभा चुनाव और उसे जीतने के हथकंडे। अब विधानसभा के चुनाव और उसे जीतने के हथकंडों में वक्त लगा रही है। लोगों की समस्याएं, उनके अंतरमन को छू भी नहीं पाती है। लोग अब भेड़ बकरी हो चुके हैं या शायद पहले भी थे। इन नेताओं, अफसरों की दृष्टि में। तभी शायद आज तक हमें अनदेखा किया जाता रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि हम शीघ्र इनके बारे में सोचें नहीं तो ये लोग सिस्टम पर ही सवाल खड़ा करना शुरु कर देंगे। फिर क्या बचेगा।

ये एक भड़ास थी मन के अंदर की, जो मैं अपने ब्लॉग के जरिए निकाल रहा हूं।

वैसे, ब्लॉग पर पाठकों की प्रतिक्रियाएं लगातार आती हैं तो अच्छा लगता है। कुछ लोगों ने शिकायत भरे लहजे में कहा है कि मैं पढ़ता भी हूं या नहीं तो मैं कहना चाहूंगा कि पढ़ता जरुर है। जवाब देना हर बार मुमकिन नहीं होता। हां, अगली पोस्ट में पिछली कई पोस्ट में पूछे सवालों और बातों का जवाब देने की कोशिश करुंगा।

बस, इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, June 2, 2009

विरोध हो, लेकिन कायदे से

एयरफ्रांस के विमान के दुर्घटना ग्रस्त होने की खबर देखी तो दिल दहल उठा। मैं दुर्घटनाग्रस्त लोगों के परिवार वालों की हालत सोचकर ही सिहर उठ रहा हूं। और क्या हाल हुआ होगा उनका, जो इस हवाई जहाज में सवार होंगे। हवाई जहाज की यात्रा सबसे सुरक्षित यात्राओं में मानी जाती है। लेकिन, जब इतने बड़े जहाज का यह हश्र होता है तब कहीं भी यात्रा करने से पहले आदमी यही सोचता है कि वो आखिरी बार परिवार वालों से मिल रहा है। मेरी संवेदनाएं उन सभी दुर्घटनाग्रस्त लोगों के परिवार वालों के साथ है। और जो लोग इस हादसे में मारे गए हैं,भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।

टेलीविजन पर देखा कि कुछ लोगों ने श्रमजीवी एक्सप्रेस को जला दिया। उनकी शिकायत थी कि ट्रेन ने कुछ स्टेशनों पर रुकना बंद कर दिया था। पहली बात तो ये कि शिकायत जायज थी। लेकिन शिकायत दर्ज कराने का ये कौन सा तरीका है? जो ट्रेन, बस आपकी सुविधा के लिए बनायी गई है, आप उन्हीं को तोड़फोड़ देते हैं या आग के हवाले कर देते हैं। ट्रेन रहेगी ही नहीं तो रुकेगी क्या खाक आपके स्टेशन पर।

विरोध दर्ज कराने के कई तरीके हैं। उनका सहारा जरुर लेना चाहिए। लोगों को मारना, चोट पहुंचाना, बिल्डिंगे जला देना, बस फूंक देना - क्या हम अपना ही नुकसान नहीं करते हैं। ये सोचने के लिए गंभीर विषय है।

अभी मैं मधुर भंडारकर की फिल्म से फारिग हुआ हूं। ‘जेल’ की भूमिका के लिए जो चेहरा बदला था, उस चेहरे को वापस मनोज बाजपेयी बनाने में लगा हुआ हूं ताकि अगली फिल्म पर काम किया जा सके। इसी बीच, हैदराबाद जाने का भी प्लान बना है। वहां से मैं दिल्ली चला जाऊंगा। शुरु के कुछ दिन अपने ससुराल वालों से मिलने के बाद अपने माता पिता और भाई बहनों के साथ रहूंगा। ऐसी मेरी योजना है।

इस बीच कहीं पर पढ़ा कि एक अभिनेता का ब्लॉग सबसे ज्यादा पढ़ा जा रहा है। टेलीविजन वालों ने इस पर एक प्रोग्राम ही बना दिया। टेलीविजन वालों को एक चींटी ने हाथी को काटा- अगर इस विषय पर भी प्रोग्राम बनाने का मौका मिले तो वो आधे घंटे का सदुपयोग कर सकते हैं। जरुरी ये नहीं है कि कितने लोगों ने पढ़ा। जरुरी ये है कि जो लिखा जा रहा है, वो कितना सामयिक है, कितना सही है और कितना न्यायंसंगत है। मैं खुश हूं कि मैं अपनी एक हफ्ते की सारी बातें अपने ब्लॉग पर लिख कर अपने मन की भढ़ास निकाल लेता हूं। मैं खुश हूं कि मैं किसी पर छींटाकशी नहीं करता। मैं खुश हूं कि जितने भी लोग मेरे साथ जुड़े हैं, वो मेरे दोस्त बने हैं।

आशा करता हूं कि ब्लॉग की ये यात्रा इसी तरह सकुशल तरीके से आगे और बहुत आगे तक जाएगी। क्या ये यात्रा का उद्देश्य नहीं होता कि हम सही सलामत अपनी मंजिल तक पहुंचे। कितनी जल्दी पहुंचे, क्या ये मायने रखता है। अगर नहीं तो मेरे जीवन की, अभिनय की और ब्लॉग की यात्रा जारी है।

ब्लॉग के जरिए जो लोग मेरे साथ जुड़ रहे हैं, उन सभी को मेरी तरफ से धन्यवाद और शुभकामनाएं।

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, May 14, 2009

हर नया किरदार बहुत पीड़ा देता है...

अभी तक मैं करज़त में ही हूं। शायद एक दो दिन में वापस मुंबई जाने के लिए अपनी पैकिंग शुरु करुं। बहुत गर्मी है यहां । लेकिन, शाम का समय अच्छा गुजर जाता है। बाकी कुछ सह कलाकार पनवेल के एक होटल में रुके हैं। दो दिन से उन्हीं के साथ जाकर गपशप मारता हूं, जब भी शूटिंग से वक्त मिलता है। क्योंकि ऐसी जगह पर जहां पर शूटिंग के अलावा और कोई गतिविधि न हो आप कितना पढ़ लेंगे, कितना टीवी देख लेंगे या कितना टहल लेंगे।

थोडी सी ऊब भी होने लगी है। शायद इसलिए क्योंकि मन जानता है कि अब हम जाने वाले हैं। बाकी की शूटिंग मुंबई शहर में ही होगी। फिल्म की शूटिंग का अपना एक उतार चढ़ाव होता है। ज्यादातर लोग ऐसे मिलते हैं, जिनके साथ आपने कभी काम नहीं किया होता। शुरुआत के दिनों में आपको चरित्र को लेकर घबराहट महसूस होती है। नए डायरेक्टर, नए सहकलाकारों और नये तकनीशियनों के साथ जान पहचान न होने के कारण अमूमन आप संबंधों को विकसित होने देना चाहते हैं, जिसमें वक्त लगता है। जब तक फिल्म खत्म होती है, तब तक आप एक दूसरे से इस कदर जुड़ जाते हैं कि छूटने का अफसोस होता है।

आईपीएल के मैच चल रहे हैं। उसने भी अच्छा खासा समय लिया है। चाहे देखने में हो या बैठकर मैच के बारे में बात करने में । लेकिन, कुल मिलाकर ये कहूंगा कि ‘जेल’ की शूटिंग के दौरान बहुत मजा आया । एक ऐसा रोल करने का मौका मिला, जिसके पास संवाद बहुत कम है। मेरा किरदार सिर्फ अपनी आंखों से भावनाओं को व्यक्त करता है। मुश्किल है लेकिन हर नया किरदार अपने तरीके की मुश्किलें लाता ही है।

फिल्म पर्दे पर आने से पहले कई स्तरों से गुजरती है। जिसमें एडिटिंग एक बहुत बड़ा पहलू होता है। देखें, उस अवस्था के बाद फिल्म कैसी लगती है और मेरा अभिनय कैसा निकलकर आता है। आत्मशंका अभिनेता के साथ हमेशा ही जुड़ी रहती है। वो दुनिया के सामने क्यों न शर्ट के बटन खोल कर घूम रहा हो लेकिन अंदर से हमेशा घबराया होता है कि क्या वो हकदार है पैसे का, प्रेम का, नाम का, जो उसे मिल रहा है?

अभिनय करने से पहले वो घबराहट अपना बड़ा स्वरुप ले लेती है। नया चरित्र निभाने के समय वो कई बार अपने आपको इसी प्रश्न के घेरे में लेता है कि क्या वो अच्छा अभिनेता है। या फिर अभिनेता है या नहीं है। बड़ी पीड़ा होती है अभिनय करते हुए। उस पीड़ा के बाद काम सही निकल कर आ जाए तो उससे ज्यादा खुशी भी कहीं नहीं मिलती। मेरे ख्याल से हर रचनात्मक काम में कलाकार को ऐसी ही पीड़ा होती है।


राजनीति की गहमागहमी हमें सुनायी देती रहती है। क्रिकेट के चौके- छक्के मौके मिलने पर देखे जाते हैं। लेकिन, इन सबसे दूर हम अपनी एक बहूमूल्य फिल्म ‘जेल’ की गतिविधि में जुटे हैं। आशा करता हूं कि मुंबई इंडियंस अपना स्थान सेमीफाइनल में बना पाएगा। उम्मीद करता हूं कि एक स्वस्थ और काबिल सरकार हमें पांच सालों के लिए मिलेगी। ये प्रार्थना करता हू कि ‘जेल’ में जो मेहनत की, उसका फल हमें अच्छा मिलेगा।

इसी आशा, उम्मीद और प्रार्थना के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Saturday, April 25, 2009

जन्मदिन पर भावुक बनाया 'जेल' की यूनिट ने

कुछ दिनों से मैं करजक में ही हूं। किसी से बात नहीं हो पाती क्योंकि मोबाइल नेटवर्क ठीक नहीं है यहां। इस कारण सुकून भी है। लेकिन,थोड़ी परेशानी भी क्योंकि कहीं न कही मोबाइल फोन अब जीवन का हिस्सा भी बन चुका है।करज़क में एक रिजॉर्ट में रुका हूं। मेरे ठीक सामने वाले कमरे में फिल्म के अहम कलाकार नील नीतिन मुकेश ने अपना पूरा घर बसाया हुआ है। करज़क की खासियत ये है कि मुंबई शहर से थोड़ा सा दूर होने के बावजूद मुंबई की भागमभाग से अलग है।

यातायात की असुविधा के कारण करज़क पहुंचने में दो ढाई घंटे लग जाते हैं। यहां जिस स्टूडियो में काम चल रहा है,वो मेरे रिजॉर्ट से 15 मिनट की दूरी पर है। अमूमन रोल कुछ ऐसा है कि मेरी जरुरत दोपहर के खाने के बाद होती है। सुबह आराम से उठकर मेकअप कराके समय पर जरुरत के मुताबिक पहुंच जाता हूं।

23 अप्रैल को ही मेरा जन्मदिन गुजरा। उसके दिन दिन पहले ही घर जाकर आया था ताकि पत्नी को कहीं जन्मदिन छूटने का अहसास न हो। वैसे, हम दोनों का मानना है कि जन्मदिन के अवसर पर काम करना शुभ होता है। 'जेल' फिल्म की यूनिट ने मुझे उस वक्त आश्चर्यचकित कर दिया, जब मैं काम में व्यस्त था और सभी ने अचानक टेबल सजाकर उस पर मेरे नाम का केक लाकर रख दिया। थोड़ी शर्मिन्दगी हुई क्योंकि जन्मदिन ऐसे मनाना कभी अपने व्यवहार में रहा नहीं है। इतने लोगों ने जन्मदिन का गाना गाया। बधाई दी। केक खाया। काफी भावुक क्षण था। मन ही मन मैं सबको धन्यवाद दे रहा था।

'जेल' का अनुभव अभी तक अच्छा रहा है। भगवान से मैं यही प्रार्थना करता हूं कि आगे भी अच्छा रहे। मेरा अपना मानना है कि फिल्म से ज्यादा अनुभव का अच्छा होना जरुरी है तभी हम अच्छी फिल्म बना सकते हैं। तभी हम अच्छा काम कर सकते हैं।फिल्म के बारे में ज्याद बात नहीं कर सकता। सिर्फ इतना कह सकता हूं कि बहुत ही कम संवाद वाला चरित्र करते हुए, उसके भावों को प्रदर्शित करने में कठिनाई का सामना करते हुए, निर्देशक के सामने अपने आप को पूरी तरह समर्पित करते हुए एक अलग तरह का अनुभव हो रहा है।

मधुर भंडारकर मेरे 14 साल पुराने जान पहचान के हैं। उस वक्त हम दोनों संघर्ष करते थे। मधुर की सफलता से मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत खुशी होती है। इसलिए जब मधुर ने मुझे इस रोल का प्रस्ताव दिया तो बिना ज्यादा समझे सुने हुए मैंने स्वीकार कर लिया। क्योंकि मधुर के जीवन के किसी क्षण में उसकी सफलता का हिस्सा बनना चाहता था मैं। बाकी सब कुछ मैंने मधुर के ऊपर छोड़ा है,और मैं जानता हूं कि वो न्याय कर पाएगा।

एक दिन का ब्रेक मिला है। मुंबई जाकर फिर लौटूंगा। इस बीच, शूटिंग जारी रहेगी। ब्लॉग पर लिखना भी जारी रहेगा और आशा करता हूं कि जीवन भी जारी रहेगा।

फिलहाल इतना ही
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Monday, April 13, 2009

हद हो गई अभद्र बयानबाजी की !

हद हो गई है। अब तो न समाचार देखने को मन करता है, न पढ़ने का। इस बार के चुनाव में राजनेता न सिर्फ अपनी मर्यादा पार कर चुके हैं, बल्कि उसकी परिभाषा भी बदल चुके हैं। कोई किसी को कुचल रहा है, कोई किसी को काट रहा है। कोई किसी को मारने की धमकी दे रहा है। और कोई किसी के अस्तित्व को मिटाने की बात कर रहा है।

लेकिन, इसके बीच भी आपको मन को समझाना है कि प्रजातंत्र को बचाए रखने के लिए वोटिंग में हिस्सा लेना जरुरी है और इन्हीं में से किसी एक को चुनना है। इस लोकतंत्र का एक वोटर, जो पूरी तरह से अपना विश्वास खो चुका है- न सिर्फ इस तंत्र में बल्कि अपने आप में, उसे इस तरह की भाषा, इस तरह के भाषण और इस तरह के नेता कहीं से भी मदद नहीं कर रहे।

आज कोई भी पार्टी ये दावा नहीं कर सकती कि उसने अपने चुनाव प्रचार में जनता को निराश नहीं किया है। सभी ने किया। उनके हर नेता ने निराश किया। और अभी 16 तारीख दूर है। पता नहीं क्या क्या झेलना होगा और क्या क्या सुनना होगा। एक मजाक सा बन गया है ये चुनाव। और इस तरह के सारे चुनाव। किसी के पास कोई ठोस आदर्श नहीं हैं, न मेनिफेस्टो है, न विचारधारा है और न राजनीति है। मुझे हंसी आती है जब सबके सब ताल ठोंकर न सिर्फ चुने जाने का दावा करते हैं, बल्कि भविष्य के प्रधानमंत्री भी खुद को ही बताते हैं। सच कहूं कि हंसी के साथ डर भी लगता है कि कहीं इस तरह के तंत्र में यही व्यक्ति सबसे ऊंचे पद पर न बैठ जाए।

लेकिन,फिर भी दिल को कहता हूं हिम्मत न हारो। उम्मीद न छोड़ो। अराजकता से ही शायद एक सही रास्ता निकलेगा। अराजक तत्वों के बीच से ही शायद अचानक सही राजधर्म निभाने वाला आएगा।

वैसे, इन दिनों अपनी फिल्म 'जेल' की शूटिंग में व्यस्त हूं। फिल्म की आउटडोर शूटिंग के लिए करजक जा रहा हूं। वहीं पर रहना होगा। मुंबई में रहते हुए भी मुंबई से 100 किलोमीटर दूर रहना होगा। इस भीड़ भीड़ से दूर। इस अराजकता से दूर। कोशिश करुंगा कि प्रजातंत्र में अपने वोट देने के अधिकार का उपयोग कर पाऊं क्योंकि अधिकार के नाम पर यही तो है,जिसे हम पूरी तरह से उपयोग कर सकते हैं। सारे दोस्तों से यही गुजारिश है कि पार्टी और नाम पर न जाएं। सिर्फ उम्मीदवार के काम और चलन को देखने के बाद ही अपना वोट डालें।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, March 31, 2009

बदल रहा है मेरा व्यक्तित्व

कुछ दिनों से मेरी कोशिश रही है कि लोग मुझे चाहे जितना भी कठिन क्यों न समझें, या फिर मेरे बारे में ग़लतफ़हमियाँ पाले बैठे रहें या उनको किसी बात से नाराज़गी हो, जिसका मुझसे कोई लेना देना भी नहीं; मैं ही उन्हें स्वयं संपर्क करुँ और करता रहूँ, चाहे वो अपनी नाराज़गी दूर करना चाहें या न करना चाहें।

एक प्रयोग करते रहना भी सत्य की तरफ़ जाने का इशारा होता है। क्योंकि शत-प्रतिशत अपने बारे में कह पाना कि आप ही सही हैं, ये उचित होगा नहीं। हाल-फ़िलहाल में कई ऐसी घटनाएँ घटीं, जब किसी ने मेरे बारे में कोई ग़लतफ़हमी पाली, या उस व्यक्ति को मुझसे नाराज़गी हुई, जिससे मेरा कोई वास्ता नहीं था। फिर भी जब मैंने उस व्यक्ति की तरफ़ लगातार अपना हाथ बढ़ाया तो संबंध सुधरे या बिगड़े या फिर वैसे ही रहे। इन संबंधों से मुझ पर असर नहीं हुआ। दरअसल, असर उस प्रकिया से हुआ जो मैंने शुरु की है। मैं अपने व्यक्तित्व में एक बदलाव-सा महसूस कर रहा हूँ। और अच्छा लग रहा है। यहाँ पर आप ख़ुद के 'मैं' से ऊपर उठना चाहते हैं। एक सुखद अनुभूति होती है इससे।

कुछ महीनों से मेरी ये भी कोशिश रही है कि अगर किसी का काम मेरे दिल को छू जाए तो चाहे मैं उसे जानता हूँ या न जानता हूँ - उस व्यक्ति से ख़ुद ही संपर्क करके मैं उसे बता सकूँ कि मैंने उसके काम को किस हद तक सराहा है। उदाहरण के लिए 'मुंबई मेरी जान' के निर्देशक निशिकांत कामत, 'वेडनसडे' के निर्देशक नीरज पांडे और 'ओए लकी...' के निर्देशक दिवाकर बैनर्जी, 'देवडी' के निर्देशक अनुराग कश्यप, 'दिल्ली छः' के निर्देशक राकेश मेहरा और गुलाल के कुछ अभिनेता जिनके काम से मैं बहुत उत्साहित हुआ था। उनसे बात करके, उनके काम के बारे में चर्चा करके और उनको बधाइयाँ देकर मैंने जिस आनंद की अनुभूति की, वो मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता।

ऐसा नहीं था कि पहले लोगों का काम अच्छा नहीं लगता था। लेकिन पहले मैं ख़ुद उनसे संपर्क नहीं करता था। अनायास मुलाक़ात के वक़्त ही बधाई देता था। लेकिन, इस तरह के बदलाव और इस तरह के प्रयोग करने के बाद मेरे अंदर की बहुत सारी गांठें खुली हैं। और ये प्रक्रिया जारी रहेगी।

हाल फिलहाल में 'गुलाल' के गाने और संगीत को लेकर मेरे पुराने दोस्त पीयूष मिश्रा से बातचीत हुई। मुझे अच्छा लग रहा है कि पीयूष की प्रतिभा के बारे में अब लोग जानना शुरु कर चुके हैं। जिसके हम सब बड़े कायल रहे हैं। बहुत कुछ सीखा है उनसे। बहुत कुछ साथ में देखा, झेला और अनुभव किया है। मेरी शुभकामनाएँ पीयूष के साथ रही हैं और रहेंगी। और मेरा अपना मानना यह है कि हमने तो उनके कई रंग-रुप देखे हैं, दुनिया अब देखना शुरु करेगी। आप भी उनके काम का लुत्फ़ लीजिए। निश्चित तौर पर यह सिर्फ़ एक शुरुआत है। पीयूष को इन्हीं शुभकामनाओं के साथ...

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी