Friday, June 15, 2012

'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के बारे में

आज कुछ ऐसी परिस्थिति है कि हवाई जहाज लखनऊ से दिल्ली आकर रुका है और कुछ देर में मुंबई उड़ान भरेगा। इसी बीच ख्याल आया कि काफी दिन हुए ब्लॉग पर कुछ लिखा नहीं है तो सोचा कि कुछ लिख ही दिया जाए। 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' का प्रचार जोर शोर से चल रहा है। हम उसमें कुछ कमी करते भी हैं तो लोगों की उत्सुकता हमें उसमें लगा देती है। हवाई जहाज में जिस सीट पर बैठा हूं। दाएं में अनुराग कश्यप हैं। और बाएं में रिचा चड्ढ़ा, जो मोबाइल फोन पर ट्विटर व फेसबुक के खिलौने से खेल रही हैं।

थकान रग रग में है। फिर भी मुंबई पहुंचने की अभिलाषा खत्म नहीं हुई है। शायद इसकी वजह मेरी छोटी बेटी है। जिसके साथ सुबह सुबह दो घंटे खेलने का वक्त तो मिलेगा। फिर नागपुर की ओर रवाना होना है। यह यात्रा चलती रहेगी 22 तारीख तक। हम इस वक्त जहां भी जा रहे हैं,वहां गैंग्स ऑफ वासेपुर और निर्देशक अनुराग कश्यप की चर्चा उफान मारती दिख रही है। इससे यह भी आभास होता है कि हिन्दी सिनेमा में वो दौर आ पहुंचा है,जहां निर्देशक को इस माध्यम की समझ होने का पूरा सम्मान मिल रहा है। चाहे वो दिबाकर बनर्जी हों या नीरज पांडे या अनुराग कश्यप। इनके अलावा न जाने कितने निर्देशक, जो आज सिनेमा के माध्यम पर अपनी पकड़ रखते हुए दिख रहे हैं। और क्यों न हो, आखिर सही मायने में सिनेमा निर्देशक का ही माध्यम है।

गैंग्स ऑफ वासेपुर की चर्चा उत्साहित करने वाली है। लेकिन, पता नहीं फिल्म को लेकर अति उत्सुकतावश क्या क्या लिखा जा रहा है। एक मायने में यह अच्छा है, लेकिन दूसरी तरफ कई गलतफहमियां भी फैलती हैं। आज सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट मिल गया है। ए सर्टिफिकेट मिला है। यह बात हमें मालूम थी। हम सब संतुष्ट भी हैं। फिल्म के सेंसर बोर्ड में अटकने को लेकर जो अफवाहें थी, वो सही मायने में अफवाहें ही थीं।

कुछ जगह इस तरह की खबरें भी छपी हैं कि जैशान,जो हमारे साथ अभिनेता हैं, और लेखन में भी जिनका योगदान रहा, उन्हें धमकियां मिली हैं। मेरी जानकारी में यह खबर बेबुनियाद है। सब कुछ अच्छा है। फिल्म का बेसब्री से इंतजार हो रहा है। मैं चाहूंगा कि आप सभी इस फिल्म को देखें और फिल्म की प्रतिक्रिया ब्लॉग के माध्यम से पहुंचाएं। मुझे विश्वास है कि यह न सिर्फ अलग तरीके और अलग ढंग से बनी फिल्म है बल्कि मनोरंजक फिल्म भी है। दोबारा जल्द मिलने के वादे के साथ आपसे विदा लेता हूं।

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी
(कुछ देर पहले हवाई जहाज में बैठकर लिखाया गया)

Wednesday, March 28, 2012

वीर सांघवी और तिग्मांशु से मुलाकात के बीच

सोमवार शाम को काम से फुर्सत पाने के बाद हिन्दुस्तान टाइम्स के ब्रंच मैग्जीन द्वारा आयोजित एक समारोह में शामिल होने का अवसर मिला। यहां मेरी अगली फिल्म ‘शूट आउट एट वडाला’ के मेरे सहभागी कलाकार जॉन अब्राहम और कंगना रानावत के साथ मंच पर वीर सांघवी संग बातचीत शामिल थी।

वीर सांघवी के लेखन का मैं बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं। वो अपने कॉलम के जरिए न सिर्फ तमाम राजनीतिक बल्कि अपनी खाने और तरह तरह के रेस्तरां के बारे में भी बहुत कुछ लिखते रहते हैं। इसमें वह उस जगह के इतिहास के बारे में भी बहुत कुछ बताते हैं। हर बार उनसे मिलकर ऐसा लगता है कि जैसे वो कुछ नहीं करते बल्कि सिर्फ पढ़ते हैं और लिखते हैं। इस तरह के व्यक्तित्व के प्रति हमेशा से मेरा रुझान रहा है। ऐसा लगता है कि दुनिया का कोई भी ऐसा हिस्सा नहीं है, जिसके बारे में ये लोग परिचित नहीं है। ऐसी कोई किताब नहीं है जिसे इन लोगों ने न पढ़ा हो। ऐसे व्यक्तित्व अपने आप में बहुत आकर्षक होते हैं।

कई दिनों से सोच रहा था कि मैं कुछ लिखूं। लेकिन, मन मस्तिष्क में ऐसा कोई विचार नहीं आ रहा था। आजकल जो राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियां चल रही हैं, उन्हें समाचार में देखकर कोफ्त होती है। कोई प्रतिक्रिया ही जन्म नहीं लेती। सस्ती भाषा में कहूं तो न्यूज चैनल पर इस तरह की ख़बरें देखकर मैं ‘चट’ गया हूं।

इधर ‘पान सिंह तोमर’ के जरिए तिग्मांशु धूलिया की सफलता से मुझे अति प्रसन्नता हुई। उनकी ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ और ‘पान सिंह तोमर’ के बॉक्स ऑफिर पर ठीक ठाक चलने से उन जैसे निर्देशकों को एक जगह मिलती दिख रही है, जो अपने आप में सुखद है। वे न सिर्फ पुराने मित्र रहे हैं बल्कि बहुत कम लोगों को पता होगा कि ‘बैंडिट क्वीन’ की कास्टिंग के दौरान किसी अभिनेता को पहली बार शेखर कपूर से से उन्होंने ही मिलवाया था।

मेरा और उनका साथ लंबा रहा है। मैंने उनके निर्देशन में एक सीरियल भी किया है। ‘हम बंबई नहीं जाएंगे’। यह किसी चैनल पर कभी आया ही नहीं। ये उन दिनों की बात है जब मैं पूरी तरह से टूट चुका था। तिंगमाशु और उनकी पत्नी मेरे अच्छे मित्र रहे हैं। लेकिन फिर मुंबई की भागा भाग में मिलना कम होता गया है। वैसे, सोमवार शाम को तिग्मांशु के साथ भी मुलाकात हुई और उनके साथ समय बिताना अच्छा लगा। अभी हाल फिलहाल में ही दिल्ली से मुंबई आने वाली हवाई यात्रा में भी वह मिल गए और आते हुए हम अगल बगल ही बैठे थे। उसी वक्त मुझे पता लगा कि हवाई यात्रा को लेकर उन्हें मुझसे भी ज्यादा डर लगता है। कहीं न कहीं सुखद अहसास हुआ कि कोई तो है,जो मुझसे ज्यादा डरता है।

लेकिन, उनके जीवन और उनके निर्देशन की उड़ान बदस्तूर जारी रहे, यही कामना है। यह कामयाबी की एक ऐसी उड़ान है, जो उन्हें बहुत पहले मिलनी चाहिए थी। लेकिन चलिए उन जैसे निर्देशक जब भी आते हैं तो अपने तौर पर कुछ न कुछ तो बदलते ही हैं। ये माध्यम ही निर्देशकों का है। शायद इसलिए मैं सिनेमा को लेकर इतना जुनूनी नहीं हू जितना अभिनय को लेकर हूं। कहीं न कहीं मुझे लगता है कि इस माध्यम में अभिनेता का बस नहीं चलता और इसे मानने में मुझे कोई संकोच भी नहीं होगा।

हम पूरी तरह से एक निर्देशक की बुदिमत्ता और दूरदर्शिता पर निर्भर करते हैं। और शायद मैं इसलिए इस माध्यम से जुड़ा कि दस साल के रंगमंच के बाद कहीं न कहीं ये अहसास हुआ कि जो भी काम करुं उसका मुझे पैसा मिले। थोड़ा बहुत जो भी मिलता है उससे मैं खुश हूं। लेकिन सिनेमा ऐसा ही फलता फूलता रहे। अच्छे निर्देशक आते रहें और अच्छी फिल्में बनती रहें-यही कामना है क्योंकि इसी से सभी का भला होगा।

इस बार के लिए इतना ही,

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, December 6, 2011

उम्मीद है ‘लंका’ का बजेगा डंका

मेरे लिए सबसे सुखद समय तब होता है, जब मैं यह कहता हूं कि फिल्म के ऊपर हममें से किसी का बस नहीं चलेगा। अब ये दर्शकों के पास जा रही है। क्योंकि जितना काम करना होता है, हम प्रदर्शन की तारीख को ध्यान में रखते हुए कर लेते हैं और अगर ज्यादा से ज्यादा समय मिले तो भी हम कुछ न कुछ करते ही रहेंगे। अंतत: निर्माता-निर्देशक दर्शकों को लिए फिल्म बनाते हैं तो एक तारीख का तय होना बहुत जरुरी होता है।

‘लंका’ से मैं बहुत खुश हूं। मुख्य धारा की फिल्म को यथार्थ के साथ दिखाने की जो परंपरा है, उसे यह फिल्म कहीं न कहीं आगे ले जाती है। और ये बताती है कि हम ‘रिएलिज्म’ के साथ रहकर भी मुख्यधारा की फिल्म बना सकते हैं। मुझे आशा है कि लोगों को भी ऐसा ही लगेगा और इस फिल्म को सभी पसंद करेंगे। मुझे इस फिल्म को बनाने के पूरे अनुभव से बहुत खुशी मिली है। अपने काम में तो कमियां मैं हमेशा निकालता ही रहता हूं। अभी तीन चार शहरों का दौरा करके हम लौटे हैं, जहां ‘लंका’ के बारे में प्रचार-प्रसार जोर शोर से किया। चिल्ला चिल्का कर लोगों को बताया कि लंका आ रही है। ये हमारे कांट्रेक्ट का हिस्सा भी होता है।



चूंकि छोटी फिल्म है तो प्रचार के लिए बजट भी कम होता है। तो जितनी मेहनत खुद से होती है तो वो करते हैं बाकी ऊपरवाले और दर्शक के हाथ मे छोड़ देते हैं। अब आशा यह है कि अच्छी फिल्म देखने के लिए दर्शक दूसरी फिल्मों के जोर शोर के प्रचार प्रसार पर न जाकर ‘लंका’ जरुर देखने आएं। लोगों को फिल्म पसंद आएगी। वैसे, ये एक उम्मीद है, जिस पर मैं हमेशा खरा नहीं उतरा हूं। क्योंकि फिर अपनी बात को दोहराते हुए कहता हूं कि अच्छी फिल्म से ज्यादा दर्शक उन फिल्मों को देखना पसंद करते हैं, जिनका प्रचार बहुत पैसे लगाकर होता है।

मीडिया से भी हम लोगों को ज्यादा सहायता नहीं मिलती। वहां भी अपने कुछ दोस्तों को खोजना पड़ता है और उनसे कुछ मदद लेनी पड़ती है। नहीं तो अमूमन यह वर्ग ऐसा है,जो जल्दी छोटी फिल्मों की गतिविधि को रिकॉर्ड करने में हिचकिचाता है। उनके पास शायद अपने कारण हैं। लेकिन छोटी और अच्छी फिल्मों को करने की जिद मैं नहीं छोड़ूंगा। कभी न कभी तो लोग मेरे साथ आएंगे। स्वभावत: जिद्दी हूं। अब उसमें सफलता मिले या विफलता यह स्वीकार्य है। उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए और मैं भी नहीं छोड़ूंगा।

फिलहाल, 9 तारीख को लंका प्रदर्शित हो रही है और मैं चाहूंगा कि आप सब न सिर्फ खुद आएं बल्कि दोस्तों और परिजनों को साथ लेकर आएं। आपको मजा आएगा।

इसी उम्मीद के साथ

आपका और सिर्फ आपका

मनोज बाजपेयी

Wednesday, November 16, 2011

'लंका' का इंतजार और कुछ दूसरी बातें

मेरी फिल्म ‘लंका’ प्रदर्शन के लिए तैयार है। फिल्म 9 दिसंबर को सिनेमाघरों में पहुंच जाएगी। उसी दिन एक बड़े निर्माता की फिल्म आ रही है, जिसका प्रचार अब जोर शोर से शुरु हो चुका है। मैं जिन फिल्मों में काम करता हूं और वे जिस बजट की होती हैं, तो वे चाहे जितनी भी आला दर्ज की हों, उनके प्रचार प्रसार के लिए हमारे पास सिर्फ तीन या चार हफ्ते का ही समय होता है क्योंकि उससे ज्यादा पैसा निर्माता खर्च करने के लिए तैयार नहीं होता। इतने वक्त में हमें सब करना होगा ताकि हम बता सकें कि हम भी हैं। और बड़े निर्माताओं ने दर्शकों की आदत इतनी बिगाड़ी दी है कि जब तक जोर शोर का प्रचार न हो तब तक वे फिल्म देखने सिनेमाघरों में जाते ही नहीं। इसका अंजाम मेरी कुछ फिल्मों को बुरी तरह से भुगतना पड़ा है। इसमें मेरी सबसे प्रिय फिल्म ‘1971’ भी है, जिसे उस साल का बेहतरीन फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। स्वामी, दस तोला और शिकार भी ऐसी बनीं कि अपने समय की बेहतरीन फिल्म होते हुए भी प्रचार प्रसार की कमी के कारण पीछे रह गईं।

मैं चाहता हूं कि लंका के साथ ऐसा कुछ न हो क्योंकि फिल्म बहुत की अनोखी बन पड़ी है। ये दुर्भाग्य उन फिल्मों के साथ हमेशा रहता है,जो छोटी होती है लेकिन बहुत अच्छी होती है। जो किसी भी बड़ी से बडी फिल्म को टक्कर देने के काबिल हैं। लेकिन दर्शक हैं कि जब तक हो- हंगामा न देंखे, किसी फिल्म का टिकट लेते ही नहीं। ऐसे में उत्साह कैसे बढ़े कि इस तरह की फिल्म की जाए। दर्शक नहीं मिलते तो निर्माता इन फिल्मों से भागना शुरु करता है और अगर वो बनाता भी है तो फिल्म शुरु करने से लेकर प्रदर्शित करने तक अपनी मजबूरियां ही गिनाता है। बहुत ही संकट का समय रहता है ऐसी फिल्मों को बनाकर प्रदर्शित करने में।

खैर, लंका जब प्रदर्शित होगी तब देखा जाएगा। अभी कई राज्यों में चुनाव की सरगर्मियां तेज होती जा रही हैं। टेलीविजन पर आरोप-प्रत्यारोप के दौर शुरु हो चुके हैं। नेतागण ज्यादा से ज्यादा बात कम समय में रखने की होड़ में लग चुके हैं। बस एक दूसरे को गाली देना ही बाकी है। ये सत्ता भी कमाल की चीज है। चाहे वो राजनीति हो या व्यक्तिगत जीवन-हर कोई उसे पाने में लगा हुआ है या दबोचने में। कोई उस कुर्सी पर बैठना चाहता है तो कोई उस कुर्सी को जाने नहीं देना चाहता। इस सारी खींचतान में अगर जनता का भला हो या उनके कल्याण पर काम होता रहे तो कोई समस्या नहीं है। लेकिन मुश्किल तो तब होती है जब राजनीति सिर्फ खींचतान से ही भरी रहती है। कल्याण कहीं पीछे छूट जाता है।

एक अच्छी बात यह रही है कि जनता के बीच से ही जनांदोलन छोटे से बड़े होते जा रहे हैं। जिससे राजनीतिक पार्टियों में एक जिज्ञासा भी है और हड़कंप भी मचा हुआ है। जनांदोलन अपने आप में प्रजातंत्र के होने का सबूत है। और ये जितना जोर पकड़े, इस डेमोक्रेसी को और आगे मजबूत ही करता जाएगा। नए से नए कानून बने, नए नए विचार सामने आएं, इससे अच्छी बात इस जनंतत्र के लिए कुछ हो ही नहीं सकती।

इस बीच मुझे अचानक याद आया कि मुंबई शहर के जिस इलाके में मैं रहता हूं,वहां पर आसपास बहुत सारी जगहों पर या यूं कहें कि खुले में खोमचों पर नकली फिल्म सीडी बिकती है। उसमें से छह खोमचे वालों को तो मैंने भगाया। पुलिसवालों से बात भी की। लेकिन ये अपने आप में चिंता का विषय है। ये नकली सीडी बड़ी फिल्मों से ज्यादा छोटी फिल्मों का नुकसान कर रही हैं। बड़ी फिल्में तो टेबल पर ही बिक जाती है या यूं कहें कि बनने से पहले ही वितरक उन्हें खरीद लेते हैं। छोटी फिल्मों के प्रदर्शन में सांस ऊपर नीचे हो जाती है। और अगर रिलीज भी होती है तो चुनिंदा दर्शक थिएटर में बैठे होते हैं क्योंकि ज्यादातर नकली सीडी पर ही उसे देखना पसंद करते हैं। ये एक सच्चाई है। और हर वो दर्शक, जो सीडी खरीद रहा है कही न कहीं गैरकानूनी काम में शरीक हो रहा है या उसे बढ़ावा दे रहा है। तो हम छोटी फिल्म के कलाकारों और तकनीशियनों की तरफ से मैं आप सभी से निवेदन करता हूं कि ऐसी गैरकानूनी गतिविधि को बढ़ावा न दें। नकली सीडी बिकने की सूचना पुलिस को दें ताकि हम जैसे लोग, जो छोटी और अच्छी फिल्मों में विश्वास रखते हैं, उनका उत्साह बना रहे और अच्छी फिल्म की एक नयी परंपरा हम बना सकें।

आपके सहयोग की अपेक्षा में
मनोज बाजपेयी

Wednesday, October 12, 2011

‘लंका’ से खुश हूं

पिछले दिनों मुंबई के बहुत सारे काम खत्म करना चाह रहा था ताकि मैं अपने घर जा सकूं। अपनी पत्नी और बेटी के साथ अपने माता पिता और भाई बहनों के पास। काम खत्म करने की ऊहापोह और भागदौड़ में ऐसा फंसा कि कुछ याद ही नहीं रहा। कई सारी चिंताएं एकाएक मस्तिष्क में समा गईं। इसमें से एक चिंता इस बात की थी कि मेरी एक फिल्म के निर्माता और मेरे दोस्त विक्रम भट्ट ने मेरी फिल्म ‘विभीषण’ का नाम बदलकर कुछ और रख दिया था। उनके रखे नाम से मैं बिलकुल भी सहमत नहीं था। चूंकि वह निर्माता थे इसलिए मेरी मजबूरी थी कि मैं उनकी ज्यादा सुनूं और कम से कम अपनी प्रतिक्रिया दूं। सारी यूनिट इस नाम के पक्ष में नहीं थी। लड़ाई करने वाला सिर्फ मैं ही बचा था। इस संबंध में विक्रम भट्ट से कई बार फोन पर बातें हुईं। इस दौरान उस फिल्म का बचा खुचा अंश हमने मुंबई में पूरा किया। और फिर विक्रम भट्ट से मुलाकात होने के बाद मैंने उन्हें एक नया नाम सुझाया। यह नाम सुनकर वह उछल पड़े। मेरी बात से सहमत होते हुए इस नाम पर उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी। फिर उस नाम को रजिस्टर्ड करने के लिए दिया गया। भाग्य अच्छा था कि वो नाम भी हमें मिल गया। और अब विक्रम भट्ट की आने वाले फिल्म, जिसे मकबूल खान ने निर्देशित किया है, का नाम ‘लंका’ होगा। बहुत खुश हूं इस निर्णय से। विक्रम भट्ट के साथ जितनी भी गहमागहमी रही, जितनी भी बहस हुई, उसका अंत अच्छा हुआ। मैं ‘लंका’ को लेकर बहुत उत्साहित हूं। इसकी कथा पटकथा इसकी शूटिंग सारे पक्षों से मैं सहमत हूं। और फूले नहीं समा रहा।

मैं अपने घर आया हूं। अपने माता पिता के पास। अपने भाई बहनों के पास। वे लोग मेरी बच्ची के साथ समय बिता रहे हैं और हमें थोड़ा आराम दे रहे हैं। इन दिनों वक्त बड़ा आरामदायक है। परिवार वाले अलग अलग तरीके के व्यंजन बनाकर हमारे सामने रख देते हैं। हर दिन कुछ नया। बचपन में जिस स्वाद को चखा था, उसके फिर से वापस आने का लुत्फ ले रहा हूं। रिश्तेदारों का आना लगा है। सबके साथ भूली बिसरी यादों पर हंसते हंसते कभी कभी दम घुटा जा रहा है। ऐसा मौका मेरे जीवन में बहुत कम आता है। क्योंकि मैं बहुत में और वे बहुत दूर। न उनक काम मुंबई लेकर आता है और न मेरा काम उनके पास लेकर जाता है। समय मिलता है तो उनके साथ थोड़ा वक्त बीताकर वापस जाना होता है। अब जबकि पूरे दस दिन के लिए उनके साथ हूं तो ऐसा लगता है कि इस बडे शहर दिल्ली में ही गांव बस गया है।

अब यहां से निकल जाऊंगा। अपनी पत्नी और बच्ची को अपने ससुराल पहुंचाकर मुंबई की तरफ मेरी रवानगी हो जाएगी। क्योंकि ‘लंका’ का बचा खुचा काम भी मुझे खत्म करना है। बहुत सारी स्क्रिप्ट्स सुननी हैं और आगे आने वाले समय के लिए अपनी योजना तैयार करनी है। पहले दूर जाता था तो माता पिता पत्नी याद आती थी। अब बच्ची से पंद्रह बीस दिन दूर रहने का जो दर्द है, शायद मेरे लिए सह पाना थोड़ा मुश्किल होगा। और शायद यह दर्द हर माता पिता महसूस करते हैं। मैं अकेला ऐसा नहीं हूं। अब अहसास होता है कि आप कैसे अपने ही बनाए हुए परिवार में बसते चलते जाते हैं कि आपको न दाए कि सूझ रहती है और न बाएं की बूझ। लेकिन जाना तो है। कब तक अपने ही घर को बंद करके रखेंगे। मुंबई से वापस मैं कुछ न कुछ लिखता रहूंगा। तब तक आप लोगों को मेरी ढेर सारी दुआएं। आप सभी आपका आशीर्वाद मेरे व परिवार के ऊपर बनाए रखें।

इसकी आशा के साथ
आपका और सिर्फ आपका

मनोज बाजपेयी

Monday, September 5, 2011

खुश हूं अन्ना का आंदोलन सफल हुआ और ‘आरक्षण’ भी

‘आरक्षण’ को लेकर काफी व्यस्त रहा। फिर घर में बेटी के आगमन के बाद जब भी घर पर होता हूं, अवसर ही नहीं मिल पाता कि मैं कुछ लिखने बैठूं। खैर, आज इस मौके को गवाउंगा नहीं। ‘आरक्षण’ ने अच्छा व्यापार किया।

आरक्षण के प्रचार के दौरान अधिकतर जगहों पर मेरा और श्री अमिताभ बच्चन जी का साथ जाना हुआ। उनके अपार प्रशंसक समुदाय को देखने-सुनने का मौका मिला। कई बार ये सोचता भी रहा कि श्री बच्चन की लोकप्रियता का जो दौर मैंने अपने बचपन में देखा था, वो आज तक कहीं रुका नहीं है बल्कि बढ़ता ही गया है। पटना पहुंचने के बाद तो ऐसा लगा कि पूरा शहर ही श्री अमिताभ बच्चन के आने के इंतजार में था।

‘आरक्षण’ ने कई बहस को जन्म दिया। कई सारी पुरानी बहस भी नयी हो गईं। इस कारण कुछ एक राज्यों में फिल्म को नुकसान भी उठाना पड़ा। अंतत: फिल्म ने अच्छा व्यापार किया। लोगों ने काफी सराहना की और इससे फिल्म से जुड़े सभी लोगों को संतोष है। बड़ी फिल्म करने का यह फायदा अवश्य है कि प्रचार प्रसार में बहुत अधिक खर्चा किया जाता है, जिससे दर्शक वर्ग उस फिल्म को देखने के लिए उत्सुक रहता है। लेकिन कहीं न कहीं दुख भी होता है उन छोटी और अच्छी फिल्मों के लिए, जिनके पास इतना पैसा नहीं होता जो बड़े स्तर पर प्रचार प्रसार कर सकें। इसके कारण दर्शक वर्ग कई बार उनमें रुचि ही नहीं दिखाता। यह अपने आप में विडंबना है। फिर भी मैं बहुत खुश हूं। न सिर्फ अपने लिए बल्कि प्रकाश झा जी के लिए भी, जिनकी मेहनत सफल हुई।

इस फिल्म के बाद लगातार घर पर रहना हुआ। अन्ना हजारे जी के आंदोलन को देखने सुनने समझने का मौका हाथ लगा। खुशी इस बात की है कि आंदोलन सफल रहा। और भ्रष्टाचार आज हमारे समाज और हमारे देश में सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। इस मुद्दे को अभी तक मुद्दा माना ही नहीं जाता था। अन्ना हजारे ने एक बड़ी अच्छी बात कही। वह यह कि सिर्फ टोपी ही नहीं पहनों बल्कि अपने चरित्र को भी बदलो। यह अपने आपमें बहुत बड़ी बात है। बदलाव हम सब को अपने घर से और अपने आप से ही शुरु करने हैं। फिर हमें ताकत मिलेगी हर उस सरकार से अपनी मांग करने की, जो सत्ता में है।

अभी मेरी बेटी फिर से मेरे साथ होने की मांग कर रही है और मैं उसके पास जा रहा हूं। लेकिन वादा करता हूं कि जल्द ही फिर से लिखूंगा।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Monday, July 11, 2011

अद्भुत अनुभव है हिन्दुस्तान के सबसे बड़े कलाकार से मिलना !

बिजनौर में मेरी शूटिंग कमाल की रही। बड़ा ही शांत शहर है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बारे में मुझे डराया गया था। वहां के माहौल में मुझसे जो कहा गया, वह मेरे हिसाब से गलत निकला। बिजनौर शहर में काम करके लगा कि सब सामान्य है। और अंत में वही बात आती है कि न शहर खराब, न माहौल। कुछ लोगों की मानसिकता खराब होती है। वो कहीं भी हो सकती है।

कल रात मैं अपने डॉक्टर त्रासी की बेटी की शादी में शामिल होने गया था। दरवाजे पर हिन्दुस्तान के सबसे बड़े कलाकार से मेरी मुलाकात हुई। और वह हैं श्री दिलीप कुमार। जिस तरह इस अवस्था में भी वह मुझसे मिले, मैं धन्य हो गया। मेरे हिसाब से हिन्दुस्तान में अभिनय के लिहाज से कोई जीवित लीजेंड है तो वह हैं श्री दिलीप कुमार। बाकी सारे अभिनेताओं ने अभिनय की शुरुआत उन्हें देखकर ही की। उन्हें देखकर मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या बोलूं। मेरे होंठ सिल गए थे। सायरा जी ने मेरी ऊहापोह को समझा और मुझे विदा होने में मदद की। लेकिन, इस अनुभव से मैं जितना लाभान्वित हुआ और जितनी खुशी हुई, वह बहुत कम मौकों पर होती है। जो लोग श्री दिलीप कुमार के बारे में नहीं जानते, मैं उनसे कहना चाहूंगा कि वह उनकी फिल्में देखें। उनकी समझ में आएगा कि अभिनय क्या होता है। भाषा क्या होती है। अगर दिलीप साहब के बाद मैं किसी अभिनेता को चाहता और सराहता हूं तो वह हैं श्री मोतीलाल जी। उनसे इस जन्म में मिलना नहीं हुआ। लेकिन उनकी फिल्मों को देखकर विभोर होता रहता हूं। पर आज जो सामने देखा, उसे भूल पाना असंभव है। और मैं यह बता दूं कि श्री दिलीप कुमार साहब से यह मेरी कोई पहली मुलाकात नहीं थी। मैं जब भी उनस मिलता हूं, मेरा यही हाल रहता है। वह जिस तरह मेरा अभिवादन करते हैं, मुझे दुनिया का सबसे बड़ा उपहार मिल जाता है।

इससे अलग अभी 'आरक्षण' के प्रचार प्रसार में शामिल हो रहा हूं। फिल्म के प्रोमो आ रहे हैं। उसकी चर्चा हो रही है, यह देखकर अच्छा लगता है। यह देखकर और अच्छा लगता है कि श्री प्रकाश झा जिस तरह अपनी फिल्म पर मेहनत करते हैं, उसे सराहना मिल रही है। 'आरक्षण' मेरे लिए इसलिए अधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह मेरी उनके साथ दूसरी फिल्म है। इसमें राजनीति से बिलकुल उलट मेरा किरदार है। और इस फिल्म में मैं अमित जी के साथ दोबारा काम कर रहा हूं। फिल्म के जरिए उनसे मिलने का मौका मिला। उनकी संगत में हर बार कुछ नया सीखने को मिलता है।

फिलहाल आप लोग खुद को तैयार रखें। फिल्म 12 अगस्त को प्रदर्शित हो रही है। आपको फिल्म कैसी लगी, मुझे ब्लॉग पर बताए। विस्तार में बताएंगे तो और अच्छा होगा।

इस बार के लिए इतना ही
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी