Saturday, December 27, 2008

सैर-सपाटा,काम और मेज़बानी के बीच फिर पुराने ढर्रे पर

डेढ़ महीने काफ़ी हलचल रही। पहले 'एसिड फ़ैक्ट्री' की शूटिंग के लिए मुझे केपटाउन जाना पड़ा। फिर पंद्रह-बीस दिनों के लिए क्वालालंपुर मलेशिया जाना हुआ, एक अपने तेलुगु निर्देशक मित्र सूर्या के लिए। सूर्या चाहते थे कि मैं उनकी निर्देशित तेलुगु फ़िल्म का हिस्सा बनूँ। उनकी ज़िद बहुत थी, लिहाज़ा इस ऑफ़र को स्वीकार कर लिया। केपटाउन के दिन बहुत ही अच्छे कटे। एक महीने तक सिर्फ़ एक्शन दृश्य ही फ़िल्माने थे। जिसमें दिमाग़ की ज़्यादा माथा-पच्ची करनी नहीं थी। हाँ, शरीर ज़रुर थक जाता था। लेकिन हमारे निर्माता संजय गुप्ता बहुत अच्छे मेज़बान माने जाते हैं। उन्होंने हर रात पार्टी रखी। हर रात हमें कहीं खिलाने-पिलाने ले गए। इससे दिन अच्छे कटते रहे। साथ में मेरी पत्नी भी थीं, तो खाली समय में हम केपटाउन घूमने निकल जाते। हमने जीवन में पहली बार मेल मछलियों का झुंड देखा। डॉल्फ़िन के झुंड को तेज़ी से समुन्दर पार करते हुए देखा। केपपाउंड भी गए, जहाँ आर्कटिक और इंडियन ओशन मिलते हैं। ख़ैर, शूटिंग के साथ-साथ सैर-सपाटा भी खूब हुआ। मेरी पत्नी को बहुत शौक़ है कि गली-कूचे में जाकर सामान ख़रीदा जाए ताकि इसी बहाने उस जगह की संस्कृति से भी परिचित हो सकें। वो महंगी जगहों पर सामान ख़रीदना पसंद नहीं करतीं। दाम भी ज़्यादा होते हैं और सारा माहौल अमेरिका सरीख़ा ही होता है। जैसे कि हमारे मॉल बन गए हैं। शूटिंग नहीं कर रहा होता था तो केपटाउन की गली-गली भटकता रहा। कभी बहुत थक जाता था तो कभी बहुत मज़ा आता था। ख़ैर, दिन कटे लेकिन इसके साथ मुझे अपने मोबाइल फ़ोन के खो जाने और उसमें स्टोर 400 से ज़्यादा नंबरों के खो जाने का बहुत ग़म है। बहुत ही दोस्ताना तरीक़े से हमने अपनी शूटिंग का एक महीने पूरा किया। फिर, मुंबई में दो दिन रुककर कुछ सामान छोड़ा, कुछ लिया और मलेशिया के लिए निकल गए।

साउथ इंडियन फ़िल्म की यूनिट सुबह सात बजे से लेकर शाम सात बजे तक शूटिंग करती हैं। ऊपर से भाषा की परेशानी। एक प्रॉम्प्टर रखकर काम चलाना पड़ता था। और वो प्रॉम्प्टर उस सैट पर मेरे लिए भगवान से कम नहीं था। मैं काफ़ी व्यस्त रहा। लेकिन मेरी पत्नी आदतन क्वालालंपुर की गलियों में जाकर वहाँ की अपनी संस्कृति से ख़ुद को परिचित कराती रहीं और अपनी शॉपिंग भी करती रहीं।

केपटाउन में अलग-अलग रेस्तराँ में खाना खाया। कभी घर के खाने की याद नहीं आयी, लेकिन क्वालालंपुर के खाने में एक तरीक़े की महक से हम दोनों ही बहुत परेशान हो गए। इस कारण खाना वापस अपने पांच सितारा होटल में ही खाना पड़ा। सूप और ब्रेड बटर खाकर ही दिन गुज़ारने पड़े। मैं उनके खाने को बुरा नहीं कहना चाहूँगा क्योंकि हर देश के खाने का अपना स्वाद होता है। चूँकि हम उससे परिचित नहीं हैं, न आदी है इसलिए शायद हमें बहुत मुश्किल हुई।

ख़ैर, वहाँ की शूटिंग ख़त्म करके वापस आया तो मेरी पत्नी की बहन अमेरिका से अपनी नवजात बच्ची को लेकर आईं। दिल्ली से मेरे सास-ससुर का आना हुआ। हम दोनों पति-पत्नी उनकी मेज़बानी में लगे रहे। अपने घर में हम दोनों अकेले ही रहते तो अचानक एक छोटी बच्ची के आने से और दो-तीन मेहमानों के होने से एक महीना कैसे कटा, पता ही नहीं चला। अब सब जा चुके हैं और फिर हम अपनी दिनचर्या में व्यस्त हैं। कमी सिर्फ़ इतनी है कि उस नवजात बच्ची की किलकारी घर में गूंज नहीं रही है। उस बच्ची का नाम ज़ोया है। और अब हम दोनों उसे बहुत 'मिस' कर रहे हैं। भगवान उसे लंबी उम्र दे और सुखी रखे।

ख़ैर, ये तो मेरी बात हुई। लेकिन जो कुछ भी मुंबई में, देश में हो रहा है, वो काफ़ी चिंताजनक है। वापस देश और समाज के बारे में आपसे अपने विचार बाँटूंगा। अगली पोस्ट में।

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Monday, December 15, 2008

क्या इस बार सबक लेंगे!

लगता है कि इस बार भी हम सबक नहीं ले पाएंगे। लोग मरते जा रहे हैं, अपनों से बिछड़ते जा रहे हैं। फिर भी हम कुछ सीख नहीं पा रहे हैं। अब भी हम पाकिस्तान के साथ तू तू मैं मैं की राजनीति में लगे हुए हैं। चाहे वो सरकार हो, चाहे वो मीडिया हो या चाहे जो भी जिम्मेदार लोग हों, हर कोई युद्ध और युद्ध की राजनीति की बातें कर रहा है। सवाल ये है कि खुद को बचाने के लिए हम क्या कर रहे हैं? हम अपने आपको सुरक्षित रख पाएं, अपने लोगों पर आंच न आने पाए,इसका कोई उपाय करें, उससे ज्यादा जरुरी कई नेताओं को ये लग रहा है कि वो कैसे टीवी चैनलों पर जाकर बहस में हिस्सा लें। और ये बता पाएं कि कैसे उसकी पार्टी या उनकी सरकार का इससे कोई लेना देना नहीं है।

मेरा अपना मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जितना दबाव बना सकते हैं,पाकिस्तान पर, वो बनाया जाए ताकि पाक में जो भी आतंकी ट्रैनिंग कैंप है,वो खत्म हो। बजाय इसके कि उनके साथ सारे सांस्कृतिक संबंध भी तोड़ लिए जाएं। दबाव बनाने में परहेज नहीं है, और न ही उसको ढीला करना चाहिए। और जहां तक आंतरिक सुरक्षा की बात है तो उस पर हमेशा से सवालिया निशान रहा है और उसे मजबूत करने की दिशा में हमें काम करना चाहिए। हर तरफ से कोशिश यही होनी चाहिए कि मुंबई की ये घटना आखिरी आतंकवादी घटना हो। पाकिस्तान से संबंध तोड़ने में कोई समझदारी नहीं है, क्योंकि जो लोग जिम्मेदार नागरिक हैं, उनका क्या लेना देना। हम उनके साथ अपने संबंध क्यों तोड़े, जो हमने अभी अभी बनाया है। प्यार दिया है,और प्यार लिया है।


मैं जानता हूं कि मेरी ये बात बहुत सारे लोगों को बुरी लगेगी। लेकिन,फिर भी जो सही है,जो मानवता के हक में है, उसी की जीत होनी चाहिए। गॉर्डन ब्राउन आए,इसके पहले बहुत सारे अंतरराष्ट्रीय स्तर के नेताओं के बयान आए। कोंडालिसा राइस आई। वापस जाते हुए पाकिस्तान में बयान भी दिए गए। लेकिन,हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि आखिरी सच यही है कि वो सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचेंगे । वो कभी हिन्दुस्तान के बारे में नहीं सोचेंगे। हिन्दुस्तान को खुद अपने बारे में सोचना होगा। हम सभी लोगों को एक दूसरे के लिए आगे बढ़कर आना होगा। तभी ये देश जहां है, वहां से आगे बढ़कर आ पाएगा। हम सब अपने अपने तौर पर ईमानदार रहने और बनने की कोशिश करें। तभी इसी देश का भला है,और इसी में हस सभी की भलाई है।

इसी के साथ
आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, November 30, 2008

नशे में धुत है घर का रखवाला

इस वक़्त सिवाय क्रोध के कोई और भाव मन में नहीं आ रहा। क्या लिखें और क्या कहें, जो हुआ क्या वो रुक सकता था? वो ज़रुर रुक सकता था। क्या अब सब कुछ सही होगा? हमेशा की तरह सिर्फ़ उम्मीद कर सकते हैं। भरोसा तो अब रहा नहीं।

टेलीविज़न पर बहस शुरु हो चुकी है। अख़बारों में प्रतिक्रियाएँ और एडिटोरियल आना शुरु हो गए हैं। दान, चंदा और मदद देने की होड़ लग रही है। फिर से वही बीरबल के चोंचले। अब ये सब एक ऐसा चुटकुला लग रहा है, जो आप कई बार सुन चुके हैं और जिस पर अब हँसी भी नहीं आती। लोग गाजर-मूली की तरह मारे गए। लेकिन कुछ राजनीतिज्ञों के कान पर अभी भी जू नहीं रेंग रही है क्योंकि उनके घर का कोई नहीं मरा है, ये बात अब समझ में आ रही है। वो अब भी बयानबाज़ी कर रहे हैं क्योंकि वो ख़ुद सुरक्षा के घेरे में रहते हैं।

हम सबकी हालत आज ऐसी है कि हम अपने ही घर में चारदीवारी को लेकर चिंतित हैं। क्योंकि घर का रखवाला उस चारदीवारी पर बैठकर उसकी रक्षा करने की बजाय हम सबका मज़ाक उड़ाते हुए नशे में धुत है।

वो सारे दृश्य देखकर कितनी ही बार मन विचलित हुआ। और अब मैं सुन्न-सा बैठा हूँ। क्या मैं गर्व के साथ कह सकता हूँ कि मैं इस देश का नागरिक हूँ। जिस देश में किसी भी नागरिक की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं। लोग ऐसे मरे और मारे गए जैसे रोज़ बकरे हलाल होते हैं। लानत है, लानत है, लानत है।

सिर्फ़ ग़ुस्सा है मेरे मन में। कोई शब्द नहीं सूझ रहे हैं। शायद ढंग की बात अगली पोस्ट में ही कर पाऊंगा। मेरी श्रद्धांजलि श्रीकांते, हेमंत करकरे और विजय सालस्कर, संदीप उन्नीकृष्णन और सिपाही गजेन्द्र को। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को इस कठिन समय में शक्ति दे। मैं इस कठिन समय में चुप हूँ, ख़ामोश हूँ और यही प्रार्थना करता हूँ कि जो लोग इस हादसे में मारे गए भगवान उनकी आत्मा को सुकून दे। और उनके परिवार को भविष्य के लिए शक्ति दे।

अब सिर्फ़ एक वाक्य कि हमें इससे बहुत कुछ सीखना होगा।

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Monday, November 10, 2008

शूटिंग की व्यस्तता से ब्लॉगिंग पर ब्रेक

मित्रों,

सबसे पहले सभी पाठकों से माफी। मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था कि शूटिंग के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका जा रहा हूं। सोचा तो ये था कि वहां से भी नियमित लिखूंगा लेकिन दिन-रात का व्यस्त कार्यक्रम और इंटरनेट की सुचारु व्यवस्था न होने से यह काम नहीं कर पाया।

फिलहाल, 'एसिड फैक्ट्री' की शूटिंग में ही व्यस्त हूं। अब मलेशिया के लिए निकल रहा हूं। वहां कुछ दिनों का शिड्यूल है। उम्मीद है कि तय वक्त में काम निपट जाएगा और इस महीने के आखिरी हफ्ते में फिर मुंबई में आ जाऊंगा।

केपटाउन में शूटिंग के दौरान मेरी पत्नी भी साथ थीं। उनकी भी इस फिल्म में एक मेहमान भूमिका है। वैसे,जब भी हम दोनों साथ किसी दूसरे देश जाते हैं तो वहां के प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने के साथ वहां की संस्कृति को समझने की कोशिश करते हैं। इस बार भी यही हुआ। शूटिंग के दौरान भी कुछ रोचक वाक्ये हुए। जिन्हें मैं विस्तार से लिखूंगा।

फिलहाल, क्षमा याचना के साथ

आपका और आपका

मनोज बाजपेयी

Monday, October 13, 2008

क्रिकेट और मैं

क्रिकेट का बुखार शुरु हो चुका है। अब ये उतरने का नाम नहीं लेगा, जब तक सीजन खत्म न हो जाए। और तब तक मेरी पत्नी मुझसे चिड़ती- नाराज होती घर में घूमेंगी क्योंकि उन्हें ये खेल बिलुकल पसंद नहीं है। इस खेल,जिमें गतिविधि के नाम पर एक बॉल डाल रहा होता है और एक बल्ला लिए गेंद को मारने की कोशिश कर रहा होता है,उसके रोमांच को मैं तमाम तर्कों के बावजूद समझा नहीं पाया। लेकिन,इन दिनों उनमें एक अजीब बदलाव देख रहा हूं। कभी-कभी जब मैं मैच देखता हूं तो कुछ रुचि दिखती है उनके चेहरे पर। भगवान से यही दुआ करता हूं कि कभी कभी की ये रुचि ठोस भाव ले ले। वैसे, उन्हें फुटबॉल के अलावा कोई भी खेल समझ नहीं आता। वो अपनी जगह सही हैं।

11 तारीख को सुबह श्री अमिताभ बच्चन जी को उनके जन्मदिन पर बधाई संदेश भेजा। पर दोपहर तक पता चला कि वो हॉस्पीटल में हैं। अपनी आंत की समस्या के कारण। मेरी उन्हें जन्मदिन पर हार्दिक बधाई। साथ यह कामना कि वो जल्द स्वस्थ होकर लौट आएं।

आजकल मुंबई के सारे काम निपटा रहा हूं। क्योंकि लगभग एक महीने के लिए तीन चार दिनों में विदेश जाना होगा। एसिड़ फैक्ट्री की शूटिंग के लिए। बारिश के कारण इस फिल्म की शूटिंग मे कुछ रुकावट आ गई थी। एक शिड्यूल खत्म कर चुके थे हम तीन ङफ्ते पहले और अब अंतिम शिड्यूल पूरा करने जा रहे हैं।

बहुत खुशी है कि यूनिट के सारे दोस्त दोस्तों और साथी कलाकारों से फिर मिलना है। अभी भी प्रोडक्शन हाउस से कैपटाउन के मौसम की जानकारी ली है ताकि उसी हिसाब से कपडे ले जा सकूं। अपने सचिव श्री त्रिपाठी से बाकी फिल्मों और उनकी तारीखों के बारे में जानकारी लेकर यह पोस्ट लिखने बैठा। मुंबई की ऊमस ने बड़ा परेशान कर रखा है। इतना कि कुछ करने का मन नहीं करता। एक खीज सी रहती है। लेकिन फिर भी काम में लगे रहना पड़ता है। और काम है कि जिसे छोड़ने का मन नहीं करता। लेकिन अंतत: अगर मौसम भी साथ दे तो काम करने का मजा भी दोगुना हो जाए।

खैर,फिर बात क्रिकेट की। आशा करता हूं कि दूसरी पारी में सहवाग का बल्ला चलेगा और इंडिया टेस्ट मैच जीतेगी। तेंदुलकर वैसे मेरे चहेते हैं लेकिन उनकी ऊहापोह की स्थिति देखकर बहुत दुख होता है।

टेस्ट में जीतने की आशा के साथ ये भी आशा करता हूं कि एक या दो दिन में श्री अमिताभ बच्चन स्वस्थ होकर अपने घर लौट आएंगे। उनसे एक कार्मिक रिश्ता है, जो हमेशा चाहता रहेगा कि वो सदा सुखी और स्वस्थ रहें और हमें अपना आशीर्वाद देते रहें।

इसी के साथ आपका और आपका
मनोज बाजपेयी।

Monday, October 6, 2008

क्यों रोज़ सवालों के घेरे में आता है हमारा प्रजातंत्र?

वैसे तो मन बिलकुल नहीं कर रहा कुछ भी लिखने का। दरअसल, कभी-कभी लगता है कि अपने बारे में क्या लिखना। ऐसा कुछ भी तो नहीं है, जो दूसरों से अलग हो। दिनचर्या भी वही, दिनचर्या की नियति भी वही। सुबह काम पर जाना, वापस आना और सो जाना। वैसे, सपने देखना कभी नही छोड़ता - एक आदर्श देश, आदर्श परिवार और आदर्श व्यक्तिगत जीवन के। निजी जीवन और परिवार में कभी-कभी वो हासिल कर भी पाता है आदमी, लेकिन समाज और देश में तो करोड़ो लोग हैं और करोड़ों के मन का मिलना मुश्किल ही नहीं, कभी-कभी असंभव भी लगता है।

टीवी पर एक बहस देख कर उठा हूँ। थोड़ा झुंझलाया और थोड़ा निराश हूँ। एक तरफ़ जामिया नगर में एनकाउंटर का राजनीतिकरण और दूसरी तरफ़ कंधमाल में बलात्कार और हिंसा की घटनाओं के बाद उठती हुई राजनीति की बू। घिन आने लगी है उन चेहरों से भी, जो इस तरह की प्रकिया में लीन हैं। ग़ुस्सा आता है कभी-कभी अपने होने पर भी, और इन सबका परिणाम है आज की पोस्ट। लिखने का मन नहीं था तो सोचा कि भड़ास ही निकाल लूँ।

हिंसा, बलात्कार और शोषण को आप किसी भी तर्क से दबा नहीं सकते। न सही ठहरा सकते हैं। जो समुदाय या व्यक्ति हिंसा करता है, उसे उसी वक़्त सज़ा देने का प्रावधान भी होना चाहिए। लेकिन ऐसा न होने से लगातार प्रजातंत्र का मखौल उड़ाया जाता है। आज देश एक होते हुए भी बँट गया है। हिंसा के कारणों से, भाषा के कारणों से, जात-पात के कारणों से। लेकिन फिर भी हम हैं कि सिर्फ़ काम पर जाते हैं, आते हैं और सो जाते हैं। लेकिन कहीं-न-कहीं कुछ लोग हैं, जो आपको विश्वास दिलाते हैं कि सब सही होगा। उन लोगों के होने के कारण शायद एक आशा बंधी हुई है। प्रजातंत्र पहले कभी-कभी सवालों के घेरे में आता था, आज हर दिन सवालों के घेरे में खड़ा होता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम सब पहले अपने आप को मानव समुदाय का मानकर और देश का नागरिक मानकर एक क़दम चलने की कोशिश करें। धर्म, क्षेत्र, भाषा - इन सबकों थोड़ा किनारे करें। मानव जाति और देश को सर्वप्रथम रखें। ख़ैर, भड़ास निकालनी थी सो निकाल दी। इसी के साथ -

आपका और सिर्फ़ आपका

मनोज बाजपेयी

Wednesday, October 1, 2008

कैसा दुःखद आरंभ नवरात्र का

जब अपने बस में कुछ नहीं रह जाता, तब व्यक्ति सरकार और तंत्र पर भरोसा जताता है। सरकार और तंत्र ही असफल हो जाएँ तो भगवान के दर पर जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। लेकिन, जब भगवान ही रखवाली न कर पाएँ तो किसके दर पर जाएँ? इच्छा थी कि इस बार कुछ और विषयों पर लिखूँ, लेकिन जोधपुर के चामुंडादेवी मंदिर के हादसे के एक-एक दृश्य ने मुझे झकझोर कर रख दिया। कुछ ऐसी ही छोटी-सी घटना इलाहाबाद के एक मंदिर में भी हुई। फिर मालेगांव और साबरकांठा में एक दिन पहले ब्लास्ट भी हुआ। जान-माल की क्षति अगर गिनने जाएँ तो जिह्वा थक-हार जाए, पर मरने वालों की गिनती न पूरी हो सके। कैसा दुःखद आरंभ नवरात्रि का। मैं पूरी तरह से हिला हुआ हूँ। मेरी तरफ़ से सभी मृतकों को भावभीनी श्रद्धांजलि। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिजनों को दुःख के इस क्षण में शक्ति दे।

अब तो ऐसा लग रहा है कि व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। 120 करोड़ लोगों का विश्वास टूटता जा रहा है। पहले वो भरे बाज़ार में सुरक्षित नहीं थे, अब वो भगवान के दरबार में भी सुरक्षित नहीं हैं। सबने इनको बेसहारा छोड़ दिया है। कहीं परमाणु संधि वार्ता सफल होने की ख़ुशी मनायी जा रही है, कहीं पर कई सारे घरों में इस साल दीवाली के दीए नहीं जलाए जाएंगे। नैना देवी, चामुंडा देवी, बिहार की बाढ़, बम ब्लास्ट जैसे तमाम हादसों के बाद इस बार कम-से-कम मैं तो घर में दीवाली नहीं मना पाऊंगा। दीवाली नहीं मनाना, मारे गए लोगों के प्रति संवेदना जताने की वजह से, और कहीं-न-कहीं विरोध में भी। दरअसल, अब समय आ चुका है कि हम करोड़ों लोगों की अपेक्षा पर तंत्र खरा उतरे।

मैं एक कलाकार हूँ। अपनी कला के प्रति पूरा समर्पण है। लेकिन इस समाज में रहते हुए मेरा कर्तव्य है कि मेरे साथ इस समाज में जो भी लोग रह रहे हैं, उनकी सुख और भलाई के लिए कुछ न सही तो अपने ब्लॉग पर ही अपनी बात रख सकूँ। अपना विरोध जता सकूँ।

उफ़... कैसा रहा ये साल! कैसे कोई उत्सव मनाए! किसी पत्रकार मित्र से मैंने कहा कि ब्लॉग से एक बात अच्छी हुई कि मैं अपने दिल की बात कह सकता हूँ। अपनी भड़ास निकाल सकता हूँ। उन्होंने कहा कि ये आपकी भड़ास नहीं, आपकी चिंता ज़्यादा नज़र आ रही है। लेकिन शायद चिंता भी एक भड़ास के रुप में बाहर आना आवश्यक है। मैंने हमेशा यह माना है कि हम अमेरिका के अभिनेता नहीं है, जो अपने आप को देश के मौजूदा हालात से अलग रख पाएँ। हम ऐसा कर ही नहीं सकते। हमारा देश अभी ग़रीब देश की संज्ञा से उबर ही रहा है। कुछ न सही तो किसी-न-किसी माध्यम से मौजूदा भ्रष्टाचार, महंगाई, ग़रीबी के ख़िलाफ़ आवाज़ तो उठा ही सकते हैं। और कुछ नहीं तो ऐसा करके लगता है कि मैं अपने होने के साथ न्याय कर रहा हूँ। पता नहीं कितने लोग मेरी बात से सहमत होंगे क्योंकि जो हालात हैं, अभी वहाँ पर Escapism ही सफलता का मूल मंत्र है। अगर है तो फिर यही सही। कौन घर से बंगला निकालने निकला था। आज अगर एक अभिनेता के तौर पर अपने मन का काम कर लेता हूँ, और अपने घर को अच्छी तरह चला लेता हूँ तो यही बहुत है। मैंने हमेशा माना कि मैंने अपने सपने से ज़्यादा ही पाया। अभिनय छोड़ नहीं सकता। ये मेरा ऑक्सीजन है। लेकिन, ब्लॉग पर अपनी चिंता को लोगों के साथ बाँट तो सकता ही हूँ। और अपनी चिंता की भड़ास तो निकाल ही सकता हूँ।

आज की पोस्ट ख़त्म करने से पहले सिर्फ़ इतना कहना चाहूंगा कि शाम को बहुत सारे चैनलों पर मैं चामुण्डादेवी की त्रासदी के बारे में कुछ और जानना चाह रहा था, लेकिन 95 प्रतिशत चैनल पर सिर्फ़ कॉमेडी से जुड़े कार्यक्रम ही दिखाए जा रहे थे। अब तो इन 185 लोगों का मरना भी कोई समाचार नहीं बना सकता। वाह रे टीआरपी, वाह रे बॉक्स ऑफ़िस।

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Saturday, September 27, 2008

अब तो डर लगता है..

कई साल पहले की बात है। मैं पांचवी क्लास में पढ़ता था। अपनी गर्मियों की छुट्टियों में स्कूल के एक टूर पर निकला था - कश्मीर की तरफ़। रास्ते में हम दिल्ली में भी रुके थे। लाल क़िला, क़ुतुब मीनार वगैरह तमाम दिलचस्प जगह हमें दिखायी गईं। क़ुतुब मीनार के नीचे खड़े होकर अलग-अलग दिशा से, अलग-अलग एंगल से फ़ोटो खिंचवाए हमनें। शायद वो फ़ोटोग्राफ आज भी कहीं किसी कोने में रखे होंगे। उस समय ये अंदाज़ भी नहीं था कि इसी के पास कोई बहुत ही शैतानी दिमाग़ एक बम का धमाका करेगा और बिना किसी कारण एक बच्चे की जान ले लेगा। इसी धमाके में कुछ लोगों को जख़्मी कर देगा। अब तो डर लग रहा है। हर उस शख़्स के लिए डर लग रहा है, जो बाज़ार घूमने जाता है। जो स्कूल पढ़ने जाता है। जो सिनेमा देखने जाता है। जो मेला घूमने जाता है। जो भी व्यक्ति भीड़-भाड़ वाले इलाक़े में तफ़रीह करने या ज़रुरी सामान लेने जाता है।

आज हमें भी अपनी जान का ख़तरा लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि शायद मौत अचानक किसी बीमारी से न आकर किसी बम के धमाके के बीच होगी। क्यों मर रहे हैं लोग? क्या कसूर है इनका? जो मार रहे हैं उनके पास कारण क्या है? बहुत समझने की कोशिश की मारने वाले के कारण के बारे में समझने की। लेकिन, मेरी समझ से तो यह परे है। किसी को क्या अधिकार है कि वो मासूमों पर बम फेंकना शुरु करे? आज ज़रुरत इस बात की है कि हम अपनी जान बचाने के लिए सजग रहें। ज़रुरत इस बात की है कि हम जहाँ भी रहें उसकी रखवाली खुद करें। आज आवश्यक हो गया है कि हम सब ही मिलकर इस जंग को लड़ें। क्योंकि लगता तो नहीं है कि कोई और हमारी लड़ाई लड़ने वाला है।

मेरी श्रद्धांजली उस मासूम के लिए और उन सभी के लिए, जिनकी जान महरौली के धमाके में गई। संवेदना उन सभी लोगों के साथ है, जो हताहत हुए हैं।

इस दुःखद हादसे के बाद अचानक लिखने का मन हो बैठा। हाँ, अंत में अपने दोस्त इमदाद को कहना चाहूंगा कि भई उम्र हो गई है, बच्चों की तरह रुठा न करें। और रुठ ही गए हो तो क्षमा चाहूंगा। बहुत साल पहले की बात है। बहुत सारी बातें अब जल्दी याद नहीं आती हैं। आप जहाँ हैं ख़ुश रहें। ऊपर वाले का आशीर्वाद आप पर और आपके परिवार पर बना रहे।

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, September 25, 2008

आराम का आनंद ले रहा हूं मैं

पिछली कुछ पोस्ट पर भेजी आप लोगों की प्रतिक्रियाएं पढ़ीं। आश्चर्य इस बात का है बहुत सारे लोग आज भी धर्म की वजह से एक दूसरे से घृणा भी करते हैं। कोफ्त इसलिए नहीं होती क्योंकि अपनी बात कहने का सभी को अधिकार है। हां,मैंने पिछली पोस्ट या अभी तक ब्लॉग में जो भी लिखा है,वो मेरे विचार हैं। दूसरो का इससे सहमत होना या न होना, आवश्यक नहीं है।

खैर, इन दिनों मैं कुछ खाली हूं क्योंकि बारिश की वजह से फिल्मों की शूटिंग कैंसिल हो गई हैं। एक शूटिंग के सिलसिले में हैदराबाद जाना था,लेकिन वहां भी यूनियन की हड़ताल के चलते शूटिंग रद्द हो गई। वैसे अच्छा है,घर भी जितना ज्यादा वक्त बिताने का मौका मिल जाए, उतना अच्छा है।

वैसे भी मैं थोड़ा आलसी प्रवृत्ति का व्यक्ति हूं। काम कम करना मेरी फितरत रही है। इस बीच,कुछ मीटिंग्स कीं। बहुत स्क्रिप्ट भी पढ़ीं। लेकिन, मज़ा नहीं आया। एक साहब की स्क्रिप्ट अच्छी लगी तो उनके पास प्रोड्यूसर नहीं है। और अब वो एक निर्माता खोजने निकले हैं।

जिन निर्माताओं की फिल्म की शूटिंग रद्द हुई है, समझ नहीं आ रहा कि उनकी डेट से तालमेल कैसे बैठाऊं। इसी ऊहापोह में समय गुजर रहा है। दिल्ली जाने की इच्छा हो रही है,लेकिन लगता है कि यहां जो काम हैं, उन्हें निपटा लिया जाए। बस, उन्हीं कामों को पूरा करने में लगा हूं और सामान सूटकेस से वापस निकालकर अलमारी में ऱखता जा रहा हूं।

अभी, सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि दिल्ली में आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ में हुए शहीद हुए इंस्पेक्टर स्वर्गीय मोहन चंद शर्मा को मेरी तरफ से श्रद्धांजलि। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को इस कठिन समय में शक्ति दे।

इसी के साथ,
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, September 21, 2008

कैसे रोकें सांप्रदायिक दंगों को

जब से होश संभाला है,तब से सांप्रदायिक दंगे और जात पात के नाम पर हिंसा जीवन का हिस्सा बना पाया है। भले ही एक मूकदर्शक की तरह,लेकिन मैं हमेशा इनके आस पास ही रहा। कंधमाल की जो घटना घटी, और जो कर्नाटक में हो रहा है, वो कहां तक सही है? क्या सरकार की भूमिका कुछ भी नहीं है? अब,क्या जेहाद के नाम पर हम ही निर्णय लेंगे कि किसे मारना है?भगवान के नाम पर हम ही फैसला लेते हैं कि कौन सा धर्म सही है,और कौन सा बुरा। जात-पात के नाम पर हम ही फैसला लेते हैं कि कौन सी जाति बड़ी है,और कौन सी छोटी।

दरअसल, ये बहस कई सौ साल से चलती आ रही हैं और साथ साथ हिंसा उसका दामन पकड़े हुए हैं। ये कौन लोग हैं।किस तरह की सोच रखते हैं। ये कौन हैं जो खुद को खुदा मानते हैं। ये कौन है जो खुद को ही सरकार मानते हैं।

मैंने एक क्रिश्चन मिशनरी स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की। आज मेरा जो भी व्यक्तित्व है, वो या तो उस क्रिश्चन मिशनरी स्कूल का दिया हुआ है या मेरे रंगमंच के निर्देशक और शिक्षक बैरी जॉन का। क्यों नहीं जात पात, धर्म और क्षेत्र मेरे दिमाग में आता है। इसका श्रेय उस स्कूल और बैरी जॉन को दिया जाना चाहिए। साथ ही साथ माता पिता को भी। दिल्ली आने के साथ ही जिस शख्स के साथ मैंने रंगमंच किया और जिसने मुझे मेरे अभिनेता से मेरा परिचय कराया और जिसने मुझे मार्क्स, लेनिन और महात्मा गांधी के दर्शन से अवगत कराया उस व्यक्ति का नाम शमसुल इस्लाम है।

मैं अपने जीवन से इन लोगों के योगदान को कैसे हटा सकता हूं। और जब ऐसी खबरें रोज़ के रोज़ आपको देखने या पढ़ने को मिलती है, तो मेरे जैसा व्यक्ति हतप्रभ होता रहता है। सोचता हूं कि ये कौन लोग हैं,जो दूसरे के विश्वास को छोटा समझते हैं। ये कौन लोग हैं जो दूसरे के भगवान पर हमला करते हैं। ये कौन लोग हैं,जो अपने धर्मग्रंथ के नाम पर हिंसा करते हैं। इनकी मानसिकता कैसी है, इनकी सोच कैसे चलती है। हिन्दुस्तान आगे बढ़ रहा है लेकिन बहुत दुख के साथ कहना पड़ता है कि आधे से ज्यादा हिन्दुस्तान धर्म और जात पात के नाम पर होने वाली हिंसा के चलते बर्बादी की कगार पर भी खड़ा है।

मानव विकास और सामाजिक विकास को अगर पूर्णतया आगे बढ़ाना है तो एसईजेड,मॉल यानी औद्योगिक विकास करते हुए धार्मिक दुर्भाग्य को दूर करना होगा। आज सांप्रदायिक बातों से ज्यादा मुझे शायद ही किसी बात से नफरत हो। जात पात की बातों से ज्यादा किसी चीज़ से मुझे घृणा हो। क्षेत्रववाद की बहस से ज्यादा शायद ही मुझे कोई चीज परेशान करती हो। मैं ये नहीं कहूंगा कि अब समय आ गया है कि उठो। मैं कहूंगा कि अभी नहीं उठे तो फिर कभी नहीं उठेंगे। ये सारी बातें और इन सारी बातों पर हिंसा बंद होनी चाहिए। आज ही।

हम ऐसी सोच रखने वाले व्यक्तियों को सामाजिक रुप से अगल थलग करने कि दिशा में आगे बढ़े क्योंकि ये मानसिकता रखने वाले लोग आपके समझाने के प्रयास को हिंसा से जवाब देते हैं क्योंकि इनके पास अपने कोई तर्क नहीं है। मेरा भगवान मेरे पास है, और मैं नहीं चाहता कि कोई मेरे भगवान की जिम्मेदारी ले। उसकी जिम्मेदारी मैं खुद लेता हूं। हर धर्म के अनुनायियों से मेरी प्रार्थना है कि धर्म को आप अपने तक सीमित रखें। वो आपका विश्वास है। वो आपकी श्रद्धा है। जरुरी नहीं कि वो दूसरी की भी आवश्यकता बने। कृपया अपने धर्म का लाउडस्पीकर लगाकर प्रचार करना बंद करें, और उसकी जगह अपने घर के चारदीवारी के अंदर अपनी आत्मा को जगाएं। भगवान को अपने अंगर महसूस करें। शायद,यही सब कारण हैं कि मैं अपने धर्म, अपने भगवान, अपने विश्वास और श्रद्धा की बातें न दोस्तों से करता हूं न परिवार से करता हूं,न मैं किसी बहस में शामिल होता हूं। मेरा भगवान मेरा है,और वो मेरे अंदर है। एक बार फिर शांति की अपील के साथ-

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, September 14, 2008

कब रुकेगा ये सिलसिला

कब खत्म होगा मौत का ये वहशीपना। हर दिन कोई न कोई हादसे का शिकार हो रहा है। आतंकवाद के नाम पर उन मासूम लोगों की जान ली जा रही है, जो अपने छोटे से जीवन में बड़ी-बड़ी परेशानियों से जूझते हुए जिंदंगी जी रहे हैं। वैसे, आतंकवादी हमलों का सिलसिला इस हिन्दुस्तान में कई साल से चल रहा है। रोक लगती हुई दिख नहीं रही है। कौन रोके इसे? किसे रोकना चाहिए। क्योंकि, जो ज़िम्मेदार तंत्र है, उसके पास अपनी खुफिया तंत्रों के बारे में भी कोई राय नहीं है। न वो कोई जिम्मेदारी लेना चाहता है। लेकिन क्या सरकार इस रोग को रोक पाएगी। अगर नहीं तो फिर कौन?

आदमी बाढ़, बिजली, भूख, सांप्रदायिक दंगे, क्षेत्रवाद के नाम पर हिंसा आदि से तो मारा जा ही रहा है, साथ ही साथ वो ऐसे आतंकवादी हादसों का भी शिकार हो रहा है, जिससे उसका दूर दूर तक लेना देना नहीं है। आतंकवादी आम लोगों की जिंदगी लेकर साबित क्या करना चाह रहे हैं। ये कौन सा युद्ध है। या कौन सा जेहाद है। जिसमें बिना कारण गाजर-मूली की तरह लोगों को काट रहे हैं, मार रहे हैं। लोग मर रहे हैं और हम सब देख रहे हैं। सिर्फ टीवी पर। अब, ये समय आ चुका है कि आम जनता अपने अपने सरकारों पर दबाव डाले और उनको जिम्मेदारी लेने पर मजबूर करें। अब समय आ चुका है कि हम सबको जवाब मिले,उत्तर मिले। वैसे,समय ये भी है कि अब हम खुद अपनी जिम्मेदारी लें।

हालांकि,100 करोड़ की आबादी होने का मतलब ये नहीं कि हम लोग घास-फूस हैं। मैं हर हर मृत व्यक्ति के परिवार के शोक मे शामिल हूं। मेरा दिल भी रो रहा है। हर जख्मी हुए व्यक्ति के लिए प्रार्थना करता हूं। और ये भी प्रार्थना करता हूं कि अब कोई आतंकवाद क्षेत्रवाद,भूख, बाढ़ और सूखे से न मरे। लोग दुनिया छोड़ें तो अपना जीवन चक्र पूरा करके। मेरी संवेदनाएं आतंकवाद के शिकार हर परिवार के साथ हैं। आइए, हम सब उन सारे परिवारों के लिए दुआएं करें।

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

फिर आई गांव की याद

विश्वास कीजिए श्री वर्मा के बारे में मैंने कोई भड़ास नहीं निकाली है। ये सिर्फ उनके ब्लॉग पर लिखी कुछ गलत जानकारियों का उत्तर था। ये जारी रहेगा, अगर कोई मेरे व्यक्तित्व के बारे में गलत बात लिखेगा या कहेगा। एक प्रजातांत्रिक देश में किसी को कुछ कहने का अधिकार है, तो दूसरे को उसका उत्तर देने का अधिकार भी होना चाहिए। खैर जो बीत गई सो बात गई।

मैं लोनावला में अपने निर्माता निर्देशक दोस्त संजय गुप्ता के घर आया हूं। यहां पर मेरी पत्नी शबाना रजा और आने वाली फिल्म के निर्देशक-दोस्त राजीव वीरानी भी मेरे साथ हैं। बाहर बारिश हो रही है। हम कुछ देर पहले ही यहां पहुंचे हैं। राजीव वीरानी की फिल्म की पटकथा के ऊपर भी यहां बहुत सारी बातचीत हुई।

मुंबई से 200 किलोमीटर दूर, समुद्र तल से 4000 फीट की ऊंचाई पर मुंबई कुछ अंजाना सा लगना शुरु हो जाता है। आचानक गांव की भी याद आ जाती है। और मनोज बाजपेयी के दो टुकड़े हो जाते हैं। एक टुकडा कहता है कि मुंबई में रहो तो दूसरा कहता है कि गांव चलो।
शांत, हरी-भरी वादियों और पहाड़ों का ये जादू ही अलग है। ये आपको इस हद तक सम्मोहित करता है कि आपके अंदर तक एक द्वंद छिड़ जाता है। आपका एक हिस्सा उन सारी चीजों को त्यागने के लिए मजबूर करता महसूस होता है, जिसके लिए आपने पूरा जीवन लगा दिया। मैं अभिनय की बात कर रहा हूं। और अभिनय करने के लिए बड़े शहर में रहने की बात कर रहा हूं।

वैसे,यहां आने से पहले शुक्रवार को एक कार्यक्रम में गया था। ये रामायण एनिमेशन फिल्म के लांच के मौके पर आयोजित था। मैंने इसमें श्रीराम जी के चरित्र को आवाज दी है। जूही चावला ने सीता और आशुतोष राणा ने रावण के चरित्र को अपनी-अपनी आवाजें दी हैं। मेरा मानना है कि यह रामायण एनिमेशन फिल्मों में एक नए दौर की शुरुआत करेगा। आजकल एनिमेशन फिल्मों में एक अलग तरह की क्रांति आ रही है। तकनीकी तौर पर हम पश्चिमी फिल्मों की दुनिया के बराबर में खड़े हैं। एनिमेशन फिल्म बनाने वालों की कमी जरुर है,लेकिन आने वाले साल में इस कमी का अहसास भी नहीं होगा।

गांव की याद और रामायण का कार्यक्रम की घटनाओं ने बचपन की याद भी दिला दी। मेरे गांव के घर के मंदिर में रोज सुबह दादा जी का रामायण का पाठ और उनसे रामायण की घटनाओं के बारे में सुनना याद आ गया। सच में अपने जगह की बात ही अलग है। सही कहा गया है कि तुम व्यक्ति को गांव से निकाल सकते हो पर गांव को व्यक्ति के अंदर से नहीं।

इसी के साथ

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, September 11, 2008

रामगोपाल वर्मा और मैं

मैंने अपनी पिछली एक पोस्ट में लिखा था, कि मैं रामगोपाल वर्मा के बारे में बात करुंगा, जिन्होंने अपने ब्लॉग पर मेरे बारे में बहुत कुछ गलत लिखा है।

मेरा उनसे गहरा नाता रहा है। मेरी फिल्म 'बैंडिट क्वीन' और 'तमन्ना' देखने के बाद उन्होंने मुझे 'सत्या' में काम दिया था। बीच में 'दौड' की शूटिंग चल रही थी,तो उसमे भी एक छोटी सी भूमिका दे दी थी। उनके साथ व्यवसायिक संबंध अच्छा रहा। रचनात्मक संबंध के बारे में ज्यादा कुछ कह नहीं पाऊंगा क्योंकि मेरी ज्यादातर रचनात्मक बातें अनुराग कश्यप या सौरभ शुक्ला से ही हुआ करती थी।

उन्होंने अपने ब्लॉग पर लिखा है कि जब लोग सत्या के बाद मेरे करेक्टर(भीखू म्हात्रे) का नाम लेकर बड़े समारोह में मुझे पुकारते थे,तो मैं रोमांचित हो जाता था क्योंकि वहां बड़े स्टार भी मौजूद होते थे,और लोग मुझे पुकारते थे न कि स्टार्स को। मेरा रामगोपाल वर्मा से मतभेद यही रहा है कि वो झूठ बोलते रहे हैं। उन्होंने अपने पूरे जीवन को ही झूठ पर आधारित कर रखा है।

सत्या की सफलता से मैं खुश था कि आखिरकार मुझे चुनाव का मौका मिला। मैं खुश था कि अपने लिए शायद एक छत मुझे मिल जाएगी। और सारे मतभेदों के बावजूद मैं उनका शुक्रगुजार था। मैं मुंबई में एक अभिनेता बनने आया था, जो अभिनय से अपनी रोजी रोटी चला सके, अपना परिवार चला सके और अपने जुनून को भी पूरा कर सके। मैं यहां किसी से प्रतियोगिता करने नहीं आया था। मुझे जो भी मिला मेरे सपने से ज्यादा मिला है।

हमारे वर्मा साहब की दिक्कत रही है कि वो एक ऐसा अभिनेता मनोज बाजपेयी चाहते थे,जो 24 घंटे उनके तलवे चाट सके। जिसका अपना कोई वजूद न हो। आज मैं सर झुकाकर सिर्फ यही कहना चाहूंगा कि वर्मा जी झूठ बोलकर मुझे बदनाम करना छोड़िए। हमारा और आपका रचनात्मक और व्यवसायिक संबंध खत्म हो चुका है। भावनात्मक तो कभी था नहीं। अगर आपको मेरी बहुत याद आती है तो एकाध फोटो पड़े होंगे, अपने सिराहने रख लीजिए और रोज सुबह देख लिया कीजिए। लेकिन झूठ बोलना छोड़िए।

वैसे, मैं जानता हूं कि आप छोडेंगे नहीं क्योंकि आपका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। में सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि सत्या की सफलता की उम्मीद न आपको थी, न मुझे थी। हमने अपनी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभायी थी। आपने एक निर्देशक के तौर पर और मैंने एक अभिनेता के तौर पर।

किसी का किसी पर कुछ उधार नहीं है। एक नजर में फिर भी अहसानमंद हूं। लेकिन आप मेरी भावनाओं की कद्र करना सीखिए। पर, मैं ये कह किसे रहा हूं। उसे, जो इस दुनिया के सारे संबंध-सारे नियम चाहे वो पति पत्नी के हों, या भाई बहन के हों, या किसी भी तरह के भावनात्मक संबंध, उन्हें मानने से इंकार करता है।

वैसे,पिछले नौ साल में मैंने कोशिश यही की थी कि संबंध बिगड़ न पाए या हम उस सुर से अलग न हों, जो सुनने में बेसुरा लगता है। सच बात ये है कि आर्थिक रुप से आपसे ज्यादा न मिला, और आपने जितनी फिल्मों में काम दिया, उससे कहीं ज्यादा फिल्मों में कास्ट कर निकाला भी, लेकिन फिर भी मैं आपका शुक्रगुजार हूं। अंत में सिर्फ इतना कहूंगा कि जो आपसे पाया, उसके लिए धन्यवाद। भगवान आपको शांति और खुशी दे।

दरअसल, मैं चाह रहा था कि मन की बात लोगों तक पहुंचे,तो आज कह डालीं। बहुत सारी बातें हैं, जो आज तक किसी को नहीं बतायी लेकिन वो बातें तभी होंगी, जब श्री वर्मा अपनी करतूत से बाज नहीं आएंगे। इज्जत करता हूं उनकी, पर इसका मतलब ये नहीं है कि बंधुआ मजदूर हूं। खैर, मन हल्का हो गया....आज इतना ही...

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Friday, September 5, 2008

बप्पा मोरया...

कल घर वापस जल्दी आया। शाम के छः बजे तक। लैपटॉप को गोद में रखकर पिछली ब्लॉग पोस्ट पर आयी प्रतिक्रियाओं को पढ़ा तो समझ आ गया कि बाढ़ के दृश्य देखकर सारे दोस्त और प्रशंसक भाव विह्लल हुए हैं। सारी प्रतिक्रियाएँ पढ़ी ही थीं कि बाहर ढोल-नगाड़े की आवाज़ सुनायी दी। इससे अहसास हुआ कि गणपति किसी-किसी घर में एक दिन पधारने के बाद विसर्जन के लिए जा रहे हैं।

दरअसल, ये ढोल-नगाड़े, बैंड-बाजे साल के इस महीने में बड़ा सुख देते हैं। एक अजीब तरीक़े का हर्षोल्लास हवा में होता है। मुंबईवासियों में गणपतिदर्शन की होड़ होती है। इस बीच, फ़ोन आया कि इस बार दिल्ली में मेरी माँ ने भी तीन दिन के गणपति बैठाने की ठानी है। मेरी माँ का कुछ ऐसा ही रहा है। वो मन्नत मांगती रहती हैं और उसी बहाने भक्तिभाव में डूबी रहती हैं। मुझे फ़ोन करके गणपति को लाने, रखने और उसकी बारीक पूजा-क्रिया की विधि बारे में भी पूछ रहीं थीं। गणपति को लाना और विसर्जन करना महाराष्ट्र की संस्कृति से जुड़ा हुआ है, जिससे वो पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं।

वैसे, पूजा का विधि-विधान ज़्यादा मुझे भी नहीं मालूम। मैं तो अगरबत्ती लगाकर सामान्य पूजा करने में यक़ीन करता हूँ। ख़ैर, कहीं-न-कहीं ये सारे पर्व आदमी को आदमी से जोड़ते हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। कभी-कभी सोच कर हैरानी होती है कि इस महीने के बाद सिर्फ़ पर्व और उत्सव का ही वक़्त शुरु होता है, जो साल के अंत तक चलता है। फिर वो किसी भी धर्म का क्यों न हों। चाहे वो गणपति हो, रमज़ान, दीवाली, छठ, दशहरा हो या फिर क्रिसमस क्यों न हों।

ऐसा लगता है कि सारे धर्म एक साथ ईश्वर को याद करते हुए साल की विदाई करते हैं। सभी पर्व में भगवान से दुआ करते हैं। मैं भी दुआ करुंगा गणपति से कि बिहार में बाढ़ से उपजी समस्या से लोगों को जल्द छुटकारा मिले।
ईश्वर उन्हें संकट से उबरने की शक्ति दे। उन्हें सुख समृद्धि मिले। देश में शांति का वातावरण बने और धर्म के नाम पर लड़ाई न हो। हम सभी भाईचारे की डोर में बंधे रहें।

इसी के साथ बोलिए गणपति बप्पा मोरया...

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, September 2, 2008

बिहार की बाढ़ से हारना नहीं है

पिछले दिनों प्रकाश झा जी से मुलाकात हुई। इस बातचीत में हमनें यही समझ पाया कि हम टेलीविजन के जरिए या निजी संपर्कों के जरिए लोगों को उत्साहित करें कि जिस संस्था को भी वो उचित समझें, उसके जरिए बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए दान करें। बहुत सारे टेलीविजन चैनलों से मेरी बात चल रही है, जो जमीनी स्तर पर वहां पर खड़े हैं और लोगों तक खबर पहुंचा रहे हैं।

वैसे, मेरा मानना है कि जरुरत इस बात की है कि लोगों को उत्साहित किया जाए कि वो अपने-अपने स्तर पर जो भी योगदान हो सके वो करें। इतना ही नहीं, बिहार की इस आपदा को एक राज्य की आपदा न मानते हुए राष्ट्रीय आपदा माना जाए। जहां आपकी कुल आबादी के करीब 25 लाख लोग प्राकृतिक विपदा को झेल रहे हैं और न जाने कितने ही अपनी जान गंवा बैठे हैं, उसे सिर्फ एक इलाके से जोड़कर देखना ठीक नहीं है।

कोसी नदी या कोई भी पहाड़ी नदी, जो उत्तर के पहाड़ से निकलर बिहार में प्रवेश करती है, उसका कहर और उसके किस्से मैं बचपन से सुनता आ रहा हूं। आश्चर्य इस बात का है कि हम सब देखते रह गए और पानी घुस आया। इसका मतलब ये है कि इतने साल में उन सारे बांधों पर कोई काम नहीं हुआ है। कब तक गरीब इसी तरह से अपनी जान गंवाते रहेंगे। कब तक हम सिर्फ शहर को ही हिन्दुस्तान मानते रहेंगे। सवाल इस बात का है।

वैसे, आज सेना की टुकड़ी पहुंच चुकी है। वायुसेना पहुंच चुकी है। जमीनी स्तर पर कई राहत कैंप लगाए जा चुके हैं। लेकिऩ, अभी भी इसे राष्ट्रीय समस्या की संज्ञा नहीं दी गई। मुझे आश्चर्य इस बात का है।

जब सुनामी आता है, तब भी मेरा दिल रोता है। उन सारे लोगों के लिए जो इससे प्राभवित होते हैं। आज कोसी ने कहर ढाया है, तो भी बहुत परेशानी हो रही है। लेकिन, सवाल ये है कि क्या इंसान की कीमत कुछ नहीं रह गई। सवाल ये है कि विकास की दर को किस तराजू पर मांपा जाए। व्यक्तिगत तौर पर जो मैं कर रहा हूं, वो व्यक्तिगत है, उसके लिए ढोल पीटने की जरुरत नहीं समझता। मेरा लोगों से भी निवेदन है कि बिना नगाड़े बजाए हुए अपनी अपनी तरफ से कुछ योगदान जरुर करें।

ब्लॉग पर अपने दर्शकों अपने पाठकों से अपनी संवेदना को बांटना, टेलीविजन और अखबारों के जरिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाना या फिर निजी अनुदान देना या फिर व्यक्तिगत तौर पर लोगों को उत्साहित करना कि वो समस्या के साथ जुड़े-ये भी राहत के बहुत काम आ सकता है। हम सब अपने अपने लोगों को उत्साहित करें, अपने- अपने लोगों को इस राहत कार्य से जुड़ने के लिए प्रेरित करें- यही आज के समय की आवश्यकता है।

मैंने कल भी एक टेलीविजन चैनल पर कहा था कि सबसे पहले तो लोगों को बाहर निकाला जाए, और सुना है कि वायुसेना के कुछ जवान वहां पहुंच चुके हैं, जो इस काम में दक्ष हैं। बस, निवेदन उन लोगों से है जो ऊपर के ओहदे पर बैठे हुए हैं। आपसे हाथ जोड़कर विनती हैं कि अब इस समस्या का निदान खोजिए। और न सिर्फ बांधों की मरम्मत की जाए, नेपाल से संधि को मजबूत किया जाए, ऐसी विपदा के वक्त वैकल्पिक व्यवस्था बनायी जाए और प्राकृतिक विपदा आने के संकेत देने वाली जितनी भी मशीन हैं, उन्हें कार्यान्वित किया जाए ताकि हिन्दुस्तान का व्यक्ति इस देश में खुद को सुरक्षित महसूस कर सके। वो ये सोचकर आश्वस्त हो सके उसकी रक्षा करने वाले लोग जिम्मेदार हैं और उसका भला चाहते हैं।

अभी समय नहीं है लेकिन आगे मैं उस व्यक्ति के बारे में जरुर लिखना चाहूंगा, जिसने अपने ब्लॉग पर मेरे बारे में कई गलत बाते लिखी हैं। उसका जवाब देना मैं उचित समझूंगा। निसंदेह उस व्यक्ति का मेरे जीवन से बड़ा गहरा नाता रहा है और उसका नाम है राम गोपाल वर्मा।

फिलहाल इतना हीं,

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, August 28, 2008

शक्तिहीन अभिनेता और बाढ़ का दर्द

बहुत दुख और दर्द हो रहा है, जब भी मैं टेलीविजन पर बिहार में बाढ़ से प्रभावित जनता को पीड़ा झेलते हुए देख रहा हूं। एकदम असहाय महसूस करता हूं मैं। नेपाल से आने वाली इस नदी की समस्या को जब से मैंने होश संभाला है, तब से सुनता आ रहा हूं। लेकिन आज तक कोई उसका निदान नहीं निकाल पाया। कई सरकारें आईं, कई गईं लेकिन मौत और दुख का ये सिलसिला जारी रहा। समझ नहीं आता कि बेबस लोग किससे अपनी लाचारी, अपनी पीड़ा कहें और एक शक्तिहीन अभिनेता के नाते मैं क्या कर सकता हूं? आज ये समाचार देखकर खुशी हुई कि कम से कम प्रधानमंत्री ने हजार करोड़ रुपए केंद्र की तरफ से देने का वायदा किया है। बस ये आशा है कि इसका एक एक रुपया न सिर्फ बाढ़ पीडितों की सहायता के लिए अभी के अभी खर्च किया जाएगा बल्कि इस समस्या का निदान भी फौरन खोजने की कोशिश होगी ताकि हर मानसून में कोसी नदी या किसी भी नदी से प्रभावित होने वाले लोग बच जाएं।

अभी श्री प्रकाश झा से मेरी बात हुई है। हम लोग मिलने वाले हैं। आपस में मिल बैठकर लोगों के दुख के बारे में बात करेंगे और कोशिश करेंगे कि अपनी अपील सरकार और प्रशासन तक पहुंचा पाएं।

आज मैं एक फिल्म की डबिंग कर रहा था लेकिन दिमाग में लोगों की चीख पुकार ही सुनायी दे रही थी। मॉल के बढ़ते संसार में हम शहर के ठीक बाहर की तकलीफ को भूलते जा रहे हैं। मॉल से ही सिर्फ विकास नहीं होगा। अगर गांव और गांव वाले ही दुखी रहेंगे तो इस देश का कुछ नहीं हो सकता। इन्हीं सब पीड़ा को महसूस करते हुए मैं आपके साथ अपने दुख को बांट रहा हूं और असहाय सा महसूस कर रहा हूं। आगे मैं चाहूंगा कि किसी तरीके से शारीरिक और भावनात्मक तौर पर ही सही, मैं अपनी तरह से पीड़ित लोगों की कुछ मदद कर पाऊं।

अभी बस इसका अंत करता हूं क्योंकि मुझे शेखर सुमन और प्रकाश झा जी से मिलना है और उनसे आगे इस बाबत क्या किया जा सकता है,इस पर विचार करना है।

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, August 24, 2008

बाज़ार में करता हूँ अभिनय का होमवर्क

शनिवार का दिन परिवार के साथ रहा। अमूमन मैं और मेरी पत्नी बाजार के तरफ निकलते हैं, कुछ खरीदारी करते हैं। हमारी गिनीचुनी दुकाने हैं। मेरी पत्नी की जिद होती है कि मैं साथ जाऊं। नहीं तो, मुझे घर में घुसे रहना ही अच्छा लगता है। वैसे, जाने से अच्छी बात ये भी होती है कि दुकान में विभिन्न तरह के लोगों से मिलता हूं, उनकी बातचीत ,जीवन यापन और स्थिति को देखकर अभिनेता का बहुत सा होमवर्क कर लेता हूं। अभिनेता के लिए तो यह अच्छा ही होता है। लेकिन पत्नी ने कौन सा सामान लिया, ये याद नहीं रहता। भूलने की बीमारी मुझे बहुत ज्यादा है। अपने लिखे गए डायलॉग को अगर दोबारा मुझसे कहा जाए कि मैं फिर से बोलू तो कभी नहीं कर पाता। और इस बीमारी के कारण घर में अक्सर तकरार भी होती रहती ङै। तकरार से अच्छा ये होता है कि कोशिश करता रहता हूं हर चीज को याद रखने की। तो खैर, शनिवार का दिन परिवार के साथ बाजार का दिन था। कपड़े की दुकान वाले फोन किया कि बहुत सारा कपड़ा आया है। तो हम चले गए कपड़ा देखने ,खरीदारी की और उसके कर्मचारियों के साथ हंसी मजाक किएय। कुछ एक ऑटोग्राफ दिए और अभिनेता का बहुत सारा होमवर्क करके आ गया। अच्छा लगा, सुकून मिला।

मैंने कई मित्रों के कमेंट देखे। अच्छा लगा। वैसे, ब्लॉग शुरु करने के बाद बहुत अच्छी चीजें हुई मेरे साथ । एक तो लोगों के साथ जुड़ाव, सीधा संवाद शुरु हुआ। और दूसरा इसी बहाने कुछ लोगों ने मेरी फिल्मों और मुझे पसंद करना शुरु किया। जैसे,बंगलोर के भाई जी विश्वनाथ ने मेरी फिल्म सत्या देखी और उन्हें पसंद आई।

इन्हीं कमेंट में एक था-राजीव तनेजा का। ये याद इसलिए भी रह गया क्योंकि इसमें राजीव ने लिखा कि उन्होंने 1971 का पाइरेटेड वर्जन देखा। मेरी राजीव से और सभी चाहने वालों से निवेदन है कि वो फिल्मों को यथा संभव थिएटर में जाकर देखा करें। मेरी फिल्मों को भी। क्योंकि, आपके देखने से बॉक्स ऑफिस पर पैसा आता है। और मेरे जैसे कई फिल्मकर्मियों को, उनके काम को प्रोत्साहन मिलता है। और निर्माता हमारी तरह की फिल्में बनाने को मजबूर होता है। जब तक वो नहीं होगा, तब तक ये बुद्धिजीवियों के ड्राइंग रुम की बातचीत होती रह जाएगी। आप मुझे पसंद करते ही रह जाएंगे और निर्माता उस अभिनेता को लेगा, जो अभिनेता उसे ज्यादा पैसे देगा बॉक्स ऑफिस पर। हमारी इंड्स्ट्री का चलन है कि जो ज्यादा पैसा लाए, वो ही ज्यादा बडा एक्टर और बड़ा स्टार कहलाएगा। दुनिया भी फिर उसी को देखती है । फिर आपका मुझे और मेरी पसंद की फिल्मों पसंद करना,उसके कोई मायने नहीं रह जाते।

कुछ लोगों ने मनी हनी की आलोचना भी की है। दरअसल, ये फिल्म एक आउट एंड आउट कॉमेडी फिल्म है। बहुत सारे लोगों को पसंद आयी, बहुत से लोगों को बिलकुल पसंद नहीं आई। लेकिन हमारी मेहनत में कभी कमी नहीं रही। इससे मुझे फायदा हुआ कि मेरे दर्शकों ने पहली बार जाना और माना कि मैं गंभीर किस्म की फिल्में और रोल ही नहीं करता हूं। मैं कॉमेडी फिल्मों और कॉमेडी रोल को भी सहजता पूर्वक निभा सकता हूं। वैसे,ये फिल्म करने का यह कारण नहीं था। कारण था निर्देशक गणेश आचार्य के साथ काम करना। उनकी अगली फिल्म फिर एक कॉमेडी होगी,जिसमें संभवत फिर मैं कॉमेडी करता दिखूं। कोशिश फिर करेंगे- आपका भरपूर मनोरंजन करने की और आपको न निराश न करने की। कोशिश एक ऐसी चीज है, जो हर मनुष्य को अपने अपने व्यवसाय में जुनून के साथ करते रहने होती है क्योंकि इसके अलावा हमें और कुछ तो आता भी नहीं है।

Thursday, August 21, 2008

बुढ़ापा और मैं

आज एनडीटीवी इंडिया पर बढ़ती महंगाई और कम पेंशन के बारे में चर्चा करते हुए चैनल ने एक वृद्ध रिटायर अफसर एस एन वर्मा का ज़िक्र किया। वो शौकिया पेंटर भी हैं। चैनल ने उनकी दिनचर्या की बात की और बताया कि कैसे गुजारे के लिए उनकी पेंशन कम पड़ती है। यहां तक कि अपनी एक पेंटिग बनाने के लिए आवश्यक चीजों की खरीद तो दूर, अपना गुजारा करने में भी पेंशन कम पड़ रही है। बस,इसे देखते सुनते अचानक भविष्य को सोच मेरा पूरा शरीर दहल गया।

दरअसल, एस एन वर्मा में मैं खुद को देख रहा था। कई सारे युवाओं को देख रहा था, जो अपने यौवन के मद में चूर हैं। उन्हें कहीं भी इस बात का अहसास नहीं है कि वो भी कल शायद एस एन वर्मा की जगह खड़े होंगे। आज का वृद्ध वैसा हो चुका है, जैसे कि घास फूस, जिसे काटकर अलग कर दिया जाता है ताकि नई फसल की बुगाई हो सके। वो अलग थलग खुद को महसूस करता है। उसके बारे में समाज तो दूर उसके अपने भी सुध नहीं लेते। क्या करें अपने बूढ़ों का? क्या हम उन्हें सहेज कर नहीं रख सकते? क्या हम उनसे मार्गदर्शन नहीं ले सकते? और अगर उसके बदले में हमें सिर्फ उनका ख्याल रखना है तो अधिक क्या गया? यही सोचते सोचते दिन कटा ।

लेकिन, इस दौरान कई चीजें दिमाग में आई,जो सोचा कि आप सभी के साथ बांट लूं।

मेरे दादा की 90 की उम्र में गुजरे। कभी कोई बीमारी नहीं। अपने निधन तक वो सारे लोगों के खेतों का दौरा करते और खेतों में होने वाली परेशानियों का हल आकर बताते। भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे। एक बुढ़ावा मैंने ये देखा। एक वो भी,जो मेरे आसपास है। मेरे पिताजी का। वो अपने मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने पटना गए। कुछ ऐसी चूक हुई ऑपरेशन में कि उस आंख की रोशनी गंवा बैठे। पता नहीं क्यों लेकिन आजतक इसका दोष भाव मुझे होता है।

लेकिन, मैंने उनके जैसा प्रजातांत्रिक पिता और जीवन को उत्सव की तरह जीने वाला शख्स अपने आसपास नहीं देखा। एक मेरे ससुर जनाब रज़ा साहब, जो अब 80 के पढ़ाव को छूने वाले हैं। फिर भी, नौकरी पर जाना उन्हें आज भी सबसे प्रिय है। मैं इन सबसे सीखता हूं। और अपने आने वाले दिन की तैयारी करता हूं।

मुझे याद है एक नाटक - जो मैंने कई साल पहले दिल्ली रंगमंच पर किया था। इसमें मैं मैं अकेला अभिनेता था। इस नाटक में मैंने एक रिटायर्ड स्टेशन मास्टर की भूमिका की थी, जो अपने बेटे और बहू द्वारा प्रताड़ित है। नाटक के दौरान हमेशा मैंने एक बूढ़े सज्जन को आगे वाली सीट पर पाया। और हर शो के अंत में जार जार रोते हुए भी पाया। पाया ये गया कि उनकी जीवनगाथा मेरे इस नाटक के इस चरित्र से बहुत मिलती जुलती है। एक तरफ नाटक का दर्शक प्रताड़ित पिता, और दूसरी तरफ मेरी फिल्म 'स्वामी' का बूढ़ा, जो अपने बेटे को खुद ही बाहर भेज देता है अपना उद्देश्य को पूरा करने के लिए। और खुद वृद्धाश्रम में जगह पाता है।

वैसे, कई हैं बूढ़े। जो आज के दिन मेरा मार्गदर्शन कर रहे हैं। कई है बूढ़े जो मुझे आने वाले दिन की तैयारी करा रहे हैं। कई हैं बूढ़े,जो मुझे जीवन को हर पल जीने की राह दिखा रहे हैं। और कई हैं बूढ़े, जो मुझे काम को पूजा समझना सिखा रहे हैं। सिखना, समझना,जीना मैं इन्हीं से जानता हूं। मेरा शत शत प्रणाम इन सभी को।

पिछली पोस्ट में कई कमेंट आए,मैं सबका जवाब देना चाहता हूं लेकिन आज अचानक मन में समाज में बुजुर्गों की स्थिति पर कार्यक्रम देखकर ये विचार कौंध गए। बहरहाल,अगली पोस्ट में आप लोगों की बात करुंगा-इस वादे के साथ

आपका और आपका

मनोज बाजपेयी

Friday, August 15, 2008

यादों के सफ़र में स्वतंत्रता दिवस

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सभी साथियों को मेरी तरफ़ से बधाइयाँ और शुभकामनाएँ।

एक छोटी-सी झोंपड़ी, लकड़ी की चौकी पर बैठे हुए मास्टर साहब, सामने बोरी पर बैठा हुआ मैं और मेरे साथ गांव के कई बच्चे। और क, ख, ग की आवाज़ से पूरा माहौल गूंज रहा था। क्लास ख़त्म करने से पहले मास्टर जी ने कहा कि अगले दिन बाँस की छोटी-छोटी तिल्लियाँ लेकर आना और तिल्लियों में तिरंगा बनाकर लाना। पूरी रात हम तिल्लियाँ काटते रहे, छीलते रहे और क़रीब पंद्रह-बीस तिरंगे तिल्लियों में डालकर अगले दिन स्कूल पहुंचे। एक मध्यम आकार के लकड़ी के पोल से तिरंगा लगा हुआ था। मास्टर जी ने उसे लहराया और पहली बार मास्टर जी के सुर-से-सुर मिलाकर मैंने जन-गण-मन गाया था। विश्वास करें आज तक नहीं भूला हूँ। वो चार किलोमीटर पैदल चलकर जाना, क़तार में सारे बच्चों के पीछे हाथ में तिरंगा लेकर पगडण्डियों पर चलते जाना रह रहकर याद आता है।

वापस घर जाकर माता-पिता को जन-गण-मन टूटी-फूटी आवाज़ में सुनाना भी याद है। उस समय का हिन्दुस्तान भी कुछ याद है और उस समय का बिहार भी याद है। क़रीब तीन साल पहले फिल्म '1971' की शूटिंग कर रहा था, तो रोहतांग पास की माइनस 14 डिग्री की ठंड में दस दिन तक शूटिंग करते हुए भी परेशानी का एहसास कभी नहीं हुआ। इसका कारण शायद बचपन में पड़ा देश के लिए जज़्बे का बीज था। शायद इसलिए सारी यूनिट के हतप्रभ होते भी दस दिन तक मौत से खेलते हुए '1971' के क्लाइमेक्स की शूटिंग की थी। क्योंकि मैं अंदर से सिर्फ़ फ़िल्म नहीं बना रहा था। मैं अपने काम से अपने देश के प्रति अपना सम्मान प्रगट कर रहा था। जब पुणे में '1971' के प्रदर्शन के बाद लेफ़्टिनेंट जनरल ने कहा कि ये फ़िल्म हली फ़िल्म है, जिसने इंडियन आर्मी के साथ न्याय किया है तो मेरी आँखें भर आईं थीं। '1971' की शूटिंग मेरे लिए मेरी बेहतरीन यादों में से एक है। '1971' ने मुझे बेहतरीन अभिनय का सुख दिया। '1971' मेरी अच्छी और बेहतरीन फ़िल्मों से एक है। '1971' मेरे देश की फ़िल्म है और वो मेरे लिए गर्व है।

वैसे, अपनी यादों से इतर बात करूँ तो जब-जब यह दिन आता है, तब-तब इसको मनाने के तरीक़े आपकी आँखों के सामने दिखते हैं और कानों को सुनायी भी देते हैं। कहीं ढोल-नगाड़े बजते हैं तो कहीं टेलीविजन पर प्रधानमंत्री का भाषण चल रहा होता है। कहीं पर बच्चों की किलकारियाँ सुनायी देती हैं, तो किसी-किसी घर से कोई भी आवाज़ नहीं आ रही होती है - मतलब छुट्टी मन रही है। इस बार का स्वतंत्रता दिवस कुछ अलग है और बहुत ही मिला-जुला भी। मन में विभिन्न तरह के विचार आ रहे हैं। अभिनव बिंद्रा के गोल्ड मेडल जीतने की ख़ुशी भी है, तो नैना देवी में 100 से ज़्यादा लोगों के मारे जाने, अहमदाबाद ब्लास्ट में कई लोगों के मारे जाने, जम्मू-कश्मीर में रोज़ होने वाली मौतें-प्रदर्शन और उनसे उठती हुई राजनीति तथा अनेक प्रकार की अच्छी और बुरी बातें इस बार मन को सुकून भी दे रही हैं तो परेशान भी कर रही हैं। हर बार के स्वतंत्रता दिवस पर एक सजग नागरिक होने के नाते सोचता हूँ कि कब वो दिन आएगा, जब हम बिना परेशानी के, बिना किसी द्वंद्व के गर्व के साथ झंडे के नीचे खड़े होकर जन-गण-मन गा सकेंगे। आशा है कि वो दिन क़रीब है। आशा है कि सारे लड़के और लड़कियाँ शिक्षा के रास्ते पर चलेंगे। आशा है कि सबको बराबर का अवसर मिलेगा। आशा है कि सबके पास रोटी, रोज़गार, कपड़ा और मकान होगा। आशा है तभी कुछ हो सकता है। आशा है तभी कुछ बदलेगा। क्योंकि पाश ने सही कहा है कि सबसे बुरा होता है सपनों का मर जाना। हम सब सपने देखते रहें। सपने देखना भी एक गतिविधि है या यूँ कहें कि सपना देखना ही आगे जाने का संकेत करता है। बाक़ी तो सही कहा है कि जो बीत गई सो बात गई। चलिए, हम मिलकर सपना देखें।

आज स्वतंत्रता दिवस का मौक़ा है, तो यादों में यही दिन था। पिछली पोस्ट पर कई कमेंट थे। आलोचना है - प्रशंसा भी। कई के जवाब ज़ेहन में हैं, लेकिन वो सब अगली पोस्ट में। एक बार फिर, स्वतंत्रता दिवस की बधाई।

आपका

मनोज बाजपेयी

Tuesday, August 12, 2008

अविश्वास के बावजूद पढ़िए, यह मेरा ब्लॉग है

मेरे ब्लॉग पर राजेश रोशन साहब का पहला कमेंट है और उनके बाद राजीव तनेजा, दिनेश राय, कविता, शैलेश भारतवासी, गिरीश, सुरेश चिपलूनकर, रजिया राज, अनूप शुक्ला और उन सभी बंधुओं को धन्यवाद जिन्होंने मेरे ब्लॉग पर आकर कमेंट किया और मेरी पहली पोस्ट की तारीफ की। वैसे, इन कमेंट में कुछ दोस्तों ने सवाल भी उठाए हैं । मसलन-

हिन्दी के बारे में आर सी मिश्रा साहब ने लिख डाला कि "कौन लिख रहा है ये ब्लॉग। अब मनोज बाजपेयी तो इतनी अच्छी हिन्दी लिखने से रहे।" दरअसल, ये दोष उनका नहीं है जो यह सवाल पूछ रहे है कि एक फिल्म अभिनेता हिन्दी में कैसे लिख सकता है? अमूमन जितने भी बड़े स्टार्स है, वो काम चलाऊ हिन्दी तो बोल लेते हैं लेकिन शायद हिन्दी में नहीं लिख पाएंगे। वो हिन्दी में इंटरव्यू भी बमुश्किल दे पाते हैं। इससे कहीं-न-कहीं दर्शकों-पाठकों के मन में ये आशंका होनी लाजिमी है कि एक अभिनेता हिन्दी में कैसे ब्लॉग लिख सकता है। आपकी जानकारी के लिए श्री अमिताभ बच्चन बहुत अच्छी हिन्दी जानते हैं। आशुतोष राणा बहुत अच्छी हिन्दी लिखते-बोलते हैं और जितने भी लोग रंगमंच से आए हैं, उनकी हिन्दी और अंग्रेजी अच्छी है। अगर आपको अभी भी अविश्वास है तो उसे रहने दीजिए, लेकिन पढ़ना जारी रखिए क्योंकि यह मेरा यानी मनोज बाजपेयी का ही ब्लॉग है और मनोज बाजपेयी की ही बात है।

पीआरशिप के बारे में संजय, आनंद और जी विश्वनाथ समेत कुछ लोगों ने कमेंट किया है कि ये ब्लॉग पीआरशिप तो नहीं? अब मैं आपको भी ये दोष न दूंगा कि आपने यह सवाल पूछा तो क्यों पूछा या फिर आपके मन में संशय हुआ क्यों? आजकल हर कदम एक फिल्म अभिनेता है और उसके पी आर शिप या प्रचार-प्रसार के पचास कारण होते हैं। टेलीविजन चैनल ने कोई कमी तो रखी नहीं है । अब तो न्यूज के बदले वो बड़े स्टार की पी आर एजेंसी बन चुके हैं। मेरा ये कदम भी शक के घेरे में आएगा, ये मुझे पता था। दरअसल, ये मेरे कुछ पत्रकार मित्रों द्वारा शुरु किया ब्लॉग है, जिसमें उन्होंने मुझे आमंत्रित किया है कि मैं भी अपने दिल की बात कह सकूं। तकनीकी सहयोग पूरा उनका है। जहां तक अंग्रेजी की बात है और मुमकिन है कि आने वाले दिनों में कुछ और भाषाओं में भी पोस्ट दिखे तो वो निश्चित तौर पर ट्रांसलेशन है। अब मैं एक भाषा में लिखकर खुद उसका ट्रांसलेशन कर सकूं, फिलहाल इतना वक्त मेरे पास तो नहीं है।

अपनी कथा यात्रा के बारे में- पंद्रह साल सिनेमा में अभिनय और 11 साल थिएटर करने के बाद भी मुझे ही अपनी कथा बतानी पड़े तो इसका मतलब है कि इतने सालों में आपने कभी इस अभिनेता की सुध नहीं ली। कृपया कुछ वक्त खर्च कर गूगल में मनोज बाजपेयी टाइप करें, सारी जानकारियां सामने आ जाएंगी।

फिलहाल, पोस्ट लंबी हो चली है। ब्लॉग पढ़ने वाले सभी बंधुओं को फिर धन्यवाद। मेरी फिल्म "हनी है तो मनी है" जरुर देखें और उस पर यहां प्रतिक्रिया दें। ब्लॉग संवाद कायम करने के लिए ही है, सो संवाद जारी रहेगा। अगली पोस्ट के साथ जल्द हाजिर होता हूं।

आपका और सिर्फ आपका

मनोज बाजपेयी

Sunday, August 10, 2008

नाम, कंप्यूटर और मैं

बच्चा पैदा होने से पहले ही नाम खोजने की प्रकिया शुरु हो जाती है। चिंकू, पिंकू, अमिताभ, आमिर ,राज या फिर मनोज। मुझे इस नाम से कभी वास्ता नहीं रहा क्योंकि मुझे हमेशा ऐसा लगता रहा कि लाख में कम से कम निन्यान्बे हज़ार मनोज नाम के हैं। और फिर, कहते हैं न कि न नाम-वाम मे क्या रखा है। वैसे ही, ब्लॉग बनाने की बात मेरे एक मित्र प्रसून ने की तो मुद्दे से ज्यादा मैं नाम के बारे में ही सोचता रहा। दरअसल, इसे बनाने में सहयोग करने वाले मेरे एक और मित्र ने जब मुझे बताया कि इसका नाम Manoj Bajpai लिखा है, तो मैं निराश हो गया। वजह ये कि ये मेरे नाम की सही स्पेलिंग नहीं है। मेरा ऑफिशियल नाम है Manoj Bajpayee। ये स्पेलिंग आज तक फिल्म वालों ने या मीडिया वालों ने कभी उपयोग में नहीं लायी। और जब मैंने इसे बदलना चाहता तो मुझ पर अंकज्योतिष अपनाने की टिप्पणी की गई।

वैसे, मेरा किसी भी गणित, किसी भी विज्ञान और किसी भी मान्यता से परहेज नहीं है। मैं विश्वास रखता हूं कि मेरा नाम 'गधा' भी होता तो लोग खूब कहते कि गधे ने 'सत्या' में अच्छा काम किया है, पिंजर में नेशनल अवार्ड लिया और 'मनी है तो हनी है' में कॉमेडी भी कर सकता है ये गधा। क्या फर्क पड़ता है?

वैसे, अगर सोचने जाए तो उल्लू को मनोज कहा जाता तो लोग कहते कि मनोज रात भर जगता है, फर्क क्या पड़ता है? बहरहाल, प्रकिय्रा खत्म हुई और मेरे नाम की स्पेलिंग चेंज कर दी गई। बदला कुछ भी नहीं पर मुझे संतुष्टि मिल गई।

ये कंप्यूटर भाई मेरे संपर्क में डेढ़ साल पहले आए है। इससे पहले मैं खुद को कंप्यूटर अज्ञानी कहता था। इस दौरान, इस विषय मे सिर्फ पहली ही पास कर पाया है। बहुत मुश्किल हो रही है, लेकिन फिर भी एक नए विज्ञान से, एक नयी वस्तु से खिलवाड़ करने में मजा आ रहा है। लेकिन, ये साहब इतने महंगे आते हैं कि डर भी लगता है कि सब नष्ट न हो जाए या कंप्यूटर की भाषा में डिलीट न हो जाए।

वैसे, बड़ा सही विज्ञान है यह। हाल फिलहाल में मैं जिसके संपर्क में भी आया उससे कुछ न कुछ सीखता रहा। फिल्म 'एसिड फैक्ट्री' के दौरान फरदीन खान और हमारे फोटोग्राफर मित्र जीतू ने मुझे म्यूजिक डाउनलोड़ करने की प्रक्रिया को समझाया । आजकल मैं संगीत सुन रहा है। माफ कीजिए, टेप पर नहीं अपने कंप्यूटर पर। समय कैसे बीत गया पता भी नहीं चला। लगता है कि ये कल की बात है जब बाबूजी बीरगंज (नेपाल) गए थे और पैनासोनिक का टेप रिकॉर्डर लेकर आए थे और अतिउत्साही मेरे भाइयों ने उसमें अपनी आवाज टेप की थी। वो सभी लगातार अपनी ही आवाज पर मोहित होते रहे थे। कितना कुछ बदल गया ? दुनिया करीब आई और इंसान दूर होते गए। वाह ! क्या विज्ञान की खोज है। फिर भी, मैं बोलने वाला कौन हूं? ग्लोब्लाइजेशन है भाई। इससे अलग सोचोगे तो प्रतिक्रियावादी होने का इल्जाम मढ़ दिया जाएगा। पहले ही अंक ज्योतिष पर विश्वास होने का इल्जाम लग चुका है। दंभी होने का भी इल्जाम लग चुका है। अब और इल्जाम नहीं चाहिए।

लेकिन हां, लगातार लिखने की प्रक्रिया जारी रहेगी ताकि सोचता रह सकूं। मेरे ब्लॉग में आप सबका स्वागत है। ब्लॉग लिखूं, अपनी फिल्म का प्रचार न करूं, ऐसा नहीं होगा। एक स्वार्थी अभिनेता की तरह कहूंगा कि 'मनी है तो हनी है' जरुर देखें। मेरी अगली फिल्म 'जुगाड़' दिल्ली में सीलिंग की समस्या से उपजी है। उसे देखना न भूलें।

आपका अपना और सिर्फ अपना

मनोज बाजपेयी with Payee