आज एनडीटीवी इंडिया पर बढ़ती महंगाई और कम पेंशन के बारे में चर्चा करते हुए चैनल ने एक वृद्ध रिटायर अफसर एस एन वर्मा का ज़िक्र किया। वो शौकिया पेंटर भी हैं। चैनल ने उनकी दिनचर्या की बात की और बताया कि कैसे गुजारे के लिए उनकी पेंशन कम पड़ती है। यहां तक कि अपनी एक पेंटिग बनाने के लिए आवश्यक चीजों की खरीद तो दूर, अपना गुजारा करने में भी पेंशन कम पड़ रही है। बस,इसे देखते सुनते अचानक भविष्य को सोच मेरा पूरा शरीर दहल गया।
दरअसल, एस एन वर्मा में मैं खुद को देख रहा था। कई सारे युवाओं को देख रहा था, जो अपने यौवन के मद में चूर हैं। उन्हें कहीं भी इस बात का अहसास नहीं है कि वो भी कल शायद एस एन वर्मा की जगह खड़े होंगे। आज का वृद्ध वैसा हो चुका है, जैसे कि घास फूस, जिसे काटकर अलग कर दिया जाता है ताकि नई फसल की बुगाई हो सके। वो अलग थलग खुद को महसूस करता है। उसके बारे में समाज तो दूर उसके अपने भी सुध नहीं लेते। क्या करें अपने बूढ़ों का? क्या हम उन्हें सहेज कर नहीं रख सकते? क्या हम उनसे मार्गदर्शन नहीं ले सकते? और अगर उसके बदले में हमें सिर्फ उनका ख्याल रखना है तो अधिक क्या गया? यही सोचते सोचते दिन कटा ।
लेकिन, इस दौरान कई चीजें दिमाग में आई,जो सोचा कि आप सभी के साथ बांट लूं।
मेरे दादा की 90 की उम्र में गुजरे। कभी कोई बीमारी नहीं। अपने निधन तक वो सारे लोगों के खेतों का दौरा करते और खेतों में होने वाली परेशानियों का हल आकर बताते। भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे। एक बुढ़ावा मैंने ये देखा। एक वो भी,जो मेरे आसपास है। मेरे पिताजी का। वो अपने मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने पटना गए। कुछ ऐसी चूक हुई ऑपरेशन में कि उस आंख की रोशनी गंवा बैठे। पता नहीं क्यों लेकिन आजतक इसका दोष भाव मुझे होता है।
लेकिन, मैंने उनके जैसा प्रजातांत्रिक पिता और जीवन को उत्सव की तरह जीने वाला शख्स अपने आसपास नहीं देखा। एक मेरे ससुर जनाब रज़ा साहब, जो अब 80 के पढ़ाव को छूने वाले हैं। फिर भी, नौकरी पर जाना उन्हें आज भी सबसे प्रिय है। मैं इन सबसे सीखता हूं। और अपने आने वाले दिन की तैयारी करता हूं।
मुझे याद है एक नाटक - जो मैंने कई साल पहले दिल्ली रंगमंच पर किया था। इसमें मैं मैं अकेला अभिनेता था। इस नाटक में मैंने एक रिटायर्ड स्टेशन मास्टर की भूमिका की थी, जो अपने बेटे और बहू द्वारा प्रताड़ित है। नाटक के दौरान हमेशा मैंने एक बूढ़े सज्जन को आगे वाली सीट पर पाया। और हर शो के अंत में जार जार रोते हुए भी पाया। पाया ये गया कि उनकी जीवनगाथा मेरे इस नाटक के इस चरित्र से बहुत मिलती जुलती है। एक तरफ नाटक का दर्शक प्रताड़ित पिता, और दूसरी तरफ मेरी फिल्म 'स्वामी' का बूढ़ा, जो अपने बेटे को खुद ही बाहर भेज देता है अपना उद्देश्य को पूरा करने के लिए। और खुद वृद्धाश्रम में जगह पाता है।
वैसे, कई हैं बूढ़े। जो आज के दिन मेरा मार्गदर्शन कर रहे हैं। कई है बूढ़े जो मुझे आने वाले दिन की तैयारी करा रहे हैं। कई हैं बूढ़े,जो मुझे जीवन को हर पल जीने की राह दिखा रहे हैं। और कई हैं बूढ़े, जो मुझे काम को पूजा समझना सिखा रहे हैं। सिखना, समझना,जीना मैं इन्हीं से जानता हूं। मेरा शत शत प्रणाम इन सभी को।
पिछली पोस्ट में कई कमेंट आए,मैं सबका जवाब देना चाहता हूं लेकिन आज अचानक मन में समाज में बुजुर्गों की स्थिति पर कार्यक्रम देखकर ये विचार कौंध गए। बहरहाल,अगली पोस्ट में आप लोगों की बात करुंगा-इस वादे के साथ
आपका और आपका
मनोज बाजपेयी
Thursday, August 21, 2008
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14 comments:
बुढापे और गरीबी से राम बचाए. ये दोनों आने पर सब साथी-सम्बन्धी किनारा कर लेते हैं.
सही है...
मैं कई बार अलग-अलग वृद्धाश्रमों में गया हूं। मैने इस पीड़ा को नजदीक से देखा है। एक बार जब मैं एक बुजुर्ग से बात कर रहा था तो मुझे पता चला कि उस बुजुर्ग का एक बेटा आईएएस है, दूसरा डाक्टर। लेकिन उसकी चाहत थी कि कोई बेटा उसके अंतिम संस्कार में भी शामिल न हो। इसके आगे उस बुजुर्ग की कथा कहने की जरूरत नहीं है।
आपने एक एेसे मुद्दे को उठाया है जिस पर समूचे समाज को गहन चिंतन की जरूरत है। इस तरफ सरकारी प्रयास नाकाफी व बेमानी हैं। सिर्फ सीनियर सिटीजन के नाम पर कुपात्रों को पेंशन देने से कुछ नहीं होगा।
लेकिन आज अचानक मन में समाज में बुजुर्गों की स्थिति पर कार्यक्रम देखकर ये विचार कौंध गए।
' great idea and thought for old people, read your article about it, expression of views and feelings are appreciable"
regards
manoj jee aapne wridhashram ki baat bhi kahi hai,magar mera apna anubhav hai ki aaj gaon hi wridhashram me badal rahe hain.maine ise apne blog par likha bhi hai kabhi fursat mile to padhiyega.waise aapne likha bahut achha hai budhaape ki aapne apne shabdon se kai tasweer bana dali hai,koi dara rahi hai to koi prerna de rahi hai.aapki kala ka ye andaaz bhi pasand aaya.badhai aapko
बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है आपने। युवा वर्ग यह समझ नहीं पाते कि कल उनका भी यही हाल होना है। आज के वृद्धों को दोनो पीढ़ियों से समझौता करना पड़ा , अपने से उपरवालों से भी , अपने से नीचेवालों से भी।
Manoj ji, Aap ke baat se kehu bhi asahmat na ho sakela. Vriddh jivan ke e katu satya ba aaj ke samay ka . Humara ke lagela ki shahar me rahe vaala vriddh logan ke halat jyada kharab baate gaon valan ke tulna me.Bhoutikta ke e yug me sabhe khali apne baare me sochat ba. apne janam data ke bhi bhula jat ba- e kaisan yug aa gail ba. eh par subke soche ke chahi.
manoj ji e vishay uthave ke khatir aap ke dhanyvaad.
अभी हम सोचते नहीं हैँ लेकिन अचानक दबे पाँव बुढापा दस्तक देने लगेगा....पता भी ना चलेगा....
खैर...जीना इसी का नाम है ...
वो लोग तो फिर भी ठीक हैं जिन्हें कम से कम पेंशन मिल रही है...लकिन उन लोगों का क्या जिन्होंने बच्चों की जिंदगी बनाने में सारा पैसा खर्च कर दिया और बुढापे में बेसहारा हो गए....
बहुत पहले एक कहानी पढ़ी थी। शायद किसी बाल पत्रिका में। तब मैं भी बच्चा था। किसी समय किसी देश में, शायद चीन में एक परंपरा थी कि बुढ़ा होने के बाद व्यक्ति को हाथ से खींची जाने वाली एक काठ की गाड़ी में बिठा कर उसका पुत्र किसी निर्जन स्थान में छोड़ आता था गाड़ी सहित। ऐसे ही एक आदमी अपने बुढ़े पिता को काठ की गाड़ी में बिठा कर छोड़ने गया। उस आदमी का बेटा भी उसके साथ था। जब वह आदमी गाड़ी सहित अपने पिता को छोड़ कर वापस आने लगा तो उसके बेटे ने कहा कि पिजाजी ये काठ की गाड़ी तो लेते चलिए। आदमी ने पूछा क्यों ? तो उसके बेटे ने कहा कि एक दिन मुझे भी आपको इसी तरह छोड़ना पड़ेगा, तब यही गाड़ी काम आ जाएगी, वरना मुझे नई गाड़ी बनानी पड़ेगी। आदमी को फिर समझ में आ गया कि बच्चे ने बचपने में बहुत बड़ी बात कह दी है। वह ठीक उसी समय उसी गाड़ी में अपने बुढ़े बाप को बिठा कर वापस घर ले आया। बाद में उसी बुढ़े आदमी ने अपने अनुभवजन्य ज्ञान से अपने बेटे और गांव के लोगों लाभान्वित किया।
जब यह कहानी पढ़ी थी करीब बीस-बाइस साल पहले (ग्लोबलाइजेशन के दौर से कुछ साल पहले), तब दस-बारह साल का था और खुब रोया था। लेकिन, यह सोच कर बहुत राहत मिली थी कि हमारे घर-समाज-देश में ऐसे हृदयहीन रिवाज नहीं हैं। लेकिन, वर्तमान में हमारे यहां बुजुर्गों की जो दुगर्ति देखने-सुनने को मिल रही है, वह बयां कर रही है कि हम जैसे-जैसे भौतिक प्रगति कर रहे हैं, हमारे संवेदनहीन होते जाने की रफ्तार उससे कई गुना बढ़ती जा रही है।
सच मानिए, आज भी बुढ़े लोगों को देखता हूं तो जेहन में दिवंगत बाबा-आजी (दादा-दादी) की तसवीर कौंध जाती है। आपने इस विषय पर चर्चा छेड़ मन के तारों को झिंझोड़ दिया है। दरअसल, आज की तारीख में संवेदनहीनता हमारे समाज का सबसे बड़ा संकट है।
मनोजजी,
आपका लेख मुझे तो बहुत सामयिक लगा।
अब कुछ ही दिनों में, मैं ६० साल का हो जाऊंगा।
मेरे कुछ विचार:
बुढापा दो टाईप का होता है।
१) शरीर का बुढापा, जिस के बारे में हम कुछ नहीं कर सकते। शरीर कमज़ोर होता जाएगा। खाने-पीने पर नियंत्रण रखकर, और नियमित व्यायाम से थोड़ी सी राह्त मिल सकती है लेकिन समस्या से बच नहीं सकते।
२)मन का बुढापा, जिसे हम स्वयं आमन्त्रित करते हैं, यह नैसर्गिक नहीं है। अगर हम चाहते हैं और प्रयत्न करते हैं तो मन कभी बूढा नहीं होगा।
एक ज़माना था जब हम यह अपेक्षा करते थे कि हमरे संतान बुढ़ापे में हमारा देखबाल करेंगे और यह उनका कर्तव्य भी है।
ज़माना आज बदल ग्या है। अब हम सब को अपने बुढापे के बारे में स्वयं सोचकर इसके लिए तैयारी और प्रबन्ध करना होगा।
मेरी राय में पूर्णरूप से रिटायर होना हर एक के लिए आवश्यक नहीं है।
और न ही ६० साल के बाद, पैसे या संपत्ति या सत्ता के लिए भागदौड़ जारी रखना। मन को किसी तरह सदा व्यस्त रखना लाभदायक है और इस के लिए अनेक रास्तें है और सही रास्ता हर एक को चुनना होगा।
आजकल, कंप्यूटर और ईंटरनेट के ज़माने में और भी रास्ते मिल जाएंगे, अपने आप को क्रियाशील रखने में। बीस - पच्चीस साल पहले जो काम वृद्धों से नहीं हो सकता था वह आज संभव है।
मेरी कामना है मेरी मृत्यु अचानक और उस क्षण हो जब अपने कंप्यूटर पर कोई क्रियाशील काम कर रहा हूँ। हम तो भागशाली हैं। हम मन और बुद्धि के बल पर कमाते हैं। हम मज़दूर नहीं हैं जो पचास साल के बाद शायद ही काम करने योग्य बने रहते हैं। जब उनके बारे में सोचता हूँ तो दिल भारी हो जाता है। उनके लिए मैं कुछ पैसे दान करने के अलावा और क्या कर सकता हूँ?
मेरे पिताजी सन २००६ में रिटायर हुए ..जब नौकरी में थे तो ट्रेड यूनियन के नेता थे ...जिंदगी भर कर्मचारियों के हक और हुकूक के लिये लडते रहे ...महज २०० रुपये किरानी ने घूस मागे थे पेंशन रिलीज करने के लिये ..पेंशन आज तक नही मिला ..मामला पटना हाइकोर्ट में लंबित है ..एक तारिख पर वकील के फी इतने होते है कि कभी कभी उन्हें लगता है कि मुकदमेबाजी को प्रणाम कर दे ...लेकिन लड रहे है ..मैने अपने जवां पिता को बूढा होते देखा ..खुद्दार इतने कि बेटों से अपना खर्च नही माँगते ..कभी कभी मैं भावावेश में कुछ करने की ठानता हूं तो सबसे पहले उन्हीं से राय लेता हूं ...और डिसीजन मत पूछिये एक सेकेंड में वो बताते है ..सभी पिता ..सभी माता लगभग ऐसे ही होते है ..मैं उन सभी लोगों से प्रार्थना करता हूं बूढे मां बाप , भाइ , दादा का सम्मान करें उनकी देखभाल करें ...ऐसा नही करते तो एक दिन आपको भी बूढा होना है ..और आप जैसा व्यवहार अपने बडों से रखेंगे बेशक रिटर्न भी आपको वैसा ही मिलेगा ....मनोज जी बहुत ही संवेदनशील पोस्ट है आपकी .....
मनोजजी, आप सच में एक बडे अभिनेता ही हैं।एक ऐसी बात हम सब के सामने लाकर रखदी जो शायद ही कोइ व्यस्त आदमी रखेगा।
मेरी होस्पीटल एक सरकारी है।जहाँ आम आदमी से मिलना-ज़ुलना होता है।एसे में कमज़ोर और ग़रीब वयस्कलोगों को देख़कर बडा दू:ख होता है।कंइ तो अपने आप अकेले ही दवाइयों केलिये आते है।उनका ना कोइ बेटा होता है ना बेटी।बुढापा/कमज़ोरी/तन्हाई ये तीनों बिमारी से ये लोग घीरे हुए होते है।
मनोज जी.सब से बडी बिमारी है "तन्हा बुढापा"
भगवान कीसी को ये बिमारी न दे।
पोस्ट के लिये धन्यवाद।
old age is not a curse.it is a plethora of experience which young sholuld learn to glorify and to serve their oldage well......
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