Thursday, August 28, 2008

शक्तिहीन अभिनेता और बाढ़ का दर्द

बहुत दुख और दर्द हो रहा है, जब भी मैं टेलीविजन पर बिहार में बाढ़ से प्रभावित जनता को पीड़ा झेलते हुए देख रहा हूं। एकदम असहाय महसूस करता हूं मैं। नेपाल से आने वाली इस नदी की समस्या को जब से मैंने होश संभाला है, तब से सुनता आ रहा हूं। लेकिन आज तक कोई उसका निदान नहीं निकाल पाया। कई सरकारें आईं, कई गईं लेकिन मौत और दुख का ये सिलसिला जारी रहा। समझ नहीं आता कि बेबस लोग किससे अपनी लाचारी, अपनी पीड़ा कहें और एक शक्तिहीन अभिनेता के नाते मैं क्या कर सकता हूं? आज ये समाचार देखकर खुशी हुई कि कम से कम प्रधानमंत्री ने हजार करोड़ रुपए केंद्र की तरफ से देने का वायदा किया है। बस ये आशा है कि इसका एक एक रुपया न सिर्फ बाढ़ पीडितों की सहायता के लिए अभी के अभी खर्च किया जाएगा बल्कि इस समस्या का निदान भी फौरन खोजने की कोशिश होगी ताकि हर मानसून में कोसी नदी या किसी भी नदी से प्रभावित होने वाले लोग बच जाएं।

अभी श्री प्रकाश झा से मेरी बात हुई है। हम लोग मिलने वाले हैं। आपस में मिल बैठकर लोगों के दुख के बारे में बात करेंगे और कोशिश करेंगे कि अपनी अपील सरकार और प्रशासन तक पहुंचा पाएं।

आज मैं एक फिल्म की डबिंग कर रहा था लेकिन दिमाग में लोगों की चीख पुकार ही सुनायी दे रही थी। मॉल के बढ़ते संसार में हम शहर के ठीक बाहर की तकलीफ को भूलते जा रहे हैं। मॉल से ही सिर्फ विकास नहीं होगा। अगर गांव और गांव वाले ही दुखी रहेंगे तो इस देश का कुछ नहीं हो सकता। इन्हीं सब पीड़ा को महसूस करते हुए मैं आपके साथ अपने दुख को बांट रहा हूं और असहाय सा महसूस कर रहा हूं। आगे मैं चाहूंगा कि किसी तरीके से शारीरिक और भावनात्मक तौर पर ही सही, मैं अपनी तरह से पीड़ित लोगों की कुछ मदद कर पाऊं।

अभी बस इसका अंत करता हूं क्योंकि मुझे शेखर सुमन और प्रकाश झा जी से मिलना है और उनसे आगे इस बाबत क्या किया जा सकता है,इस पर विचार करना है।

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

22 comments:

Anil Pusadkar said...

badh to badh hoti hai manoj jee,kya bihar aur kya orrisa,uska kahar saman hota hai.mumbai aur gujrat ki badh par bhi utna hi dukh hota hai,aur sailab ke liye sab saman hote hain.raha sawal rahat rashi ka to uske liye to afsar dua karte hain,jitna bada package utna bada hissa.khair achha laga aapne is bare men sochha.aisa soch kar hi aapne sabit kar diya ki aap shaktihin nahi hain,han shaktimaan tab kehlayenge jab aapki or se koi thos pehal hogi.aabhar aapka badhpiditon ke bare me sochne ke liye

PD said...

Anil Pusadkar जी, आपने सही कहा.. बाढ तो सिर्फ बाढ होता है.. चाहे कहीं भी आये.. मगर अभी जो हालात बिहार के बाढ प्रभावित क्षेत्रों के हैं वो मेरी जानकारी में आजाद भारत में आये बाढों में सबसे भयावह है.. आप इसकी तुलना इस साल आये पंजाब और गुजरात के बाढों से नहीं कर सकते हैं.. क्या आप ये सोच भी सकते हैं की किसी राज्य के 2-3 जिलों का अस्तित्व ही किसी बाढ में नष्ट हो जाये.. कुछ ऐसा ही अंदेशा हो रहा है इस साल बिहार में आये बाढ से..

जितेन्द़ भगत said...

आपने सही मुद्दा उठाया। आप लोग अगर ध्‍यान देंगे तो पद पर आसी‍न लोगों का भी ध्‍यान इस तरफ जाएगा। महानगर जाकर भी गाँव को न भूलना, अच्‍छी बात लगी, नि‍भाइगा भी।

Tarun said...

Aapne kam se kam is disha me socha to, aap baat aage uthayenge to shayad kuch ho. Dhanyvaad ish disha me ek pehal karne ka, bus ise is post tak hi simit mat rehne dijyega...aage kuch jaroor kariyega.

anil yadav said...

मनोज भाई,
पता नही क्यों बाढ़ वाली पोस्ट पढ़ते हुए इप्टा के बलराज साहनी की याद आई।

muktibodh said...

manoj bhaiya dard to hota hai jab kuch bhi aisa hota hai jis per tatkal to hamara bus nahi hota ha per 62 barso say hum kuch bhi nahi kar saktay thay per nahi kiya .abhi samay nahi hai ke aaropo -partaropo ke bat ke jay.aap kalakar log milkar ek sow bad may kar kay fand jama kar saktay ho.jo dard to kam nahi kar sakti parantu kuch ehsas karasakti hai logo ki koi bhi aadmi apnay level say kuch to kar hisakta hai."hai anderi rat per diya jalana kab mana hai; mukesh

Ranjit said...

Thanks for your concern. We r always with you.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आपके जज़्बे को सलाम...!
कोसी और गण्डक तो बिहार के लिए अभिशाप हैं।

Pragati Mehta said...

Itni dur MAYANAGRI men rahte hue bhi aap apne Bihar se is kadar jude hain yah bahut badi bat hai. Bihar is samay bhayankar flood se jujh raha hai.waqt ki mang hai ki apni dharti se juda har wo sakhsh kisi bhi rup me madad ko haath badhaye..hum sabhi bhi prayas kar rahe hain....apka prayash sarahniya hai...bhaiya unke liye kuchh kijiye.....
dhanyabad.
Pragati Mehta
Correspondent
AmarUjala
Noida.

tarun said...

एक अभिनेता इस बारे में इतना सजग है जानकर अच्छा लगता हैं । दिल अपना भी दुखता है मगर...................। कल रात ही की बात है न्यूज़ पर कोसी का क़हर देखकर दिल दहल गया था मेरा । पापा ने आवाज़ लगायी तरुण खाना लगवाओ और यक-ब-यक मेरे मुँह से निकला....................खाना । मेरे कानो में उन लोगो की रिरियाई चीखें गूँजने लगी जिनके बारे में मैंने सुबह ही अख़बार में पढ़ा था -- एक मधेपुरावासी ने दिल्ली में स्थित अपने ऑफिस में मोबाइल से खबर दी और रोते हुए कहा --साहब कुछ कीजिए मैं और मेरा परिवार यहाँ पिछले पाँच दिनो भूखा-प्यासा फँसा हुआ है पानी रोज़ पाँच फीट बढ़ जाता है हम इस समय मकान की छत पर है ,मोबाइल की बैटरी भी खत्म होने वाली है शायद ये मेरी अंतिम खबर हो ।यह व्यक्ति एक हिंदी दैनिक का संवाददाता था जो खुद एक खबर बनने के लिए तैयार था ।

Sanjeet Tripathi said...

शिखर पर पहुंचना, और उस शिखर पर पहुंचकर भी अपनी जड़ों को याद रखना, उसके दर्द को महसूस करना। इ
इसीलिए मैनें पहले एक जगह कहा था कि मनोज बाजपेयी हमें अपने ही बीच का एक शख्स लगता है कोई सितारा नही।
उपरवाला आपको ऐसे ही बनाए रखे।

राजीव तनेजा said...

आप एक उम्दा अभिनेता तो हैँ ही...साथ ही एक सजग और जिम्मेदार नागरिक भी हैँ...ये जानकर अच्छा लगा

CHANDAN said...

मनोज भाई पहले तो सीधे संवाद के लिये बधाई,जाने-अनजाने ही सही आप एक मिथक भी तोड़ रहे हैं ।अभी तक अभिनेता मतलब यही समझ आता था कि कहीं से लिये गये या गढ़े गये एक किरदार को जीना और संवेदनशील होने का अहसास कराना भर है ।लेकिन आपको पढ़ा तो लगा कि अरे ये तो हममे से एक है ।इसे सिर्फ नायिकाओं को गुंडों से बचाने कि ही चिंता नहीं है बल्कि कोसी का पानी इसका भी बहुत कुछ बहा ले जाता है ।ये सिर्फ नम्बर वन की दौड़ के बारे में ही नहीं सोचता बल्कि इसे गांवों की टूटी सड़कों की भी चिंता है ।
और सबसे बड़ी बात ये केवल सोचता नहीं बल्कि बदलाव की चिंता के बगैर बोल भी सकता है ।

anil yadav said...

apni jamin yaad rakhne ke liye hardik badhai.... ..

ashish said...

aapko sayad maloom nahi hoga supaul mein namak sau rupaiya mein mil raha hai, madhepura mein nav hai hi nahi, jaan bachane ki kimat hai dus hazar, nitish sarkar ekdam nikammi hai, afsar log khush hain, rashtriya aapda mein arabpati banne ki lotery lag gayi hai.
aap samadhan ki baatkarte hain aur khud ko saktihin bhi kehte hain, wo ad yaad hai-- the power of one.

khamma gani said...

manoj ji aapka lekha achaa laga. har tarah se hum baadh piditon ke saath hai. main udaipur rajasathan mai samuh banakar sewa ke liye paise ekatthe kar raha hun. taki mai punya ka bhaagi ban saku.

पंकज शुक्ल said...

मनोज भाई,

इस दुनिया में बड़ा कठिन हैं इंसां का इंसां रह पाना..

और इंसानियत इसी को कहते हैं कि दूसरे इंसान का दर्द हम अपने अंदर भी महसूस कर सकें। पिछले हफ्ते चार दिन तक पटना में था। लेकिन वहां तो सरकार से जुड़े लोग ही लूटने में लगे हुए हैं। पहली बार बिहार गया था, लेकिन अच्छा अनुभव लेकर नहीं लौटा। फिर भी बिहार के बाढ़पीड़ितों की मदद के लिए मेरी कोई भी मदद बन सके, मैं हमेशा तैयार हूं।

सस्नेह,
पंकज शुक्ल
http://thenewsididnotdo.blogspot.com/

राकेश said...

अच्छा लगा जानकर कि आपको बाढ से बेहाल बिहार की जनता के प्रति हमदर्दी है, लेकिन जब आपने अपनी शक्तिहीनता का जिक्र किया तो थोड़ी निराशा हुई. याद होगा आपको सुमानी के दौरान राहुल बोस, जॉन अब्राहम (शायद) समेत कई अभिनेताओं ने पुनर्वास के काम में जमकर हाथ बंटाया था. चले गए थे वे लोग वहां. अपने यहां तो मुसीबत की घड़ी में फिल्मी हस्तियों के योगदान की लंबी और पुरानी परंपरा है. दिलीप साहब, कैफी, शबाना ...;
मैं तो बस यही गुजारिश करूंगा कि अपने व्यस्त रोज़मर्रा से कुछ समय निकाल कर चलिए बिहार जानते हैं, मुसीबत से दो-दो हाथ करते वक्त लोगों को अपने साथ खड़े और लोगों को देख कर बल मिलता है.
एक बात और कहना चाहूंगा यहां, सरकार की तरफ़ से चले तो गए हज़ार करोड़ रुपए. पर ऐसा नहीं है कि पहली बार कोई हज़ार करोड़ निकला हो सरकारी खजाने से सहायता या पुनर्वास के नाम पर. योजनागत ढंग से तो हर साल ही हज़ारों करोड़ जनता के नाम पर ही निकलते हैं, प्रोजेक्ट्स बनते हैं; पर होता क्या है शायद आपको पता ही होगा. यानी पिछले हफ़्ते जो पैसे मिले हैं बाढ राहत के नाम पर, सचमूच उसको उसी काम में लगाया जाएगा, पूरा का पूरा लगाया जाएगा; मुझे संदेह है. वैसे भी जनता की निगरानी ज़रूरी है. आपने खुद ही कहा है कि हर साल बिहार के किसी न किसी हिस्से में तबाही मचती है. मैं बस इतना जोड़ रहा हूं कि हर तबाही के बाद रिलीफ़-उलीफ़ के नाम पर कुछ करोड़-वरोड़ ख़र्च किए जाते हैं, पर जनता को क्या मिलता है, कितना मिलता है; मैं उसकी एक मिसाल बताना चाहूंगा:

पिछले साल मेरा गांव (शिवहर जिले के तरियानी छपरा) भी बाढ की चपेट में आया था. सरकारी रिलीफ आया. आधा-अधूरा बंटा वो भी आधे गांव वालों के बीच ही. पिछले अक्टूबर में मैं जब गांव गया था तो देखा गांव के दक्षिण में दलितों के टोले में (जिसको शायद आपके गांव में भी चमरटोली कहा जाता होगा. ख़ैर कुछ सामाजिक प्रयासों से हमने उसका नाम बदल कर बाबा फूले टोला रखा) अंजुरी भर अनाज भी नहीं बांटा गया था. पता चला मुखिया ने इन टोलों को ब्लैक लिस्‍सटेड किया हुआ है. टोले के चारो तरफ़ घुटने से कमर भर पानी भरा ही था. मल-मूत्र भी उसी में. ये भी पता चला कि गांव के हाई स्कूल में एक कमरा रिलीफ के राशन से भरा हुआ है. अगली बार दिसंबर में बाबा फूले टोला के लोगों ने बताया कि आखिरकार उनके टोले वाले कुछ नहीं मिला रिलीफ के नाम पर.

रिलीफ वाला अनाज देखते तो आप उबल जाते गुस्से से. न जाने कितने वेराइटी के कंकड़ थे. कहें कि कंकड़ों में चावल थे तो ग़लत नहीं होगा.

मनोज भाई, मेरे कहने का मतलब ये नहीं है कि सरकार सहायता नहीं देती है, या सरकारी सहायता पर भरोसा न किय जाए. मैं तो बस इतना कह रहा हूं कि जिस तरीके से बड़े पैमाने पर धांधली होती है इस काम में उसको रोकना ज़रूरी है. हर रिलीफ ऑपरेशन में बेजुबान और ग़रीब लोग ही छोड़ दिए जाते हैं, या छूट जाते हैं. शुक्र है उन वोलंटरी संगठनों का जिनके कार्यकर्ता जान जोखिम में डालकर आखिरी लोगों तक रिलीफ पहुंचाने की कोशिश करते हैं और कुछ हद तक सफल भी होते हैं.
अंत में बस यही गुजारिश करूंगा मनोज भाई कि थोड़ा वक्त निकालिए. चलिए पुननिर्माण के काम में थोड़ा योगदान दीजिए, बड़ा असर पड़ेगा. ये अपील आपसे इसलिए भी कर रहे हैं कि आपकी और हमारी सामाजिक पहचान और स्थिति में फ़र्क़ है. मैं और मेरे जैसे हज़ारों लोग तो काम कर रहे हैं, पर वो असर नहीं होता जिससे और लोग जुड़ें इस काम में. और सिर्फ आप ही क्यों हर क्षेत्र के अगुवाओं को आगे आने की ज़रूरत है इस वक्त. ज़रूर असर पड़ेगा. बड़े पैमाने पर लोग आगे आएंगे.

दुनिया भर से अपील की बात करना अच्छी बात करना अच्छी बात है. पर मैं तो ये कहना चाहूंगा कि जितने भी पेशेवर लोग हैं चाहे जिस पेशे में भी हैं. बस एक दिन की कमाई और सात दिन की छुट्टी ले कर चलते हैं बाढ पीडित इलाक़े में. कम से कम इतना तो ही जाएगा कि हर एक परिवार के लिए एक छत की व्यवस्था हो जाएगी. उसके बाद आगे की चीज़ें भी होने लगेंगी.
आज दिल्ली विश्वविद्यालय के सोशल वर्क डिपार्टमेंट से छात्रों का पहला जत्था रवाना हो रहा है सहरसा के लिए. दिल्ली के प्रोफेशनलों की एक बैठक बस आधे घंटे में शुरू होने वाली है, आगे कैसे और क्या-क्या किया जा सकता है: विचार किया जाएगा.

माफ़ कीजिएगा, ज़्यादा लंबी हो गयी प्रतिक्रिया. बातचीत करनी हो तो मेरा नंबर है +91 9811 972 872.

Sangeeta Manral said...

नमस्कार मनोज जी,

सुखद आश्चार्य आपका ब्लाग वो भी हिन्दी में, बिहार का मंज़र वाकई बहुत भयावह है, आप ठीक कहते है हम शहरी शायद इस पीङा को समझ भी ना पायें. समय की मार, प्रकृति कि मार, हर किसी की मार सिर्फ गरीब को ही सहनी पङती है.

उम्मीद करती हूँ आपकी कलम लिखती रहगी| आमीन

vipin-choudhary said...

मनोज जी, बिहार में बाढ की भयावहता हम हर रोज देख-सून रहें हैं। आप लोग इस दिशा में सोचते हैं, यह जान कर अच्छा लगा।

अनुराग द्वारी said...

मनोज जी ... बाढ़ प्रभावित इलाकों के लिए अभी सबसे जरूरी है नाव ...
साथ ही अगर कुछ डाक्टर तैयार हो जाएं .... तो बीमार लोगों के लिए कैम्प बड़ा फायदेमंद होगा ...
बाढ़ के बाद महामारी की सबसे ज्यादा आशंका होगी ... पैसे ... कपड़ों के लिए हम सभी लगे हैं ...
फिर ये दोनों चीजें बड़ी मददगार होंगी ...

jai mata di said...

Bhaiya,
jai mata di,
Main ek chota business man hun.Patna me meri medicine ki wholsale dukan hain.Badh pirition ke lie kabhi bhi kanhi bhi kisi roop me meri jarurat samagh me aye main 24 hour is nobel cause ke lie rady hun.Thanks.mukesh hissariya,patna 9835093446