Tuesday, September 2, 2008

बिहार की बाढ़ से हारना नहीं है

पिछले दिनों प्रकाश झा जी से मुलाकात हुई। इस बातचीत में हमनें यही समझ पाया कि हम टेलीविजन के जरिए या निजी संपर्कों के जरिए लोगों को उत्साहित करें कि जिस संस्था को भी वो उचित समझें, उसके जरिए बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए दान करें। बहुत सारे टेलीविजन चैनलों से मेरी बात चल रही है, जो जमीनी स्तर पर वहां पर खड़े हैं और लोगों तक खबर पहुंचा रहे हैं।

वैसे, मेरा मानना है कि जरुरत इस बात की है कि लोगों को उत्साहित किया जाए कि वो अपने-अपने स्तर पर जो भी योगदान हो सके वो करें। इतना ही नहीं, बिहार की इस आपदा को एक राज्य की आपदा न मानते हुए राष्ट्रीय आपदा माना जाए। जहां आपकी कुल आबादी के करीब 25 लाख लोग प्राकृतिक विपदा को झेल रहे हैं और न जाने कितने ही अपनी जान गंवा बैठे हैं, उसे सिर्फ एक इलाके से जोड़कर देखना ठीक नहीं है।

कोसी नदी या कोई भी पहाड़ी नदी, जो उत्तर के पहाड़ से निकलर बिहार में प्रवेश करती है, उसका कहर और उसके किस्से मैं बचपन से सुनता आ रहा हूं। आश्चर्य इस बात का है कि हम सब देखते रह गए और पानी घुस आया। इसका मतलब ये है कि इतने साल में उन सारे बांधों पर कोई काम नहीं हुआ है। कब तक गरीब इसी तरह से अपनी जान गंवाते रहेंगे। कब तक हम सिर्फ शहर को ही हिन्दुस्तान मानते रहेंगे। सवाल इस बात का है।

वैसे, आज सेना की टुकड़ी पहुंच चुकी है। वायुसेना पहुंच चुकी है। जमीनी स्तर पर कई राहत कैंप लगाए जा चुके हैं। लेकिऩ, अभी भी इसे राष्ट्रीय समस्या की संज्ञा नहीं दी गई। मुझे आश्चर्य इस बात का है।

जब सुनामी आता है, तब भी मेरा दिल रोता है। उन सारे लोगों के लिए जो इससे प्राभवित होते हैं। आज कोसी ने कहर ढाया है, तो भी बहुत परेशानी हो रही है। लेकिन, सवाल ये है कि क्या इंसान की कीमत कुछ नहीं रह गई। सवाल ये है कि विकास की दर को किस तराजू पर मांपा जाए। व्यक्तिगत तौर पर जो मैं कर रहा हूं, वो व्यक्तिगत है, उसके लिए ढोल पीटने की जरुरत नहीं समझता। मेरा लोगों से भी निवेदन है कि बिना नगाड़े बजाए हुए अपनी अपनी तरफ से कुछ योगदान जरुर करें।

ब्लॉग पर अपने दर्शकों अपने पाठकों से अपनी संवेदना को बांटना, टेलीविजन और अखबारों के जरिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाना या फिर निजी अनुदान देना या फिर व्यक्तिगत तौर पर लोगों को उत्साहित करना कि वो समस्या के साथ जुड़े-ये भी राहत के बहुत काम आ सकता है। हम सब अपने अपने लोगों को उत्साहित करें, अपने- अपने लोगों को इस राहत कार्य से जुड़ने के लिए प्रेरित करें- यही आज के समय की आवश्यकता है।

मैंने कल भी एक टेलीविजन चैनल पर कहा था कि सबसे पहले तो लोगों को बाहर निकाला जाए, और सुना है कि वायुसेना के कुछ जवान वहां पहुंच चुके हैं, जो इस काम में दक्ष हैं। बस, निवेदन उन लोगों से है जो ऊपर के ओहदे पर बैठे हुए हैं। आपसे हाथ जोड़कर विनती हैं कि अब इस समस्या का निदान खोजिए। और न सिर्फ बांधों की मरम्मत की जाए, नेपाल से संधि को मजबूत किया जाए, ऐसी विपदा के वक्त वैकल्पिक व्यवस्था बनायी जाए और प्राकृतिक विपदा आने के संकेत देने वाली जितनी भी मशीन हैं, उन्हें कार्यान्वित किया जाए ताकि हिन्दुस्तान का व्यक्ति इस देश में खुद को सुरक्षित महसूस कर सके। वो ये सोचकर आश्वस्त हो सके उसकी रक्षा करने वाले लोग जिम्मेदार हैं और उसका भला चाहते हैं।

अभी समय नहीं है लेकिन आगे मैं उस व्यक्ति के बारे में जरुर लिखना चाहूंगा, जिसने अपने ब्लॉग पर मेरे बारे में कई गलत बाते लिखी हैं। उसका जवाब देना मैं उचित समझूंगा। निसंदेह उस व्यक्ति का मेरे जीवन से बड़ा गहरा नाता रहा है और उसका नाम है राम गोपाल वर्मा।

फिलहाल इतना हीं,

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

22 comments:

जितेन्द़ भगत said...

आपका सामाजि‍क सरोकार देखकर बेहद खुशी हुई।

रंजन said...

इसे प्रधानमंत्री ने "राष्ट्रीय आपदा" घोषीत कर दिया है..

दुआ करें कि ये बाढ़ अपने साथ बिहार कि सारी समस्यायें ले जाये.. और .. बिहार को इस बाढ से उबर कर जल्द हि प्रगतिशील राज्यों में शुमार हो...

Lovely kumari said...

मनोज जी लोग बाढ़ से नही हारते गरीबी से हारते हैं ,जिनके पास पैसा होता है उन्हें क्या फर्क पड़ता है ,फर्क तो फटेहाल गरीबों को पड़ता है उन्हें जिंदगी फ़िर से बसानी पड़ती है जो उनके लिए खासी मशक्कत का काम है

Nitish Raj said...

वैसे तो रंजन ने ये बात आपको बता ही दी है कि इस आपदा को पीएम ने राष्ट्रीय आपदा पहले ही करार दे दिया है। लेकिन आप बार-बार इस बात पर जोर क्यों दे रहे हैं कि पहले देश इसे राष्ट्रीय आपदा माने। ये बिहार की ही समस्या नहीं है ये तो राष्ट्रीय आपदा है। अरे दुनिया मान रही है, देख-देख कर सिहर रही है लेकिन आप हैं कि रोटियां सेकने में लग गए हैं, जबरदस्ती ये बोलने पर लगे हुए हैं कि नहीं पहले मानिए, अरे मान तो रहे हैं भई, या आप ये कहलवाना चाहते है कि मैं कह रहा हूं तो जरूर मानिए। दो रोज पहले भी मैंने आपको एक चैनल पर फोन पर भी बिल्कुल ये ही कहते सुना था जबकि सवाल आपसे पूछा कुछ और गया था। आपके पास मंचों की कमी नहीं है पर मंच मिलने पर एक ही बात का राग अलापना कितना सही है।
अगस्त में आपका ये ब्लाग खुला हाय-तौबा हुई क्या सच ये मनोज वाजपेयी का ही ब्लॉग है। क्योंकि हमारे देश में हिंदी फिल्मों में काम करने वाले अधिकतर अभिनेता हिंदी बोलने में शर्म महसूस करते हैं। काम हिंदी में करेंगे पर बोलेंगे अंग्रेजी, छोड़िए इस बात को इस पर फिर कभी। बहरहाल उस समय देश में भी हाय तौबा हो रही थी। पूरी घाटी-जम्मू जल रहा था लेकिन आप ने अपनी अगस्त की ६ पोस्ट में से एक भी पोस्ट पर इस का जिक्र किया, नहीं। आप तो अपने कद को भुनाने आए हैं यहां पर, पर मुझे इस बात से कोई भी गिला नहीं। लेकिन इस बात से है कि बिन मतलब आप एक ही बात की रट ना लगाए। दिल से निकली आवाज़ एक अलग होती है।
दूसरे राज्य भी भारत का ही हिस्सा हैं जैसे कि 'हमारा-आपका बिहार'। आपकी हर मूवी मैंने देखी होगी शायद हर। आपने मुझे पैसे नहीं दिए कि देखो या जबरदस्ती नहीं की कि देखो, लेकिन मैंने देखी मैं भी जबरदस्ती नहीं कर रहा कि जम्मू के बारे में क्यों नहीं लिखा। पर प्लीज आप एक सैलिब्रिटि हैं सोच समझ कर लिखें-बोलें तो बहुत अच्छा। आप अच्छे अभिनेता है प्लीज राजनेता की बोली ना बोलें, सिर्फ अभिनेता और सच्चे इंसान की बोलें। सिर्फ ये ही इल्तजा है। जानता हूं कि मुझे अपनों से, इसे छापने वालों से सब से कुछ ना कुछ बुरा-भला सुनना पड़ेगा।
आपका प्रशंसक

Himwant said...

जल संशाधन हमारे लिए वरदान है, लेकिन आज यह अभिशाप बना हुआ है । कौन है दोशी इसके लिए ? जब भी जल संशाधनो के व्यवस्थापन की बात चलती है, नेपाल के छद्म राष्ट्रवादी और भारत मे मेघा पाटकर सरीखे लोग विरोध शुरु कर देते है । अटल जी के समय मे बाढ की समस्या से छुटकारा पाने के लिए नदीयों को जोडने की बात चली थी तो मेघा पाटकर नेपाल पहुंच गई और लोगो को भारत की योजना के विरुद्ध भडकाने लगी । नेपाल मे भारत जब भी तटबन्ध निर्माण या मरम्मत की कोशिश करता है तो नेपाल मे भारत विरोधी ईसे नेपाल की राष्ट्रिय अस्मिता से जोड कर अंनर्गल प्रचार शुरु कर देते है । भारत के राजनयिक नेपाल के लोगो के दिल मे भारत के प्रति अच्छी भावनाए जगाने मे असफल रहे हैं । एसे मे नेपाल एवम भारत मे जनस्तर पर सरकारो पर दवाब बनाने का काम भी होना चाहिए ।

www.himwant.blogspot.com

Sarvesh said...

बिल्कुल सही कहा मनोज जी. मैं खुद यही अपिल अपने दोस्तों, कलिग्स और जान पहचान के लोगो से कर रहा हुं कि आप लोग इस पर मत जोर दिजिये कि किसको डोनेट करें. जिसमे सहुलियत हो उसमे करें लेकिन जरुर करें.बिहार को अभी मदद की जरुरत है. अगर किसी को कुछ समझ ना आये तो सि एम रिलिफ़ फ़ंड मे मदद भेज दें.

रही बात उस रमुआ का तो बताइये क्या कहता है. और उसका ब्लाग का पता बताइय़े हम लोग मुंह नोच लेंगे उसका (बात चित और तर्क से).

Umesh said...

भारत और नेपाल की सन्धि को मजबुत किया जाना जरुरी है । लेकिन राजनिती करने वालो का ध्यान तो सिर्फ कुर्सी पर होता है । आज भारत की सरकार नेपाल मे एसे लोगो का समर्थन कर रही हैं जो भारत विरोधि है । प्रचण्ड ने तो कोशी नदी के सम्झौते को एतिहासिक भुल तक कह डाला । ये माओवादी तटबन्ध के मरम्मत मे अडचन डालते थे । तटबन्धो मे पत्थरो को बांधने वाले गैबिन वायर (तार) तक चुरा लिए गए थे । नेपाल मे राज्य की असफलता की वजह से तटबन्धो को प्रयाप्त सुरक्षा नही उपलब्ध कराई जा सकी थी । तटबन्ध के टुटने के कई कारणो मे यह भी प्रमुख कारण है । काठमांडौ मे भारत के राजदुत हर महिने नेपाल के प्रधानमंत्री से मिलते है, लेकिन कोशी के तटबन्ध की सुरक्षा उनके प्राथमिकता मे नही होती है । वे तो महारानी सोनिया को खुश करने के लिए प्रधानमंत्री को ईस बात के लिए मनाते है की हिन्दु राष्ट्र समाप्त कर धर्म निर्पेक्ष बनाया जए नेपाल को । जब भारत के दुश्मन भारत के राजगद्दी पर बैठे है, तो फिर भगवान ही मालिक है !!!

अनुराग said...

doantion से ज्यादा जरूरी है संसाधनों का उचित तरीके से उपयोग....समस्या को समझने की इच्छाशक्ति ओर लोगो की मुश्किलों को इमानदारी से समझना ....कुछ चीजे राजनीती से परे होती है....शायद ये बात लोगो की समझ में आये

mahadev said...

बिहार को बाढ से छुटकारा दिलाने और जल संशाधन को बिहार के उन्नति का आधार बनाने के लिए एक बृहत महत्वकांक्षी परियोजना पर काम शुरु होना चाहिए । अटल जी की नदीयो को जोडने वाली योजना जहां कृषि के लिए सिचाई उपलब्ध करवाएगी, वहीं पीने के लिए पानी और जल यातायात की सम्भावनाओ को भी साकार करेगी । सिर्फ बाढ के दिनों मे सरोकार दिखाने से काम नही चलेगा । बाढ के गुजर जाने के बाद भी इस दर्द को महसुस कर सकें और परियोजना लाने के लिए केन्द्र, बिहार एवम नेपाल सरकार पर जन दवाब बना सकें तो यह बिहार और देश की असल सेवा होगी ।

tanmay said...

कोसी की बाढ़ पर आपकी साथी रवीश और अविनाश मोहल्‍ला पर लिख हैं।

adarsh said...

Manoj JI,
Lekh me kai bhashik galtiyan hain.
Bihar me Bagmati nadi hai- bagpati nahi.
pahli line me- hamne yahi samajh paya ki bajay- hamne yahi samjha.
khair..!
Good to hear from u.
Adarsh Kumar Inqalab.

vipinkizindagi said...

achchi post....

राजीव तनेजा said...

साथी हाथ बढाना.....साथी रे

एक अकेला थक जाएगा
मिलकर ज़ोर लगाना.....


बिहार की स्तिथि को राष्ट्रीय आपदा मान कर सभी को इसके निदान के लिए अपनी तरफ से कुछ ना कुछ सहयोग करना चाहिए...

आज पंजाब केसरी में भी आपके ब्लॉग का जिक्र आया है....

jai mata di said...

भैया ,
जय माता दी,
आपलोग एक स्टेज प्रोग्राम के द्वारा फंड जमा करके भी बाढ़ पीरितों की मदद कर सकतें हैं.

surajshakya.com said...

नमस्कार मनोजजी,
सर्वप्रथम मै आपको धन्यवाद देना चाहुंगा, ब्‍लगके मार्फत अपने विचारको मै जैसा आम आदमी समक्ष पहुँचाने के लिए, इसके साथ साथ टेक्नोलोजीके विकासको भी जो हमे कल तक असम्भव लगने वाली चिज को सम्भव बनानेमे दिन गुनी रात चौगुनी तरक्की कर रही है।
विडम्बना ए है कि आज, ईस तरक्कीके जमानेमैं भी हम अपनी पूरानी, बाबाअादमके जमाने की समस्याअों की सामना कर रहे हैं। जी मै विहार मे बाढका ही बात कर रहा हुँ। आपकि (भारत) नजरोँ से देखा जाऐ तो नेपाल से आई हुई पानी ने बिहारमै नुक्सान पहुँचाया है लेकिन जो बराज बनाया गया है उसका ताला चावी तो भारतके पास है, दु:खके साथ कहरहाहूँ मनोजजी हमे नातो कोशी बराजकी मरम्मत कर्नेकि अधिकार है ना तो पानी ज्यादा होनेके कारण बराजकी दरवाजा खोल्ने कि, नुक्सान त हमारे नेपालके गावोँ मे भी कम नहिं है। और वह भी हर साल। इस बार कुछ ज्यादही दु:खदायी, लेकिन कबतक?
क्योँ न हम इस घटनासे कुछ सिकें, बिहारको गरिब प्रान्तमे गिना जाता हे तो नेपाल को गरिब देशके रूपमें। उपलब्ध तकनिकियोँकी प्रयोग करते हुऐ यदि इस कोशी का प्रयोग हम प्रचुर मात्रामेँ बिजली निकाल्ने के लिए कर सक्ते हैं, बिजली हो तो टाटा के 'नानो' जैसे कई 'प्रोजेक्ट' बिहारमे आने कि होड लगादेगी, विक्रमशिला, नालन्दा जैसे विश्वविध्यालय फिर खुलेगी, और फिर देर नहि, बिहार और नेपालकी काया पलट होने कि।
जरूरत है तो सिर्फ जनताकी स्वार्थको देखकर
अाज हमें जरूरत है, एक-दुसरे पर गाली गलौज करने कि नहिं, बिगत कि अनुभवोँ कि पाठ पढतेहुए, एक सुन्दर भविष्य कि तरफ बढने के लिए, वर्तमान मै कुछ करनेकि।
माफी चाहूंगा यदि मै कुछ ज्यादा ही भाभुक हो गया या मेरी हिन्दी 'टुटी-फुटी' हो गई हो तो।
आपका प्रसंसक
सुरज शाक्य
विराटनगर, नेपाल

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आपकी सहज चिन्ता में पूरा देश आपके साथ है, मनोज जी। बस लालू एण्ड पार्टी को समझाइए कि इस समय राजनीति छोड़कर तमीज़दारी से अपने राज्य के बारे में कुछ करने के बारे में सोचें। १५ वर्षों तक खून चूसने के बाद आज की प्राकृतिक विपदा उन्हें ‘क्रिमिनल नेग्लीजेन्स’ दिखायी दे रही है।

लानत है इस हृदयहीनता पर...

MAA said...

SIR,
JAI MATA DI,
The situation of flood in Bihar(India) is too worst. More than 25 Lakhs people’s are effected by this flood.
so is kindley request YOU to give some help for the people.
MUKESH HISSARIYA,9835093446

डेटलाइन इंडिया said...

आलोक तोमर
बिहार से लौट कर

मधेपुरा और पूर्णियां से लौटने के बाद भीड़, गंदगी, निराशा, जीवन के प्रति हताशा और सरकार से मिल सकने वाली किसी भी उम्मीद के इंतजार में पटना रेलवे स्टेशन पर और बाहर के मैदान में बैठी भीड़ आम तौर पर किसी को भी विचलित कर सकती है लेकिन जिसने मधेपुरा, पूर्णिया और सहरसा के बाजारों और सड़कों नदी बने देख लिया है और जो कुछ हवा से और ज्यादातर जमीन पर बस्तियों को तालाब में विलिन होते देख कर आया है, उसके लिए राहत की बात यही हो सकती है कि वह जहां खड़ा है वहां उसके घुटने तक पानी नहीं हैं और चारो तरफ याचना भरी अभागी निगाहें उसकी ओर देख नहीं रही है।

मेरे जैसे जिस व्यक्ति ने जो गुजरात के महाचक्रवात में खुद फंस गया था और होटल की तीसरी मंजिल तक खिड़की से पानी को छू सकता था, जिसने उड़ीसा के महाचक्रवात के बाद नारियल के पेड़ों पर टंगी लाशे देखी थी, जिसने 1984 में सिखों का सरेआम-कत्लेआम और जिंदा सिखों को जलते हुए टायरों से भून कर मरते देखा था, उसके लिए भी बिहार की बाढ़ की यह त्रासदी किसी सात जन्म तक न भूलने वाली कहानी बन चुकी हैं। अगर यह कोई बुरा सपना होता तो टूट जाता लेकिन यह एक मौत की हकीकत है, जिससे मैं कवच में गया था और कवच में ही लौटा हूं। कवच बरकरार है लेकिन इसने भीतर ही भीतर मुझे तोड़ दिया है।

आम तौर पर मलघट से लौट कर जो श्मशान वैराग्य होता है और कुछ क्षण के लिए ही सही जीवन की नश्वरता का पूरा बोध हो जाता है, वैसा ही इस महात्रासदी और महाप्रलय को देखने के बाद हुआ है। आसमान में हेलीकॉप्टर डोल रहे है और पॉलीथिन की थैलियों में फेंकी गई पूरियां और उनमें मिल गया कीचड़ भी लगातार भूखे इन लोगों को खाने लायक लगता है और न सिर्फ वे इस अखाद्य को खाने के लिए मजबूर है बल्कि बीच-बीच में सेना और दूसरे संगठनों के अधिकारी उन्हें आ कर याद दिला जाते है कि उन पर कितना बड़ा ऐहसान सरकार कर रही है, यह देख कर सरकार पर से भरोसा ही उठ जाता है।

छोटे बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे क्योंकि वे इस प्रलय में अपने स्कूल खोजे भी तो कहां से खोजें, ज्यादातर के पास जैसे भी देशी खिलौने थे वे पानी की भेंट चढ़ चुके हैं और जिन भोली आंखों ने अभी दुनिया देखी भी नहीं वे दुनिया का इतना भयानक नजारा देख रहे हैं। बहुत सारे एनजीओ किस्म के संगठन इस बात के लिए उलझ रहे हैं कि काम करने का अवसर, श्रेय और उस श्रेय से पैदा होने वाली देशी और विदेशी आमदनी उन्हें नसीब हो, उनका अमानवीय चेहरा भी देखते ही बनता हैं।

आखिरकार जो 27 लाख लोग धूल भरे इस पानी के बीच फंसे हैं उन्हें पीने का पानी नसीब नहीं हैं और लालू यादव ने रेलनीर के नाम से जो पानी भेजा है उसकी एक लाख बोतलें दो या तीन दिन में गांवों तक पहुंचेगी और प्रति व्यक्ति इसको कितनी बूंद पानी मिलेगा यह काई नहीं जानता। जल प्रलय के इस माहौल में पीने का पानी नहीं, बीमारियों की दवा नहीं, खाने को एक मुट्ठी भात नहीं और पुनर्वास का कोई पक्का आश्वासन नहीं।

लेकिन यह भीड़ और उसका दर्द टीवी चैनलों की टीआरपी नहीं बढ़ाता। इसी पूर्णिया में बार बालाओं के नाच पर तीन घंटे का कार्यक्रय चलाने वाले एक टीवी चैनल ने आज रात तक बाढ़ का एक दृश्य नहीं दिखाया था। जिस समय रविवार को मधेपुरा और सहरसा के बीच एक गांव बाढ़ के पानी के दबाव में धस कर पाताल में चला गया था उस समय यह टीवी चैनल कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव का एक कार्यक्रम पेश कर रहा था। इसके अलावा एक और चैनल टीवी पर आने वाली सास बहू और साजिश जैसा कोई कार्यक्रम दिखा रहा था।

उन अभागे लोगों का कहीं कोई वर्णन नहीं था जो ठीक से हिंदी नहीं बोल पाते, इसलिए बाइट नहीं दे पाते और इसीलिए टीआरपी नहीं बढ़ा पाते। जाहिर है कि इस देश में मौत भी अगर खबर बनती है तो नोएडा की आरूषि तलवार या दिल्ली पब्लिक स्कूल की पुष्पांजलि की दुर्भाग्यपूर्ण मौत बनती हैं। एक दो मौत में भी ग्लैमर होना चाहिए। जैसे आप इस समय शांति से बैठ कर अखबार पढ़ रहे हैं वैसे ही मैं अपने घर के कवच में लौट आया हूं लेकिन मौत के सन्नाटे से घिरी रातों में गूंजती अनाम भाषा की चीखे सपनों में नहीं आएंगी इसकी कोई गारंटी जब ईश्वर नहीं दे सकता तो हम और आप तो मनुष्य हैं।

ANKUR said...

manoj ji kaise hai,hum log aapse apil karte hai ki aap es sankat ki ghari mein aage aaye hai.aapki pratikriya bahut aachhi hai. bihar ke log kabhi harna nahi jante hai es dukh ki ghari mein gharye se kaam le rahen hai.hum log aap se maddad ki umeed karte hai.aur mujhe biswas hai aap ke sahyog se bihar ka naam vishva ke maan chitra par har chetra mein aarthik samajik awam sanskritik awam swakshnik roop se no-1 rajya ban kar ubharega.
http://www.orkut.co.in/Community.aspx?cmm=54581214

कामोद Kaamod said...

मनोज जी, आपके समाजिक उत्तरदायित्व की भावना को देखकर अच्छा लगा. ऐसे समय में हम सब को एकजुट होकर काम करने की आवश्यकता है .
कुछ बातें हमारे सिनेमा से..
सिनेमा जगत में रूचि रखने वालों को आप जैसे अनुभवी लोगों से मार्ग दर्शन मिलेगा.(ऐसा मेरा मानना है.)
सिनेमा जगत में कई एजेंसीयां हैं जो नये कलाकारों को काम का भरोसा देती हैं और पंजीकरण शुल्क के नाम पर अच्छी खासी रकम ऐंठ लेती है. आपकी राय में ऐसी एजेंसीयों को माध्यम बनाना सही है और क्या इन पर भरोसा किया जा सकता है?

khatrinama said...

Dear Maonaj Itni khushi hui ki ak mukam haasil karnay ke baad apna mandi house ka saathi manoj di or dimag se vaisa hi hai jaisay pehlay hota tha, apni ek sanstha NATURE FOUNDATION INDIA ke jariya delhi main kuch logo or companies ko motivate karkay saaman bhijvaya jar aha hai, accha laga or umeed rahaygi ki bhavishya main bhi in muddo per juday rahogay
GOD BLESS YOU
Rakesh Khatri

sameer said...

bihar ki badh ko lekar aapki chintaye swabhavik hai.nissendeh sare hindustan ko badhpirit logo ki madad ko aage aana chahiye.aur han vikas ke mayno ko lekar aapne satik bat kahi hain.sahri vikas ki hor me gaon bahut pichhe chhut chuke hain unhe aur chhote sahro par dhyan dena jaruri hai.