Thursday, September 11, 2008

रामगोपाल वर्मा और मैं

मैंने अपनी पिछली एक पोस्ट में लिखा था, कि मैं रामगोपाल वर्मा के बारे में बात करुंगा, जिन्होंने अपने ब्लॉग पर मेरे बारे में बहुत कुछ गलत लिखा है।

मेरा उनसे गहरा नाता रहा है। मेरी फिल्म 'बैंडिट क्वीन' और 'तमन्ना' देखने के बाद उन्होंने मुझे 'सत्या' में काम दिया था। बीच में 'दौड' की शूटिंग चल रही थी,तो उसमे भी एक छोटी सी भूमिका दे दी थी। उनके साथ व्यवसायिक संबंध अच्छा रहा। रचनात्मक संबंध के बारे में ज्यादा कुछ कह नहीं पाऊंगा क्योंकि मेरी ज्यादातर रचनात्मक बातें अनुराग कश्यप या सौरभ शुक्ला से ही हुआ करती थी।

उन्होंने अपने ब्लॉग पर लिखा है कि जब लोग सत्या के बाद मेरे करेक्टर(भीखू म्हात्रे) का नाम लेकर बड़े समारोह में मुझे पुकारते थे,तो मैं रोमांचित हो जाता था क्योंकि वहां बड़े स्टार भी मौजूद होते थे,और लोग मुझे पुकारते थे न कि स्टार्स को। मेरा रामगोपाल वर्मा से मतभेद यही रहा है कि वो झूठ बोलते रहे हैं। उन्होंने अपने पूरे जीवन को ही झूठ पर आधारित कर रखा है।

सत्या की सफलता से मैं खुश था कि आखिरकार मुझे चुनाव का मौका मिला। मैं खुश था कि अपने लिए शायद एक छत मुझे मिल जाएगी। और सारे मतभेदों के बावजूद मैं उनका शुक्रगुजार था। मैं मुंबई में एक अभिनेता बनने आया था, जो अभिनय से अपनी रोजी रोटी चला सके, अपना परिवार चला सके और अपने जुनून को भी पूरा कर सके। मैं यहां किसी से प्रतियोगिता करने नहीं आया था। मुझे जो भी मिला मेरे सपने से ज्यादा मिला है।

हमारे वर्मा साहब की दिक्कत रही है कि वो एक ऐसा अभिनेता मनोज बाजपेयी चाहते थे,जो 24 घंटे उनके तलवे चाट सके। जिसका अपना कोई वजूद न हो। आज मैं सर झुकाकर सिर्फ यही कहना चाहूंगा कि वर्मा जी झूठ बोलकर मुझे बदनाम करना छोड़िए। हमारा और आपका रचनात्मक और व्यवसायिक संबंध खत्म हो चुका है। भावनात्मक तो कभी था नहीं। अगर आपको मेरी बहुत याद आती है तो एकाध फोटो पड़े होंगे, अपने सिराहने रख लीजिए और रोज सुबह देख लिया कीजिए। लेकिन झूठ बोलना छोड़िए।

वैसे, मैं जानता हूं कि आप छोडेंगे नहीं क्योंकि आपका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। में सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि सत्या की सफलता की उम्मीद न आपको थी, न मुझे थी। हमने अपनी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभायी थी। आपने एक निर्देशक के तौर पर और मैंने एक अभिनेता के तौर पर।

किसी का किसी पर कुछ उधार नहीं है। एक नजर में फिर भी अहसानमंद हूं। लेकिन आप मेरी भावनाओं की कद्र करना सीखिए। पर, मैं ये कह किसे रहा हूं। उसे, जो इस दुनिया के सारे संबंध-सारे नियम चाहे वो पति पत्नी के हों, या भाई बहन के हों, या किसी भी तरह के भावनात्मक संबंध, उन्हें मानने से इंकार करता है।

वैसे,पिछले नौ साल में मैंने कोशिश यही की थी कि संबंध बिगड़ न पाए या हम उस सुर से अलग न हों, जो सुनने में बेसुरा लगता है। सच बात ये है कि आर्थिक रुप से आपसे ज्यादा न मिला, और आपने जितनी फिल्मों में काम दिया, उससे कहीं ज्यादा फिल्मों में कास्ट कर निकाला भी, लेकिन फिर भी मैं आपका शुक्रगुजार हूं। अंत में सिर्फ इतना कहूंगा कि जो आपसे पाया, उसके लिए धन्यवाद। भगवान आपको शांति और खुशी दे।

दरअसल, मैं चाह रहा था कि मन की बात लोगों तक पहुंचे,तो आज कह डालीं। बहुत सारी बातें हैं, जो आज तक किसी को नहीं बतायी लेकिन वो बातें तभी होंगी, जब श्री वर्मा अपनी करतूत से बाज नहीं आएंगे। इज्जत करता हूं उनकी, पर इसका मतलब ये नहीं है कि बंधुआ मजदूर हूं। खैर, मन हल्का हो गया....आज इतना ही...

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

20 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

मनोज जी,

तमन्ना वह पहली फिल्म थी जहाँ से मनोज बाजपेयी मेरे जेहन में बस गया था। आपकी व्यथा समझी जा सकती है। कलाकार को बनाने की गलतफहमी व्यावसायिक जगत में बहुतों को है लेकिन वो भूल जाते हैं कि "राम गोपाल वर्मा की आग" भी एक सच है।

***राजीव रंजन प्रसाद

सुमो said...

"जब लोग सत्या के बाद मेरे करेक्टर(भीखू म्हात्रे) का नाम लेकर बड़े समारोह में मुझे पुकारते थे,तो मैं रोमांचित हो जाता था क्योंकि वहां बड़े स्टार भी मौजूद होते थे,और लोग मुझे पुकारते थे न कि स्टार्स को।"
राम गोपाल वर्मा ने इसमें बुरा क्या लिखा है? आप रामू के बारे में कहते रहे हैं कि उनने अपने सारे जीवन को झूठ पर आधारित रखा है ये बुरा बोलना हुआ. मुझे तो आपका बोलना बुरा लग रहा है, न कि रामू का. आप यदि रामू के ब्लाग का लिंक देते तो शायद हम और अच्छी तरह समझ पाते कि रामू क्या झूठ बोल रहे हैं
हम तो आपको सत्या और शूल से ही पहचानते हैं इससे पहले की एकाध फिल्म जैसे तमन्ना देखी होगी लेकिन उसमें तो शायद आप खुद भी खुद को खोज न पाये हों. बाद की पिक्चर के बारे में तो बात भी मत कीजिये.
शायद रामू आपके लिये एक सीढी भर होंगे. नेता और अभिनेता दोनों अपनी अपनी सीढियों को भूल जाने के लिये विख्यात हैं. (धर्मेन्द्र जैसे अपवादों को छोड़कर)
आप रामू को कह रहे हैं कि वे आपके फोटो सिरहाने रखकर देख लें और हर सुबह देख लें. अब आप इतने तो खूबसूरत भी नहीं हैं :)
बुरा मत मानिये, वैसे भी मैंने इस्माइली लगा दी है.

दुश्मनी जम करो लेकिन ये गुंजायश रहे
कल अगर हम दोश्त बन जायें तो शर्मिन्दा न हों

आज रामू की कुछ पिक्चर पिट गईं है, कल किसने देखा है,

संगीता पुरी said...

बीती बातों को भूल ही जाएं। अब तो ब्लाग लिखने के बाद मन भी हल्का हो गया। सामान्य रहें।

मुकेश कुमार मिश्र said...

जिन्दगी में ऐसे पल और लोग मिला ही करते हैं, जो बीत गयी उसे भूल जाइये और सफलता के उच्चतम शिखर प्राप्त करें, हम सबकी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं । मुझे विश्वास है एक दिन आप उस शिखर पर अवश्य पहुचेंगे ।

महामंत्री-तस्लीम said...

"हमारे वर्मा साहब की दिक्कत रही है कि वो एक ऐसा अभिनेता मनोज बाजपेयी चाहते थे,जो 24 घंटे उनके तलवे चाट सके।"

यह जिंदगी का वह सच है, जो हर किसी के सामने एक न एक दिन आता ही है। आप थोडा जल्दी समझ गये, यह आपकी खुशनसीबी है।
-जाकिर अली रजनीश

डॉ .अनुराग said...

आपके किसी इंटरव्यू में पहले भी पढ़ा था ओर हैरान हुआ था की वर्मा जी कितने अहंकारी इन्सान है ...मुझे याद है आपकी शूल देखकर मै लौटा ओर होस्टल के बाहर सीडियो पर देर रात तक हम दोस्त इसकी बात करते रहे....यथार्थ ....मुझे लगा की शायद उस साल के नेशनल न सही कम से कम बेस्ट ऐक्टर के हक़दार आप थे ,पर फ़िल्म इंडस्ट्री का यही फलसफा है ...आजकल जो नाचता गता है स्टेज पर ,उसी को अवार्ड दे देते है....पर हाँ जमीन से जुड़े लोग जिंदगी में हारते नही है ,उम्मीद है निराशा के उस दौर से आप निकल चुके होगे,...

शैलेश भारतवासी said...

रामगोपाल वर्मा का व्यवहारिक पक्ष तो मैं नहीं जानता लेकिन उनकी निर्देशन प्रतिभा से इम्प्रैश्ड हूँ। मैम तो यही कामना करूँगा कि आपके संबंध दुबारा सुधरें।

nadeem said...

मनोज जी,
आपका मन हल्का हो गया उसके लिए मैं आपको बधाई देता हूँ.और ये उम्मीद करता हूँ कि वर्मा जी आपके दर्द को समझें भी. मगर मैं आपको भी वहां पा रहा हूँ जहाँ मैंने अधिकतर ब्लोग्गेर्स और मुझे ख़ुद को पाया है कि हम अक्सर अपना ब्लॉग दिल की भडास निकालने के लिए ही बनाते हैं. जिसका मुझे अफ़सोस है. आपने अपने दिल की भडास को निकालकर मन हल्का कर लिया जो कि एक बहुत ही अच्छा काम है और मुझे यकीन है इसके बाद आपको काफी सकूं भी मिल पायेगा. मेरी आपसे विनती है कि कृपया अपने ब्लॉग को अपने कुछ रचनात्मक लेखों से सवारें. जिससे हमें एक अलग मनोज की छवि नज़र आयें.
धन्यवाद्

Sunil Doiphode said...

मनोजजी
आपको मै मेरे screenplay - अद्-भूत के एक ड्रीम रोल मे देखना चाहता हूँ !

http://Enovels.in

सुनील

पंकज सुबीर said...

दो पुराने शेर आपके लिये दे रहा हूं इनको अपने वर्मा जी को ज़रूर सुना दीजियेगा ।
मैंने ही बनाया है उसे तोड़ भी दूंगा
गर बुत ने ये समझा वो ख़ुदा मेरे लिये है
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जिनमें हो जाते हैं अंदाज़े ख़ुदाई पैदा
हमने देखा है वो बुत तोड़ दिये जाते हैं
दरअस्‍ल में ये होता ही है कि जब कोई व्‍यक्ति किसी को चांस देता है तो वो उसको अपनी प्रायवेट प्रापर्टी समझने लगता है । विशेषकर कला से जुड़े मामलों में तो ये आम बात होती है । जबकि होता ये है कि कोई किसी को नहीं बढ़ाता है हर व्‍यक्ति केवल और केवल अपने ही टेलेंट के दम पर आगे बढ़ता है । हां येबात ज़रूर है कि हर क्षेत्र में कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनके स्‍पर्श से आगे जाने के रास्‍ते ख़ुल जाते हैं । मगर उसमें भी सच वही है कि जिसमें टेलेंट है उसे अगर रामगोपाल नहीं मिलेगा तो श्‍यामगोपाल मिलेगा वर्मा नहीं मिलेगा तो शर्मा मिलेगा । क्‍योंकि उसके लिये ई श्‍वर ने जो मुकाम तय कर रखा है वहां तक जाने के लिये अगर वो प्रयत्‍न कर रहा है तो फिर ईश्‍वर भी उसके लिये रामगोपालों, श्‍यामगोपालों को भेजना प्रारंभ कर देता है । अब इसमें हो क्‍या जाता है कि ये जो रामगोपा श्‍यामगोपाल होते हैं ये ये समझने लगते है के बनाया तो मैंने ही है । बस इसी गलतफहमी के आते ही तो प्रतिभा का स्‍खलन होना प्रारंभ हो जाता है । स्‍खलन जब प्रतिभा को होता है तो फिर उसके बाद कुछ शेष नहीं रहता है उसके बाद तो होता ये है कि स्‍खलित प्रतिभा से रामगोपाल वर्मा की आग जन्‍म लेती है । ये लाठी ईश्‍वर की है वो ये कहता है कि भई तू कौन है किसीको बनाने वाला , बनाया तो मैंने है तू तो एक साधन था , और जो तू भी नहीं होता तो कोई और होता तेरी जगह । और फिर भी आदमी नहीं मानता तो वो ईश्‍वर प्रतिभा को स्‍खलित कर देता है कि ले भाई तू दूसरों को बनाने का दावा कर रहा था अब जरा अपनी ही बना के देख ले । खैर ये तो होता ही रहता है कि हर दौर में कोई न कोई ऐसा आता है जोकि अपने को खुदा समझने का दावा करने लगता है । आखिर में चूंकि शायर हूं इसलिये अपना ही एक शेर आपको दे रहा हूं कभी मौका मिले तो अपने रामगोपाल जी को सुना दीजियेगा
ये तख्‍़तो ताज हैं ये अब तलक किसके हुए हैं
पड़े गर्दिश तो सबसे पहले आसन डोलता है

Deepak Bhanre said...

मनोज जी अच्छा किया जो आपने अपने लोगों के सामने मन की कषक को अभिव्यक्त किया . हम ताओ अब आपसे यही आशा करेंगे की आप आने वाली फिल्मों मैं मन लगाकर काम करेंगे और हमें एक अच्छी फ़िल्म देखने को मिलेगी .

Manmohan Sharma said...

meine aap ko sabse pahele swabhimaan natak mein ek advocate ke roop mein dekha tha mein wahin se aapka fan ho gaya tha ye satya to aapki pata nahin uske kitne saal baad aayin aur mein aapse itna khana cahoonga ki movie kitne bade directr ki kyon na ho use hero ki jarorat padti hi hai nahin to woh khud hi bhku matrey ka role nibha lete aap se kyon nibhwaya shyad woh ye bhool gayein taalin kabhi ek haath se nahin bajti hain isliyein ek acche actor ki bhi jaroorat hoti hai....mein bus aapse itna kahna cahoonga ki aise logo ki baatein dil par na lagay karein....

Warmth Regards
Manmohan Sharma

जितेन्द़ भगत said...

आपके बहाने फि‍ल्‍मी दुनि‍या के छल-प्रपंच से सीधे रूबरू हो पा रहा हूँ। शुक्रि‍या।

dhiru singh said...

दुश्मनी जम करो लेकिन ये गुंजायश रहे
कल अगर हम दोश्त बन जायें तो शर्मिन्दा न हों
sumo ne sahi kha. manoj ji us ke baare main kuch nahi kahna chahiy jisne kabhi aap par chota sa bhi ahsaan kiya ho .

राजीव तनेजा said...

बीती ताहीं बिसार की आगे की सोचिए....
ज़िन्दगी बहुत छोटी है....इसमें बस खुश रहिए.. सुखी रहिए.... आबाद रहिए....

कुछ नहीं धरा है वैर में...
हो सके तो मेल कर लें...लेकिन ये भी सच है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती...

ओमप्रकाश तिवारी said...

मनोज जी

Jankar Ascharya hua.

ritesh said...

Manoj ji,
I spent a complete four years in Motihari, the district headquarter of east champaran. In those days, I used to sit in Sri Krishna Nagar Mohallah with a friend of Mine, though he is atleast 20 years older to me,Chunchun Thakur, and normally we used to talk about you and your time spent in Motihari. First time, I heard about you after seeing you in Satya. So, Now I could say that I know some of your real qualities, which could not be seen by the people of outer world. kam se kam itna to janta hoon ki Manoj Vajpayee kisi par Jhoota Arop Nahi laga sakta or na hi kisi ka apman kar sakta hai. Manoj Vajpayee tabhi bolta hai jab uske hridaya par Gahra aaghat lagta hai. From the very first days of my adolescence, I am fond of very few cine-artists. apart from you Nana Patekar, Govind Namdev, Ashish Vidyarthi, Paresh Rawal and the legendary Raj Kumar. During my college days, I saw you in Drohkaal. But Manoj Vajpayee in Ghaath & Shool is the one, whom we find in ourselves. Samar Pratap Singh aur Krishna Patil mein hum apne aap ko paate the. dono youngers ke hridaya ki peeda ki abhivayakti thi. It is possible that the changing time & circumstances may have changed you a little but not so much that you could say against only for popularity. Manoj jee, ek sher arj hai.
CHALE THE HUM AKELE JANIB-E-MANJIL MAGAR, LOG SAATH AATE GAYE AUR KAARVAN BANTA GAYA.
Hum log to aapke saath hain hi. Verma ji ho ya Sharma ji, Koi Farq nahi parta, log parde par actor ko dekhte hain, director ko nahi. ab kya karenge, verma ji ko parde par dikhne ka naya shoq chada hai to vo kuch na kuch bolenge hi. aap in cheejon mein na pade. Negetive thinking always creates a negetive energy field around us, that harms our creativity. Hum nahi chahte ki hamara bhai jise hum itni oonchaiyon par dekh rahe hai wo is keechar mein pade. Let Verma ji do. As he sow, so shall he reap. Ek bar phir se usi Manoj Vajpayee ko parde par dekhne ki thamanna hai. Manoj Vajpayee, A versetile Actor, who could make himself fit in any kind of Role.

Ritesh Kumar aka Ritesh Jha

anil yadav said...

मनोज जी जिस तरह से आपने अपनी भड़ास निकाली है उससे पता चलता है कि आप भी वर्मा जी के प्रति कोई अच्छे विचार नही रखते हैं....अगर आपने रामू जी को उन्ही की भाषा में जवाब दिया तो आपमें औऱ रामू जी में फर्क क्या रहा....औऱ आपको ये नही भूलना चाहिए कि आज आप जो भी है उसमें रामू जी का भी एक बड़ा योगदान है ....वैसे रामू जी के बारे में जितना हम लोग जानते है उससे ये निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि रामू जी भी दूध के धुले कतई नही होंगे.......फिर भी आप दोनों ही के लिए ( बद्र ) साहब की एक लाईन कहना चाहूँगा....


ए -खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे ....
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे....
खतावार समझेगी तुझे ये दुनिया....
अब इतनी भी ज्यादा सफाई न दें....

varsha said...

duniya ka ye dastoor kyon he ki use oonche mandand ki bajay jhukte meudand pasand hein.well good luck u r a fine actor.

SERVDEO MANI said...

bhaiya,pranam
main nanhey(dr.s.tripathi,brother of gyandeo tripathi).bhaiya kal tv par aapke blog ke bare main dekha aur abhin padha.aap date rahiye aap aapni jagah egdam thik hain.haan aur ek bat main pichle 2 salon se diu main hoon bahut khoosurat jagah hai kabhi ghumne ka plaan banaiye.Dr.S.M.Tripathi