Sunday, September 21, 2008

कैसे रोकें सांप्रदायिक दंगों को

जब से होश संभाला है,तब से सांप्रदायिक दंगे और जात पात के नाम पर हिंसा जीवन का हिस्सा बना पाया है। भले ही एक मूकदर्शक की तरह,लेकिन मैं हमेशा इनके आस पास ही रहा। कंधमाल की जो घटना घटी, और जो कर्नाटक में हो रहा है, वो कहां तक सही है? क्या सरकार की भूमिका कुछ भी नहीं है? अब,क्या जेहाद के नाम पर हम ही निर्णय लेंगे कि किसे मारना है?भगवान के नाम पर हम ही फैसला लेते हैं कि कौन सा धर्म सही है,और कौन सा बुरा। जात-पात के नाम पर हम ही फैसला लेते हैं कि कौन सी जाति बड़ी है,और कौन सी छोटी।

दरअसल, ये बहस कई सौ साल से चलती आ रही हैं और साथ साथ हिंसा उसका दामन पकड़े हुए हैं। ये कौन लोग हैं।किस तरह की सोच रखते हैं। ये कौन हैं जो खुद को खुदा मानते हैं। ये कौन है जो खुद को ही सरकार मानते हैं।

मैंने एक क्रिश्चन मिशनरी स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की। आज मेरा जो भी व्यक्तित्व है, वो या तो उस क्रिश्चन मिशनरी स्कूल का दिया हुआ है या मेरे रंगमंच के निर्देशक और शिक्षक बैरी जॉन का। क्यों नहीं जात पात, धर्म और क्षेत्र मेरे दिमाग में आता है। इसका श्रेय उस स्कूल और बैरी जॉन को दिया जाना चाहिए। साथ ही साथ माता पिता को भी। दिल्ली आने के साथ ही जिस शख्स के साथ मैंने रंगमंच किया और जिसने मुझे मेरे अभिनेता से मेरा परिचय कराया और जिसने मुझे मार्क्स, लेनिन और महात्मा गांधी के दर्शन से अवगत कराया उस व्यक्ति का नाम शमसुल इस्लाम है।

मैं अपने जीवन से इन लोगों के योगदान को कैसे हटा सकता हूं। और जब ऐसी खबरें रोज़ के रोज़ आपको देखने या पढ़ने को मिलती है, तो मेरे जैसा व्यक्ति हतप्रभ होता रहता है। सोचता हूं कि ये कौन लोग हैं,जो दूसरे के विश्वास को छोटा समझते हैं। ये कौन लोग हैं जो दूसरे के भगवान पर हमला करते हैं। ये कौन लोग हैं,जो अपने धर्मग्रंथ के नाम पर हिंसा करते हैं। इनकी मानसिकता कैसी है, इनकी सोच कैसे चलती है। हिन्दुस्तान आगे बढ़ रहा है लेकिन बहुत दुख के साथ कहना पड़ता है कि आधे से ज्यादा हिन्दुस्तान धर्म और जात पात के नाम पर होने वाली हिंसा के चलते बर्बादी की कगार पर भी खड़ा है।

मानव विकास और सामाजिक विकास को अगर पूर्णतया आगे बढ़ाना है तो एसईजेड,मॉल यानी औद्योगिक विकास करते हुए धार्मिक दुर्भाग्य को दूर करना होगा। आज सांप्रदायिक बातों से ज्यादा मुझे शायद ही किसी बात से नफरत हो। जात पात की बातों से ज्यादा किसी चीज़ से मुझे घृणा हो। क्षेत्रववाद की बहस से ज्यादा शायद ही मुझे कोई चीज परेशान करती हो। मैं ये नहीं कहूंगा कि अब समय आ गया है कि उठो। मैं कहूंगा कि अभी नहीं उठे तो फिर कभी नहीं उठेंगे। ये सारी बातें और इन सारी बातों पर हिंसा बंद होनी चाहिए। आज ही।

हम ऐसी सोच रखने वाले व्यक्तियों को सामाजिक रुप से अगल थलग करने कि दिशा में आगे बढ़े क्योंकि ये मानसिकता रखने वाले लोग आपके समझाने के प्रयास को हिंसा से जवाब देते हैं क्योंकि इनके पास अपने कोई तर्क नहीं है। मेरा भगवान मेरे पास है, और मैं नहीं चाहता कि कोई मेरे भगवान की जिम्मेदारी ले। उसकी जिम्मेदारी मैं खुद लेता हूं। हर धर्म के अनुनायियों से मेरी प्रार्थना है कि धर्म को आप अपने तक सीमित रखें। वो आपका विश्वास है। वो आपकी श्रद्धा है। जरुरी नहीं कि वो दूसरी की भी आवश्यकता बने। कृपया अपने धर्म का लाउडस्पीकर लगाकर प्रचार करना बंद करें, और उसकी जगह अपने घर के चारदीवारी के अंदर अपनी आत्मा को जगाएं। भगवान को अपने अंगर महसूस करें। शायद,यही सब कारण हैं कि मैं अपने धर्म, अपने भगवान, अपने विश्वास और श्रद्धा की बातें न दोस्तों से करता हूं न परिवार से करता हूं,न मैं किसी बहस में शामिल होता हूं। मेरा भगवान मेरा है,और वो मेरे अंदर है। एक बार फिर शांति की अपील के साथ-

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

11 comments:

Suresh Chandra Gupta said...

@हर धर्म के अनुनायियों से मेरी प्रार्थना है कि धर्म को आप अपने तक सीमित रखें।

बहुत अच्छी प्रार्थना है. पर क्या इसे वह लोग मानेंगे जो दूसरों के धर्म परिवर्तन को उनके अपने ईश्वर के द्वारा दिया गया अधिकार मानते हैं? अगर आज ईसाई और मुसलमान अपने धर्म को अपने आप तक सीमित रखें तो कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं होगा.
क्यों परेशान हो बदलने को धर्म दूसरों का,
खुदा का कोई धर्म नहीं होता.

Mukesh hissariya said...

भैया,
बिहार की फ्लड रिलीफ़ की लिए आपलोग कुछ किजिएया .हालत बहुत खराब हैं.

राजीव तनेजा said...

"हर धर्म के अनुनायियों से मेरी प्रार्थना है कि धर्म को आप अपने तक सीमित रखें। वो आपका विश्वास है। वो आपकी श्रद्धा है। जरुरी नहीं कि वो दूसरी की भी आवश्यकता बने".....

अच्छी पोस्ट...उत्तम विचार

अमिताभ भूषण said...

manoj ji "anyaay sah chup bethna,
yah maha dushkaram hai ,nayayaarth apne bandhuo ko dand dena dharm hai .'

GIRISH BILLORE MUKUL said...

प्रिय मनोज भाई
असीम-स्नेह
मेरी ये राय है की धर्म और अध्यात्म की प्रथक-प्रथक व्याख्या हो
आम आदमी धर्म अध्यात्म और कबीलों की व्यवस्था को समझे,
मानव-धर्म का सर्व-व्यापीकरण हो, कुतर्क बंद हों और सियासी दलों पर कठोर
अनुशासन स्वीकार्य हो, सबसे पहले कबीलों की नकेल कसी जाए

Sachin pandit said...

JAI MATA KI
manoj bhae bahut pehle se ye sab padhta aa raha hu ki orrisa k pichhde aadiwasee areas maen dharm parivartan ka ganda khel chal raha hae. hindu sangathan itne time se shantipoorvak tareeke se baat rakh rahe the but nobody listend, and now they killed swami lakshmananand saraswatee jee,

dekhiye bhae kise ke bujurg sant kee hatya hogee to ye sab hona to swabhawik hae, sab apne dharm mae santust rahen to kitna achcha ho agar tumhe God mil gaye haen to achchee baat hae use gareeb aadiwasiyo par kyu thopte ho, mishonary schools k aur chikitsa suvidhaye muhaeya karane ke naam pe ye sab ho raha tha, bhae ye sab kreeya kee pratkriya bhar hae aur kuchh nahee,
Ram Ram

dahleez said...

मनोज जी मैं भी एक ईसाई िमशनरी स्कूल से पढ़ा हूं। उस दौरान मैंने कभी यह महसूस नहीं िकया िक धमॆ पिरवतॆन के पऱयास िकए जाते हैं। यहां तक िक मुझे यह भी पता नहीं थी िक धमॆ पिरवतॆन क्या होता है। पढ़ाई कर जब पतऱकार बना तो एख बार रांची के नरकोपी इलाके में सांपऱदाियक िहंसा के बाद िरपोटॆंिग करने गया। वैसे तो सबकुछ ठीक रहा पर एक चीज जो मुझे खटक गई वह यह थी िक जो सलड़का स्कूल में मेरा सहपाठी था वह मेरे स्कूल के पऱधानाध्यापक के साथ मैतऱी मैच में शािमल था। मैंने जब उससे पूछा िक यहां कैसे तो उसने बताया िक अब सर के साथ ही हूं। उसने अपना धमॆ बदल िलया था। इस घटना के बाद मुझे लगने लगा िक वाकई धमॆ के नाम पर बहुत कुछ हो रहा है। चाहे पऱलोभन हो या िफर जबरदस्ती या कोई और अन्य उपाय। मेरा तो यह भी कहना है िक धमॆ िबल्कुल अपनी अास्था से जुड़ा मामला है, इसे पेचीदा धमॆ के ठेकेदार बनाते हैं, चाहे िफर वे िहंदू हों, मुसलमान या िफर ईसाई।

रज़िया "राज़" said...

मनोज जी आपकी पोस्ट बहोत ही पसंद आइ। काश! सभी लोग आपही की तरहाँ सोचते!
मैं आपसे निवेदन करती हुं कि आप मेरे ब्लोग पर ज़रूर पधारें। कुछ मिलता_ज़ुलता ज़रूर पाऎगे।

UjjawalTrivedi said...

मनोज जी, आपके विचार जानकर खुशी हुई, मुझे लगता था आप सिर्फ अच्छे इंसान और अभिनेता ही है- पहली बार एहसास हुआ कि आपके भीतर एक पत्रकार भी छिपा है-

anil yadav said...

ब्लॉग पर इस भाषण से कोई फायदा नही ये घुट्टी आजमगढ ,जामिया नगर ,मुरादाबाद ,और रामपुर में जाकर सुनाइये तो हो सकता है बम विस्फोटों में कुछ कमी आ जाए....

राजेश चौधरी said...

इतिहास गवाह है, कहीं भी एक नए युग की शुरुवात होने से पहले वहां सब कुछ तहस नहस होना लाजमी होता है. इस दरमियाँ पुराना ढर्रा अपने आप रास्ता बनाता है नए युग के लिए.

उधाहरण के तौर पे हाल ही की सब-प्राइम समस्या जब तक अमेरिका की अर्थव्यवस्था को पुरी तरह से नष्ट नही कर देती तब तक वहां नई अर्थव्यवस्था का आगाज़ नही हो सकता.