Wednesday, October 1, 2008

कैसा दुःखद आरंभ नवरात्र का

जब अपने बस में कुछ नहीं रह जाता, तब व्यक्ति सरकार और तंत्र पर भरोसा जताता है। सरकार और तंत्र ही असफल हो जाएँ तो भगवान के दर पर जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। लेकिन, जब भगवान ही रखवाली न कर पाएँ तो किसके दर पर जाएँ? इच्छा थी कि इस बार कुछ और विषयों पर लिखूँ, लेकिन जोधपुर के चामुंडादेवी मंदिर के हादसे के एक-एक दृश्य ने मुझे झकझोर कर रख दिया। कुछ ऐसी ही छोटी-सी घटना इलाहाबाद के एक मंदिर में भी हुई। फिर मालेगांव और साबरकांठा में एक दिन पहले ब्लास्ट भी हुआ। जान-माल की क्षति अगर गिनने जाएँ तो जिह्वा थक-हार जाए, पर मरने वालों की गिनती न पूरी हो सके। कैसा दुःखद आरंभ नवरात्रि का। मैं पूरी तरह से हिला हुआ हूँ। मेरी तरफ़ से सभी मृतकों को भावभीनी श्रद्धांजलि। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिजनों को दुःख के इस क्षण में शक्ति दे।

अब तो ऐसा लग रहा है कि व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। 120 करोड़ लोगों का विश्वास टूटता जा रहा है। पहले वो भरे बाज़ार में सुरक्षित नहीं थे, अब वो भगवान के दरबार में भी सुरक्षित नहीं हैं। सबने इनको बेसहारा छोड़ दिया है। कहीं परमाणु संधि वार्ता सफल होने की ख़ुशी मनायी जा रही है, कहीं पर कई सारे घरों में इस साल दीवाली के दीए नहीं जलाए जाएंगे। नैना देवी, चामुंडा देवी, बिहार की बाढ़, बम ब्लास्ट जैसे तमाम हादसों के बाद इस बार कम-से-कम मैं तो घर में दीवाली नहीं मना पाऊंगा। दीवाली नहीं मनाना, मारे गए लोगों के प्रति संवेदना जताने की वजह से, और कहीं-न-कहीं विरोध में भी। दरअसल, अब समय आ चुका है कि हम करोड़ों लोगों की अपेक्षा पर तंत्र खरा उतरे।

मैं एक कलाकार हूँ। अपनी कला के प्रति पूरा समर्पण है। लेकिन इस समाज में रहते हुए मेरा कर्तव्य है कि मेरे साथ इस समाज में जो भी लोग रह रहे हैं, उनकी सुख और भलाई के लिए कुछ न सही तो अपने ब्लॉग पर ही अपनी बात रख सकूँ। अपना विरोध जता सकूँ।

उफ़... कैसा रहा ये साल! कैसे कोई उत्सव मनाए! किसी पत्रकार मित्र से मैंने कहा कि ब्लॉग से एक बात अच्छी हुई कि मैं अपने दिल की बात कह सकता हूँ। अपनी भड़ास निकाल सकता हूँ। उन्होंने कहा कि ये आपकी भड़ास नहीं, आपकी चिंता ज़्यादा नज़र आ रही है। लेकिन शायद चिंता भी एक भड़ास के रुप में बाहर आना आवश्यक है। मैंने हमेशा यह माना है कि हम अमेरिका के अभिनेता नहीं है, जो अपने आप को देश के मौजूदा हालात से अलग रख पाएँ। हम ऐसा कर ही नहीं सकते। हमारा देश अभी ग़रीब देश की संज्ञा से उबर ही रहा है। कुछ न सही तो किसी-न-किसी माध्यम से मौजूदा भ्रष्टाचार, महंगाई, ग़रीबी के ख़िलाफ़ आवाज़ तो उठा ही सकते हैं। और कुछ नहीं तो ऐसा करके लगता है कि मैं अपने होने के साथ न्याय कर रहा हूँ। पता नहीं कितने लोग मेरी बात से सहमत होंगे क्योंकि जो हालात हैं, अभी वहाँ पर Escapism ही सफलता का मूल मंत्र है। अगर है तो फिर यही सही। कौन घर से बंगला निकालने निकला था। आज अगर एक अभिनेता के तौर पर अपने मन का काम कर लेता हूँ, और अपने घर को अच्छी तरह चला लेता हूँ तो यही बहुत है। मैंने हमेशा माना कि मैंने अपने सपने से ज़्यादा ही पाया। अभिनय छोड़ नहीं सकता। ये मेरा ऑक्सीजन है। लेकिन, ब्लॉग पर अपनी चिंता को लोगों के साथ बाँट तो सकता ही हूँ। और अपनी चिंता की भड़ास तो निकाल ही सकता हूँ।

आज की पोस्ट ख़त्म करने से पहले सिर्फ़ इतना कहना चाहूंगा कि शाम को बहुत सारे चैनलों पर मैं चामुण्डादेवी की त्रासदी के बारे में कुछ और जानना चाह रहा था, लेकिन 95 प्रतिशत चैनल पर सिर्फ़ कॉमेडी से जुड़े कार्यक्रम ही दिखाए जा रहे थे। अब तो इन 185 लोगों का मरना भी कोई समाचार नहीं बना सकता। वाह रे टीआरपी, वाह रे बॉक्स ऑफ़िस।

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

17 comments:

abhivyakti said...

aapka blog pahli bar dekha aur anubhav hua ki aap jitne achche kalakar hain utne hi samvedansheel insan bhi hain
dr jaya

Bharat said...

Dear brother Manoj i agree with you

Bharat said...

dear brother i agree with you

दिनेशराय द्विवेदी said...

बाक्स ऑफिस? का जमाना है इंसान का नहीं।

Aaditya said...

इससे दुखद शुरुआत नहीं हो सकती. जोधपुर जैसे छोटे से शहर के लिये १८०-२०० बहुत बड़ी संख्या है.. मेरा बचपन उन्ही गलियों में बीता है.. अब सोच/देख के बहुत दुख होता है..

कितनी लापरवाही.. क्या कहें.. इस बार दिपावली शायद ही जोधपुर में मनाई जायें...

रंजन

नटखट बच्चा said...

अंकल
ठीक कहते हो ,फ़िर भी मीडिया वाले कहते है सबसे तेज

mamta said...

सच कह रहे है आप ।

मथुरा कलौनी said...

कौन करेगा शांति नृत्य
कौन पहनेगा पायल
अब बचा ही है कौन
जिसके पाँव नहीं हों घायल

अमित अग्रवाल said...

मनोज बाजपेयी साहब,
आपका चिट्ठा वो भी हिन्दी में पढ़कर हम तो धन्य होगा गए| बहुत खूब, हमें तो पता ही नहीं था कि
आप जितना अच्छा अभिनय करते हैं उतना ही अच्छा लिखते भी हैं| हार्दिक बधाई!!
आशा है आगे भी आप लिखते रहेंगे और हम पढ़ते रहेंगे|

अमित

Deepak M. said...

मनोज जी इतने लोगों का मरना भले ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए ख़बर नहीं हो, पर प्रिंट मीडिया के लिए ये बड़ी ख़बर है। यकीन न हो तो राजस्थान से प्रकाशित होने वाले कुछ समाचार पत्रों के मुख पृष्ठ पर निगाह डालिए। एक दूसरे पर चढ़े लोग, कुछ चीखते हुए, कुछ आँखें फाड़ कर कुछ कहने की कोशिश करते हुए, कुछ अचेत, तो कुछ बेबस से मौत का इंतज़ार करते हुए। ऐसा वीभत्स दृश्य जिसे देखने वालों के रौंगटे खड़े हो जाए। और ये फोटो कुछ अख़बारों में सिर्फ़ इसलिए छपे क्योंकि वे अपने पत्रकार धर्म का पालन कर रहे थे। शायद मौत का वो चेहरा जो टी.वी.चैनलों पर दिखने से बच गया था वो समाचार पत्रों में दिखाई दे गया। और ये वोही समाचार पत्र हैं जो वीभत्सता के लिए टी.वी.चैनलों को जी भर कर कोसते हैं।
अखबार के अन्दर के पन्ने पलटिये, आपको कुछ और लाशें दिखाई देंगी। और शायद इन्ही चित्रों की वजह से लोग इन अखबारों को ज़्यादा पढेंगे। शायद इसी को लाशों का व्यापार कहते हैं।

Mukesh hissariya said...

Jai mata di,
Kerala ki Gurumata ke dwara bihar me medical reief camp chlaya ja rha hai.Us unit ke head hain Dr ram mohan(9470897958).Hum log unke is prayas ka utsahvardhan kar sakten hain ek sms bhejkar.

राजीव तनेजा said...

सही कहा मनोज जी आपने ये भड़ास नहीं बल्कि चिंता होती है जो हमारी लेखनी के जरिए बाहर निकलती है।जब हम देखते हैँ कि सब कुछ जानते-बूझते हुए हम निरीह और लाचार हैँ तो कुछ ना कर पाने की बेबसी ही शब्दों का रूप अख्तियार कर लेती है। इसी बेबसी और उत्कंठा को मैँने कविता का रूप देने की कोशिश की है। उम्मीद है कि आपको पसन्द आएगी


"भडास दिल की कागज़ पे उतार लेता हूँ मैँ"

***राजीव तनेजा***


क्या लिखूँ.. कैसे लिखूँ...
लिखना मुझे आता नहीं...
टीवी की झकझक..
रेडियो की बकबक..
मोबाईल में एम.एम.एस..
कुछ मुझे भाता नहीं
भडास दिल की...
कब शब्द बन उबल पडती है
टीस सी दिल में..
कब उभर पडती है...
कुछ पता नहीं

सोने नहीं देती है ..
दिल के चौखट पे..
ज़मीर की ठक ठक
उथल-पुथल करते..
विचारों के जमघट
जब बेबस हो..तमाशाई हो..
देखता हूँ अन्याय हर कहीं
फेर के सच्चाई से मुँह..
कभी हँस भी लेता हूँ
ज़्यादा हुआ तो..
मूंद के आँखे...
ढाँप के चेहरा...
पलट भाग लेता हूँ कहीं
आफत गले में फँसी
जान पडती है मुझको
कुछ कर न पाने की बेबसी...
जब विवश कर देती मुझको..

असमंजस के ढेर पे बैठा
मैँ 'नीरो' बन बाँसुरी बजाऊँ कैसे
क्या करूँ...कैसे करूँ...
कुछ सूझे न सुझाए मुझे...
बोल मैँ सकता नहीं
विरोध कर मैँ सकता नहीं
आज मेरी हर कमी...
बरबस सताए मुझको

उहापोह त्याग...कुछ सोच ..
लौट मैँ फिर
डर से भागते कदम थाम लेता हूँ ...
उठा के कागज़-कलम...
भडास दिल की...
कागज़ पे उतार लेता हूँ
ये सोच..खुश हो
चन्द लम्हे. ..
खुशफहमी के भी कभी
जी लेता हूँ मैँ कि..
होंगे सभी जन आबाद
कोई तो करेगा आगाज़
आएगा इंकलाब यहीं..
हाँ यहीँ...हाँ यहीँ
सच..
लिखना मुझे आता नहीं...
फिर भी कुछ सोच..
भडास दिल की...
कागज़ पे उतार लेता हूँ मैँ"


***राजीव तनेजा***

shubhi said...

यह व्यवस्था का दोष है भारत ही नही दुनिया भर में श्रद्धालु इसका शिकार होते रहे हैं चाहे मीना में होने वाला हादसा हो या चामुंडा मंदिर में। जनता को प्रशासन से आशा छोड़नी होगी। उन्हें जल्दबाजी के दोष से मुक्त होना होगा, क्योंकि ईश्वर इतना दुर्लभ है कि उसे जल्दबाजी से नहीं पाया जा सकता।

रौशन said...

बताया जाता है की इस दुर्घटना के पीछे वह के स्थानीय सांसद को बिना आगा पीछा सोचे दिया गया वी आई पी ट्रीटमेंट है
अब जब देश में इतने वी आई पी होते जा रहे हैं तो हर ऐसी जगह पर वी आई पी द्वार ही बना देना चाहिए कम से कम आम लोग तो सुरक्षित रहेंगे

अंशुमान सिंह said...

मनोज जी प्रणाम. आपका ब्लॉग देखकर अच्छा लगा.

अंशुमान सिंह said...

ये देखकर बहुत ही सुखद अनुभूति हुई की आप जैसी वयस्तता होने का बावजूद भी इतने गंभीर मुद्दों पर आप भी आम भारतीय की तरह ही दुखी होते हैं वरना आज के समय में तो हमारी फिल्म इंडस्ट्री के लोगों के पास (सभी नहीं) आम जनता के दुःख दर्द पर मरहम लगाने का भी समय नहीं है.
चामुंडा देवी मंदिर में हुई घटना ने सभी को अन्दर तक हिला कर रख दिया. लेकिन राजनीतिज्ञों का रवैया फिर भी दुखद ही रहा. हम सभी इस दुखद समय में उनके परिजनों के साथ हैं.
आप का ब्लॉग पढ़ा और अच्छा लगा.

मुन्ना पांडेय(कुणाल) said...

आजके न्यूज़ चैनलों में न्यूज़ भी होता है क्या ?
सिर्फ़ चार सी इनके लिए न्यूज़ हैं:-
१-सेलेब्रटी
२-सिनेमा
३-क्रिकेट
४-कॉमेडी