Thursday, August 28, 2008

शक्तिहीन अभिनेता और बाढ़ का दर्द

बहुत दुख और दर्द हो रहा है, जब भी मैं टेलीविजन पर बिहार में बाढ़ से प्रभावित जनता को पीड़ा झेलते हुए देख रहा हूं। एकदम असहाय महसूस करता हूं मैं। नेपाल से आने वाली इस नदी की समस्या को जब से मैंने होश संभाला है, तब से सुनता आ रहा हूं। लेकिन आज तक कोई उसका निदान नहीं निकाल पाया। कई सरकारें आईं, कई गईं लेकिन मौत और दुख का ये सिलसिला जारी रहा। समझ नहीं आता कि बेबस लोग किससे अपनी लाचारी, अपनी पीड़ा कहें और एक शक्तिहीन अभिनेता के नाते मैं क्या कर सकता हूं? आज ये समाचार देखकर खुशी हुई कि कम से कम प्रधानमंत्री ने हजार करोड़ रुपए केंद्र की तरफ से देने का वायदा किया है। बस ये आशा है कि इसका एक एक रुपया न सिर्फ बाढ़ पीडितों की सहायता के लिए अभी के अभी खर्च किया जाएगा बल्कि इस समस्या का निदान भी फौरन खोजने की कोशिश होगी ताकि हर मानसून में कोसी नदी या किसी भी नदी से प्रभावित होने वाले लोग बच जाएं।

अभी श्री प्रकाश झा से मेरी बात हुई है। हम लोग मिलने वाले हैं। आपस में मिल बैठकर लोगों के दुख के बारे में बात करेंगे और कोशिश करेंगे कि अपनी अपील सरकार और प्रशासन तक पहुंचा पाएं।

आज मैं एक फिल्म की डबिंग कर रहा था लेकिन दिमाग में लोगों की चीख पुकार ही सुनायी दे रही थी। मॉल के बढ़ते संसार में हम शहर के ठीक बाहर की तकलीफ को भूलते जा रहे हैं। मॉल से ही सिर्फ विकास नहीं होगा। अगर गांव और गांव वाले ही दुखी रहेंगे तो इस देश का कुछ नहीं हो सकता। इन्हीं सब पीड़ा को महसूस करते हुए मैं आपके साथ अपने दुख को बांट रहा हूं और असहाय सा महसूस कर रहा हूं। आगे मैं चाहूंगा कि किसी तरीके से शारीरिक और भावनात्मक तौर पर ही सही, मैं अपनी तरह से पीड़ित लोगों की कुछ मदद कर पाऊं।

अभी बस इसका अंत करता हूं क्योंकि मुझे शेखर सुमन और प्रकाश झा जी से मिलना है और उनसे आगे इस बाबत क्या किया जा सकता है,इस पर विचार करना है।

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, August 24, 2008

बाज़ार में करता हूँ अभिनय का होमवर्क

शनिवार का दिन परिवार के साथ रहा। अमूमन मैं और मेरी पत्नी बाजार के तरफ निकलते हैं, कुछ खरीदारी करते हैं। हमारी गिनीचुनी दुकाने हैं। मेरी पत्नी की जिद होती है कि मैं साथ जाऊं। नहीं तो, मुझे घर में घुसे रहना ही अच्छा लगता है। वैसे, जाने से अच्छी बात ये भी होती है कि दुकान में विभिन्न तरह के लोगों से मिलता हूं, उनकी बातचीत ,जीवन यापन और स्थिति को देखकर अभिनेता का बहुत सा होमवर्क कर लेता हूं। अभिनेता के लिए तो यह अच्छा ही होता है। लेकिन पत्नी ने कौन सा सामान लिया, ये याद नहीं रहता। भूलने की बीमारी मुझे बहुत ज्यादा है। अपने लिखे गए डायलॉग को अगर दोबारा मुझसे कहा जाए कि मैं फिर से बोलू तो कभी नहीं कर पाता। और इस बीमारी के कारण घर में अक्सर तकरार भी होती रहती ङै। तकरार से अच्छा ये होता है कि कोशिश करता रहता हूं हर चीज को याद रखने की। तो खैर, शनिवार का दिन परिवार के साथ बाजार का दिन था। कपड़े की दुकान वाले फोन किया कि बहुत सारा कपड़ा आया है। तो हम चले गए कपड़ा देखने ,खरीदारी की और उसके कर्मचारियों के साथ हंसी मजाक किएय। कुछ एक ऑटोग्राफ दिए और अभिनेता का बहुत सारा होमवर्क करके आ गया। अच्छा लगा, सुकून मिला।

मैंने कई मित्रों के कमेंट देखे। अच्छा लगा। वैसे, ब्लॉग शुरु करने के बाद बहुत अच्छी चीजें हुई मेरे साथ । एक तो लोगों के साथ जुड़ाव, सीधा संवाद शुरु हुआ। और दूसरा इसी बहाने कुछ लोगों ने मेरी फिल्मों और मुझे पसंद करना शुरु किया। जैसे,बंगलोर के भाई जी विश्वनाथ ने मेरी फिल्म सत्या देखी और उन्हें पसंद आई।

इन्हीं कमेंट में एक था-राजीव तनेजा का। ये याद इसलिए भी रह गया क्योंकि इसमें राजीव ने लिखा कि उन्होंने 1971 का पाइरेटेड वर्जन देखा। मेरी राजीव से और सभी चाहने वालों से निवेदन है कि वो फिल्मों को यथा संभव थिएटर में जाकर देखा करें। मेरी फिल्मों को भी। क्योंकि, आपके देखने से बॉक्स ऑफिस पर पैसा आता है। और मेरे जैसे कई फिल्मकर्मियों को, उनके काम को प्रोत्साहन मिलता है। और निर्माता हमारी तरह की फिल्में बनाने को मजबूर होता है। जब तक वो नहीं होगा, तब तक ये बुद्धिजीवियों के ड्राइंग रुम की बातचीत होती रह जाएगी। आप मुझे पसंद करते ही रह जाएंगे और निर्माता उस अभिनेता को लेगा, जो अभिनेता उसे ज्यादा पैसे देगा बॉक्स ऑफिस पर। हमारी इंड्स्ट्री का चलन है कि जो ज्यादा पैसा लाए, वो ही ज्यादा बडा एक्टर और बड़ा स्टार कहलाएगा। दुनिया भी फिर उसी को देखती है । फिर आपका मुझे और मेरी पसंद की फिल्मों पसंद करना,उसके कोई मायने नहीं रह जाते।

कुछ लोगों ने मनी हनी की आलोचना भी की है। दरअसल, ये फिल्म एक आउट एंड आउट कॉमेडी फिल्म है। बहुत सारे लोगों को पसंद आयी, बहुत से लोगों को बिलकुल पसंद नहीं आई। लेकिन हमारी मेहनत में कभी कमी नहीं रही। इससे मुझे फायदा हुआ कि मेरे दर्शकों ने पहली बार जाना और माना कि मैं गंभीर किस्म की फिल्में और रोल ही नहीं करता हूं। मैं कॉमेडी फिल्मों और कॉमेडी रोल को भी सहजता पूर्वक निभा सकता हूं। वैसे,ये फिल्म करने का यह कारण नहीं था। कारण था निर्देशक गणेश आचार्य के साथ काम करना। उनकी अगली फिल्म फिर एक कॉमेडी होगी,जिसमें संभवत फिर मैं कॉमेडी करता दिखूं। कोशिश फिर करेंगे- आपका भरपूर मनोरंजन करने की और आपको न निराश न करने की। कोशिश एक ऐसी चीज है, जो हर मनुष्य को अपने अपने व्यवसाय में जुनून के साथ करते रहने होती है क्योंकि इसके अलावा हमें और कुछ तो आता भी नहीं है।

Thursday, August 21, 2008

बुढ़ापा और मैं

आज एनडीटीवी इंडिया पर बढ़ती महंगाई और कम पेंशन के बारे में चर्चा करते हुए चैनल ने एक वृद्ध रिटायर अफसर एस एन वर्मा का ज़िक्र किया। वो शौकिया पेंटर भी हैं। चैनल ने उनकी दिनचर्या की बात की और बताया कि कैसे गुजारे के लिए उनकी पेंशन कम पड़ती है। यहां तक कि अपनी एक पेंटिग बनाने के लिए आवश्यक चीजों की खरीद तो दूर, अपना गुजारा करने में भी पेंशन कम पड़ रही है। बस,इसे देखते सुनते अचानक भविष्य को सोच मेरा पूरा शरीर दहल गया।

दरअसल, एस एन वर्मा में मैं खुद को देख रहा था। कई सारे युवाओं को देख रहा था, जो अपने यौवन के मद में चूर हैं। उन्हें कहीं भी इस बात का अहसास नहीं है कि वो भी कल शायद एस एन वर्मा की जगह खड़े होंगे। आज का वृद्ध वैसा हो चुका है, जैसे कि घास फूस, जिसे काटकर अलग कर दिया जाता है ताकि नई फसल की बुगाई हो सके। वो अलग थलग खुद को महसूस करता है। उसके बारे में समाज तो दूर उसके अपने भी सुध नहीं लेते। क्या करें अपने बूढ़ों का? क्या हम उन्हें सहेज कर नहीं रख सकते? क्या हम उनसे मार्गदर्शन नहीं ले सकते? और अगर उसके बदले में हमें सिर्फ उनका ख्याल रखना है तो अधिक क्या गया? यही सोचते सोचते दिन कटा ।

लेकिन, इस दौरान कई चीजें दिमाग में आई,जो सोचा कि आप सभी के साथ बांट लूं।

मेरे दादा की 90 की उम्र में गुजरे। कभी कोई बीमारी नहीं। अपने निधन तक वो सारे लोगों के खेतों का दौरा करते और खेतों में होने वाली परेशानियों का हल आकर बताते। भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे। एक बुढ़ावा मैंने ये देखा। एक वो भी,जो मेरे आसपास है। मेरे पिताजी का। वो अपने मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने पटना गए। कुछ ऐसी चूक हुई ऑपरेशन में कि उस आंख की रोशनी गंवा बैठे। पता नहीं क्यों लेकिन आजतक इसका दोष भाव मुझे होता है।

लेकिन, मैंने उनके जैसा प्रजातांत्रिक पिता और जीवन को उत्सव की तरह जीने वाला शख्स अपने आसपास नहीं देखा। एक मेरे ससुर जनाब रज़ा साहब, जो अब 80 के पढ़ाव को छूने वाले हैं। फिर भी, नौकरी पर जाना उन्हें आज भी सबसे प्रिय है। मैं इन सबसे सीखता हूं। और अपने आने वाले दिन की तैयारी करता हूं।

मुझे याद है एक नाटक - जो मैंने कई साल पहले दिल्ली रंगमंच पर किया था। इसमें मैं मैं अकेला अभिनेता था। इस नाटक में मैंने एक रिटायर्ड स्टेशन मास्टर की भूमिका की थी, जो अपने बेटे और बहू द्वारा प्रताड़ित है। नाटक के दौरान हमेशा मैंने एक बूढ़े सज्जन को आगे वाली सीट पर पाया। और हर शो के अंत में जार जार रोते हुए भी पाया। पाया ये गया कि उनकी जीवनगाथा मेरे इस नाटक के इस चरित्र से बहुत मिलती जुलती है। एक तरफ नाटक का दर्शक प्रताड़ित पिता, और दूसरी तरफ मेरी फिल्म 'स्वामी' का बूढ़ा, जो अपने बेटे को खुद ही बाहर भेज देता है अपना उद्देश्य को पूरा करने के लिए। और खुद वृद्धाश्रम में जगह पाता है।

वैसे, कई हैं बूढ़े। जो आज के दिन मेरा मार्गदर्शन कर रहे हैं। कई है बूढ़े जो मुझे आने वाले दिन की तैयारी करा रहे हैं। कई हैं बूढ़े,जो मुझे जीवन को हर पल जीने की राह दिखा रहे हैं। और कई हैं बूढ़े, जो मुझे काम को पूजा समझना सिखा रहे हैं। सिखना, समझना,जीना मैं इन्हीं से जानता हूं। मेरा शत शत प्रणाम इन सभी को।

पिछली पोस्ट में कई कमेंट आए,मैं सबका जवाब देना चाहता हूं लेकिन आज अचानक मन में समाज में बुजुर्गों की स्थिति पर कार्यक्रम देखकर ये विचार कौंध गए। बहरहाल,अगली पोस्ट में आप लोगों की बात करुंगा-इस वादे के साथ

आपका और आपका

मनोज बाजपेयी

Friday, August 15, 2008

यादों के सफ़र में स्वतंत्रता दिवस

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सभी साथियों को मेरी तरफ़ से बधाइयाँ और शुभकामनाएँ।

एक छोटी-सी झोंपड़ी, लकड़ी की चौकी पर बैठे हुए मास्टर साहब, सामने बोरी पर बैठा हुआ मैं और मेरे साथ गांव के कई बच्चे। और क, ख, ग की आवाज़ से पूरा माहौल गूंज रहा था। क्लास ख़त्म करने से पहले मास्टर जी ने कहा कि अगले दिन बाँस की छोटी-छोटी तिल्लियाँ लेकर आना और तिल्लियों में तिरंगा बनाकर लाना। पूरी रात हम तिल्लियाँ काटते रहे, छीलते रहे और क़रीब पंद्रह-बीस तिरंगे तिल्लियों में डालकर अगले दिन स्कूल पहुंचे। एक मध्यम आकार के लकड़ी के पोल से तिरंगा लगा हुआ था। मास्टर जी ने उसे लहराया और पहली बार मास्टर जी के सुर-से-सुर मिलाकर मैंने जन-गण-मन गाया था। विश्वास करें आज तक नहीं भूला हूँ। वो चार किलोमीटर पैदल चलकर जाना, क़तार में सारे बच्चों के पीछे हाथ में तिरंगा लेकर पगडण्डियों पर चलते जाना रह रहकर याद आता है।

वापस घर जाकर माता-पिता को जन-गण-मन टूटी-फूटी आवाज़ में सुनाना भी याद है। उस समय का हिन्दुस्तान भी कुछ याद है और उस समय का बिहार भी याद है। क़रीब तीन साल पहले फिल्म '1971' की शूटिंग कर रहा था, तो रोहतांग पास की माइनस 14 डिग्री की ठंड में दस दिन तक शूटिंग करते हुए भी परेशानी का एहसास कभी नहीं हुआ। इसका कारण शायद बचपन में पड़ा देश के लिए जज़्बे का बीज था। शायद इसलिए सारी यूनिट के हतप्रभ होते भी दस दिन तक मौत से खेलते हुए '1971' के क्लाइमेक्स की शूटिंग की थी। क्योंकि मैं अंदर से सिर्फ़ फ़िल्म नहीं बना रहा था। मैं अपने काम से अपने देश के प्रति अपना सम्मान प्रगट कर रहा था। जब पुणे में '1971' के प्रदर्शन के बाद लेफ़्टिनेंट जनरल ने कहा कि ये फ़िल्म हली फ़िल्म है, जिसने इंडियन आर्मी के साथ न्याय किया है तो मेरी आँखें भर आईं थीं। '1971' की शूटिंग मेरे लिए मेरी बेहतरीन यादों में से एक है। '1971' ने मुझे बेहतरीन अभिनय का सुख दिया। '1971' मेरी अच्छी और बेहतरीन फ़िल्मों से एक है। '1971' मेरे देश की फ़िल्म है और वो मेरे लिए गर्व है।

वैसे, अपनी यादों से इतर बात करूँ तो जब-जब यह दिन आता है, तब-तब इसको मनाने के तरीक़े आपकी आँखों के सामने दिखते हैं और कानों को सुनायी भी देते हैं। कहीं ढोल-नगाड़े बजते हैं तो कहीं टेलीविजन पर प्रधानमंत्री का भाषण चल रहा होता है। कहीं पर बच्चों की किलकारियाँ सुनायी देती हैं, तो किसी-किसी घर से कोई भी आवाज़ नहीं आ रही होती है - मतलब छुट्टी मन रही है। इस बार का स्वतंत्रता दिवस कुछ अलग है और बहुत ही मिला-जुला भी। मन में विभिन्न तरह के विचार आ रहे हैं। अभिनव बिंद्रा के गोल्ड मेडल जीतने की ख़ुशी भी है, तो नैना देवी में 100 से ज़्यादा लोगों के मारे जाने, अहमदाबाद ब्लास्ट में कई लोगों के मारे जाने, जम्मू-कश्मीर में रोज़ होने वाली मौतें-प्रदर्शन और उनसे उठती हुई राजनीति तथा अनेक प्रकार की अच्छी और बुरी बातें इस बार मन को सुकून भी दे रही हैं तो परेशान भी कर रही हैं। हर बार के स्वतंत्रता दिवस पर एक सजग नागरिक होने के नाते सोचता हूँ कि कब वो दिन आएगा, जब हम बिना परेशानी के, बिना किसी द्वंद्व के गर्व के साथ झंडे के नीचे खड़े होकर जन-गण-मन गा सकेंगे। आशा है कि वो दिन क़रीब है। आशा है कि सारे लड़के और लड़कियाँ शिक्षा के रास्ते पर चलेंगे। आशा है कि सबको बराबर का अवसर मिलेगा। आशा है कि सबके पास रोटी, रोज़गार, कपड़ा और मकान होगा। आशा है तभी कुछ हो सकता है। आशा है तभी कुछ बदलेगा। क्योंकि पाश ने सही कहा है कि सबसे बुरा होता है सपनों का मर जाना। हम सब सपने देखते रहें। सपने देखना भी एक गतिविधि है या यूँ कहें कि सपना देखना ही आगे जाने का संकेत करता है। बाक़ी तो सही कहा है कि जो बीत गई सो बात गई। चलिए, हम मिलकर सपना देखें।

आज स्वतंत्रता दिवस का मौक़ा है, तो यादों में यही दिन था। पिछली पोस्ट पर कई कमेंट थे। आलोचना है - प्रशंसा भी। कई के जवाब ज़ेहन में हैं, लेकिन वो सब अगली पोस्ट में। एक बार फिर, स्वतंत्रता दिवस की बधाई।

आपका

मनोज बाजपेयी

Tuesday, August 12, 2008

अविश्वास के बावजूद पढ़िए, यह मेरा ब्लॉग है

मेरे ब्लॉग पर राजेश रोशन साहब का पहला कमेंट है और उनके बाद राजीव तनेजा, दिनेश राय, कविता, शैलेश भारतवासी, गिरीश, सुरेश चिपलूनकर, रजिया राज, अनूप शुक्ला और उन सभी बंधुओं को धन्यवाद जिन्होंने मेरे ब्लॉग पर आकर कमेंट किया और मेरी पहली पोस्ट की तारीफ की। वैसे, इन कमेंट में कुछ दोस्तों ने सवाल भी उठाए हैं । मसलन-

हिन्दी के बारे में आर सी मिश्रा साहब ने लिख डाला कि "कौन लिख रहा है ये ब्लॉग। अब मनोज बाजपेयी तो इतनी अच्छी हिन्दी लिखने से रहे।" दरअसल, ये दोष उनका नहीं है जो यह सवाल पूछ रहे है कि एक फिल्म अभिनेता हिन्दी में कैसे लिख सकता है? अमूमन जितने भी बड़े स्टार्स है, वो काम चलाऊ हिन्दी तो बोल लेते हैं लेकिन शायद हिन्दी में नहीं लिख पाएंगे। वो हिन्दी में इंटरव्यू भी बमुश्किल दे पाते हैं। इससे कहीं-न-कहीं दर्शकों-पाठकों के मन में ये आशंका होनी लाजिमी है कि एक अभिनेता हिन्दी में कैसे ब्लॉग लिख सकता है। आपकी जानकारी के लिए श्री अमिताभ बच्चन बहुत अच्छी हिन्दी जानते हैं। आशुतोष राणा बहुत अच्छी हिन्दी लिखते-बोलते हैं और जितने भी लोग रंगमंच से आए हैं, उनकी हिन्दी और अंग्रेजी अच्छी है। अगर आपको अभी भी अविश्वास है तो उसे रहने दीजिए, लेकिन पढ़ना जारी रखिए क्योंकि यह मेरा यानी मनोज बाजपेयी का ही ब्लॉग है और मनोज बाजपेयी की ही बात है।

पीआरशिप के बारे में संजय, आनंद और जी विश्वनाथ समेत कुछ लोगों ने कमेंट किया है कि ये ब्लॉग पीआरशिप तो नहीं? अब मैं आपको भी ये दोष न दूंगा कि आपने यह सवाल पूछा तो क्यों पूछा या फिर आपके मन में संशय हुआ क्यों? आजकल हर कदम एक फिल्म अभिनेता है और उसके पी आर शिप या प्रचार-प्रसार के पचास कारण होते हैं। टेलीविजन चैनल ने कोई कमी तो रखी नहीं है । अब तो न्यूज के बदले वो बड़े स्टार की पी आर एजेंसी बन चुके हैं। मेरा ये कदम भी शक के घेरे में आएगा, ये मुझे पता था। दरअसल, ये मेरे कुछ पत्रकार मित्रों द्वारा शुरु किया ब्लॉग है, जिसमें उन्होंने मुझे आमंत्रित किया है कि मैं भी अपने दिल की बात कह सकूं। तकनीकी सहयोग पूरा उनका है। जहां तक अंग्रेजी की बात है और मुमकिन है कि आने वाले दिनों में कुछ और भाषाओं में भी पोस्ट दिखे तो वो निश्चित तौर पर ट्रांसलेशन है। अब मैं एक भाषा में लिखकर खुद उसका ट्रांसलेशन कर सकूं, फिलहाल इतना वक्त मेरे पास तो नहीं है।

अपनी कथा यात्रा के बारे में- पंद्रह साल सिनेमा में अभिनय और 11 साल थिएटर करने के बाद भी मुझे ही अपनी कथा बतानी पड़े तो इसका मतलब है कि इतने सालों में आपने कभी इस अभिनेता की सुध नहीं ली। कृपया कुछ वक्त खर्च कर गूगल में मनोज बाजपेयी टाइप करें, सारी जानकारियां सामने आ जाएंगी।

फिलहाल, पोस्ट लंबी हो चली है। ब्लॉग पढ़ने वाले सभी बंधुओं को फिर धन्यवाद। मेरी फिल्म "हनी है तो मनी है" जरुर देखें और उस पर यहां प्रतिक्रिया दें। ब्लॉग संवाद कायम करने के लिए ही है, सो संवाद जारी रहेगा। अगली पोस्ट के साथ जल्द हाजिर होता हूं।

आपका और सिर्फ आपका

मनोज बाजपेयी

Sunday, August 10, 2008

नाम, कंप्यूटर और मैं

बच्चा पैदा होने से पहले ही नाम खोजने की प्रकिया शुरु हो जाती है। चिंकू, पिंकू, अमिताभ, आमिर ,राज या फिर मनोज। मुझे इस नाम से कभी वास्ता नहीं रहा क्योंकि मुझे हमेशा ऐसा लगता रहा कि लाख में कम से कम निन्यान्बे हज़ार मनोज नाम के हैं। और फिर, कहते हैं न कि न नाम-वाम मे क्या रखा है। वैसे ही, ब्लॉग बनाने की बात मेरे एक मित्र प्रसून ने की तो मुद्दे से ज्यादा मैं नाम के बारे में ही सोचता रहा। दरअसल, इसे बनाने में सहयोग करने वाले मेरे एक और मित्र ने जब मुझे बताया कि इसका नाम Manoj Bajpai लिखा है, तो मैं निराश हो गया। वजह ये कि ये मेरे नाम की सही स्पेलिंग नहीं है। मेरा ऑफिशियल नाम है Manoj Bajpayee। ये स्पेलिंग आज तक फिल्म वालों ने या मीडिया वालों ने कभी उपयोग में नहीं लायी। और जब मैंने इसे बदलना चाहता तो मुझ पर अंकज्योतिष अपनाने की टिप्पणी की गई।

वैसे, मेरा किसी भी गणित, किसी भी विज्ञान और किसी भी मान्यता से परहेज नहीं है। मैं विश्वास रखता हूं कि मेरा नाम 'गधा' भी होता तो लोग खूब कहते कि गधे ने 'सत्या' में अच्छा काम किया है, पिंजर में नेशनल अवार्ड लिया और 'मनी है तो हनी है' में कॉमेडी भी कर सकता है ये गधा। क्या फर्क पड़ता है?

वैसे, अगर सोचने जाए तो उल्लू को मनोज कहा जाता तो लोग कहते कि मनोज रात भर जगता है, फर्क क्या पड़ता है? बहरहाल, प्रकिय्रा खत्म हुई और मेरे नाम की स्पेलिंग चेंज कर दी गई। बदला कुछ भी नहीं पर मुझे संतुष्टि मिल गई।

ये कंप्यूटर भाई मेरे संपर्क में डेढ़ साल पहले आए है। इससे पहले मैं खुद को कंप्यूटर अज्ञानी कहता था। इस दौरान, इस विषय मे सिर्फ पहली ही पास कर पाया है। बहुत मुश्किल हो रही है, लेकिन फिर भी एक नए विज्ञान से, एक नयी वस्तु से खिलवाड़ करने में मजा आ रहा है। लेकिन, ये साहब इतने महंगे आते हैं कि डर भी लगता है कि सब नष्ट न हो जाए या कंप्यूटर की भाषा में डिलीट न हो जाए।

वैसे, बड़ा सही विज्ञान है यह। हाल फिलहाल में मैं जिसके संपर्क में भी आया उससे कुछ न कुछ सीखता रहा। फिल्म 'एसिड फैक्ट्री' के दौरान फरदीन खान और हमारे फोटोग्राफर मित्र जीतू ने मुझे म्यूजिक डाउनलोड़ करने की प्रक्रिया को समझाया । आजकल मैं संगीत सुन रहा है। माफ कीजिए, टेप पर नहीं अपने कंप्यूटर पर। समय कैसे बीत गया पता भी नहीं चला। लगता है कि ये कल की बात है जब बाबूजी बीरगंज (नेपाल) गए थे और पैनासोनिक का टेप रिकॉर्डर लेकर आए थे और अतिउत्साही मेरे भाइयों ने उसमें अपनी आवाज टेप की थी। वो सभी लगातार अपनी ही आवाज पर मोहित होते रहे थे। कितना कुछ बदल गया ? दुनिया करीब आई और इंसान दूर होते गए। वाह ! क्या विज्ञान की खोज है। फिर भी, मैं बोलने वाला कौन हूं? ग्लोब्लाइजेशन है भाई। इससे अलग सोचोगे तो प्रतिक्रियावादी होने का इल्जाम मढ़ दिया जाएगा। पहले ही अंक ज्योतिष पर विश्वास होने का इल्जाम लग चुका है। दंभी होने का भी इल्जाम लग चुका है। अब और इल्जाम नहीं चाहिए।

लेकिन हां, लगातार लिखने की प्रक्रिया जारी रहेगी ताकि सोचता रह सकूं। मेरे ब्लॉग में आप सबका स्वागत है। ब्लॉग लिखूं, अपनी फिल्म का प्रचार न करूं, ऐसा नहीं होगा। एक स्वार्थी अभिनेता की तरह कहूंगा कि 'मनी है तो हनी है' जरुर देखें। मेरी अगली फिल्म 'जुगाड़' दिल्ली में सीलिंग की समस्या से उपजी है। उसे देखना न भूलें।

आपका अपना और सिर्फ अपना

मनोज बाजपेयी with Payee