Saturday, September 27, 2008

अब तो डर लगता है..

कई साल पहले की बात है। मैं पांचवी क्लास में पढ़ता था। अपनी गर्मियों की छुट्टियों में स्कूल के एक टूर पर निकला था - कश्मीर की तरफ़। रास्ते में हम दिल्ली में भी रुके थे। लाल क़िला, क़ुतुब मीनार वगैरह तमाम दिलचस्प जगह हमें दिखायी गईं। क़ुतुब मीनार के नीचे खड़े होकर अलग-अलग दिशा से, अलग-अलग एंगल से फ़ोटो खिंचवाए हमनें। शायद वो फ़ोटोग्राफ आज भी कहीं किसी कोने में रखे होंगे। उस समय ये अंदाज़ भी नहीं था कि इसी के पास कोई बहुत ही शैतानी दिमाग़ एक बम का धमाका करेगा और बिना किसी कारण एक बच्चे की जान ले लेगा। इसी धमाके में कुछ लोगों को जख़्मी कर देगा। अब तो डर लग रहा है। हर उस शख़्स के लिए डर लग रहा है, जो बाज़ार घूमने जाता है। जो स्कूल पढ़ने जाता है। जो सिनेमा देखने जाता है। जो मेला घूमने जाता है। जो भी व्यक्ति भीड़-भाड़ वाले इलाक़े में तफ़रीह करने या ज़रुरी सामान लेने जाता है।

आज हमें भी अपनी जान का ख़तरा लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि शायद मौत अचानक किसी बीमारी से न आकर किसी बम के धमाके के बीच होगी। क्यों मर रहे हैं लोग? क्या कसूर है इनका? जो मार रहे हैं उनके पास कारण क्या है? बहुत समझने की कोशिश की मारने वाले के कारण के बारे में समझने की। लेकिन, मेरी समझ से तो यह परे है। किसी को क्या अधिकार है कि वो मासूमों पर बम फेंकना शुरु करे? आज ज़रुरत इस बात की है कि हम अपनी जान बचाने के लिए सजग रहें। ज़रुरत इस बात की है कि हम जहाँ भी रहें उसकी रखवाली खुद करें। आज आवश्यक हो गया है कि हम सब ही मिलकर इस जंग को लड़ें। क्योंकि लगता तो नहीं है कि कोई और हमारी लड़ाई लड़ने वाला है।

मेरी श्रद्धांजली उस मासूम के लिए और उन सभी के लिए, जिनकी जान महरौली के धमाके में गई। संवेदना उन सभी लोगों के साथ है, जो हताहत हुए हैं।

इस दुःखद हादसे के बाद अचानक लिखने का मन हो बैठा। हाँ, अंत में अपने दोस्त इमदाद को कहना चाहूंगा कि भई उम्र हो गई है, बच्चों की तरह रुठा न करें। और रुठ ही गए हो तो क्षमा चाहूंगा। बहुत साल पहले की बात है। बहुत सारी बातें अब जल्दी याद नहीं आती हैं। आप जहाँ हैं ख़ुश रहें। ऊपर वाले का आशीर्वाद आप पर और आपके परिवार पर बना रहे।

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, September 25, 2008

आराम का आनंद ले रहा हूं मैं

पिछली कुछ पोस्ट पर भेजी आप लोगों की प्रतिक्रियाएं पढ़ीं। आश्चर्य इस बात का है बहुत सारे लोग आज भी धर्म की वजह से एक दूसरे से घृणा भी करते हैं। कोफ्त इसलिए नहीं होती क्योंकि अपनी बात कहने का सभी को अधिकार है। हां,मैंने पिछली पोस्ट या अभी तक ब्लॉग में जो भी लिखा है,वो मेरे विचार हैं। दूसरो का इससे सहमत होना या न होना, आवश्यक नहीं है।

खैर, इन दिनों मैं कुछ खाली हूं क्योंकि बारिश की वजह से फिल्मों की शूटिंग कैंसिल हो गई हैं। एक शूटिंग के सिलसिले में हैदराबाद जाना था,लेकिन वहां भी यूनियन की हड़ताल के चलते शूटिंग रद्द हो गई। वैसे अच्छा है,घर भी जितना ज्यादा वक्त बिताने का मौका मिल जाए, उतना अच्छा है।

वैसे भी मैं थोड़ा आलसी प्रवृत्ति का व्यक्ति हूं। काम कम करना मेरी फितरत रही है। इस बीच,कुछ मीटिंग्स कीं। बहुत स्क्रिप्ट भी पढ़ीं। लेकिन, मज़ा नहीं आया। एक साहब की स्क्रिप्ट अच्छी लगी तो उनके पास प्रोड्यूसर नहीं है। और अब वो एक निर्माता खोजने निकले हैं।

जिन निर्माताओं की फिल्म की शूटिंग रद्द हुई है, समझ नहीं आ रहा कि उनकी डेट से तालमेल कैसे बैठाऊं। इसी ऊहापोह में समय गुजर रहा है। दिल्ली जाने की इच्छा हो रही है,लेकिन लगता है कि यहां जो काम हैं, उन्हें निपटा लिया जाए। बस, उन्हीं कामों को पूरा करने में लगा हूं और सामान सूटकेस से वापस निकालकर अलमारी में ऱखता जा रहा हूं।

अभी, सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि दिल्ली में आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ में हुए शहीद हुए इंस्पेक्टर स्वर्गीय मोहन चंद शर्मा को मेरी तरफ से श्रद्धांजलि। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार को इस कठिन समय में शक्ति दे।

इसी के साथ,
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, September 21, 2008

कैसे रोकें सांप्रदायिक दंगों को

जब से होश संभाला है,तब से सांप्रदायिक दंगे और जात पात के नाम पर हिंसा जीवन का हिस्सा बना पाया है। भले ही एक मूकदर्शक की तरह,लेकिन मैं हमेशा इनके आस पास ही रहा। कंधमाल की जो घटना घटी, और जो कर्नाटक में हो रहा है, वो कहां तक सही है? क्या सरकार की भूमिका कुछ भी नहीं है? अब,क्या जेहाद के नाम पर हम ही निर्णय लेंगे कि किसे मारना है?भगवान के नाम पर हम ही फैसला लेते हैं कि कौन सा धर्म सही है,और कौन सा बुरा। जात-पात के नाम पर हम ही फैसला लेते हैं कि कौन सी जाति बड़ी है,और कौन सी छोटी।

दरअसल, ये बहस कई सौ साल से चलती आ रही हैं और साथ साथ हिंसा उसका दामन पकड़े हुए हैं। ये कौन लोग हैं।किस तरह की सोच रखते हैं। ये कौन हैं जो खुद को खुदा मानते हैं। ये कौन है जो खुद को ही सरकार मानते हैं।

मैंने एक क्रिश्चन मिशनरी स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की। आज मेरा जो भी व्यक्तित्व है, वो या तो उस क्रिश्चन मिशनरी स्कूल का दिया हुआ है या मेरे रंगमंच के निर्देशक और शिक्षक बैरी जॉन का। क्यों नहीं जात पात, धर्म और क्षेत्र मेरे दिमाग में आता है। इसका श्रेय उस स्कूल और बैरी जॉन को दिया जाना चाहिए। साथ ही साथ माता पिता को भी। दिल्ली आने के साथ ही जिस शख्स के साथ मैंने रंगमंच किया और जिसने मुझे मेरे अभिनेता से मेरा परिचय कराया और जिसने मुझे मार्क्स, लेनिन और महात्मा गांधी के दर्शन से अवगत कराया उस व्यक्ति का नाम शमसुल इस्लाम है।

मैं अपने जीवन से इन लोगों के योगदान को कैसे हटा सकता हूं। और जब ऐसी खबरें रोज़ के रोज़ आपको देखने या पढ़ने को मिलती है, तो मेरे जैसा व्यक्ति हतप्रभ होता रहता है। सोचता हूं कि ये कौन लोग हैं,जो दूसरे के विश्वास को छोटा समझते हैं। ये कौन लोग हैं जो दूसरे के भगवान पर हमला करते हैं। ये कौन लोग हैं,जो अपने धर्मग्रंथ के नाम पर हिंसा करते हैं। इनकी मानसिकता कैसी है, इनकी सोच कैसे चलती है। हिन्दुस्तान आगे बढ़ रहा है लेकिन बहुत दुख के साथ कहना पड़ता है कि आधे से ज्यादा हिन्दुस्तान धर्म और जात पात के नाम पर होने वाली हिंसा के चलते बर्बादी की कगार पर भी खड़ा है।

मानव विकास और सामाजिक विकास को अगर पूर्णतया आगे बढ़ाना है तो एसईजेड,मॉल यानी औद्योगिक विकास करते हुए धार्मिक दुर्भाग्य को दूर करना होगा। आज सांप्रदायिक बातों से ज्यादा मुझे शायद ही किसी बात से नफरत हो। जात पात की बातों से ज्यादा किसी चीज़ से मुझे घृणा हो। क्षेत्रववाद की बहस से ज्यादा शायद ही मुझे कोई चीज परेशान करती हो। मैं ये नहीं कहूंगा कि अब समय आ गया है कि उठो। मैं कहूंगा कि अभी नहीं उठे तो फिर कभी नहीं उठेंगे। ये सारी बातें और इन सारी बातों पर हिंसा बंद होनी चाहिए। आज ही।

हम ऐसी सोच रखने वाले व्यक्तियों को सामाजिक रुप से अगल थलग करने कि दिशा में आगे बढ़े क्योंकि ये मानसिकता रखने वाले लोग आपके समझाने के प्रयास को हिंसा से जवाब देते हैं क्योंकि इनके पास अपने कोई तर्क नहीं है। मेरा भगवान मेरे पास है, और मैं नहीं चाहता कि कोई मेरे भगवान की जिम्मेदारी ले। उसकी जिम्मेदारी मैं खुद लेता हूं। हर धर्म के अनुनायियों से मेरी प्रार्थना है कि धर्म को आप अपने तक सीमित रखें। वो आपका विश्वास है। वो आपकी श्रद्धा है। जरुरी नहीं कि वो दूसरी की भी आवश्यकता बने। कृपया अपने धर्म का लाउडस्पीकर लगाकर प्रचार करना बंद करें, और उसकी जगह अपने घर के चारदीवारी के अंदर अपनी आत्मा को जगाएं। भगवान को अपने अंगर महसूस करें। शायद,यही सब कारण हैं कि मैं अपने धर्म, अपने भगवान, अपने विश्वास और श्रद्धा की बातें न दोस्तों से करता हूं न परिवार से करता हूं,न मैं किसी बहस में शामिल होता हूं। मेरा भगवान मेरा है,और वो मेरे अंदर है। एक बार फिर शांति की अपील के साथ-

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, September 14, 2008

कब रुकेगा ये सिलसिला

कब खत्म होगा मौत का ये वहशीपना। हर दिन कोई न कोई हादसे का शिकार हो रहा है। आतंकवाद के नाम पर उन मासूम लोगों की जान ली जा रही है, जो अपने छोटे से जीवन में बड़ी-बड़ी परेशानियों से जूझते हुए जिंदंगी जी रहे हैं। वैसे, आतंकवादी हमलों का सिलसिला इस हिन्दुस्तान में कई साल से चल रहा है। रोक लगती हुई दिख नहीं रही है। कौन रोके इसे? किसे रोकना चाहिए। क्योंकि, जो ज़िम्मेदार तंत्र है, उसके पास अपनी खुफिया तंत्रों के बारे में भी कोई राय नहीं है। न वो कोई जिम्मेदारी लेना चाहता है। लेकिन क्या सरकार इस रोग को रोक पाएगी। अगर नहीं तो फिर कौन?

आदमी बाढ़, बिजली, भूख, सांप्रदायिक दंगे, क्षेत्रवाद के नाम पर हिंसा आदि से तो मारा जा ही रहा है, साथ ही साथ वो ऐसे आतंकवादी हादसों का भी शिकार हो रहा है, जिससे उसका दूर दूर तक लेना देना नहीं है। आतंकवादी आम लोगों की जिंदगी लेकर साबित क्या करना चाह रहे हैं। ये कौन सा युद्ध है। या कौन सा जेहाद है। जिसमें बिना कारण गाजर-मूली की तरह लोगों को काट रहे हैं, मार रहे हैं। लोग मर रहे हैं और हम सब देख रहे हैं। सिर्फ टीवी पर। अब, ये समय आ चुका है कि आम जनता अपने अपने सरकारों पर दबाव डाले और उनको जिम्मेदारी लेने पर मजबूर करें। अब समय आ चुका है कि हम सबको जवाब मिले,उत्तर मिले। वैसे,समय ये भी है कि अब हम खुद अपनी जिम्मेदारी लें।

हालांकि,100 करोड़ की आबादी होने का मतलब ये नहीं कि हम लोग घास-फूस हैं। मैं हर हर मृत व्यक्ति के परिवार के शोक मे शामिल हूं। मेरा दिल भी रो रहा है। हर जख्मी हुए व्यक्ति के लिए प्रार्थना करता हूं। और ये भी प्रार्थना करता हूं कि अब कोई आतंकवाद क्षेत्रवाद,भूख, बाढ़ और सूखे से न मरे। लोग दुनिया छोड़ें तो अपना जीवन चक्र पूरा करके। मेरी संवेदनाएं आतंकवाद के शिकार हर परिवार के साथ हैं। आइए, हम सब उन सारे परिवारों के लिए दुआएं करें।

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

फिर आई गांव की याद

विश्वास कीजिए श्री वर्मा के बारे में मैंने कोई भड़ास नहीं निकाली है। ये सिर्फ उनके ब्लॉग पर लिखी कुछ गलत जानकारियों का उत्तर था। ये जारी रहेगा, अगर कोई मेरे व्यक्तित्व के बारे में गलत बात लिखेगा या कहेगा। एक प्रजातांत्रिक देश में किसी को कुछ कहने का अधिकार है, तो दूसरे को उसका उत्तर देने का अधिकार भी होना चाहिए। खैर जो बीत गई सो बात गई।

मैं लोनावला में अपने निर्माता निर्देशक दोस्त संजय गुप्ता के घर आया हूं। यहां पर मेरी पत्नी शबाना रजा और आने वाली फिल्म के निर्देशक-दोस्त राजीव वीरानी भी मेरे साथ हैं। बाहर बारिश हो रही है। हम कुछ देर पहले ही यहां पहुंचे हैं। राजीव वीरानी की फिल्म की पटकथा के ऊपर भी यहां बहुत सारी बातचीत हुई।

मुंबई से 200 किलोमीटर दूर, समुद्र तल से 4000 फीट की ऊंचाई पर मुंबई कुछ अंजाना सा लगना शुरु हो जाता है। आचानक गांव की भी याद आ जाती है। और मनोज बाजपेयी के दो टुकड़े हो जाते हैं। एक टुकडा कहता है कि मुंबई में रहो तो दूसरा कहता है कि गांव चलो।
शांत, हरी-भरी वादियों और पहाड़ों का ये जादू ही अलग है। ये आपको इस हद तक सम्मोहित करता है कि आपके अंदर तक एक द्वंद छिड़ जाता है। आपका एक हिस्सा उन सारी चीजों को त्यागने के लिए मजबूर करता महसूस होता है, जिसके लिए आपने पूरा जीवन लगा दिया। मैं अभिनय की बात कर रहा हूं। और अभिनय करने के लिए बड़े शहर में रहने की बात कर रहा हूं।

वैसे,यहां आने से पहले शुक्रवार को एक कार्यक्रम में गया था। ये रामायण एनिमेशन फिल्म के लांच के मौके पर आयोजित था। मैंने इसमें श्रीराम जी के चरित्र को आवाज दी है। जूही चावला ने सीता और आशुतोष राणा ने रावण के चरित्र को अपनी-अपनी आवाजें दी हैं। मेरा मानना है कि यह रामायण एनिमेशन फिल्मों में एक नए दौर की शुरुआत करेगा। आजकल एनिमेशन फिल्मों में एक अलग तरह की क्रांति आ रही है। तकनीकी तौर पर हम पश्चिमी फिल्मों की दुनिया के बराबर में खड़े हैं। एनिमेशन फिल्म बनाने वालों की कमी जरुर है,लेकिन आने वाले साल में इस कमी का अहसास भी नहीं होगा।

गांव की याद और रामायण का कार्यक्रम की घटनाओं ने बचपन की याद भी दिला दी। मेरे गांव के घर के मंदिर में रोज सुबह दादा जी का रामायण का पाठ और उनसे रामायण की घटनाओं के बारे में सुनना याद आ गया। सच में अपने जगह की बात ही अलग है। सही कहा गया है कि तुम व्यक्ति को गांव से निकाल सकते हो पर गांव को व्यक्ति के अंदर से नहीं।

इसी के साथ

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, September 11, 2008

रामगोपाल वर्मा और मैं

मैंने अपनी पिछली एक पोस्ट में लिखा था, कि मैं रामगोपाल वर्मा के बारे में बात करुंगा, जिन्होंने अपने ब्लॉग पर मेरे बारे में बहुत कुछ गलत लिखा है।

मेरा उनसे गहरा नाता रहा है। मेरी फिल्म 'बैंडिट क्वीन' और 'तमन्ना' देखने के बाद उन्होंने मुझे 'सत्या' में काम दिया था। बीच में 'दौड' की शूटिंग चल रही थी,तो उसमे भी एक छोटी सी भूमिका दे दी थी। उनके साथ व्यवसायिक संबंध अच्छा रहा। रचनात्मक संबंध के बारे में ज्यादा कुछ कह नहीं पाऊंगा क्योंकि मेरी ज्यादातर रचनात्मक बातें अनुराग कश्यप या सौरभ शुक्ला से ही हुआ करती थी।

उन्होंने अपने ब्लॉग पर लिखा है कि जब लोग सत्या के बाद मेरे करेक्टर(भीखू म्हात्रे) का नाम लेकर बड़े समारोह में मुझे पुकारते थे,तो मैं रोमांचित हो जाता था क्योंकि वहां बड़े स्टार भी मौजूद होते थे,और लोग मुझे पुकारते थे न कि स्टार्स को। मेरा रामगोपाल वर्मा से मतभेद यही रहा है कि वो झूठ बोलते रहे हैं। उन्होंने अपने पूरे जीवन को ही झूठ पर आधारित कर रखा है।

सत्या की सफलता से मैं खुश था कि आखिरकार मुझे चुनाव का मौका मिला। मैं खुश था कि अपने लिए शायद एक छत मुझे मिल जाएगी। और सारे मतभेदों के बावजूद मैं उनका शुक्रगुजार था। मैं मुंबई में एक अभिनेता बनने आया था, जो अभिनय से अपनी रोजी रोटी चला सके, अपना परिवार चला सके और अपने जुनून को भी पूरा कर सके। मैं यहां किसी से प्रतियोगिता करने नहीं आया था। मुझे जो भी मिला मेरे सपने से ज्यादा मिला है।

हमारे वर्मा साहब की दिक्कत रही है कि वो एक ऐसा अभिनेता मनोज बाजपेयी चाहते थे,जो 24 घंटे उनके तलवे चाट सके। जिसका अपना कोई वजूद न हो। आज मैं सर झुकाकर सिर्फ यही कहना चाहूंगा कि वर्मा जी झूठ बोलकर मुझे बदनाम करना छोड़िए। हमारा और आपका रचनात्मक और व्यवसायिक संबंध खत्म हो चुका है। भावनात्मक तो कभी था नहीं। अगर आपको मेरी बहुत याद आती है तो एकाध फोटो पड़े होंगे, अपने सिराहने रख लीजिए और रोज सुबह देख लिया कीजिए। लेकिन झूठ बोलना छोड़िए।

वैसे, मैं जानता हूं कि आप छोडेंगे नहीं क्योंकि आपका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। में सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि सत्या की सफलता की उम्मीद न आपको थी, न मुझे थी। हमने अपनी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभायी थी। आपने एक निर्देशक के तौर पर और मैंने एक अभिनेता के तौर पर।

किसी का किसी पर कुछ उधार नहीं है। एक नजर में फिर भी अहसानमंद हूं। लेकिन आप मेरी भावनाओं की कद्र करना सीखिए। पर, मैं ये कह किसे रहा हूं। उसे, जो इस दुनिया के सारे संबंध-सारे नियम चाहे वो पति पत्नी के हों, या भाई बहन के हों, या किसी भी तरह के भावनात्मक संबंध, उन्हें मानने से इंकार करता है।

वैसे,पिछले नौ साल में मैंने कोशिश यही की थी कि संबंध बिगड़ न पाए या हम उस सुर से अलग न हों, जो सुनने में बेसुरा लगता है। सच बात ये है कि आर्थिक रुप से आपसे ज्यादा न मिला, और आपने जितनी फिल्मों में काम दिया, उससे कहीं ज्यादा फिल्मों में कास्ट कर निकाला भी, लेकिन फिर भी मैं आपका शुक्रगुजार हूं। अंत में सिर्फ इतना कहूंगा कि जो आपसे पाया, उसके लिए धन्यवाद। भगवान आपको शांति और खुशी दे।

दरअसल, मैं चाह रहा था कि मन की बात लोगों तक पहुंचे,तो आज कह डालीं। बहुत सारी बातें हैं, जो आज तक किसी को नहीं बतायी लेकिन वो बातें तभी होंगी, जब श्री वर्मा अपनी करतूत से बाज नहीं आएंगे। इज्जत करता हूं उनकी, पर इसका मतलब ये नहीं है कि बंधुआ मजदूर हूं। खैर, मन हल्का हो गया....आज इतना ही...

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Friday, September 5, 2008

बप्पा मोरया...

कल घर वापस जल्दी आया। शाम के छः बजे तक। लैपटॉप को गोद में रखकर पिछली ब्लॉग पोस्ट पर आयी प्रतिक्रियाओं को पढ़ा तो समझ आ गया कि बाढ़ के दृश्य देखकर सारे दोस्त और प्रशंसक भाव विह्लल हुए हैं। सारी प्रतिक्रियाएँ पढ़ी ही थीं कि बाहर ढोल-नगाड़े की आवाज़ सुनायी दी। इससे अहसास हुआ कि गणपति किसी-किसी घर में एक दिन पधारने के बाद विसर्जन के लिए जा रहे हैं।

दरअसल, ये ढोल-नगाड़े, बैंड-बाजे साल के इस महीने में बड़ा सुख देते हैं। एक अजीब तरीक़े का हर्षोल्लास हवा में होता है। मुंबईवासियों में गणपतिदर्शन की होड़ होती है। इस बीच, फ़ोन आया कि इस बार दिल्ली में मेरी माँ ने भी तीन दिन के गणपति बैठाने की ठानी है। मेरी माँ का कुछ ऐसा ही रहा है। वो मन्नत मांगती रहती हैं और उसी बहाने भक्तिभाव में डूबी रहती हैं। मुझे फ़ोन करके गणपति को लाने, रखने और उसकी बारीक पूजा-क्रिया की विधि बारे में भी पूछ रहीं थीं। गणपति को लाना और विसर्जन करना महाराष्ट्र की संस्कृति से जुड़ा हुआ है, जिससे वो पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं।

वैसे, पूजा का विधि-विधान ज़्यादा मुझे भी नहीं मालूम। मैं तो अगरबत्ती लगाकर सामान्य पूजा करने में यक़ीन करता हूँ। ख़ैर, कहीं-न-कहीं ये सारे पर्व आदमी को आदमी से जोड़ते हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। कभी-कभी सोच कर हैरानी होती है कि इस महीने के बाद सिर्फ़ पर्व और उत्सव का ही वक़्त शुरु होता है, जो साल के अंत तक चलता है। फिर वो किसी भी धर्म का क्यों न हों। चाहे वो गणपति हो, रमज़ान, दीवाली, छठ, दशहरा हो या फिर क्रिसमस क्यों न हों।

ऐसा लगता है कि सारे धर्म एक साथ ईश्वर को याद करते हुए साल की विदाई करते हैं। सभी पर्व में भगवान से दुआ करते हैं। मैं भी दुआ करुंगा गणपति से कि बिहार में बाढ़ से उपजी समस्या से लोगों को जल्द छुटकारा मिले।
ईश्वर उन्हें संकट से उबरने की शक्ति दे। उन्हें सुख समृद्धि मिले। देश में शांति का वातावरण बने और धर्म के नाम पर लड़ाई न हो। हम सभी भाईचारे की डोर में बंधे रहें।

इसी के साथ बोलिए गणपति बप्पा मोरया...

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, September 2, 2008

बिहार की बाढ़ से हारना नहीं है

पिछले दिनों प्रकाश झा जी से मुलाकात हुई। इस बातचीत में हमनें यही समझ पाया कि हम टेलीविजन के जरिए या निजी संपर्कों के जरिए लोगों को उत्साहित करें कि जिस संस्था को भी वो उचित समझें, उसके जरिए बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए दान करें। बहुत सारे टेलीविजन चैनलों से मेरी बात चल रही है, जो जमीनी स्तर पर वहां पर खड़े हैं और लोगों तक खबर पहुंचा रहे हैं।

वैसे, मेरा मानना है कि जरुरत इस बात की है कि लोगों को उत्साहित किया जाए कि वो अपने-अपने स्तर पर जो भी योगदान हो सके वो करें। इतना ही नहीं, बिहार की इस आपदा को एक राज्य की आपदा न मानते हुए राष्ट्रीय आपदा माना जाए। जहां आपकी कुल आबादी के करीब 25 लाख लोग प्राकृतिक विपदा को झेल रहे हैं और न जाने कितने ही अपनी जान गंवा बैठे हैं, उसे सिर्फ एक इलाके से जोड़कर देखना ठीक नहीं है।

कोसी नदी या कोई भी पहाड़ी नदी, जो उत्तर के पहाड़ से निकलर बिहार में प्रवेश करती है, उसका कहर और उसके किस्से मैं बचपन से सुनता आ रहा हूं। आश्चर्य इस बात का है कि हम सब देखते रह गए और पानी घुस आया। इसका मतलब ये है कि इतने साल में उन सारे बांधों पर कोई काम नहीं हुआ है। कब तक गरीब इसी तरह से अपनी जान गंवाते रहेंगे। कब तक हम सिर्फ शहर को ही हिन्दुस्तान मानते रहेंगे। सवाल इस बात का है।

वैसे, आज सेना की टुकड़ी पहुंच चुकी है। वायुसेना पहुंच चुकी है। जमीनी स्तर पर कई राहत कैंप लगाए जा चुके हैं। लेकिऩ, अभी भी इसे राष्ट्रीय समस्या की संज्ञा नहीं दी गई। मुझे आश्चर्य इस बात का है।

जब सुनामी आता है, तब भी मेरा दिल रोता है। उन सारे लोगों के लिए जो इससे प्राभवित होते हैं। आज कोसी ने कहर ढाया है, तो भी बहुत परेशानी हो रही है। लेकिन, सवाल ये है कि क्या इंसान की कीमत कुछ नहीं रह गई। सवाल ये है कि विकास की दर को किस तराजू पर मांपा जाए। व्यक्तिगत तौर पर जो मैं कर रहा हूं, वो व्यक्तिगत है, उसके लिए ढोल पीटने की जरुरत नहीं समझता। मेरा लोगों से भी निवेदन है कि बिना नगाड़े बजाए हुए अपनी अपनी तरफ से कुछ योगदान जरुर करें।

ब्लॉग पर अपने दर्शकों अपने पाठकों से अपनी संवेदना को बांटना, टेलीविजन और अखबारों के जरिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाना या फिर निजी अनुदान देना या फिर व्यक्तिगत तौर पर लोगों को उत्साहित करना कि वो समस्या के साथ जुड़े-ये भी राहत के बहुत काम आ सकता है। हम सब अपने अपने लोगों को उत्साहित करें, अपने- अपने लोगों को इस राहत कार्य से जुड़ने के लिए प्रेरित करें- यही आज के समय की आवश्यकता है।

मैंने कल भी एक टेलीविजन चैनल पर कहा था कि सबसे पहले तो लोगों को बाहर निकाला जाए, और सुना है कि वायुसेना के कुछ जवान वहां पहुंच चुके हैं, जो इस काम में दक्ष हैं। बस, निवेदन उन लोगों से है जो ऊपर के ओहदे पर बैठे हुए हैं। आपसे हाथ जोड़कर विनती हैं कि अब इस समस्या का निदान खोजिए। और न सिर्फ बांधों की मरम्मत की जाए, नेपाल से संधि को मजबूत किया जाए, ऐसी विपदा के वक्त वैकल्पिक व्यवस्था बनायी जाए और प्राकृतिक विपदा आने के संकेत देने वाली जितनी भी मशीन हैं, उन्हें कार्यान्वित किया जाए ताकि हिन्दुस्तान का व्यक्ति इस देश में खुद को सुरक्षित महसूस कर सके। वो ये सोचकर आश्वस्त हो सके उसकी रक्षा करने वाले लोग जिम्मेदार हैं और उसका भला चाहते हैं।

अभी समय नहीं है लेकिन आगे मैं उस व्यक्ति के बारे में जरुर लिखना चाहूंगा, जिसने अपने ब्लॉग पर मेरे बारे में कई गलत बाते लिखी हैं। उसका जवाब देना मैं उचित समझूंगा। निसंदेह उस व्यक्ति का मेरे जीवन से बड़ा गहरा नाता रहा है और उसका नाम है राम गोपाल वर्मा।

फिलहाल इतना हीं,

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी