Monday, October 13, 2008

क्रिकेट और मैं

क्रिकेट का बुखार शुरु हो चुका है। अब ये उतरने का नाम नहीं लेगा, जब तक सीजन खत्म न हो जाए। और तब तक मेरी पत्नी मुझसे चिड़ती- नाराज होती घर में घूमेंगी क्योंकि उन्हें ये खेल बिलुकल पसंद नहीं है। इस खेल,जिमें गतिविधि के नाम पर एक बॉल डाल रहा होता है और एक बल्ला लिए गेंद को मारने की कोशिश कर रहा होता है,उसके रोमांच को मैं तमाम तर्कों के बावजूद समझा नहीं पाया। लेकिन,इन दिनों उनमें एक अजीब बदलाव देख रहा हूं। कभी-कभी जब मैं मैच देखता हूं तो कुछ रुचि दिखती है उनके चेहरे पर। भगवान से यही दुआ करता हूं कि कभी कभी की ये रुचि ठोस भाव ले ले। वैसे, उन्हें फुटबॉल के अलावा कोई भी खेल समझ नहीं आता। वो अपनी जगह सही हैं।

11 तारीख को सुबह श्री अमिताभ बच्चन जी को उनके जन्मदिन पर बधाई संदेश भेजा। पर दोपहर तक पता चला कि वो हॉस्पीटल में हैं। अपनी आंत की समस्या के कारण। मेरी उन्हें जन्मदिन पर हार्दिक बधाई। साथ यह कामना कि वो जल्द स्वस्थ होकर लौट आएं।

आजकल मुंबई के सारे काम निपटा रहा हूं। क्योंकि लगभग एक महीने के लिए तीन चार दिनों में विदेश जाना होगा। एसिड़ फैक्ट्री की शूटिंग के लिए। बारिश के कारण इस फिल्म की शूटिंग मे कुछ रुकावट आ गई थी। एक शिड्यूल खत्म कर चुके थे हम तीन ङफ्ते पहले और अब अंतिम शिड्यूल पूरा करने जा रहे हैं।

बहुत खुशी है कि यूनिट के सारे दोस्त दोस्तों और साथी कलाकारों से फिर मिलना है। अभी भी प्रोडक्शन हाउस से कैपटाउन के मौसम की जानकारी ली है ताकि उसी हिसाब से कपडे ले जा सकूं। अपने सचिव श्री त्रिपाठी से बाकी फिल्मों और उनकी तारीखों के बारे में जानकारी लेकर यह पोस्ट लिखने बैठा। मुंबई की ऊमस ने बड़ा परेशान कर रखा है। इतना कि कुछ करने का मन नहीं करता। एक खीज सी रहती है। लेकिन फिर भी काम में लगे रहना पड़ता है। और काम है कि जिसे छोड़ने का मन नहीं करता। लेकिन अंतत: अगर मौसम भी साथ दे तो काम करने का मजा भी दोगुना हो जाए।

खैर,फिर बात क्रिकेट की। आशा करता हूं कि दूसरी पारी में सहवाग का बल्ला चलेगा और इंडिया टेस्ट मैच जीतेगी। तेंदुलकर वैसे मेरे चहेते हैं लेकिन उनकी ऊहापोह की स्थिति देखकर बहुत दुख होता है।

टेस्ट में जीतने की आशा के साथ ये भी आशा करता हूं कि एक या दो दिन में श्री अमिताभ बच्चन स्वस्थ होकर अपने घर लौट आएंगे। उनसे एक कार्मिक रिश्ता है, जो हमेशा चाहता रहेगा कि वो सदा सुखी और स्वस्थ रहें और हमें अपना आशीर्वाद देते रहें।

इसी के साथ आपका और आपका
मनोज बाजपेयी।

Monday, October 6, 2008

क्यों रोज़ सवालों के घेरे में आता है हमारा प्रजातंत्र?

वैसे तो मन बिलकुल नहीं कर रहा कुछ भी लिखने का। दरअसल, कभी-कभी लगता है कि अपने बारे में क्या लिखना। ऐसा कुछ भी तो नहीं है, जो दूसरों से अलग हो। दिनचर्या भी वही, दिनचर्या की नियति भी वही। सुबह काम पर जाना, वापस आना और सो जाना। वैसे, सपने देखना कभी नही छोड़ता - एक आदर्श देश, आदर्श परिवार और आदर्श व्यक्तिगत जीवन के। निजी जीवन और परिवार में कभी-कभी वो हासिल कर भी पाता है आदमी, लेकिन समाज और देश में तो करोड़ो लोग हैं और करोड़ों के मन का मिलना मुश्किल ही नहीं, कभी-कभी असंभव भी लगता है।

टीवी पर एक बहस देख कर उठा हूँ। थोड़ा झुंझलाया और थोड़ा निराश हूँ। एक तरफ़ जामिया नगर में एनकाउंटर का राजनीतिकरण और दूसरी तरफ़ कंधमाल में बलात्कार और हिंसा की घटनाओं के बाद उठती हुई राजनीति की बू। घिन आने लगी है उन चेहरों से भी, जो इस तरह की प्रकिया में लीन हैं। ग़ुस्सा आता है कभी-कभी अपने होने पर भी, और इन सबका परिणाम है आज की पोस्ट। लिखने का मन नहीं था तो सोचा कि भड़ास ही निकाल लूँ।

हिंसा, बलात्कार और शोषण को आप किसी भी तर्क से दबा नहीं सकते। न सही ठहरा सकते हैं। जो समुदाय या व्यक्ति हिंसा करता है, उसे उसी वक़्त सज़ा देने का प्रावधान भी होना चाहिए। लेकिन ऐसा न होने से लगातार प्रजातंत्र का मखौल उड़ाया जाता है। आज देश एक होते हुए भी बँट गया है। हिंसा के कारणों से, भाषा के कारणों से, जात-पात के कारणों से। लेकिन फिर भी हम हैं कि सिर्फ़ काम पर जाते हैं, आते हैं और सो जाते हैं। लेकिन कहीं-न-कहीं कुछ लोग हैं, जो आपको विश्वास दिलाते हैं कि सब सही होगा। उन लोगों के होने के कारण शायद एक आशा बंधी हुई है। प्रजातंत्र पहले कभी-कभी सवालों के घेरे में आता था, आज हर दिन सवालों के घेरे में खड़ा होता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम सब पहले अपने आप को मानव समुदाय का मानकर और देश का नागरिक मानकर एक क़दम चलने की कोशिश करें। धर्म, क्षेत्र, भाषा - इन सबकों थोड़ा किनारे करें। मानव जाति और देश को सर्वप्रथम रखें। ख़ैर, भड़ास निकालनी थी सो निकाल दी। इसी के साथ -

आपका और सिर्फ़ आपका

मनोज बाजपेयी

Wednesday, October 1, 2008

कैसा दुःखद आरंभ नवरात्र का

जब अपने बस में कुछ नहीं रह जाता, तब व्यक्ति सरकार और तंत्र पर भरोसा जताता है। सरकार और तंत्र ही असफल हो जाएँ तो भगवान के दर पर जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। लेकिन, जब भगवान ही रखवाली न कर पाएँ तो किसके दर पर जाएँ? इच्छा थी कि इस बार कुछ और विषयों पर लिखूँ, लेकिन जोधपुर के चामुंडादेवी मंदिर के हादसे के एक-एक दृश्य ने मुझे झकझोर कर रख दिया। कुछ ऐसी ही छोटी-सी घटना इलाहाबाद के एक मंदिर में भी हुई। फिर मालेगांव और साबरकांठा में एक दिन पहले ब्लास्ट भी हुआ। जान-माल की क्षति अगर गिनने जाएँ तो जिह्वा थक-हार जाए, पर मरने वालों की गिनती न पूरी हो सके। कैसा दुःखद आरंभ नवरात्रि का। मैं पूरी तरह से हिला हुआ हूँ। मेरी तरफ़ से सभी मृतकों को भावभीनी श्रद्धांजलि। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिजनों को दुःख के इस क्षण में शक्ति दे।

अब तो ऐसा लग रहा है कि व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। 120 करोड़ लोगों का विश्वास टूटता जा रहा है। पहले वो भरे बाज़ार में सुरक्षित नहीं थे, अब वो भगवान के दरबार में भी सुरक्षित नहीं हैं। सबने इनको बेसहारा छोड़ दिया है। कहीं परमाणु संधि वार्ता सफल होने की ख़ुशी मनायी जा रही है, कहीं पर कई सारे घरों में इस साल दीवाली के दीए नहीं जलाए जाएंगे। नैना देवी, चामुंडा देवी, बिहार की बाढ़, बम ब्लास्ट जैसे तमाम हादसों के बाद इस बार कम-से-कम मैं तो घर में दीवाली नहीं मना पाऊंगा। दीवाली नहीं मनाना, मारे गए लोगों के प्रति संवेदना जताने की वजह से, और कहीं-न-कहीं विरोध में भी। दरअसल, अब समय आ चुका है कि हम करोड़ों लोगों की अपेक्षा पर तंत्र खरा उतरे।

मैं एक कलाकार हूँ। अपनी कला के प्रति पूरा समर्पण है। लेकिन इस समाज में रहते हुए मेरा कर्तव्य है कि मेरे साथ इस समाज में जो भी लोग रह रहे हैं, उनकी सुख और भलाई के लिए कुछ न सही तो अपने ब्लॉग पर ही अपनी बात रख सकूँ। अपना विरोध जता सकूँ।

उफ़... कैसा रहा ये साल! कैसे कोई उत्सव मनाए! किसी पत्रकार मित्र से मैंने कहा कि ब्लॉग से एक बात अच्छी हुई कि मैं अपने दिल की बात कह सकता हूँ। अपनी भड़ास निकाल सकता हूँ। उन्होंने कहा कि ये आपकी भड़ास नहीं, आपकी चिंता ज़्यादा नज़र आ रही है। लेकिन शायद चिंता भी एक भड़ास के रुप में बाहर आना आवश्यक है। मैंने हमेशा यह माना है कि हम अमेरिका के अभिनेता नहीं है, जो अपने आप को देश के मौजूदा हालात से अलग रख पाएँ। हम ऐसा कर ही नहीं सकते। हमारा देश अभी ग़रीब देश की संज्ञा से उबर ही रहा है। कुछ न सही तो किसी-न-किसी माध्यम से मौजूदा भ्रष्टाचार, महंगाई, ग़रीबी के ख़िलाफ़ आवाज़ तो उठा ही सकते हैं। और कुछ नहीं तो ऐसा करके लगता है कि मैं अपने होने के साथ न्याय कर रहा हूँ। पता नहीं कितने लोग मेरी बात से सहमत होंगे क्योंकि जो हालात हैं, अभी वहाँ पर Escapism ही सफलता का मूल मंत्र है। अगर है तो फिर यही सही। कौन घर से बंगला निकालने निकला था। आज अगर एक अभिनेता के तौर पर अपने मन का काम कर लेता हूँ, और अपने घर को अच्छी तरह चला लेता हूँ तो यही बहुत है। मैंने हमेशा माना कि मैंने अपने सपने से ज़्यादा ही पाया। अभिनय छोड़ नहीं सकता। ये मेरा ऑक्सीजन है। लेकिन, ब्लॉग पर अपनी चिंता को लोगों के साथ बाँट तो सकता ही हूँ। और अपनी चिंता की भड़ास तो निकाल ही सकता हूँ।

आज की पोस्ट ख़त्म करने से पहले सिर्फ़ इतना कहना चाहूंगा कि शाम को बहुत सारे चैनलों पर मैं चामुण्डादेवी की त्रासदी के बारे में कुछ और जानना चाह रहा था, लेकिन 95 प्रतिशत चैनल पर सिर्फ़ कॉमेडी से जुड़े कार्यक्रम ही दिखाए जा रहे थे। अब तो इन 185 लोगों का मरना भी कोई समाचार नहीं बना सकता। वाह रे टीआरपी, वाह रे बॉक्स ऑफ़िस।

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी