Saturday, December 27, 2008

सैर-सपाटा,काम और मेज़बानी के बीच फिर पुराने ढर्रे पर

डेढ़ महीने काफ़ी हलचल रही। पहले 'एसिड फ़ैक्ट्री' की शूटिंग के लिए मुझे केपटाउन जाना पड़ा। फिर पंद्रह-बीस दिनों के लिए क्वालालंपुर मलेशिया जाना हुआ, एक अपने तेलुगु निर्देशक मित्र सूर्या के लिए। सूर्या चाहते थे कि मैं उनकी निर्देशित तेलुगु फ़िल्म का हिस्सा बनूँ। उनकी ज़िद बहुत थी, लिहाज़ा इस ऑफ़र को स्वीकार कर लिया। केपटाउन के दिन बहुत ही अच्छे कटे। एक महीने तक सिर्फ़ एक्शन दृश्य ही फ़िल्माने थे। जिसमें दिमाग़ की ज़्यादा माथा-पच्ची करनी नहीं थी। हाँ, शरीर ज़रुर थक जाता था। लेकिन हमारे निर्माता संजय गुप्ता बहुत अच्छे मेज़बान माने जाते हैं। उन्होंने हर रात पार्टी रखी। हर रात हमें कहीं खिलाने-पिलाने ले गए। इससे दिन अच्छे कटते रहे। साथ में मेरी पत्नी भी थीं, तो खाली समय में हम केपटाउन घूमने निकल जाते। हमने जीवन में पहली बार मेल मछलियों का झुंड देखा। डॉल्फ़िन के झुंड को तेज़ी से समुन्दर पार करते हुए देखा। केपपाउंड भी गए, जहाँ आर्कटिक और इंडियन ओशन मिलते हैं। ख़ैर, शूटिंग के साथ-साथ सैर-सपाटा भी खूब हुआ। मेरी पत्नी को बहुत शौक़ है कि गली-कूचे में जाकर सामान ख़रीदा जाए ताकि इसी बहाने उस जगह की संस्कृति से भी परिचित हो सकें। वो महंगी जगहों पर सामान ख़रीदना पसंद नहीं करतीं। दाम भी ज़्यादा होते हैं और सारा माहौल अमेरिका सरीख़ा ही होता है। जैसे कि हमारे मॉल बन गए हैं। शूटिंग नहीं कर रहा होता था तो केपटाउन की गली-गली भटकता रहा। कभी बहुत थक जाता था तो कभी बहुत मज़ा आता था। ख़ैर, दिन कटे लेकिन इसके साथ मुझे अपने मोबाइल फ़ोन के खो जाने और उसमें स्टोर 400 से ज़्यादा नंबरों के खो जाने का बहुत ग़म है। बहुत ही दोस्ताना तरीक़े से हमने अपनी शूटिंग का एक महीने पूरा किया। फिर, मुंबई में दो दिन रुककर कुछ सामान छोड़ा, कुछ लिया और मलेशिया के लिए निकल गए।

साउथ इंडियन फ़िल्म की यूनिट सुबह सात बजे से लेकर शाम सात बजे तक शूटिंग करती हैं। ऊपर से भाषा की परेशानी। एक प्रॉम्प्टर रखकर काम चलाना पड़ता था। और वो प्रॉम्प्टर उस सैट पर मेरे लिए भगवान से कम नहीं था। मैं काफ़ी व्यस्त रहा। लेकिन मेरी पत्नी आदतन क्वालालंपुर की गलियों में जाकर वहाँ की अपनी संस्कृति से ख़ुद को परिचित कराती रहीं और अपनी शॉपिंग भी करती रहीं।

केपटाउन में अलग-अलग रेस्तराँ में खाना खाया। कभी घर के खाने की याद नहीं आयी, लेकिन क्वालालंपुर के खाने में एक तरीक़े की महक से हम दोनों ही बहुत परेशान हो गए। इस कारण खाना वापस अपने पांच सितारा होटल में ही खाना पड़ा। सूप और ब्रेड बटर खाकर ही दिन गुज़ारने पड़े। मैं उनके खाने को बुरा नहीं कहना चाहूँगा क्योंकि हर देश के खाने का अपना स्वाद होता है। चूँकि हम उससे परिचित नहीं हैं, न आदी है इसलिए शायद हमें बहुत मुश्किल हुई।

ख़ैर, वहाँ की शूटिंग ख़त्म करके वापस आया तो मेरी पत्नी की बहन अमेरिका से अपनी नवजात बच्ची को लेकर आईं। दिल्ली से मेरे सास-ससुर का आना हुआ। हम दोनों पति-पत्नी उनकी मेज़बानी में लगे रहे। अपने घर में हम दोनों अकेले ही रहते तो अचानक एक छोटी बच्ची के आने से और दो-तीन मेहमानों के होने से एक महीना कैसे कटा, पता ही नहीं चला। अब सब जा चुके हैं और फिर हम अपनी दिनचर्या में व्यस्त हैं। कमी सिर्फ़ इतनी है कि उस नवजात बच्ची की किलकारी घर में गूंज नहीं रही है। उस बच्ची का नाम ज़ोया है। और अब हम दोनों उसे बहुत 'मिस' कर रहे हैं। भगवान उसे लंबी उम्र दे और सुखी रखे।

ख़ैर, ये तो मेरी बात हुई। लेकिन जो कुछ भी मुंबई में, देश में हो रहा है, वो काफ़ी चिंताजनक है। वापस देश और समाज के बारे में आपसे अपने विचार बाँटूंगा। अगली पोस्ट में।

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Monday, December 15, 2008

क्या इस बार सबक लेंगे!

लगता है कि इस बार भी हम सबक नहीं ले पाएंगे। लोग मरते जा रहे हैं, अपनों से बिछड़ते जा रहे हैं। फिर भी हम कुछ सीख नहीं पा रहे हैं। अब भी हम पाकिस्तान के साथ तू तू मैं मैं की राजनीति में लगे हुए हैं। चाहे वो सरकार हो, चाहे वो मीडिया हो या चाहे जो भी जिम्मेदार लोग हों, हर कोई युद्ध और युद्ध की राजनीति की बातें कर रहा है। सवाल ये है कि खुद को बचाने के लिए हम क्या कर रहे हैं? हम अपने आपको सुरक्षित रख पाएं, अपने लोगों पर आंच न आने पाए,इसका कोई उपाय करें, उससे ज्यादा जरुरी कई नेताओं को ये लग रहा है कि वो कैसे टीवी चैनलों पर जाकर बहस में हिस्सा लें। और ये बता पाएं कि कैसे उसकी पार्टी या उनकी सरकार का इससे कोई लेना देना नहीं है।

मेरा अपना मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जितना दबाव बना सकते हैं,पाकिस्तान पर, वो बनाया जाए ताकि पाक में जो भी आतंकी ट्रैनिंग कैंप है,वो खत्म हो। बजाय इसके कि उनके साथ सारे सांस्कृतिक संबंध भी तोड़ लिए जाएं। दबाव बनाने में परहेज नहीं है, और न ही उसको ढीला करना चाहिए। और जहां तक आंतरिक सुरक्षा की बात है तो उस पर हमेशा से सवालिया निशान रहा है और उसे मजबूत करने की दिशा में हमें काम करना चाहिए। हर तरफ से कोशिश यही होनी चाहिए कि मुंबई की ये घटना आखिरी आतंकवादी घटना हो। पाकिस्तान से संबंध तोड़ने में कोई समझदारी नहीं है, क्योंकि जो लोग जिम्मेदार नागरिक हैं, उनका क्या लेना देना। हम उनके साथ अपने संबंध क्यों तोड़े, जो हमने अभी अभी बनाया है। प्यार दिया है,और प्यार लिया है।


मैं जानता हूं कि मेरी ये बात बहुत सारे लोगों को बुरी लगेगी। लेकिन,फिर भी जो सही है,जो मानवता के हक में है, उसी की जीत होनी चाहिए। गॉर्डन ब्राउन आए,इसके पहले बहुत सारे अंतरराष्ट्रीय स्तर के नेताओं के बयान आए। कोंडालिसा राइस आई। वापस जाते हुए पाकिस्तान में बयान भी दिए गए। लेकिन,हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि आखिरी सच यही है कि वो सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचेंगे । वो कभी हिन्दुस्तान के बारे में नहीं सोचेंगे। हिन्दुस्तान को खुद अपने बारे में सोचना होगा। हम सभी लोगों को एक दूसरे के लिए आगे बढ़कर आना होगा। तभी ये देश जहां है, वहां से आगे बढ़कर आ पाएगा। हम सब अपने अपने तौर पर ईमानदार रहने और बनने की कोशिश करें। तभी इसी देश का भला है,और इसी में हस सभी की भलाई है।

इसी के साथ
आपका और आपका
मनोज बाजपेयी