Tuesday, December 22, 2009

कब साफ रखना सीखेंगे अपने समुन्दर के किनारों को....

गौराई बीच। समुन्दर का एक किनारा है और मुंबई में होते हुए भी मुंबई से अलग है। यहां मेरी एक फिल्म की शूटिंग चल रही है। यहीं एक क्लब में रहना हो रहा है। करीब चालीस मिनट की दूरी पर लॉकेशन पर वापस सुबह सुबह आना होता है। मुंबई में रहते हुए भी मुबंई की चकाचौंध और भीड़-भाड से दूर रहकर सुकून मिल रहा है। अफसोस एक ही बात का है कि हम अपने समुन्दर के किनारे कब साफ रखना सीखेंगे। सरकार और प्रशासन कब इस तरफ ध्यान देंगे?

एक तरफ विदेशों के समुन्दरी किनारे हैं, जो शहरों से लगे हुए हैं। उनकी खूबसूरती देखिए। दूसरी तरफ मुंबई के समुन्दर के किनारे, जो गंदगी से लबालब है। साफ सुथरी जगह तक नहीं मिलती, जहां आप पांव रख सकें।

खैर ये बात रही मेरे शूटिंग स्थल की। अभी बस फोन ही आया था भाई का कि वो गांव जा रहे हैं। मेरे माता पिता और बाकी लोग जा चुके हैं। छुट्टियां बिताने दिल्ली से। मन कर रहा है कि सब छोड़कर कुछ दिनों के लिए गांव जाऊं। लेकिन ऐसी कुछ परिस्थितियां बन पड़ी हैं कि कुछ भी छोड़ नहीं सकता। अपने घर-गांव और राज्य की याद तो खैर सबको आती है और वैसे ही मुझे भी आती है। शायद मार्च अप्रैल में जाने का अवसर मिले। लेकिन, इस गांव जाने के विचार के साथ ही न जाने कहां से ये विचार भी आता है कि हम बड़े क्यों हुए। रोजी रोटी का चक्कर इतना बड़ा कैसे हो गया कि हमें सबकुछ छोड़ना पड़ा।

लेकिन, फिर दिमाग में एक बात कौंधती है कि बात दाने पाने की नहीं थी। बात अभिनय से लगाव की थी। प्यार की थी। एक जुनून की थी। फिर भी,गांव बहुत याद आता है।

आज शूटिंग के बीच से वक्त निकाला है,इसलिए ज्यादा कुछ लिख नहीं पा रहा। लेकिन,अगली बार जरुर कुछ ज्यादा बातें होंगी।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Monday, December 7, 2009

अधूरा रह गया दुबई देखने का ख़्वाब

पिछले हफ्ते दुबई में था। दुबई कभी गया नहीं था। उसके बहुत सारे कारण थे। जब भी ऐसे मौके मिले तो मैंने उस प्लान को खारिज कर दिया या वो प्लान खुद ही खारिज हो गया। इस बार मौका लगा तो मन में खुशी थी कि दुबई देखने का मौका मिलेगा। दुबई एयरपोर्ट पर उतरे, गाड़ी में बैठे और गाड़ी करीब दो घंटे चलने के बाद होटल हिल्टन पर रुकी। मैंने ड्राइवर से पूछा कि ये दुबई ही है न? तो उसने जवाब में कहा- दुबई एक अलग अमीरात है। हम दो अमीरात पार करके किसी तीसरे ही अमीरात में पहुंचे हैं। इसका नाम है रस अल खेमा।

आप सोच सकते हैं कि मैं कितना उदास रहा होऊंगा। एक छोटा और बहुत ही छोटा सा शहर जो अभी विकसित हो नहीं पाया है। लेकिन शूटिंग वहीं होनी थी। छह सात दिन की शूटिंग करके वापस दुबई हवाई अड्डे पर उतरा और फिर दिल्ली आ गया। दुबई देखने और घूमने की इच्छा अधूरी ही रह गई।

इधर,दिल्ली में प्रवासी भारतीय फिल्म फेस्टीवल की योजना बन रही है। जिसके अवॉर्ड की ट्रॉफी के अनावरण के उपलक्ष्य में समारोह रखा गया था, मुझे उसमें भाग लेना था। बहुत अच्छा समारोह रहा। श्री अशोक चक्रधर, श्री राजीव शुक्ला, श्री साबिर अली इन सभी लोगों ने अपने अपने भाषण से लोगों का मन मोह लिया। लेकिन जो सबसे बड़ी उपलब्धी थी इस समासोह की तो वो मॉरिशस के राष्ट्रपति महामहिम अनिरुद्ध जगन्नाथ की उपस्थिति। वो इस समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में मौजूद थे। उनकी सादगी देखकर मैं आश्चर्यकित और भौचक रह गया।

ऐसे लोगों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। बचपन से सादगी मुझे लुभाती रहती है। ऐसे ही जीने की इच्छा है। जब बड़े पद पर बैठे लोग आपके सामने उदाहरण पेश करते हैं तो फिर व्यक्ति अपनी ही सादगी पर सवाल खड़े करना शुरु करता है और अपने आप को सुधारने की दिशा में काम करना शुरु करता है।

मुझे जीवन में आराम चाहिए। आधारभूत सुविधाओं की इच्छा रखता हूं। लेकिन, सादगी से एक सम्मोहन और एक आकर्षण रहा है। और आशा करता हूं कि मैं इसी तरह से आगे का जीवन भी व्यतीत करता रहूं। आप पाठकों की प्रतिक्रियाएं लगातार उत्साह बढ़ाती हैं, और मैं देखता हूं कि कुछ पाठक लगातार उत्साहवर्धन करते हैं। सभी की प्रतिक्रियाओं को लेकर बातचीत जल्दी ही।

फिलहाल, सादगी भर अभिनंदन के साथ आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Wednesday, November 25, 2009

26/11 की याद कर दहल उठता है दिल

ऐसा लगता है कि मैं कल ही मलेशिया से आया था। और ऐसा लगता है कि मैं अभी रात को सोकर उठा हूं। हालांकि, बात पिछले साल 26 नवंबर की है, जब मुझे आधी रात के करीब ढेरों संदेश मिले मोबाइल फोन पर। रात के ढाई बजे थे, जब संदेशों का सिलसिला शुरु हुआ। मैं भौचक रह गया था सारे संदेश पढ़कर। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि हर कोई मेरी बेहतरी की दुआ क्यों कर रहा है? और हर कोई मेरे घर पहुंचने की बात क्यों जानना जा रहा है ?

ख्याल आया कि टेलीविजन ऑन करुं और देखू कि कहीं कोई हादसा तो नहीं हो गया। और जो देखा और जो गुजरा वो आज तक दम निकालता है। कई जवान शहीद हुए। सैकड़ों बच्चे अनाथ हुए। कई औरतें विधवा हुईं। कितनों की रोजी रोटी का सिलसिला ही खत्म हो गया। और पता नहीं कितनों ने इस जख्म को अपने भीतर आज तक हरा रखा है और न जाने कितने सालों तक रखेंगे।

वैसे,हादसे के बाद मुंबई सड़कों पर भी आया था। उसने विरोध भी किया। उसने अपनी मांगें भी रखीं। नेता पहली बार सहमे से नजर आए। डरे हुए दिखे। ऐसा लगा कि अब जिम्मेदारी तय होगी। लेकिन नेता तो नेता है। ऐसे लोग भय से बहुत जल्दी ऊपर उठ जाते हैं। अब वो समाज में घूमते हैं, तो फिर अपनी जोडतोड़ में लगे हैं। उन्होंने कई चुनाव देख लिए और आगे देखने भी हैं, लिहाजा अब उसी जोड़तोड में लगे हैं।

मुझे अभी भी याद है कि 26/11 के हादसे के करीब एक हफ्ते बाद मैं सिनेमाघर में एक फिल्म देखने गया था। उस वक्त हम चार पांच लोग थिएटर में फिल्म देख रहे थे। और हर बार ऐसा लगता था कि फिल्म छोड़कर चले जाएं। ऐसा डर समाया था कि लगता था कि कभी भी कुछ भी हो सकता है। मुंबई की सड़कें सुनसान हो गई थीं। और ये बहुत दिनों तक रहा था। धीरे धीरे जीवन सामान्य होता गया और आज हम फिर उस जगह आ पहुंचे हैं कि जब हम बेफिक्र हैं।

लेकिन, सच यही है कि कहीं न कहीं वो भय अंदर तक समाया हुआ है। शायद सभी लोगों के भीतर और लोग बरसों तक उससे बाहर आ पाएंगे, ऐसा मुझे नहीं लगता। हर कोई ये दुआ कर रहा है कि ऐसा फिर न हो। लेकिन कौन जाने ? जब व्यक्ति ही व्यक्ति को मारने में तुला है और जब कारण अंजान हो चुका है, अपरिचित हो चुका है तो फिर ऐसा पता नहीं कितनी बार होगा और कहां-कहां होगा।

आज मैं दुबई में शूटिंग कर रहा हूं। एक एयरपोर्ट पर। एयरपोर्ट के इस कोने में उस तरह के विमान रखे गए हैं,जो सड़-गल गए हैं और जिनका कोई काम नहीं है। वो अब उड़ना भूल चुके हैं या फिर यूं कहें कि उड़ते-उड़ते थक चुके हैं। इनकी शक्ल कुछ वैसी ही दिखायी दे रही है,जैसी की हवाई दुर्घटना के बाद किसी विमान की शक्ल होती है। यहां पहुंचने के साथ ही ये जरुर अंदर आया कि अब अगर आप उड़ना चाहें तो बिना भय के नहीं उड़ सकते। भय-दहशत आज हमारे जीवन का हिस्सा हो चुका है। और पता नहीं कब तक रहेगा।

लेकिन इसी डर के बीच मैं उन सारे शहीदों को श्रद्दांजलि अर्पित करता हूं, जिन्होंने 26 नवंबर 2008 को लोगों की जिंदगी बचाते हुए अपनी जिंदगी कुर्बान की थी। मैं उन सारे परिवार के लोगों को अपनी सहानुभूति प्रकट करता हूं, जिन्होंने इस हादसे में अपने किसी न किसी को खोया है। हमें उन पर गर्व है, और उनका कर्ज हम यकीकन उतार नहीं सकते। बाकी देश वासियों और दुनियावालों से यही कहूंगा कि अपने आसपास की चीजों और व्यक्तियों से सजग रहें। चौकन्ने रहें। आंखें खुली रखें ताकि हम स्वयं इस समाज को लंबे वक्त तक भयमुक्त रख पाएं।

26/11 के आने से पहले भय में लिप्त लेकिन चौकन्ना और सजग रहने की कोशिश करते हुए मैं मनोज बाजपेयी आपसे फिर यही गुजारिश करता हूं कि हमारी सुरक्षा हमारे हाथ है, इसलिए जिम्मेदार बनें,सजग बनें।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Friday, November 13, 2009

देश को टुकड़े करने वाले बयानों को प्रमुखता न दे मीडिया

काफी समय हो गया। ‘राजनीति’ की शूटिंग, ‘जेल’ के प्रचार-प्रसार, उसके बाद की मीटिंग्स और बाकी अपने व्यक्तिगत कामों में काफी व्यस्त रहा। जेल को आम जनता से प्रशंसा मिल रही है और मेरे अपने अभिनय के लिए भी मुझे प्रोत्साहन मिल रहा है। आपमें से जिन लोगों ने अभी तक फिल्म देखी नहीं है, कृपया अपने आसपास, जहां कभी भी जेल लगी है, अवश्य देखें। मैं नहीं जानता कि फिल्म कितनी सफल होगी या कितने पैसे कमाएगी, मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि मैं अपने काम से खुश हूं। मुझे मधुर के साथ काम करते हुए अच्छा लगा। बहुत कुछ सीखा और बहुत से नए दोस्त बनाए।

हाल फिलहाल में कई लोग मुझसे भाषा को लेकर कई सवाल कर रहे हैं। कुछ एक राजनेताओं ने भाषा और क्षेत्र को ही अपने राजनीतिक एजेंडा में रखा है। मीडिया भी उनके बयानों और उनकी करतूतों और हरकतों को दिखाए जा रही है। सुबह छह बजे से लेकर रात के 10-11 बजे तक उन्हीं राजनेताओं के बयान हेडलाइन की तरह आते रहते हैं और फिर आपसे उनपर कमेंट करने को कहा जाता है। मैंने दो साल पहले ही इस मुद्दे पर अपना कमेंट दे दिया था,जहां पूरे मीडिया को बुलाकर अपनी बात कही थी। उस वक्त मैंने मीडियाकर्मियों और राजनेताओं से आग्रह किया था कि न तो इस तरह की बयानबाजी करें जो देश को टुकडे-टुकड़े करने वाला है और न मीडिया इसे हर दिन हमारे चेहरे पर थोपती रहे। और हर दिन हमसे उस पर एक कमेंट की अपेक्षा करती रहे।

लेकिन मैं तो सिर्फ निवेदन ही कर सकता हूं। बाकी निर्णय उन राजनेताओं को लेना है और मीडिया को भी लेना है। मैं कौन होता हूं ? लेकिन यह अवश्य है कि मैं इस तरह के राजनीतिक एजेंडा और बयानबाजी पर अपने कमेंट कभी नहीं दूंगा। मैं विरोध जता चुका हूं। इस तरह के भाषा और क्षेत्र की मानसिकता के खिलाफ। अब इस तरह की हेडलाइन के खिलाफ हर दिन अपनी राय नहीं दूंगा क्योंकि मुझे लगता है कि रोज कुछ न कुछ ऐसा घट रहा है, जो हेडलाइन बन सकता है।

खैर, आपसे बात होती रहेगी। बहुत दिनों से पाठकों के कमेंट पर बात करने की इच्छा है। कोशिश करुंगा कि अगली पोस्ट में सिर्फ कमेंट पर बात करुं।

पुन: निवेदन कि जेल अवश्य देखें। हमने बहुत मेहनत से फिल्म बनायी है। आपको पसंद आए अथवा न आए, इसके बारे में अपनी राय मुझे जरुर दें।

इसी के साथ

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Saturday, October 31, 2009

प्रचार बिन सब सून

अपनी नयी फिल्म ‘जेल’ के प्रमोशन के लिए मैं फैशन वीक में रैंप पर उतरा तो कई लोगों ने मुझसे एक सवाल किया कि क्या रैंप पर उतरना फिल्म कलाकारों के लिए अब फैशन हो गया है? या इस हथकंडे से फिल्म के सफल होने की गारंटी मिल जाती है? ये सवाल शायद इसलिए भी बार बार पूछा गया क्योंकि रैंप पर ‘जेल’ के सभी सदस्य यानी मैं, नील, मुग्धा और डायरेक्टर मधुर भंडारकर साथ-साथ उतरे और मैंने और नील ने तो कैदी की यूनिफॉर्म पहनी थी, और हाथ में हथकड़ी लगायी हुई थी। लेकिन, बात रैंप पर चलने की नहीं, इस बारे में पूछे गए सवालों की है।

फिल्म के प्रमोशन के लिए रैंप पर चलना इन दिनों आम हो गया है-इसमें कोई शक नहीं है। दरअसल, कंज्यूमरिज़्म के इस दौर में फिल्म भी एक प्रोडक्ट है और बॉलीवुड को यह बात अब अच्छी तरह समझ आ चुकी है। एक प्रोडक्ट को बेचने के लिए जिस तरह एडवरटाइजिंग की जरुरत होती है,उसी तरह फिल्म को बेचने के लिए भी एडवरटाइजिंग की जरुरत होती है। लेकिन, फिल्म और दूसरे प्रोड्क्ट में एक बड़ा अंतर यह है कि फिल्म का हश्र रिलीज के तीन दिनों के भीतर तय हो जाता है। ऐसे में, फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए जिन जिन तरीकों या कभी कभार हथकंडों की जरुरत होती है, उनका सहारा लिया जाता है। रैंप पर चलना सबसे सस्ते तरीकों में हैं,जहां आप कोई रकम खर्च नहीं कर रहे अलबत्ता पब्लिसिटी बटोर रहे हैं।

बहुत से लोग इस बारे में सवाल कर सकते हैं कि क्या पब्लिसिटी से फिल्म हिट हो सकती है? क्योंकि कई बड़े बजट की फिल्मों को धुआंधार पब्लिसिटी के बावजूद औंधे मुंह गिरते लोगों ने देखा है। जी हां, इसमें कोई दो राय नहीं है कि सिर्फ पब्लिसिटी ही सब कुछ नहीं होती। लेकिन,माफ कीजिए बहुत कुछ होती भी है। आखिर,दर्शकों को रिलीज हुई फिल्म के बारे में पता तो चलना चाहिए। उस फिल्म की कहानी-कलाकार आदि के बारे में कुछ तो पता होना चाहिए, तभी तो वो थिएटर तक फिल्म देखने की मशक्कत करेगा।

करियर के शुरुआती दौर में मैं पब्लिसिटी को अहम नहीं मानता था। लेकिन, अब मुझे लगता है कि मैं गलत था। दरअसल, अपनी फिल्मों की खराब पब्लिसिटी का हश्र मैंने कई बार भुगता है। मेरी फिल्म ‘स्वामी’ को आलोचकों ने बहुत सराहा, लेकिन फिल्म पिट गई क्योंकि दर्शकों को इसके बारे में पता ही नहीं चला कि फिल्म कब आई और कब गई। मैं अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘1971’ को मानता हूं। इसी फिल्म को इस साल बेस्ट हिन्दी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है। लेकिन, इस फिल्म की खराब पब्लिसिटी का ही नतीजा था कि दर्शकों को इस फिल्म के बारे में पता नहीं चला। टेलीविजन पर लोग फिल्म देखकर अब फोन करते हैं और पूछते हैं कि ये कौन सी फिल्म है, जिसमें मैंने इतना बढ़िया अभिनय किया है। हाल में प्रदर्शित हुई एसिड फैक्ट्री के बारे में भी मेरा यही मानना है कि फिल्म की पब्लिसिटी ठीक नहीं हुई।

आज के युग में फिल्मों के प्रचार प्रसार के लिए जरुरी है कि आप यानी कलाकार और फिल्म से जुड़े लोग हर संभव मंच से चिल्ला चिल्लाकर बताएं कि अमुक फिल्म रिलीज हो रही है। लोग कहते हैं कि क्या अब माउथ पब्लिसिटी के लिए कोई जगह नहीं है। तो मेरा यही मानना है कि नहीं है। वो इसलिए क्योंकि फिल्म का धंधा सिर्फ तीन दिनों का है,क्योंकि अगर तीन दिनों के भीतर लोग थिएटर तक नहीं पहुंचे तो फिर अगले हफ्ते तीन-चार फिल्में रिलीज के लिए तैयार होती हैं।

निश्चित तौर पर छोटे निर्माताओं को अपनी फिल्म के प्रचार में अब खासी मुश्किलें आती हैं, और उनके लिए यही रास्ता है कि वो सभी मुमकिन मंच से फिल्म का प्रचार करें। रिएलिटी शो में जाएं, रैंप पर कलाकारों को उतारें, वेबसाइट पर चैट करें वगैरह वगैरह। कुल मिलाकर सच्ची बात यही है कि बिन प्रचार सब सून है। दर्शकों द्वारा फिल्म पसंद या खारिज तो तब की जाएगा,जब बड़ी संख्या में लोग फिल्म को देखें और बिना पब्लिसिटी यह मुमकिन नहीं है। इसलिए ‘जेल’ या अपनी किसी दूसरी फिल्म के लिए जब मैं रैंप पर उतरता हूं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं चाहता हूं कि लोग फिल्म को देखने के बाद अपना फैसला दें।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, October 25, 2009

चटोरी जुबान रुकती नहीं !

अभी मैं भोपाल में हूँ। ‘राजनीति’ की अंतिम चरण की शूटिंग जारी है। इस पूरी शूटिंग के दौरान खाने का सिलसिला लगातार चल रहा है। कभी-कभार वर्जिश कर लेता हूँ। लेकिन पता नहीं क्यों चटोरी ज़ुबान रुकती ही नहीं ! हर दिन कहीं-न-कहीं से चिकन बिरयानी आता है या फिर मटन आता है। एक दिन खाना खाने के बाद अगले दिन के खाने की प्लानिंग शुरु हो जाती है। कोशिश कर रहा हूँ कि इस सिलसिले को थोड़ा रोकूँ, वरना वजन बढ़ जाएगा। लेकिन फिर यह लगता है कि पता नहीं भोपाल कब आना होगा और कब इस तरह का स्वाद फिर मिलेगा। ढाई साल पहले सिगरेट छोड़ने के बाद खाने का स्वाद पहली बार महसूस करना शुरु किया है। और अब खाना खाने में बहुत मन लगता है। इतने साल मैं सिगरेट पीता रहा तो खाना खाने का स्वाद जाता रहा था और सच कहूं तो खाना खाने में दिलचस्पी भी नहीं थी।

ख़ैर, इसके बाद वापस “जेल” के प्रचार प्रसार में लगूंगा। फिर एक नयी फ़िल्म को दर्शकों तक पहुँचाने की प्रक्रिया शुरु करुंगा। “जेल” में मेरा किरदार बहुत ही अनोखा है। एक सूत्रधार का रोल कर रहा हूँ। एक ऐसा व्यक्ति जो आजीवान कारावास की सज़ा काट रहा है, जिसने अपने जीवन को भगवान के सहारे छोड़ दिया है और कहीं-न-कहीं ऊपर वाले की मर्ज़ी से उसने समझौता कर लिया है।

मधुर भंडारकर ने जब फिल्म ऑफ़र की थी, तो मैं उसे बिना सुने भी करने को तैयार था। क्योंकि मधुर से मेरी संघर्ष के दिनों से जान-पहचान थी। श्री राम गोपाल वर्मा को वो असिस्ट किया करते थे और इन्होंने अभी-अभी सहायक निर्देशक का काम छोड़कर अपना काम तलाशना शुरु किया था। और मैंने “दौड़” की शूटिंग शुरु की थी राम गोपाल वर्मा के साथ। काफ़ी मिलना-जुलना रहा है। और उसने “जेल” फ़िल्म भी अच्छी बनायी है।

मधुर मुख्यधारा की ही फ़िल्में बनाते हैं, लेकिन विषय का चुनाव और जिस तरह से वो फ़िल्म का निर्देशन करते हैं, उससे वो फ़िल्में थोड़ी अलग दिखती हैं। ख़ास बात ये कि कहीं-न-कहीं सामाजिक सरोकार इनकी फ़िल्मों में दिखता है, जो बात मुझे बहुत अच्छी लगती है। मैं जानता हूँ कि लोग इस फ़िल्म को पसंद करेंगे। अब ये देखना कि लोग कितनी तादाद में सिनेमाहॉल के भीतर जाते हैं। एक सार्थक और यथार्थ से भरपूर फ़िल्म को देखने के लिए। मेरी दुआएँ मधुर भंडारकर और पूरी टीम के साथ हैं। और उनको मैं धन्यवाद देता हूँ मेरा पूरा ख़्याल रखने के लिए। मैं चाहूंगा कि फ़िल्म सफल से सफलतम साबित हो। इसमें दर्शकों के सहयोग की ख़ासी आवश्यकता होगी। “जेल” फ़िल्म देखें और अपना सुझाव या आलोचना भेजना न भूलें।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, October 13, 2009

वोट न डालने का अफसोस है

‘एसिड़ फैक्ट्री’ का प्रदर्शन हो चुका है। मेरे अभिनय की लोग तारीफ कर रहे हैं। अच्छा लग रहा है कि मेहनत सफल हुई। दुख इस बात का है कि जिसके ऊपर फिल्म के प्रचार की जिम्मेदारी थी, वो अपना काम पूरा नहीं कर पाए। अमूमन संजय गुप्ता की फिल्में ठीक तरीके से दर्शकों तक पहुंचा दी जाती है। संजय गुप्ता को इस काम में महारथ हासिल है। लेकिन चूंकि इस बार फिल्म किसी और ने खरीद ली थी और इसके प्रमोशन की जिम्मेदारी उसी व्यक्ति के हाथों पर थी और हम सब एक असहाय दर्शक की भांति अपने ही बनाए गए काम को धराशायी होते देखते रहे।

ऐसा ही मेरी एक फिल्म ‘1971’ के साथ 2007 में हुआ था। और इस साल उसी फिल्म को बेस्ट हिन्दी फीचर फिल्म-2007 का राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया गया। दुख इस बात का है कि ‘एसिड़ फैक्ट्री’ एक मनोरंजक फिल्म है और इससे दर्शकों को अवगत होना चाहिए। लेकिन फिर वही गलती दोहराई गई। बहुत दुखी हूं ये सोचकर कि इतनी मेहनत का फिर क्या फायदा। स्वाभाविक है मेरा दुखी होना। फिर भी, मैं अपने दोस्तों से कहूंगा कि एसिड फैक्ट्री को देखें। ये एक मनोरंजक फिल्म है,जो आपको हंसाएगी और रोमांचित करेगी।

पूरे महाराष्ट्र ने वोट डाला। मैं चूंकि हैदराबाद में शूटिंग कर रहा हूं इसलिए अपने इस अधिकार का उपयोग नहीं कर पाया। और वैसे भी वोटर लिस्ट में दो दो बार रजिस्ट्रेशन करा चुका है लेकिन अभी तक न तो मेरे पास वोटर कार्ड है, और न ही ऐसी कोई खबर है। लेकिन, इस बार मुंबई में हूं नहीं तो पता नहीं कर पाया कि मेरा लिस्ट में नाम है कि नहीं। हां आईडी नहीं मिला है ये तो पता है मुझे।

आशा करता हूं कि इस इस बार जनता ने सोच समझकर अपने प्रतिनिधि का चुनाव किया होगा। ताकि उसे पांच साल तक पछताना न पड़े। अगली बार विस्तृत पोस्ट लिखूंगा।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, October 1, 2009

अपने मुँह मियाँ मिट्ठू !

“राजनीति” की शूटिंग अच्छी रही भोपाल में। दशहरा के दिन अपने दोस्त विजय जाजोरिया के घर खाना भी अच्छा रहा। कुल मिलाकर ये दस दिन अच्छे कटे। अब, मुंबई लौट रहा हूँ। “एसिड फैक्ट्री” के प्रमोशन के लिए। वैसे, टीम तो हैदराबाद और कोलकाता जा चुकी है, लेकिन बंगलोर और दिल्ली का सफ़र अभी बाक़ी है। शायद मैं दोनों ही शहरों में एसिड फैक्ट्री के प्रचार-प्रसार के लिए निकल पड़ूँ।

इस बीच कुछ एक निर्देशक हैं, जिनसे मिलना है। जिनसे कहानियाँ सुननी हैं या जिनसे स्क्रिप्ट लेनी है। साथ-ही-साथ मधुर भंडारकर की फिल्म “जेल” के कुछ प्रमोशन कार्यक्रमों का हिस्सा बनना है। पहले ऐसा कभी मेरे साथ हुआ नहीं कि एक ही महीने में मेरी दो फिल्में आई हों। लेकिन संयोग ऐसा बन पड़ा है कि एक महीने में एसिड फैक्ट्री और जेल सिनेमाघरों में पहुंच जाएंगी। एसिड फैक्ट्री सबसे पहले नौ अक्टूबर को रिलीज़ हो रही है। दोनों अलग तरीक़े की फिल्में हैं। दोनों में मेरी भूमिका उत्तर-दक्षिण की तरह अलग-अलग हैं। आशा करता हूँ कि सभी दर्शकों को न सिर्फ़ ये फिल्में अच्छी लगें, बल्कि ये प्रयोग भी उन्हें नया लगे।

एसिड फैक्ट्री का प्रमोशन करते वक़्त मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं अपने मुँह ही मियाँ मिट्ठू हो रहा हूँ। और शायद यह कहें कि हर फिल्म के प्रमोशन के वक़्त ही ऐसा लगता है। ये प्रमोशन का सबसे वीभत्स अनुभव होता है, जब आप ख़ुद ही फिल्म की तारीफ़ कर रहे होते हैं, और ख़ुद ही भूमिका के बारे में बातें कर रहे होते हैं। ये एक ऐसा पहलू है प्रचार-प्रसार का, जो मुझे रास आता नहीं है। लेकिन, ज़माना ऐसा बदला है कि जिन फिल्मों का प्रचार-प्रसार हुआ नहीं, जिन फिल्मों की तारीफ़ उनके अपने अभिनेताओं ने की नहीं, वो भी प्रदर्शन के पहले, तो दर्शक उन फिल्मों को देखने ही नहीं गए।

तो ठीक है। अगर दर्शकों के फिल्म देखने की शर्त यही है तो यही सही। आशा करता हूँ कि इस ब्लॉग से जुड़े सारे मेरे दोस्त मेरी फिल्मों से संतुष्ट होंगे। आपकी प्रतिक्रियाओं के लिए धन्यवाद। एसिड फैक्ट्री के रिलीज़ के बाद एक बार फिर आपसे प्रतिक्रियाओं को लेकर बात करुंगा।

इसी के साथ

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, September 15, 2009

छुट्टी का सदुपयोग कर रहा हूँ

हैदराबाद में शूटिंग करते वक़्त मेरी पीठ में चोट लग गई थी। उसके बाद मैं बिस्तर पर पड़ा रहा। चोट से उबर ही रहा था कि मुझे ‘जेल’ फ़िल्म की डबिंग करनी पड़ी। फिर ‘एसिड फ़ैक्ट्री’ के प्रचार-प्रसार में जुट जाना पड़ा। और उसके बाद प्रकाश झा की शूटिग के लिए भोपाल आना हुआ है। काफी भागमभाग रही है। पीठ को पूरा आराम दे नहीं पाया। लेकिन, अब पीठ ख़ुद ठीक हो रही है।

आजकल खाली समय में टीवी लगाकर देखता रहता हूँ कि 'एसिड फ़ैक्ट्री' के प्रोमो कब आएंगे। लगातार एसिड फैक्ट्री का प्रचार धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। और अच्छा ये लग रहा है कि एसिड फ़ैक्ट्री के निर्माता और वितरक दोनों ही उसके सही प्रदर्शन को लेकर सजग हैं। यहाँ भोपाल में दो दिन की छुट्टी मिली मुझे, तो मैं भोजपुर चला गया शिवलिंग के दर्शन करने। वहाँ से निकलकर भीम बेटिका गया, जो विश्व धरोहर है। वहाँ पहुँचते ही एक गाइड को अपने साथ लिया। ताकि वो हमें गुफाओं और गुफाओ पर बने शैल-चित्रों के बारे में विस्तृत जानकारी दे सके।

अच्छा ये लगा कि इस धरोहर को बहुत ही सुरक्षित ढंग से रखा गया है। काफ़ी साफ़-सफ़ाई रखी गई है। गाइड के बोलने के अंदाज़ को देखकर मैं काफ़ी अचंभित हुआ और मन-ही-मन में उसके अंदाज़ की नक़ल करना शुरु कर दिया। कभी ऐसी कोई भूमिका मिले तो उस गाइड की नक़ल ज़रुर करुंगा। मेरी यात्रा काफ़ी जानकारी भरी रही और गाइड के कारण काफ़ी मनोरंजक भी।

मुझे पता है कि मैं अपना ब्लॉग नियमित नहीं लिख पा रहा हूँ। थोड़ा गैप आ जाता है। लेकिन अब इस अंतराल को कम करने की पूरी कोशिश होगी। अब हर हफ़्ते आपसे मुख़ातिब होऊंगा और उस हफ़्ते की पूरी गतिविधि के बारे में आपसे बातचीत किया करुंगा।

लेकिन,अभी मुझे एक स्क्रिप्ट पढ़कर ख़त्म करनी है,यही मौक़ा है जब मुझे छुट्टी मिली है तो उसका उपयोग करुँ। और ब्लॉग का उपयोग करते हुए मैं सिर्फ़ ये कहूंगा कि एसिड फ़ैक्ट्री के बारे में जितनी जानकारी ले सकते हैं,ले लें। नेट पऱ। फ़िल्म मैंने देखी है और फ़िल्म काफ़ी अच्छी है। लेकिन उसके बारे में बातचीत उसके प्रदर्शन के वक़्त करुंगा। अभी के लिए इतना ही।

आपका और सिर्फ़ आपका

मनोज बाजपेयी

Friday, August 28, 2009

रात की शूटिंग के नाम से सिहर जाता हूं..

काफी दिन हो गए लिखे हुए तो सोचा आज कुछ बात कर लूं आप लोगों से। आजकल किसी पार्टी में अंदरुनी कलह की बातें आ रही हैं, कहीं सलमान खान के आईपीएल टीम खरीदने की चर्चा जोर शोर से दिख रही है। समाचार देखते देखते ऊब जाता हूं। फिर सो जाता हूं। आप सोच रहे होंगे कि क्या कर रहा हूं। आजकल कुछ काम नहीं है क्या ?

दरअसल, मैं आजकल रामोजी फिल्म सिटी हैदराबाद में शूटिंग कर रहा हूं, जो शहर से एक-डेढ़ घंटे की दूरी पर है। आसपास कुछ भी नहीं है सिवाय स्टूडिया के। स्टूडियों में एक दो अच्छे होटल हैं, जहां पर आप, अगर शूटिंग नहीं कर रहे हैं तो, ठहरते हैं। और कुछ करने को है नहीं। शूटिंग पर बुलावे का इंतजार कर रहा हूं और इस बीच हर न्यूज चैनल को टटोलने की कोशिश भी कर रहा हूं। ये भी देख रहा हूं कि “एसिड फैक्ट्री” के प्रोमो आने शुरु हुए कि नहीं।

अभी अभी “एसिड फैक्ट्री” के निर्देशक से बात हुई तो उन्होंने बताया कि एसिड फैक्ट्री का एक गाना किसी खास चैनल पर आना शुरु हो गया है। अगले तीन चार दिनों में सारे प्रोमो आने शुरु हो गए जाएंगे। उत्साहित हूं। उत्सुकता भी है प्रोमो देखने की क्योंकि यही रामोजी राव स्टूडियो है, जहां पर एसिड फैक्ट्री की डेढ महीने की शूटिंग की थी हमनें। और काफी मजे भी किए थे यही पर।

यहां पड़े पडे उस समय की याद ताजा हो गई है। मैंने फिल्म खुद देखी। एक बहुत ही मनोरंजक फिल्म बन पड़ी है। मुझे फिल्म बहुत अच्छी लगी। एक तेज गति वाली भरपूर मनोरंजन देने वाली फिल्म है एसिड फैक्ट्री। इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा। बाकी जब लोग देखेंगे तो वो अपने आप निर्णय लेंगे। नहीं तो यह आरोप लग जाएगा कि मैं सिर्फ अपनी फिल्म का ही प्रचार कर रहा हूं अपने ब्लॉग पर।

कुछ दिनों के बाद भोपाल वापस जाना होगा। “राजनीति” की शूटिंग के लिए, जिसका बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं। इंतजार कर रहा हूं अपने दोस्त विजय जाजोरिया से मिलने का, जो कॉलेज के दिनों के साथी हैं। भोपाल एक छोटा लेकिन बहुत सुंदर शहर है। पिछली बार शूटिंग कर चुका हूं। अच्छा लगेगा फिर से वापस जाने में।

आजकल मैं रात की शूटिंग कर रहा हूं और रात की शूटिंग करना मुझे बेहद नापसंद है। मैं चाहे कितनी भी कोशिश क्यों न करुं कि निर्देशक मेरा काम खत्म कर 12-1 बजे तक वापस भेज दे। फिर भी नाकाम ही रहता हूं। निर्देशक कभी ये सोच नहीं पाते कि मैं 12-1 बजे के बाद अपना काम ढंग से नहीं कर पाता। मैं अपनी ऊर्जा लगा नहीं पाता। न दिमाग लगा पाता हूं। ये मेरी परेशानी हमेशा से रही है। लेकिन, एक कमिटमेंट किया है तो उसे पूरा करना ही पड़ेगा।

आज रात मैं फिर जागना है। ये सोचकर ही मैं दहशत में हूं। खैर, आज इतना ही,

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Wednesday, August 12, 2009

बाप रे बाप...स्वाइन फ्लू...

स्वाइन फ्लू। स्वाइन फ्लू । स्वाइन फ्लू। स्वाइन फ्लू। चारों तरफ यही हाहाकार मचा हुआ है। डरने के बावजूद भी मास्क नहीं मिल रहे हैं। कोई आयुर्वेदिक दवाइयों की लिस्ट भेज रहा है तो कोई होम्यौपेथी की लिस्ट भेज रहा है-अपने अपने चहेतों को। सब के सब एक दूसरे को लेकर फिक्रमंद हैं।

इतने सारे सामाचार, इतने सारे संदेश- अब हर पल लोगों को चिंता में डाले जा रहे हैं। कहीं हमें न हो जाए ये बीमारी- सभी यही सोच रहे हैं। माथा गर्म है तो स्वाइन फ्लू होगा। पैर में दर्द है तो शायद स्वाइन फ्लू हो सकता है। हर तरफ इसी तरह की बेचैनी नजर आ रही है। सरकार अगर निजी हॉस्पीटल को ये अधिकार दे दे कि वो स्वाइन प्लू का टेस्ट कर सकते हैं, उनका इलाज कर सकते हैं और उनकी कड़ी निगरानी रखना शुरु कर दे तो मेरा मानना है कि आधे से ज्यादा लोगों की मन की परेशानी दूर हो सकती है। हर न्यूज चैनल पर लोगों को लंबी लंबी लाइनों में खड़ा देखकर मैं ही नहीं, हर कोई घबरा रहा है। ऐसा लगता है कि अगर उनमें से किसी को ये बीमारी लग गई तो टेस्ट होते होते ही उसकी जान जा सकती है।

खैर, यह मेरे मन की बात। मैं तेलुगु फिल्म की शूटिंग कर रहा था, उसका शिड्यूल कैंसल हो गया है। और इन दस दिनों के लिए शायद घर पर ही रखना पड़े। बाकी अभिनेताओं की तारीख की समस्या आन पड़ी है। हमारे पेशे में ऐसा अक्सर होता रहता है। ‘राजनीति’ की शूटिंग की तैयारियां शुरु हो चुकी हैं। इसे लेकर प्रकाश झा जी से एक मुलाकात हो चुकी है। कल फिर मिलने जाऊंगा। अभी मैंने अपनी एनिमेशन फिल्म ‘रामायण’ की बची घुची डबिंग खत्म की है। लेकिन,घर लौटकर जैसे ही टीवी खोला, वही स्वाइन प्लू की खबर देखने को मिली।

मेरे मित्र विशाल भारद्वाज की फिल्म रीलिज हो रही है-कमीने । उसे देखने हॉल में जरुर जाऊंगा। लेकिन, साथ में इतने लोगों के संपर्क में आने का डर भी बना हुआ है। लोगों से डर नहीं है। स्वाइन फ्लू से है। फिर भी एक जागरुक व्यक्ति होने के नाते मैं अपने मन को समझा रहा हूं कि बस सावधानी बरतनी है। लेकिन, ‘कमीने’ तो देखने जरुर ही जाऊंगा क्योंकि विशाल की फिल्में मुझे अच्छी लगती हैं।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, July 30, 2009

खुश हूं कि तेलुगु निर्देशकों की कसौटी पर खरा उतरा

इन दिनों मेरा आना जाना हैदराबाद लगा रहता है। हैदराबाद में तेलुगु इंडस्ट्री में लोग सुबह सात बजे से काम करना शुरु कर देते हैं। मेरे दोस्त आशीष विद्यार्थी तेलुगु फिल्मों में काफी व्यस्त हैं। उनका अपना मानना है कि आंध्र प्रदेश में बचपन से ही बच्चों को कड़ी मेहनत करना सिखाया जाता है और तेलुगु इंडस्ट्री इससे अछूती नहीं है। मुंबई के लोग भी काफी प्रोफेशनल हैं लेकिन तेलुगु में काम करने का आनंद बहुत ही कमाल का रहा है। ऐसा लग रहा है कि इतनी मेहनत तो मैंने कभी की ही नहीं थी। मेरे दोनों फिल्मों के निर्देशक मुझसे खुश नजर आए और कहीं न कहीं मुझे लगा कि इनकी कड़ी मेहनत की परिभाषा पर मैं खरा उतरा हूं।

मेरी शूटिंग लगातार चल रही है। सुबह साढ़े छह बजे काम पर निकलता हूं। शाम को आठ बजे अपने होटल पहुंचता हूं। फिर, वर्जिश करने के लिए जिम जाता हूं । डेढ़ घंटे अपने शरीर पर काम करने के बाद करीब साढ़े नौ बजे फिर होटल के कमरे में पहुंचता हूं। इसके बाद, तैयार होकर उन सभी मुंबई के कलाकारों से मिलता हूं,जो उसी होटल में ठहरे हैं। उनसे गपशप करके और साथ खाना खाकर 11 बजे तक सो जाता हूं। बस, यही मेरी दिनचर्या है।

इस बीच, मैं मुंबई दो दिन के लिए गया था। ‘एसिड़ फैक्ट्री’ तीन अक्टूबर को रीलिज होने वाली है। इसके प्रोमो और प्रचार के सारे सामान मीडिया के सामने रखा गया। कई महीनों की शूटिंग के बाद सारे कलाकार एक साथ इस आयोजन में शरीक हुए। उनके फिर से मिलने का अनुभव बहुत कमाल का रहा। हम इस कार्यक्रम के बाद भी तीन बजे रात तक निर्माता संजय गुप्ता के घर पर जमे रहे। कोई घर जाने को तैयार नहीं था। सब खुश थे क्योंकि सबने पूरी फिल्म देख रखी है और सभी अंतिम परिणाम से संतुष्ट हैं। आपके फिल्म बनाने के अनुभव पर चार चांद लग जाते हैं अगर आप अंतिम परिणाम से संतुष्ट हों।

एक दो हफ्ते के बाद फिल्म के प्रोमो आना शुरु हो जाएंगे। लेकिन, एक बात मैं पूरे आश्वासन के साथ कह सकता हूं कि एक साफ सुथरी रोमांचक फिल्म का अनुभव अगर आपको लेना है,तो एसिड़ फैक्ट्री जरुर देखें। बाकी देखने और न देखने का निर्णय हमारे दर्शकों के हाथ में है। मैं बार-बार आपके पास आता रहूंगा और अपने अनुभवों को आपके साथ बांटता रहूंगा।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, July 9, 2009

सिर्फ लिखता नहीं, ब्लॉग पढ़ता भी हूं

मैंने माइकल जैक्सन से बड़ा सितारा इस उम्र में न तो देखा और न सुना। एक ऐसा सितारा, जो मेरे गांव से लेकर अमेरिका की गली गली में जाना पहचाना गया। विवादों से घिरी जिंदगी, परिवार से दूर जिंदगी, अकेलेपन से घिरी जिंदगी, प्यार की खोज में भटकती जिंदगी और बहुत सारी सफलताओं से भरी जिंदगी। वो अचानक अकेलेपन में ही खो गई। माइकल जैक्सन के जाने के बाद लोगों को अहसास हो रहा है कि उन्होंने कितनी बड़ी प्रतिभा को खोया है। ऐसा मशहूर सितारा शायद आने वाले कई सालों तक हमें देखने और सुनने को नहीं मिलेगा। मेरी तरफ से माइकल जैक्सन को श्रद्धांजलि। भगवान उनके बच्चों को स्वस्थ और सुरक्षित रखे।

पिछली पोस्ट में मैंने लिखा था कि पाठकों की प्रतिक्रियाओं का उत्तर देने की कोशिश करुंगा। मुझे अच्छा लगता है कि लोग ब्लॉग पढ़ते हैं, और अपनी राय रखते हैं।

मेरी पिछली पोस्ट “मुंबई में खुली जगह कहां” पर कई पाठकों ने सहमति जताई। इसका शुक्रिया। वैसे,मैं सिविल इंजीनियरिंग के मामले में बिलकुल नादान हूं, इसलिए इसका सटीक हल मेरे पास नहीं है,लेकिन इतना विश्वास है कि अगर एक्सपर्ट लोग इस गंभीर समस्या के हल के बारे में सोचें तो कुछ हल जरुर निकल सकता है।

किसी पोस्ट की प्रतिक्रिया में भाई इरशाद अली और विजय वडनेरे ने पूछा है कि आप दूसरों के ब्लॉग भी पढ़ते हैं या सिर्फ अपना ब्लॉग देखते हैं? मैं कहना चाहूंगा कि शायद सभी ब्लॉग नहीं पढ़ पाता हूं,लेकिन जब मौका मिलता है कि तो खास और आम सभी के ब्लॉग देखने की कोशिश करता हूं।

संध्या आर्य ने भी एक पोस्ट की प्रतिक्रिया में क्षेत्रवाद के बाबत बात की है। मुझे लगता है कि बढ़ता क्षेत्रवाद गंभीर विषय है। इसकी जितनी निंदा की जाए,उतनी कम है। राजनेता अपने बैंक को सुरक्षित रखने के लिए इस तरह की बातों को हवा दे रहे हैं। मेरे बहुत सारे मराठी दोस्त हूं। मैं आम लोगों में भी घूमता फिरता हूं। वो इस सारी घटना पर अफसोस जताते हैं। और हम सभी ने खुले शब्दों में इसकी निंदा भी की है। टेलीविजन के माध्यम से और समाचार पत्रों के जरिए भी। अगर कोई कानून हाथ में लेता है तो कानून उसे सजा दे। हम और आप एक दूसरे से झगड़ा करके, उसका निदान नहीं निकाल पाएंगे।

जिन दिनों मैं करजत में जेल की शूटिंग कर रहा था, कुछ पोस्ट मैंने वहीं से लिखीं। उन पोस्ट में करजत का लगातार जिक्र आया था। इस दौरान रानी पात्रिक ने एक कमेंट में लिखा कि करजत से आगे की बात कीजिए। तो लीजिए मैं उन्हें बता दूं कि अब मैं करजत में नहीं हैदराबाद में हूं। अपने एक तमिल मित्र की तेलुगु फिल्म के सिलसिले में। अनुभव बहुत अच्छा है। यहां के लोग बहुत मेहनती हैं। यहां का खाना बहुत अच्छा लग रहा है। ढाई साल पहले, जब से सिगरेट छोड़ी है, अलग-अलग तरीके के खाना खोजने और खाने में मजा आने लगा है। क्योंकि मेरा मानना है कि भोजन भी एक क्षेत्र की संस्कृति का हिस्सा होता है। वो संस्कृति की बात भी कहता है और खुद में इतिहास भी समेटे रहता है। रानी जी, कभी हैदराबाद आना हो, तो एक रेस्तरां है अंजपर। पंचगुटा में। वहां खाना जरुर खाइएगा। केले के पत्ते पर खाना खाने का जो मजा आपको आएगा,वो आप कई दिनों तक याद रखेंगी।

वैसे, प्रतिक्रियाओं को देखते हुए एक बात अच्छी लगी कि कई पाठक बहस को आगे बढ़ाते हैं,तो कई किसी समस्या का हल खोजने की कोशिश में आगे आते दिखते हैं। हेमंत कुमार, गिरजेश राव, राजीव रंजन, अनिल कांत, सतीश पंचम, अजय कुमार झा, सागर नाहर, पुखराज, यायावर जैसे कई पाठक लगातार कमेंट कर हौसला बढ़ा रहे हैं। सभी का नाम लेना संभव नहीं है,लेकिन आप सभी का शुक्रिया।

कई पाठकों ने मेरी आने वाली फिल्मों के बारे में पूछा है कि तो मैं कहना चाहूंगा कि मेरी आने वाली फिल्में हैं-एसिड़ फैक्ट्री, जेल और राजनीति। इन सभी पर काम चल रहा है। सितंबर से ये फिल्में रीलिज होना शुरु होंगी। अवश्य देखें। मुझे काम करने में मजा आया। उम्मीद है कि आपको देखने में भी मजा आएगा।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, June 23, 2009

मुंबई में अब कहां बची है खुली जगह

शाम को टहलने निकला तो बहुत अच्छा लग रहा था। आज पहली बार यहां रहते हुए सुंदर से पार्क में अलग अलग से चेहरों को देखते हुए, उनकी गतिविधियों और हावभाव को निहारते हुए अपनी वॉक पूरी कर रहा था। यहां ठीक मेरी बिल्डिंग के सामने टहलने के लिए एक बहुत ही कम जगह में पार्क बनाया गया है। इसमें आसपास के लोग वर्जिश करने या टहलने के लिए उमड़ पड़ते हैं। आखिर क्यों न करें। यहां पर खुली जगह की कितनी कमी है !

लेकिन, टहलते वक्त ही अचानक मुझे ख्याल आया है कि इस पूरे मुंबई शहर में अब खुलापन बचा ही नहीं है। बच्चों के पार्क खत्म हो गए हैं। पेड़-पौधे भी जा रहे हैं। शहर बढ़ता ही जा रहा है। विकास के नाम पर इमारतें खड़ी हो रही हैं। खाली जगहों को गगनचुंबी ढांचों से भरा जा रहा है। एसईजेड बन रहे हैं, जिसके बारे में मैं थोड़ा अज्ञानी हूं। वर्जिश और टहलने के नाम पर जिम बनाए जा रहे हैं। मतलब ये कि अब हरे भरे पेड़, खेत-खलिहान सब धीरे धीरे विकास की भेंट चढ़ा दिए जाएंगे। कितना भयावह दृश्य होगा-पूछिए मत! सरकार को, लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए।

इस बीच हिंसा का तांडव चारों ओर लगातार दिख रहा है। लोग जितने उदास थे। नाखुश थे। अब गुस्सा हो रहे हैं। सोफियान हो या फिर लालगढ़। इन सबका निदान ढूंढना अब सरकार के ही हाथ में है। ऐसा क्यों होता है, जब हिंसा से लोग अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं, तभी सरकार सुनती है। वोट बैंक की राजनीति कम होने का नाम ही नहीं लेती। पहले लोकसभा चुनाव और उसे जीतने के हथकंडे। अब विधानसभा के चुनाव और उसे जीतने के हथकंडों में वक्त लगा रही है। लोगों की समस्याएं, उनके अंतरमन को छू भी नहीं पाती है। लोग अब भेड़ बकरी हो चुके हैं या शायद पहले भी थे। इन नेताओं, अफसरों की दृष्टि में। तभी शायद आज तक हमें अनदेखा किया जाता रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि हम शीघ्र इनके बारे में सोचें नहीं तो ये लोग सिस्टम पर ही सवाल खड़ा करना शुरु कर देंगे। फिर क्या बचेगा।

ये एक भड़ास थी मन के अंदर की, जो मैं अपने ब्लॉग के जरिए निकाल रहा हूं।

वैसे, ब्लॉग पर पाठकों की प्रतिक्रियाएं लगातार आती हैं तो अच्छा लगता है। कुछ लोगों ने शिकायत भरे लहजे में कहा है कि मैं पढ़ता भी हूं या नहीं तो मैं कहना चाहूंगा कि पढ़ता जरुर है। जवाब देना हर बार मुमकिन नहीं होता। हां, अगली पोस्ट में पिछली कई पोस्ट में पूछे सवालों और बातों का जवाब देने की कोशिश करुंगा।

बस, इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, June 2, 2009

विरोध हो, लेकिन कायदे से

एयरफ्रांस के विमान के दुर्घटना ग्रस्त होने की खबर देखी तो दिल दहल उठा। मैं दुर्घटनाग्रस्त लोगों के परिवार वालों की हालत सोचकर ही सिहर उठ रहा हूं। और क्या हाल हुआ होगा उनका, जो इस हवाई जहाज में सवार होंगे। हवाई जहाज की यात्रा सबसे सुरक्षित यात्राओं में मानी जाती है। लेकिन, जब इतने बड़े जहाज का यह हश्र होता है तब कहीं भी यात्रा करने से पहले आदमी यही सोचता है कि वो आखिरी बार परिवार वालों से मिल रहा है। मेरी संवेदनाएं उन सभी दुर्घटनाग्रस्त लोगों के परिवार वालों के साथ है। और जो लोग इस हादसे में मारे गए हैं,भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।

टेलीविजन पर देखा कि कुछ लोगों ने श्रमजीवी एक्सप्रेस को जला दिया। उनकी शिकायत थी कि ट्रेन ने कुछ स्टेशनों पर रुकना बंद कर दिया था। पहली बात तो ये कि शिकायत जायज थी। लेकिन शिकायत दर्ज कराने का ये कौन सा तरीका है? जो ट्रेन, बस आपकी सुविधा के लिए बनायी गई है, आप उन्हीं को तोड़फोड़ देते हैं या आग के हवाले कर देते हैं। ट्रेन रहेगी ही नहीं तो रुकेगी क्या खाक आपके स्टेशन पर।

विरोध दर्ज कराने के कई तरीके हैं। उनका सहारा जरुर लेना चाहिए। लोगों को मारना, चोट पहुंचाना, बिल्डिंगे जला देना, बस फूंक देना - क्या हम अपना ही नुकसान नहीं करते हैं। ये सोचने के लिए गंभीर विषय है।

अभी मैं मधुर भंडारकर की फिल्म से फारिग हुआ हूं। ‘जेल’ की भूमिका के लिए जो चेहरा बदला था, उस चेहरे को वापस मनोज बाजपेयी बनाने में लगा हुआ हूं ताकि अगली फिल्म पर काम किया जा सके। इसी बीच, हैदराबाद जाने का भी प्लान बना है। वहां से मैं दिल्ली चला जाऊंगा। शुरु के कुछ दिन अपने ससुराल वालों से मिलने के बाद अपने माता पिता और भाई बहनों के साथ रहूंगा। ऐसी मेरी योजना है।

इस बीच कहीं पर पढ़ा कि एक अभिनेता का ब्लॉग सबसे ज्यादा पढ़ा जा रहा है। टेलीविजन वालों ने इस पर एक प्रोग्राम ही बना दिया। टेलीविजन वालों को एक चींटी ने हाथी को काटा- अगर इस विषय पर भी प्रोग्राम बनाने का मौका मिले तो वो आधे घंटे का सदुपयोग कर सकते हैं। जरुरी ये नहीं है कि कितने लोगों ने पढ़ा। जरुरी ये है कि जो लिखा जा रहा है, वो कितना सामयिक है, कितना सही है और कितना न्यायंसंगत है। मैं खुश हूं कि मैं अपनी एक हफ्ते की सारी बातें अपने ब्लॉग पर लिख कर अपने मन की भढ़ास निकाल लेता हूं। मैं खुश हूं कि मैं किसी पर छींटाकशी नहीं करता। मैं खुश हूं कि जितने भी लोग मेरे साथ जुड़े हैं, वो मेरे दोस्त बने हैं।

आशा करता हूं कि ब्लॉग की ये यात्रा इसी तरह सकुशल तरीके से आगे और बहुत आगे तक जाएगी। क्या ये यात्रा का उद्देश्य नहीं होता कि हम सही सलामत अपनी मंजिल तक पहुंचे। कितनी जल्दी पहुंचे, क्या ये मायने रखता है। अगर नहीं तो मेरे जीवन की, अभिनय की और ब्लॉग की यात्रा जारी है।

ब्लॉग के जरिए जो लोग मेरे साथ जुड़ रहे हैं, उन सभी को मेरी तरफ से धन्यवाद और शुभकामनाएं।

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, May 14, 2009

हर नया किरदार बहुत पीड़ा देता है...

अभी तक मैं करज़त में ही हूं। शायद एक दो दिन में वापस मुंबई जाने के लिए अपनी पैकिंग शुरु करुं। बहुत गर्मी है यहां । लेकिन, शाम का समय अच्छा गुजर जाता है। बाकी कुछ सह कलाकार पनवेल के एक होटल में रुके हैं। दो दिन से उन्हीं के साथ जाकर गपशप मारता हूं, जब भी शूटिंग से वक्त मिलता है। क्योंकि ऐसी जगह पर जहां पर शूटिंग के अलावा और कोई गतिविधि न हो आप कितना पढ़ लेंगे, कितना टीवी देख लेंगे या कितना टहल लेंगे।

थोडी सी ऊब भी होने लगी है। शायद इसलिए क्योंकि मन जानता है कि अब हम जाने वाले हैं। बाकी की शूटिंग मुंबई शहर में ही होगी। फिल्म की शूटिंग का अपना एक उतार चढ़ाव होता है। ज्यादातर लोग ऐसे मिलते हैं, जिनके साथ आपने कभी काम नहीं किया होता। शुरुआत के दिनों में आपको चरित्र को लेकर घबराहट महसूस होती है। नए डायरेक्टर, नए सहकलाकारों और नये तकनीशियनों के साथ जान पहचान न होने के कारण अमूमन आप संबंधों को विकसित होने देना चाहते हैं, जिसमें वक्त लगता है। जब तक फिल्म खत्म होती है, तब तक आप एक दूसरे से इस कदर जुड़ जाते हैं कि छूटने का अफसोस होता है।

आईपीएल के मैच चल रहे हैं। उसने भी अच्छा खासा समय लिया है। चाहे देखने में हो या बैठकर मैच के बारे में बात करने में । लेकिन, कुल मिलाकर ये कहूंगा कि ‘जेल’ की शूटिंग के दौरान बहुत मजा आया । एक ऐसा रोल करने का मौका मिला, जिसके पास संवाद बहुत कम है। मेरा किरदार सिर्फ अपनी आंखों से भावनाओं को व्यक्त करता है। मुश्किल है लेकिन हर नया किरदार अपने तरीके की मुश्किलें लाता ही है।

फिल्म पर्दे पर आने से पहले कई स्तरों से गुजरती है। जिसमें एडिटिंग एक बहुत बड़ा पहलू होता है। देखें, उस अवस्था के बाद फिल्म कैसी लगती है और मेरा अभिनय कैसा निकलकर आता है। आत्मशंका अभिनेता के साथ हमेशा ही जुड़ी रहती है। वो दुनिया के सामने क्यों न शर्ट के बटन खोल कर घूम रहा हो लेकिन अंदर से हमेशा घबराया होता है कि क्या वो हकदार है पैसे का, प्रेम का, नाम का, जो उसे मिल रहा है?

अभिनय करने से पहले वो घबराहट अपना बड़ा स्वरुप ले लेती है। नया चरित्र निभाने के समय वो कई बार अपने आपको इसी प्रश्न के घेरे में लेता है कि क्या वो अच्छा अभिनेता है। या फिर अभिनेता है या नहीं है। बड़ी पीड़ा होती है अभिनय करते हुए। उस पीड़ा के बाद काम सही निकल कर आ जाए तो उससे ज्यादा खुशी भी कहीं नहीं मिलती। मेरे ख्याल से हर रचनात्मक काम में कलाकार को ऐसी ही पीड़ा होती है।


राजनीति की गहमागहमी हमें सुनायी देती रहती है। क्रिकेट के चौके- छक्के मौके मिलने पर देखे जाते हैं। लेकिन, इन सबसे दूर हम अपनी एक बहूमूल्य फिल्म ‘जेल’ की गतिविधि में जुटे हैं। आशा करता हूं कि मुंबई इंडियंस अपना स्थान सेमीफाइनल में बना पाएगा। उम्मीद करता हूं कि एक स्वस्थ और काबिल सरकार हमें पांच सालों के लिए मिलेगी। ये प्रार्थना करता हू कि ‘जेल’ में जो मेहनत की, उसका फल हमें अच्छा मिलेगा।

इसी आशा, उम्मीद और प्रार्थना के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Saturday, April 25, 2009

जन्मदिन पर भावुक बनाया 'जेल' की यूनिट ने

कुछ दिनों से मैं करजक में ही हूं। किसी से बात नहीं हो पाती क्योंकि मोबाइल नेटवर्क ठीक नहीं है यहां। इस कारण सुकून भी है। लेकिन,थोड़ी परेशानी भी क्योंकि कहीं न कही मोबाइल फोन अब जीवन का हिस्सा भी बन चुका है।करज़क में एक रिजॉर्ट में रुका हूं। मेरे ठीक सामने वाले कमरे में फिल्म के अहम कलाकार नील नीतिन मुकेश ने अपना पूरा घर बसाया हुआ है। करज़क की खासियत ये है कि मुंबई शहर से थोड़ा सा दूर होने के बावजूद मुंबई की भागमभाग से अलग है।

यातायात की असुविधा के कारण करज़क पहुंचने में दो ढाई घंटे लग जाते हैं। यहां जिस स्टूडियो में काम चल रहा है,वो मेरे रिजॉर्ट से 15 मिनट की दूरी पर है। अमूमन रोल कुछ ऐसा है कि मेरी जरुरत दोपहर के खाने के बाद होती है। सुबह आराम से उठकर मेकअप कराके समय पर जरुरत के मुताबिक पहुंच जाता हूं।

23 अप्रैल को ही मेरा जन्मदिन गुजरा। उसके दिन दिन पहले ही घर जाकर आया था ताकि पत्नी को कहीं जन्मदिन छूटने का अहसास न हो। वैसे, हम दोनों का मानना है कि जन्मदिन के अवसर पर काम करना शुभ होता है। 'जेल' फिल्म की यूनिट ने मुझे उस वक्त आश्चर्यचकित कर दिया, जब मैं काम में व्यस्त था और सभी ने अचानक टेबल सजाकर उस पर मेरे नाम का केक लाकर रख दिया। थोड़ी शर्मिन्दगी हुई क्योंकि जन्मदिन ऐसे मनाना कभी अपने व्यवहार में रहा नहीं है। इतने लोगों ने जन्मदिन का गाना गाया। बधाई दी। केक खाया। काफी भावुक क्षण था। मन ही मन मैं सबको धन्यवाद दे रहा था।

'जेल' का अनुभव अभी तक अच्छा रहा है। भगवान से मैं यही प्रार्थना करता हूं कि आगे भी अच्छा रहे। मेरा अपना मानना है कि फिल्म से ज्यादा अनुभव का अच्छा होना जरुरी है तभी हम अच्छी फिल्म बना सकते हैं। तभी हम अच्छा काम कर सकते हैं।फिल्म के बारे में ज्याद बात नहीं कर सकता। सिर्फ इतना कह सकता हूं कि बहुत ही कम संवाद वाला चरित्र करते हुए, उसके भावों को प्रदर्शित करने में कठिनाई का सामना करते हुए, निर्देशक के सामने अपने आप को पूरी तरह समर्पित करते हुए एक अलग तरह का अनुभव हो रहा है।

मधुर भंडारकर मेरे 14 साल पुराने जान पहचान के हैं। उस वक्त हम दोनों संघर्ष करते थे। मधुर की सफलता से मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत खुशी होती है। इसलिए जब मधुर ने मुझे इस रोल का प्रस्ताव दिया तो बिना ज्यादा समझे सुने हुए मैंने स्वीकार कर लिया। क्योंकि मधुर के जीवन के किसी क्षण में उसकी सफलता का हिस्सा बनना चाहता था मैं। बाकी सब कुछ मैंने मधुर के ऊपर छोड़ा है,और मैं जानता हूं कि वो न्याय कर पाएगा।

एक दिन का ब्रेक मिला है। मुंबई जाकर फिर लौटूंगा। इस बीच, शूटिंग जारी रहेगी। ब्लॉग पर लिखना भी जारी रहेगा और आशा करता हूं कि जीवन भी जारी रहेगा।

फिलहाल इतना ही
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Monday, April 13, 2009

हद हो गई अभद्र बयानबाजी की !

हद हो गई है। अब तो न समाचार देखने को मन करता है, न पढ़ने का। इस बार के चुनाव में राजनेता न सिर्फ अपनी मर्यादा पार कर चुके हैं, बल्कि उसकी परिभाषा भी बदल चुके हैं। कोई किसी को कुचल रहा है, कोई किसी को काट रहा है। कोई किसी को मारने की धमकी दे रहा है। और कोई किसी के अस्तित्व को मिटाने की बात कर रहा है।

लेकिन, इसके बीच भी आपको मन को समझाना है कि प्रजातंत्र को बचाए रखने के लिए वोटिंग में हिस्सा लेना जरुरी है और इन्हीं में से किसी एक को चुनना है। इस लोकतंत्र का एक वोटर, जो पूरी तरह से अपना विश्वास खो चुका है- न सिर्फ इस तंत्र में बल्कि अपने आप में, उसे इस तरह की भाषा, इस तरह के भाषण और इस तरह के नेता कहीं से भी मदद नहीं कर रहे।

आज कोई भी पार्टी ये दावा नहीं कर सकती कि उसने अपने चुनाव प्रचार में जनता को निराश नहीं किया है। सभी ने किया। उनके हर नेता ने निराश किया। और अभी 16 तारीख दूर है। पता नहीं क्या क्या झेलना होगा और क्या क्या सुनना होगा। एक मजाक सा बन गया है ये चुनाव। और इस तरह के सारे चुनाव। किसी के पास कोई ठोस आदर्श नहीं हैं, न मेनिफेस्टो है, न विचारधारा है और न राजनीति है। मुझे हंसी आती है जब सबके सब ताल ठोंकर न सिर्फ चुने जाने का दावा करते हैं, बल्कि भविष्य के प्रधानमंत्री भी खुद को ही बताते हैं। सच कहूं कि हंसी के साथ डर भी लगता है कि कहीं इस तरह के तंत्र में यही व्यक्ति सबसे ऊंचे पद पर न बैठ जाए।

लेकिन,फिर भी दिल को कहता हूं हिम्मत न हारो। उम्मीद न छोड़ो। अराजकता से ही शायद एक सही रास्ता निकलेगा। अराजक तत्वों के बीच से ही शायद अचानक सही राजधर्म निभाने वाला आएगा।

वैसे, इन दिनों अपनी फिल्म 'जेल' की शूटिंग में व्यस्त हूं। फिल्म की आउटडोर शूटिंग के लिए करजक जा रहा हूं। वहीं पर रहना होगा। मुंबई में रहते हुए भी मुंबई से 100 किलोमीटर दूर रहना होगा। इस भीड़ भीड़ से दूर। इस अराजकता से दूर। कोशिश करुंगा कि प्रजातंत्र में अपने वोट देने के अधिकार का उपयोग कर पाऊं क्योंकि अधिकार के नाम पर यही तो है,जिसे हम पूरी तरह से उपयोग कर सकते हैं। सारे दोस्तों से यही गुजारिश है कि पार्टी और नाम पर न जाएं। सिर्फ उम्मीदवार के काम और चलन को देखने के बाद ही अपना वोट डालें।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, March 31, 2009

बदल रहा है मेरा व्यक्तित्व

कुछ दिनों से मेरी कोशिश रही है कि लोग मुझे चाहे जितना भी कठिन क्यों न समझें, या फिर मेरे बारे में ग़लतफ़हमियाँ पाले बैठे रहें या उनको किसी बात से नाराज़गी हो, जिसका मुझसे कोई लेना देना भी नहीं; मैं ही उन्हें स्वयं संपर्क करुँ और करता रहूँ, चाहे वो अपनी नाराज़गी दूर करना चाहें या न करना चाहें।

एक प्रयोग करते रहना भी सत्य की तरफ़ जाने का इशारा होता है। क्योंकि शत-प्रतिशत अपने बारे में कह पाना कि आप ही सही हैं, ये उचित होगा नहीं। हाल-फ़िलहाल में कई ऐसी घटनाएँ घटीं, जब किसी ने मेरे बारे में कोई ग़लतफ़हमी पाली, या उस व्यक्ति को मुझसे नाराज़गी हुई, जिससे मेरा कोई वास्ता नहीं था। फिर भी जब मैंने उस व्यक्ति की तरफ़ लगातार अपना हाथ बढ़ाया तो संबंध सुधरे या बिगड़े या फिर वैसे ही रहे। इन संबंधों से मुझ पर असर नहीं हुआ। दरअसल, असर उस प्रकिया से हुआ जो मैंने शुरु की है। मैं अपने व्यक्तित्व में एक बदलाव-सा महसूस कर रहा हूँ। और अच्छा लग रहा है। यहाँ पर आप ख़ुद के 'मैं' से ऊपर उठना चाहते हैं। एक सुखद अनुभूति होती है इससे।

कुछ महीनों से मेरी ये भी कोशिश रही है कि अगर किसी का काम मेरे दिल को छू जाए तो चाहे मैं उसे जानता हूँ या न जानता हूँ - उस व्यक्ति से ख़ुद ही संपर्क करके मैं उसे बता सकूँ कि मैंने उसके काम को किस हद तक सराहा है। उदाहरण के लिए 'मुंबई मेरी जान' के निर्देशक निशिकांत कामत, 'वेडनसडे' के निर्देशक नीरज पांडे और 'ओए लकी...' के निर्देशक दिवाकर बैनर्जी, 'देवडी' के निर्देशक अनुराग कश्यप, 'दिल्ली छः' के निर्देशक राकेश मेहरा और गुलाल के कुछ अभिनेता जिनके काम से मैं बहुत उत्साहित हुआ था। उनसे बात करके, उनके काम के बारे में चर्चा करके और उनको बधाइयाँ देकर मैंने जिस आनंद की अनुभूति की, वो मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता।

ऐसा नहीं था कि पहले लोगों का काम अच्छा नहीं लगता था। लेकिन पहले मैं ख़ुद उनसे संपर्क नहीं करता था। अनायास मुलाक़ात के वक़्त ही बधाई देता था। लेकिन, इस तरह के बदलाव और इस तरह के प्रयोग करने के बाद मेरे अंदर की बहुत सारी गांठें खुली हैं। और ये प्रक्रिया जारी रहेगी।

हाल फिलहाल में 'गुलाल' के गाने और संगीत को लेकर मेरे पुराने दोस्त पीयूष मिश्रा से बातचीत हुई। मुझे अच्छा लग रहा है कि पीयूष की प्रतिभा के बारे में अब लोग जानना शुरु कर चुके हैं। जिसके हम सब बड़े कायल रहे हैं। बहुत कुछ सीखा है उनसे। बहुत कुछ साथ में देखा, झेला और अनुभव किया है। मेरी शुभकामनाएँ पीयूष के साथ रही हैं और रहेंगी। और मेरा अपना मानना यह है कि हमने तो उनके कई रंग-रुप देखे हैं, दुनिया अब देखना शुरु करेगी। आप भी उनके काम का लुत्फ़ लीजिए। निश्चित तौर पर यह सिर्फ़ एक शुरुआत है। पीयूष को इन्हीं शुभकामनाओं के साथ...

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Wednesday, March 18, 2009

‘जेल’ में मैं नहीं गैंगस्टर

“राजनीति” की शूटिंग करके अभी भोपाल से लौटा हूं। ये शेड्यूल का अंतिम चरण था। अगल शेड्यूल सितंबर के पहले हफ्ते में शुरु होगा, जब सारे अभिनेताओं की तारीखें उपलब्ध होंगी। जब जब भोपाल जाना हुआ अच्छा लगा। एक अच्छा बदलाव था। मुंबई जैसे महानगर से बाहर निकलने के बाद ऐसा लगता है कि पहली बार सांस ले रहा है व्यक्ति।

मेरी दूसरी फिल्म “जेल” अप्रैल के दूसरे हफ्ते से शुरु होगी। मधुर भंडारकर इस फिल्म के निर्देशक हैं। खबर के विपरित मैं ये कहना चाहूंगा कि “जेल” में मेरा किरदार किसी गैंगस्टर का नहीं है। किसका है, क्या है, ये मैं अभी बताने में असमर्थ हूं। फिलहाल, उसकी तैयारियों में लगा हूं।

इस बीच दस दिन के लिए मेरे माता-पिता और भांजी का मेरे घर पर आना हुआ है। मैं और मेरी पत्नी शबाना उनके आने को लेकर खुश हैं। हमारी पूरी कोशिश है कि उनका दस दिन का मुंबई आगमन सुखद गुजरे।

इसी बीच चुनाव की गहमागहमी पर भी नजर रहती है। आज ये जानकर खुशी हुई की मेरे निर्देशक मित्र श्री प्रकाश झा लोकजनशक्ति पार्टी से बेतिया के लिए उम्मीदवार चुने गये हैं। मेरे पिता जी काफी खुश हैं। उनका ऐसा मानना है कि श्री प्रकाश झा जी बेतिया से लोकसभा के उम्मीदवार जरुर चुने जाएंगे। मेरे पिता जी का ऐसा मानना है कि श्री प्रकाश झा ने बेतिया में काफी काम किया है। काफी समय गुजारा है लोगों के बीच और लोग उनसे खुश हैं। सही बात है उन्होंने अगर काम किया है। लोगों के दुख दर्द को समझा है तो उनका चुना जाना उचित होगा। और मैं यही आशा करता हूं कि प्रकाश जी इस बार लोकसभा के न सिर्फ उम्मीदवार चुने जाएं बल्कि लोगों की इच्छाओं और आशाओं पर खरें उतरें। किसी ने मुझसे पूछा कि क्या फिल्मी दुनिया के लोगों का राजनीति में आना उचित है, तो मेरा जवाब यही था कि एक अपराधी की जगह पर अगर एक फिल्म कलाकार आता है तो वो लाख दर्जे अच्छा है। क्योंकि फिल्मवाला कहीं न कहीं सीधा लोगों से जुड़ा होता है। वो संजीदा होता है। और कहीं न कहीं लोगों को समझने की कोशिश होती है उसमें।

मेरी प्रार्थना है सारे वोटरों से कि कृपया पार्टी चुनाव चिन्ह पर न जाएं। सिर्फ होनहार और वास्तव में लोगों के बीच रहकर जिसमें काम करने की क्षमता हो, उसी को चुनें। मेरा अपना मानना है कि जब जब चुनाव आता है, तो उम्मीदवार के लिए परीक्षा की घड़ी नहीं होती। अगर परीक्षा की घड़ी किसी के लिए होती है तो वो हैं वोटर। मैं आशा करता हूं कि हम सब इस अवसर और इस अधिकार का समझदारी से उपयोग करेंगे। और एक सभ्य, समझदार, ईमानदार, निष्ठावान प्रतिनिधि को लोकसभा में भेजेंगे।

इसी आशा के साथ
आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Saturday, March 7, 2009

खोज जारी है.....

आज ही ख़त्म किया “राजनीति” का पहला शिड्यूल भोपाल में। वापस मुंबई जाने की तैयारी है। अच्छा समय निकला यहाँ। पहली बार नाना पाटेकर, अजय देवगन, अर्जुन रामपाल और कुछ एक थिएटर एक्टर, जिनका नाम लिखना चाहूंगा जैसे दयाशंकर पांडे और चेतन, इनके साथ काम किया और बहुत अच्छा समय निकला।

लगातार जद्दोजहद रहती है हर शॉट में। कोशिश रहती है कि उस समय की क़ाबिलियत और शक्ति के मुताबिक़ उस शॉट में अपनी अधिकतम ऊर्जा डाल पाऊँ। इसी में दिन निकल जाता है। जबतक आप अपने होटल के कमरे में पहुंचते हैं, आप मानसिक रुप से पूरी तरह से थक चुके होते हैं। अगले दिन के लिए आपको फ़िट भी रहना है, सो जिम भी जाना होगा। इसलिए थोड़ी शारीरिक मेहनत भी करनी होगी। पूरा दिन थकाने वाला होता है। खाने-पीने की सुध नहीं रहती। फिर भी करना तो है। क्योंकि यही सोचा था कि यही काम करेंगे। और कितने लोग हैं दुनिया में, जो वो करना चाहते थे, वही कर रहे हैं? मैं अपने आप को इस बारे में बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ।

ख़ैर, अभी मैंने भोपाल के दोस्त विजय जाजौरिया को बुलाया है। ताकि उनके साथ कुछ समय काट सकूँ। विजय भोपाल में ही रहता है। मेरे साथ दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। वो मेरे अच्छे दोस्तों में है। उससे मिलना कम होता है, क्योंकि भोपाल से मुंबई की दूरी कुछ ज़्यादा ही है। “शूल” की शूटिंग के दौरान भोपाल आया था, तब उससे मिला था। इस बार जब भी “राजनीति” की शूटिंग के लिए आता हूँ, उससे और उसके परिवार से मुलाक़ात हो जाती है। उसे ख़ुश देखना अच्छा लगता है। और वो ख़ुश है अपने परिवार के साथ, अपने व्यापार के साथ। विजय ने दिल्ली, मुंबई सब देखा लेकिन भोपाल का मोह नहीं छोड़ पाया। वो एक सुकून चाहता था, जो उसे भोपाल में मिला। उसने जीवन में शांति और सुकून को ज़्यादा महत्ता दी और वो इसीलिए भोपाल जैसी जगह पर रह गया। वो जैसा रहना चाहता था वैसा रह रहा है। मुझे उस पर गर्व है।

मैं आज जीवन के ऐसे दौर से गुज़र रहा हूँ, जहाँ पर मुझे मुंबई से निकलना ज़्यादा अच्छा लगता है। छोटे शहरों में शूटिंग करना ज़्यादा अच्छा लगता है। लोगों से ज़्यादा-से-ज़्यादा मिलना मुझे बहुत अच्छा लगता है। बड़े शहर अब रास नहीं आते हैं। लेकिन हमारे अभिनय का काम पूरी तरह से मुंबई में होने की वजह से कहीं-न-कहीं एक मजबूरी भी है बड़े शहर में रहने की। बहरहाल, मेरी शांति और सुकून की जद्दोजेहद और खोज जारी है। और मैं भी आशा करता हूँ कि इसका रास्ता भी मिल ही जाएगा।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Friday, February 27, 2009

अब तो स्लमडॉग को लेकर विवाद बंद हो...

स्लमडॉग मिलिनेयर बनी। प्रदर्शित भी हुई। और दुनिया भर में वाहवाही भी लूटी। हमारे अपनों ने इसमें भारी योगदान दिया है। दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कार के मंच पर भारत की प्रतिभा का प्रतिनिधित्व किया है। मैं ए आर रहमान, रसूल, श्री गुलजार साहब और फिल्म से जुड़े तमाम छोटे और बड़े भारतीय कलाकारों को बधाई देता हूं।

इस पूरी सफलता की यात्रा के बाद आज भी टेलीविजन चैनल पर बहस का दौर जारी है कि क्या पश्चिम के लोग हमारी गरीबी को बेचते हैं। हम कहीं से भी स्वीकार करने को तैयार ही नहीं कि जिस किसी को भी ये प्रतिष्ठा मिली है, उसने पूरे देश और देश की फिल्म इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व किया है और हमें उन पर गर्व होना चाहिए। बल्कि हम इसी खींचातानी में लगे हैं कि कैसे इनकी टांग पकड़कर नीचे किया जाए। कैसे हम साबित करें कि जो प्रतिष्टा हमारे कलाकारों को मिली है,उसमें उनका योगदान नहीं है। फिर से वही घिसी पीटी बहस जारी है कि गरीबी और गरीबी को भुनाने वालों के संबध क्या हैं।

शर्म आती है मुझे जब मैं लोगों की जलन को इस ऊंचाई तक जाते हुए देखता हूं। अगर आज इनको प्रतिष्ठा मिली है तो कल आपको भी मिलेगी। धैर्य रखें। और न भी मिले तो इस बात की संतुष्टि रखिए कि स्वर्गीय श्री सत्यजीत रे ,भानु अथैया सहित स्लमडॉग के कलाकारों ने इस फिल्म इंडस्ट्री का नाम और यहां के संगीत का लोहा दुनिया में मनवाया।उसे ऑस्कर के मंच से रोशन किया है। लेकिन, हममें से कई लोग फिर भी जलभुन कर राख हुए जा रहे हैं।

ये एक नाराजगी थी जो मैं यहां पर लिखना चाहता था। मन की भड़ास निकालना चाहता था। बाकी मेरे दिल में रहमान, रसूल, गुलजार साहब और सारे कलाकारों को देने के लिए हुत सारी बधाइयां हैं,जो मै अपने ब्लॉग के जरिए दे रहा हूं। वो इसे स्वीकार करें।

मैं चाहूंगा कि जो भी इसे पढ़े। पढ़ने के बाद और कुछ नहीं तो सिर्फ मेरे ब्लॉग के जरिए या किसी और माध्यम से उन कलाकारों तक अपनी बधाई पहुंचाए। तभी उनकी उपलब्धि सही मायने में कामयाब मानी जाएगी।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ
आपका मनोज बाजपेयी

Thursday, February 19, 2009

राजनीति और “राजनीति”

“राजनीति” की शूटिंग के लिए भोपाल गया था, पाँच दिन के लिए। कल रात ही वापस लौटा हूँ। इस बीच, “जुगाड़” का जितना प्रचार मुमकिन था, मैंने किया। भोपाल में भी कई पत्रकार मित्रों से इस सिलसिले में मिला। यहाँ तक कि रीलिज़ से एक दिन पहले एक थिएटर मालिक ने मुझे आमंत्रित किया था, जहाँ पत्रकारों का जमघट और प्रशंसकों की भीड़ थी। सबके साथ मिलना हुआ।

“जुगाड़” को प्रदर्शित हुए क़रीब एक हफ़्ता होने वाला है। मिली-जुली रिपोर्ट मिली। कुछ लोगों ने तारीफ़ की, तो कुछ लोगों ने इसे साधारण फ़िल्म बताया। अब मेरा दिमाग़ “जुगाड़” से बाहर आ चुका है। इस फ़िल्म की अच्छी यादों को अपने दिलो-दिमाग़ में लिए हुए अब मैं आगे बढ़ चुका हूँ, अगली फ़िल्म की तरफ़। जहाँ फिर कोशिश होगी कि आपको अच्छा स्वस्थ मनोरंजन दे सकूँ।

एक प्रशंसक मित्र ने श्री अजय ब्रह्मात्मज की जुगाड़ के बारे में लिखी समीक्षा मेरे ब्लॉग पर भेजी है। उसके लिए धन्यवाद। अजय ब्रह्मात्मज जी को भी इस समीक्षा के लिए धन्यवाद। हम अभिनेताओं का जीवन ही कुछ निराला है। फ़िल्म में बड़ी मेहनत से काम करते हैं। फ़िल्म रीलिज़ होने के बाद कुछ लोगों से वाहवाही लेते हैं, तो कुछ से आलोचना। वाहवाही लेकर भी आराम से बैठने का समय नहीं मिलता और आलोचना लेकर भी उदास होने के लिए समय निकाल पाना बड़ा कठिन होता है। आगे बढ़ना मजबूरी है।

कुछ लोगों ने मेरी राय जानने की कोशिश की राजनीति में आने को लेकर। हर चुनाव में निमंत्रण मिलता है, उम्मीदवारी के लिए। तक़रीबन हर पार्टी से। और मैं उन सभी पार्टियों का शुक्रगुज़ार हूँ कि वो मुझमें एक उम्मीदवार देखते हैं। लेकिन मैं अपने आपको अभी तक एक योग्य राजनीतिक उम्मीदवार के रुप में नहीं देख पाया हूँ। न ही खुद के भीतर के अभिनेता को छोड़ने का दुस्साहस कर सकता हूँ। अभिनय और परिवार - इसी में समय कट जाता है, फिर राजनीति के लिए समय कहाँ से दे पाऊंगा।

हाँ, “राजनीति” फ़िल्म के लिए पूरा समय है। और उसे करने में मज़ा भी बहुत आ रहा है। चूंकि बहुत सारे कलाकार हैं। तो कुछ दिन मेरी शूटिंग होती है, कुछ दिन नहीं। जब शूटिंग नहीं होती है, उस दिन की बाट जोहता हूँ कि कब शूटिंग पर जाना होगा। सच में बहुत मज़ा आ रहा है।

दिल्ली के रामजस कालेज की तरफ एक निमंत्रण आया है, उसे पढ़कर ख़ुशी हुई। लेकिन, जैसा मैंने कहा कि अभी “राजनीति” की शूटिंग में व्यस्त हूँ, क्योंकि समय निकाल पाना मुश्किल होगा। मेरे साथ कई कलाकार हैं और सभी की तारीख़ों का वापस मिलना मुश्किल है। लेकिन रामजस के छात्र साथियों का फिर धन्यवाद, जिन्होंने मुझे आमंत्रित किया ब्लॉग के ज़रिए।

अभी घर आया हूँ। बाक़ी कुछ काम निपटाऊंगा, तब तक फिर से भोपाल जाने का समय होगा। अभी बस, बाक़ी के व्यावसायिक काम और पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ इन्हीं की तरफ़ अपना ध्यान लगा रहा हूँ। जल्द लौटूंगा, इस वादे के साथ...

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Wednesday, February 11, 2009

'जुगाड़' : थोड़ा स्वार्थी हो जाऊँ

'जुगाड़' 12 फ़रवरी को रिलीज़ हो रही है। ऐसे में थोड़ा वाजिब है मेरा स्वार्थी हो जाना और आप लोगों को 'जुगाड़' के बारे में कुछ जानकारियाँ देना, साथ ही उत्साहित करना कि आप सभी लोग थिएटर में जाकर फ़िल्म देखें।

जुगाड़ फ़िल्म दिल्ली की एमसीडी की सीलिंग घटना से प्रभावित होकर लिखी गई कहानी है। फ़िल्म सीलिंग के बारे में नहीं है। यह एक सफल आदमी के संघर्ष की कहानी है, जिसका दफ़्तर रातों-रात सील हो जाता है। वो सड़क पर आ जाता है। फ़िल्म एक व्यंग्य है जुगाड़ मानसिकता को लेकर। ये हमारे समाज में बेपरवाह और बेझिझक शब्द के रुप में और मानसिकता के रुप में भी फैली हुई है। फ़िल्म आपको हँसाएगी भी, और फ़िल्म आपको सोचने के लिए मजबूर भी करेगी।

छोटे बजट की फ़िल्म है। ढेर सारे रंगमंच के कलाकार इसमें शिरकत कर रहे हैं। काफ़ी सारे लोगों की मेहनत है इसमें। फ़िल्म इतने छोटे बजट की है कि जब एक सीन में भीड़ की ज़रुरत पड़ी, तो प्रोड्यूसर ने पास की फ़ैक्ट्री में जाकर अफ़वाह फैला दी कि करीना कपूर शूटिंग कर रहीं हैं। सारे वर्कर करीना को देखने आए और उन्हें भीड़ की तरह हमने कैमरे में क़ैद कर लिया। कुछ इसी तरह के वाकयात हुए फ़िल्म को बनाने में।

हँसते-खेलते कुछ दिक़्क़तों को सहते हमने फ़िल्म को बनाया है। इस फ़िल्म की सारी शूटिंग दिल्ली में हुई। दिल्ली में मेरा पूरा परिवार रहता है। मेरे दोस्त रहते हैं। कॉलेज और रंगमंच की यादें हैं। हर गली से मेरा रिश्ता है। अंडे-पराठे, छोले-कुलचे, चिकन-टिक्का ये सभी अभी भी ज़हन में उसी तरह शामिल हैं। फ़िल्म की शूटिंग के दौरान हर गली, हर नुक्कड़ पर खाया और बीती हुई यादों को ताज़ा करने की कोशिश की। दिल्ली शहर के साथ मेरा ऐसा ही रिश्ता है। 'जुगाड़' की शूटिंग मेरे दिल्ली के संबंध को लेकर भी बहुत याद रहेगी। मुझे शायद ही कोई दिन याद हो, जब मैं शूटिंग के बाद कमरे में बैठा हूँ।

फिर भी, अगर आपको फ़िल्म पसंद आए तो हमारी सारी मेहनत सफल हो जाएगी। मैं फ़िल्में अपने विश्वास और यक़ीं से करता हूँ। कितनी ही बार सही साबित होता हूँ। कितनी ही बार ग़लत भी साबित होता हूँ। यह माध्यम ही कुछ ऐसा है। लेकिन, इतना ज़रुर कह सकता हूँ कि बाल-बच्चों के साथ देखने लायक फ़िल्म है। जो न सिर्फ़ आपका मनोरंजन करेगी, बल्कि थिएटर से बाहर जाने से पहले आपको कुछ-एक सामाजिक संदेश भी देगी।

अगर आपको फ़िल्म अच्छी लगे तो अपनी तरफ़ से बाक़ी दोस्तों को भेजना न भूलें। फ़िल्म के बारे में अपनी प्रतिक्रिया ब्लॉग के ज़रिए मुझ तक भी पहुँचाएँ। फ़िल्म बुरी लगे तो भी बताएँ ताकि मैं अगले प्रयास में शायद आपका स्वस्थ, सुखद मनोरंजन कर सकूँ।

इसी उम्मीद के साथ...

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Friday, February 6, 2009

कुछ अपनी, कुछ आपकी

रात को मुंबई पहुँचा तो भारत और श्रीलंका के बीच वनडे सीरिज़ का चौथा मैच चल रहा था। इन दिनों तो धोनी की टीम बुलंदियों पर है, और टीम जीते तो मैच देखने का मज़ा दोगुना हो जाता है। मैंने भी इसका आनंद लिया। लेकिन आज मैच की बात नहीं, क्योंकि मैच की बात की तो पूरी पोस्ट इसी पर लिख डालूंगा।

बहुत दिनों से पाठकों के कमेंट्स पर लिखने की सोच रहा था। टिप्पणियाँ निकाल भी लीं थीं। लेकिन मौक़ा नहीं मिल रहा था। सोचा, आज वक़्त भले थोड़ा है लेकिन ये काम भी कर दूँ।

सुप्रतिम बनर्जी समेत कई दोस्तों ने नयी फ़िल्मों के बारे में पूछा है, और मैं इससे ही शुरु करता हूँ। आजकल प्रकाश झा की फ़िल्म "राजनीति" की शूटिंग कर रहा हूँ। बीच में एक-एक दिन के लिए मुंबई आता हूँ, "जुगाड़" फ़िल्म के प्रचार के सिलसिले में। मैं अकेला अभिनेता हूँ इस फ़िल्म में, जिसे प्रचार-प्रसार की बड़ी ज़िम्मेदारी दी गई है। चूंकि जुगाड़ छोटे बजट की फ़िल्म है, अलग कहानी है, नया निर्माता है, नया निर्देशक है, इसलिए मेरी ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है। जुगाड़ इस महीने की 12 तारीख़ को सिनेमाघरों में आ जाएगी। मैं आशा करता हूँ कि दर्शक इसे देखने में उत्सुकता दिखाएंगे।

आदर्श राठौर साहब ने ठीक बात कही है कि ब्लॉग के ज़रिए मुलाक़ात हो रही है। दरअसल मेरा मानना है कि अब ये मुमकिन ही नहीं है कि दूर बैठे दो लोग लगातार मिल पाएँ। एक-दूसरे से अपने मन की बात कह पाएँ। रिश्तेदारों से दूरियाँ बन जाती हैं, भाई-बहनों से दूरियाँ बन जाती है। भावनात्मक स्तर पर नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्र और व्यवसाय में रहने के कारण। ब्लॉग ने मुझे एक मौक़ा दिया अपनी बात कहने का और आपसे सीधे जुड़ने का। मैं हमेशा आपको आमंत्रित करता हूँ कि आप मेरे ब्लॉग पर अपने दिल की बात कहें। आपका हमेशा स्वागत है।

सुशांत सिंघल भाई ने मोबाइल खोने के बाद एक कमेंट में कुछ सुझाव दिए। लेकिन सुशांत भाई, अभी-अभी थोड़े दिन पहले ही मैंने ई-मेल, सर्फ़िंग और फिर ब्लॉगिंग करना सीखा है। धीरे-धीरे नयी तकनीक समझ रहा हूँ। लेकिन, आपके सुझाव के लिए धन्यवाद।

एनडीटीवी के रवीश भाई के कमेंट भी देखे। एक कमेंट नववर्ष पर था। रवीश भाई, आपको भी नए साल की शुभकामनाएँ। आपका एक प्रोग्राम मैंने चैनल पर देखा, जिसमें आप दूसरे चैनलों की कड़े शब्दों में आलोचना कर रहे थे कि कैसे वे यूट्यूब से वीडियो निकालकर अपनी कहानियाँ गढ़ते हैं। मुझे कार्यक्रम अच्छा लगा। अच्छा यह लगा कि शायद पहली बार किसी पत्रकार ने अपने ही समाज की आलोचना का साहस जुटाया, जिससे वो सहमत नहीं था।

शशि जी, जुगाड़ की म्यूज़िक रीलिज़ के वक़्त आपकी पर्ची भीड़-भाड़ में मुझसे गिर गई। माफ़ करें। आप मुझे ई-मेल कर दें सवाल। शायद, तब मैं उनके जवाब दे पाऊंगा। मुझे बड़ी ख़ुशी होती है, जब आप लोग मुझसे इंटरव्यू के लिए कहते हैं। मुझे लगता है कि पत्रकार समूह का एक बड़ा वर्ग मुझसे बहुत स्नेह करता है। चंदन प्रताप जी, आप भी संभव हो तो ई-मेल कर दें। वैसे, दिल्ली में अगर मुलाक़ात मुमकिन हुई तो निश्चित तौर पर होगी।

कई पाठकों ने लिखा है कि मैं अपने संघर्ष -अपने क़िस्सों के बारे में लिखूँ। लेकिन भइया, मैं बोल-बोलकर थक गया हूँ कि 16 साल हो गए सिनेमा में। अपनी कहानी कहकर मैं भी बोर हो चुका हूँ। उन क़िस्सों का कहीं ज़िक्र आएगा तो ज़रुर लिखूंगा। लेकिन अब इस नए माध्यम का इस्तेमाल अपने दिल की बात, अपनी भड़ास और आप लोगों से संवाद करते हुए करना चाहता हूँ। अपनी कहानी कहने में नहीं।

क्रिएटिवकोना के हेमंत जी, अर्श, ख़ुशी, प्रवीण जाखड़, विक्षुब्ध सागर समेत कई पाठकों ने जुगाड़ की सफलता की कामना की है; उन सभी का तहे-दिल से धन्यवाद।

बहुत सारे कमेंट हैं। बहुत सारे सवाल हैं, जिनका जवाब देना चाहता हूँ। बाद में दूंगा। हाँ, यहाँ जर्मनी के सुमधुर और पाकिस्तान के शिराज़ का ज़िक्र ज़रुर करना चाहूंगा। सुमधुर को संभवतः अभीतक विश्वास नहीं है कि यह ब्लॉग मेरा है, तो उनसे कहना चाहता हूँ कि भइया अब तो छः महीने हो गए ब्लॉग लिखते हुए। यह मेरा ही ब्लॉग है और आप लोग अपने देश से दूर बैठ हमारी फ़िल्में देखते हैं - पसंद करते हैं - तो यह सुनकर अच्छा लगता है। पाकिस्तान के शिराज़ से कहना चाहता हूँ - अच्छा लगा सुनकर कि पाकिस्तान में भी मेरे प्रशंसक हैं और हाँ, आपको जो फ़िल्म पंसद आए - वो फ़िल्म भी आएगी। फ़िलहाल आप "जुगाड़" देखें।

इस बार के लिए इतना ही।

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Monday, January 26, 2009

नयी बिल्डिंग में पहला गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं। देश फिर से उठ खड़ा हो और शांति की राह पर चले। हमारे प्रधानमंत्री जल्द से जल्द अपने घर और काम पर लौटे, ऐसी मेरी भगवान से प्रार्थना है।

आज अपने सोसाइटी की मीटिंग अटेंड की। ऐसा करना मुझे अच्छा लगता है। इस बिल्डिंग के सारे लोगों से मिलना हो जाता है और बिल्डिंग को व्यवस्थित रखने के लिए होने वाले कामों की जानकारी मिल जाती है। आज सोसाइटी के लोगों ने झंडा फहराया और हम सभी ने ‘जन गण मन’ गाया। इस बिल्डिंग में मनाए पहले गणतंत्र दिवस की याद भी जेहन में दर्ज हो गई।

करीब एक साल हो चुके हैं मुझे इस घर में आए हुए। सब कुछ सही चल रहा है। इतने साल घर से दूर रहा। हर साल घर बदलता रहा कि अब चारदीवारियां घर सी नहीं लगती । जहां परिवार है, वो ही घर लगता है। ये विडंबना है एक शहर की और शहर में रहने वालों की। एक घर को बदल कर वो दूसरे में जाते रहते हैं। साथ रहता है तो सिर्फ परिवार और कुछ पुरानी यादों से जुड़ी हुई चीजें। लेकिन, यही ढर्रा है शहरों का। जीवन इसी के साथ आगे भी चलता है। किसी ने मुझसे कहा कि अब तो इसी में रहोगे या इसे भी बदलोगे। तो मेरा अनायास जवाब ये आया कि पता नहीं।

शायद कारण ये है कि जो घर गांव में छोड़ा उसके अलावा किसी और चारदीवारी को घर मान ही नहीं पाया। लेकिन,मैं खुश हूं । खुश इस बात से हूं कि ऊपर वाले का आशीर्वाद रहा और आप सभी का ढेर सारा प्यार रहा। परिवार का हमेशा से साथ रहा है। और यही सब मेरी चारदीवारियों से ज्यादा मायने रखती हैं।

गणतंत्र दिवस पर आप सबको मेरी शुभकामनाएं लेकिन आपकी शुभकामनाओं की जरुरत मुझे भी है।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Wednesday, January 21, 2009

क्या सब वास्तव में बदल रहा है?

सब कुछ बदल रहा है। समाज बदल रहा है। सांस्कृतिक विचारधारा बदल रही है। शिक्षा का स्तर बदल रहा है। ऐसा लोग कहते हैं। अगर वो कहते हैं तो सच में बदल रहा होगा। लेकिन,जो बदला है वो सबके सामने है। और वो है बराक ओबामा का पहले अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति के रुप में शपथ लेना। लोग कहते हैं कि अब सब कुछ अच्छा हो जाएगा। आशाएं बढ़ी हैं। उम्मीदें मुंह बाएं खड़ी हैं। भगवान करे ऐसा ही हो।

बदलाव की सख्त जरुरत है। मेरा अपना मानना है कि बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्र्पति हैं किसी और देश के नहीं। वो सिर्फ अमेरिका के नजरिए से ही पूरे विश्व को देखेंगे। ऐसा होना भी चाहिए। लेकिन हम भारतीय अगर अपने राष्ट्र के बारे में ही सोचें, राष्ट्र में होने वाले बदलाव के बारे में सोचें तो ही हम सबके लिए बेहतर होगा। हमें भी बहुत कुछ बदलना है। अगर कोई कहता है कि राष्ट्र बदलाव के दौर से गुजर रहा है तो मेरी थोड़ी सी सहमति उसके साथ होगी,ज्यादा नहीं।

हाल में हुए सत्यम के पूरे घोटाले ने हमें फिर अपने सिस्टम पर सोचने पर मजबूर कर दिया है। हां, इस बीच कोई सुखद घटना मुझे घटती दिखी तो वो है उमर अब्दुल्ला का युवा मुख्यमंत्री के रुप में शपथ लेना। अब समय आ चुका है जब नेतृत्व की दूसरी पीढ़ी सामने आए। क्योंकि आशाएं और उम्मीदें सिर्फ उन्हीं से की जा सकती हैं।

घर में बैठा टेलीविजन देख रहा हूं। और अमेरिका के बदलते रुप को ईर्ष्या की दृष्टि से निहार रहा हूं। मुझे एक बात ठीक से समझ नहीं आती कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था खराब हुई तो फिर भारत क्यों मंदी के दौर में जा रहा है। क्या इतना ज्यादा निर्भर हो गए हम अमेरिका पर। आखिर, सब कुछ तो अच्छा ही था यहां। शायद मेरी जानकारी थोड़ी है इसलिए क्षमा करें। लेकिन,दिमाग है तो सोचता रहता हूं। खैर,अपने मन की कुछ भड़ास आपके साथ बांट रहा था। बाकी की भड़ास फिर निकालूंगा।

हां,ब्लॉग पर कई कमेंट देखे हैं। इनमें कई सवाल भी हैं,कई सुझाव भी हैं। इस बारे में भी वक्त मिलते ही लिखूंगा।

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, January 11, 2009

'जुगाड़' से बेहाल

इन दिनों बहुत उलझा हुआ हूं। फिल्म 'राजनीति' के किरदार की तैयारी, उसके कॉस्ट्यूम फाइनल करना, निर्देशक प्रकाश झा के साथ हफ्ते में दो तीन बार बैठना, परिवार की जरुरत का ख्याल रखाना, कुछ स्क्रिप्ट को पड़ना और फिल्म 'जुगाड़', जो फरवरी में आ रही है, के प्रमोशन के लिए इधर से उधर भागना। व्यस्तता कुछ ऐसी कि ब्लॉग के लिए लिखने की फुर्सत ही नहीं मिल रही थी।

फिलहाल दिल्ली में हूं। 'जुगाड़' के प्रमोशन के लिए आया हूं। जुगाड़ एक व्यंग्यात्मक फिल्म है,जिसमें गंभीरता भी है। जुगाड़ एक प्रचलित शब्द है। इस फिल्म में जुगाड़ नाम के तंत्र पर कटाक्ष है, जो आपको हंसाएगी भी और रुलाएगी भी। जरुर देखें।

एक-दो दिन में वापस मुंबई चला जाऊंगा। यहां से जाकर अच्छा इसलिए भी लगेगा क्योंकि इलेक्शन का समय है और दिल्ली आते ही कुछ दोस्त मेरी राजनीतिक रुचि के बारे में जानना चाहता हैं। मैं बहुत घबरता हूं। नेता बनने का सपना कभी देखा नहीं था। अभिनेता बनने में बड़ा मजा आ रहा है। इलेक्शन फिर से सिर पर खड़े हैं। चारों तरफ सड़के और फ्लाई ओवर बनाए जा रहे हैं। हर कोई अपने लिए अच्छे से अच्छे उम्मीदवार चुनने में लगा है। लेकिन, इन सबमें हमारी जिम्मेदारी यही है कि हम एक समझदार और जिम्मेदार उम्मीदवार को ही अपना प्रतिनिधि बनाएं।

हाल फिलहाल में 'गजनी' देखी। एक अति दर्जे की बदले की भावना वाली कमर्शियल फिल्म कई साल बाद देखने को मिली। अच्छा लगा। बहुत सारी बचपन की यादें भी ताजा हो आयी। इन्हीं सब फिल्मों को देखर ही तो हम बड़े हुए हैं। मुझे अच्छा ये भी लगा कि आमिर ने पूरी विश्वसनीयता के साथ अपने किरदार को निभाने की कोशिश की है। एक ऐसे फिल्म के किरदार को जो पूरी तरह से कमर्शियल है। यही बात अमिताभ बच्चन की मुझे अच्छी लगती थी। आला दर्जे की मसाला फिल्मों में भी अपने किरदार के प्रति उनका विश्वास देखने लायक होता था। हाल फिलहाल में अमिताभ बच्चन जी पर लिखी एक किताब के विमोचन पर गया था। वहां अमित जी और आमिर से दोनों से मिलना हुआ। कई दिनों बाद अमित जी से मिलकर अच्छा लगा। उन्हें देखते ही बचपन की कई सारी यादें ताज हो आती है। और यकीं नहीं होता कि 'दीवार' वाला यह वही व्यक्ति है,जिसके डायलॉग सुनकर मैं रोमांचित हो जाता था। विश्वास ही नहीं होता कि मैं उस अभिनेता और व्यक्ति के पास खड़ा हूं। भगवान उन्हें लंबी उम्र दे।


बहरहाल, अब फिर निकलने का वक्त है। 'जुगाड़' के प्रमोशन में इंतजार कर रहे कुछ पत्रकार मित्रों से मिलने के लिए निकलूंगा। इन दिनों सिर्फ 'जुगाड़' के बारे में बात कर रहा हूं। थक गया हूं। बेहाल हूं। लेकिन,फिल्म के बारे में आप लोगों तक,दर्शकों तक मीडिया के जरिए बात पहुंचाना भी एक अभिनेता का कमिटमेंट है, उससे नहीं हटा जा सकता।

आज इतना ही,

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, January 1, 2009

आखिर,तारीख ही तो बदली है...

नए साल की शुरुआत हो चुकी है। हर साल की तरह पत्रकार फोन करते हैं। वो पूछते हैं कि इस साल आपने क्या संकल्प लिया है। और हर साल की तरह मन में कोई ऐसा संकल्प न होने के कारण उन्हें कुछ मनगढंत बातें कहनी पड़ती हैं। कारण ये कि मन का बोलने पर अमूमन वो बुरा मान जाते हैं। बाइट तो देनी ही पड़ेगी। झूठी ही सही। और मैं बुरा मानने वालों से थोड़ा तंग आ चुका हूं। इसलिए अब थोड़ा कन्नी काटकर निकलना ही उचित समझता हूं ताकि मैं खुश और सब खुश।

ये साल भी हर साल की तरह अपने आप में बहुत सारी आशाएं लेकर प्रवेश कर चुका है। बहुत सारी उम्मीदें दे रहा है। बहुत सारे सपने दिखा रहा है। और इंसान की अपनी फितरत है कि वो पीछे को छोड़कर आगे जाना चाहता है। चाहना, उम्मीद रखना, सपने देखना बहुत अच्छा है। लेकिन,साथ में अगर भूतकाल की परछाई लेकर चलें तो शायद सपने यथार्थ में तब्दील हो जाएं। या फिर सपने पूरे न भी हों तब भी नुकसान कुछ न हों। खैर, ये मेरी अपनी सोच है।

2008 जितने सपने पूरे कर सकता था कर गया। जितना नुकसान कर सकता था कर गया। लेकिन,हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि 2008 में हमसे गलतियां भी बहुत हुई हैं। चाहे भले ही परिस्थितियों का दोष क्यों न रहा हो। भले ही हम जग को जाहिर न करें अपनी गलतियों के बारे में। फिर भी उसके बारे में सजग रहकर 2009 में कदम बढ़ाएं तो शायद क्षति का प्रतिशत घट जाएगा।

मैंने ऐसा कुछ संकल्प लिया नहीं है। न मैं इसमें विश्वास रखता हूं। सपने देखना बंद नहीं करता। लेकिन,सपनों पर निर्भर नहीं करता हूं। जैसा अगला दिन होता है,उसी प्रकार जीता हूं और मैं इसमें खुश हूं। फिर भी आशा करता हूं कि 2009 सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, पूरे भारतवर्ष और पूरे विश्व के लिए एक शांतिमय माहौल लेकर आए। जहां बिना आतंकवाद, दुर्घटना या प्राकृतिक विपदा के हम अपने जीवन को जी सकें। और हम सब विकास के रास्ते पर चलें। विकास जो हमें शांति दे,शिक्षा दे और हमारे विश्व को गरीबी से निजाद दिलाए।

इन्हीं सब बातों के साथ मैं आज अपने कदम घर से बाहर निकालूंगा। 2009 के आसमान को एक पल के लिए निहारुंगा और फिर अपने काम में जुट जाऊंगा। ठीक वैसे ही, जैसा 31 दिसंबर को मैं तल्लीन था अपने काम में।

आखिर तारीख ही तो बदली है,बाकी तो खुद को ही बदलना है।


आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं ।

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी