Wednesday, February 11, 2009

'जुगाड़' : थोड़ा स्वार्थी हो जाऊँ

'जुगाड़' 12 फ़रवरी को रिलीज़ हो रही है। ऐसे में थोड़ा वाजिब है मेरा स्वार्थी हो जाना और आप लोगों को 'जुगाड़' के बारे में कुछ जानकारियाँ देना, साथ ही उत्साहित करना कि आप सभी लोग थिएटर में जाकर फ़िल्म देखें।

जुगाड़ फ़िल्म दिल्ली की एमसीडी की सीलिंग घटना से प्रभावित होकर लिखी गई कहानी है। फ़िल्म सीलिंग के बारे में नहीं है। यह एक सफल आदमी के संघर्ष की कहानी है, जिसका दफ़्तर रातों-रात सील हो जाता है। वो सड़क पर आ जाता है। फ़िल्म एक व्यंग्य है जुगाड़ मानसिकता को लेकर। ये हमारे समाज में बेपरवाह और बेझिझक शब्द के रुप में और मानसिकता के रुप में भी फैली हुई है। फ़िल्म आपको हँसाएगी भी, और फ़िल्म आपको सोचने के लिए मजबूर भी करेगी।

छोटे बजट की फ़िल्म है। ढेर सारे रंगमंच के कलाकार इसमें शिरकत कर रहे हैं। काफ़ी सारे लोगों की मेहनत है इसमें। फ़िल्म इतने छोटे बजट की है कि जब एक सीन में भीड़ की ज़रुरत पड़ी, तो प्रोड्यूसर ने पास की फ़ैक्ट्री में जाकर अफ़वाह फैला दी कि करीना कपूर शूटिंग कर रहीं हैं। सारे वर्कर करीना को देखने आए और उन्हें भीड़ की तरह हमने कैमरे में क़ैद कर लिया। कुछ इसी तरह के वाकयात हुए फ़िल्म को बनाने में।

हँसते-खेलते कुछ दिक़्क़तों को सहते हमने फ़िल्म को बनाया है। इस फ़िल्म की सारी शूटिंग दिल्ली में हुई। दिल्ली में मेरा पूरा परिवार रहता है। मेरे दोस्त रहते हैं। कॉलेज और रंगमंच की यादें हैं। हर गली से मेरा रिश्ता है। अंडे-पराठे, छोले-कुलचे, चिकन-टिक्का ये सभी अभी भी ज़हन में उसी तरह शामिल हैं। फ़िल्म की शूटिंग के दौरान हर गली, हर नुक्कड़ पर खाया और बीती हुई यादों को ताज़ा करने की कोशिश की। दिल्ली शहर के साथ मेरा ऐसा ही रिश्ता है। 'जुगाड़' की शूटिंग मेरे दिल्ली के संबंध को लेकर भी बहुत याद रहेगी। मुझे शायद ही कोई दिन याद हो, जब मैं शूटिंग के बाद कमरे में बैठा हूँ।

फिर भी, अगर आपको फ़िल्म पसंद आए तो हमारी सारी मेहनत सफल हो जाएगी। मैं फ़िल्में अपने विश्वास और यक़ीं से करता हूँ। कितनी ही बार सही साबित होता हूँ। कितनी ही बार ग़लत भी साबित होता हूँ। यह माध्यम ही कुछ ऐसा है। लेकिन, इतना ज़रुर कह सकता हूँ कि बाल-बच्चों के साथ देखने लायक फ़िल्म है। जो न सिर्फ़ आपका मनोरंजन करेगी, बल्कि थिएटर से बाहर जाने से पहले आपको कुछ-एक सामाजिक संदेश भी देगी।

अगर आपको फ़िल्म अच्छी लगे तो अपनी तरफ़ से बाक़ी दोस्तों को भेजना न भूलें। फ़िल्म के बारे में अपनी प्रतिक्रिया ब्लॉग के ज़रिए मुझ तक भी पहुँचाएँ। फ़िल्म बुरी लगे तो भी बताएँ ताकि मैं अगले प्रयास में शायद आपका स्वस्थ, सुखद मनोरंजन कर सकूँ।

इसी उम्मीद के साथ...

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

26 comments:

राजीव तनेजा said...

बिलकुल देखेंगे जी..और सपरिवार देखेंगे...वैसे आपने भीड़ इकट्ठी करने का सही जुगाड़ बताया....तालियाँ

कुश said...

करीना वाली बात से तो लिखता है.. फिल्म बनाने में भी काफ़ी जुगाड़ लगा है.. चार पाँच महीने पहले जब इंडिया एफ एम पर फिल्म की कहानी पढ़ी तब भी बहुत अच्छी लगी थी.. आज सुबह ही सोच रहा था की फ्राइडे नाइट जुगाड़ देखूँगा और सनडे को बिल्लू... सुना है फिल्म में बक्शी का रोल बढ़िया है..

अविनाश वाचस्पति said...

और अगर कोई जुगाड़ को

जुगाड़ लगाकर ही देख ले

तो .........

कंचन सिंह चौहान said...

ज़रूर देखूँगी और पूरी ईमानदारी से बताऊँगी फिल्म कैसी लगी...!

*KHUSHI* said...

hahaha kya sahi idea lagaya bheed ekkatha karne ka, acha laga film banatey banatey ander ki baatein jaane ka.aap ko apne purane din yaad aa gaye?? wohi to humne aapse pichle post mai poocha tha.
Jugaad to dekhni hai.. aur jab dekhungi uske agle din aap ko report dungi ki kaisi lagi.

bhawna said...

film jaroor dekhungi lekin blog ke jariye film ke bare me likhna swarthi hona nahin kahna chahiye. ye film aapse aapke kaam se judi hai aur blog apne aap ko, aur apni gatividhiyon ,soch ko vyakt karne ka bhi ek jariya hai. to... nahin ji aap swarthi nahin hain.
film ke liye subhkaamnayein

मुंहफट said...

वह्ह-वह्ह बाजपेई भैया....फिलिम दिखावै का बड़ा सही जुगाड़ निकाला है. दिल्ली क्या, हम यूपी वाले भी फिदा हैं. बस इतना बताइ दीजै कि भीड़ जुटावै के लिए करीना का ही नाम क्यों उड़वाया, कैटरीना का किसी से मद्धिम रही. अब जरा अपने बिलाग पर बताइएगा कि राजनीति कब आ रही है. एक बात और. प्रकाश झा का परचार करने तो चुनाव में कत्तई मत जाइएगा. आपका अभिनय जितना अच्छा है, ई फिलिम वालों ने आपको उतना मौका भला दिया कहां. आपकी कोई भी फिलिम बिना देखे छोड़ता नहीं हूं. ....तो आखिर में यह भी जान लीजिए कि आपके बिलाग के बहाने आप तक पहुंचने का मैंने भी सही जुगाड़ निकाल लिया है.

शिवराज गूजर. said...

jugad ke liye badhai ho manoj ji. ham sab doston ki shubkamnayen aapke saath hain. haum log jaroor aapki yah film dekhenge or doston ko or unke parivaar walon ko bhi kahenge ki wo ya fil jaroor dekhen. hamari yahi duaa hai ki aapki yah film super-dupr hit ho.

creativekona said...

आदरणीय मनोज जी ,
आप अपनी फ़िल्म रिलीज होने के एक दिन पहले लोगों को यदि उस फ़िल्म के बारे में कुछ बता रहे हैं तो इसमें स्वार्थी होने की कोई बात ही नहीं है.आप देखिये की जब कोई रंगकर्मी अपने किसी नाटक का मंचन करता है तो उसे देखने के लिए आमंत्रण पत्र भेजता है.,लेखक की किताब छपती है तो उसके विमोचन के समय लोगों के pas bulava bhejata है ,फ़िर एक फ़िल्म कलाकार क्या अपनी फ़िल्म के बारे में अपने ब्लॉग पर नहीं लिख सकता .और ये तो विज्ञापन का जमाना है ही .मैं जरूर देखूँगा ये फ़िल्म और इसके बारे में आपको बताऊंगा भी .फ़िर से एक बार जुगाड़ की सफलता की शुभकामनाओं के साथ.
हेमंत कुमार

aditya pujan said...

जी हां, आजकल इस जुगाड़ टेक्‍नोलॉजी के ही तो जलवे हैं और आपने भी अपनी फिल्‍म की पब्लिसिटी का ये अच्‍छा जुगाड़ ढूंढ निकाला। बढिया। वैसे आप जैसे कलाकारों से ब्‍लॉग के माध्‍यम से मिलना अच्‍छा लगता है।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वाजपेयी जी, आज प्रथम बार वो भी अचानक ही आपके ब्लाग पर आने का अवसर प्राप्त हुआ.यहां आकर जब आपके बारे में पढा तो अच्छा लगा.
यूं तो सिनेमा/फिल्म वगैरह से हमारा कोई विशेष लगाव नहीं है, लेकिन फिर भी लीक से हटकर चलने वाले चन्द कलाकार ऎसे हैं(जिनमे आप भी सम्मिलित हैं), जिन्हे देखना अच्छा लगता है.
ईश्वर से कामना करता हूं कि आपकी ये फिल्म सफल हो. एवं आप हिन्दी सिनेमा के माध्यम से जीवन में सफलता के नए आयाम स्थापित करें.

rohit said...

aapki yahi emandari aapki acting me bhi dikhti hai.film jaroor dekhuga.hmari subhkannaye aap ke sath hai........

Praveen Sharan said...

प्रिय मनोज जी,

पहले तो आपको आपकी आने वाली फिल्मों के लिए ढेर सारी शुभकामनायएं. मैं आपका प्रशंसक तबसे हूँ जब आप स्वाभिमान मैं आया करते थे. आज आपका वहां से चलकर इतना आगे आ जाना वाकई सुखद है.
मैं आपके ब्लोग्स काफ़ी समय से पड़ रहा हूँ. शुरुआत मैं तो विश्वास ही नहीं हुआ था की ये आप ही हैं. पर अब अच्छा लगता है आपसे रूबरू होना.
एक बात जो आपके ब्लॉग की विशेषता है वो ये है की इसे पड़ते समय कभी ये एहसास नहीं होता की किसी इतने बड़े स्टार से बात हो रही है. हमेशा ऐसा लगता है की हमारा ही कोई दोस्त है जो मुंबई मैं रह रहा है और आपनी आप बीती सुनाता रहता हैं. आप इसी तरह अच्छा और गुणवत्ता भरा काम करते रहें यहीं कामना करता हूँ.
मैं लॉस अंग्लेस मैं रहता हूँ कभी इस तरफ़ आइये तो जरूर इतेला करियेगा. आपसे मिलने की बड़ी ख्वाहिस है.

धन्यवाद
प्रवीण श्रीवास्तव

Babu said...

Manoj ji, we have already decided to watch Jugad with my family. Hope you shall make us laugh a lot. Aur manoj bhai ek to main aapka fan hun aur Jugad men hamare Monsoon Wedding ke pyare Dube ji bhi to hain. Best of Luck for the film and all of you. See you all in the theater ... Umesh Kumar

rahul.ranjan said...

Hello sir!
kafi dine se apke kisi film ka intizar tha. aj achha lag raha hai.
apke bare me net par dekh raha tha tab apke is blog ka pata chala.... apke is pahlu(lekhan) se ru ba ru ho raha hun ... jo mere liye ek dam nya hai... Barak Obama ke bare likha bahut pasand aya.
film dekhane ke bad phir sampark karta hun..
waise bhagwan ne chaha to apke sath ek film banane ki tammana hai... wo puri jarur hogi ek din..
rahul Ranjan
bhukjonhi.blogspot.com

sushant said...

jugaad......sabse pahle iss film k liye dher sari shubhkamnaye.....aaj k daur me koi bhi karya bina iss shabd JUGaad K sambhav nahi....bheed jutane k alawa aur kya-2 jugaad kiye gaye hai is film me wo to dekhne k baad pata chalega...
waise bhi iss kshetra se sambandh rakhta hu shayad hi koi film miss karta hu......
pahli baar aapke BLOG me aaya hu.........Din bhar aapke articles hi padhta raha.....kafi achha laga.......
Film k bare me apni rai film dekhne k baad dunga.....

Irshad said...

निर्माता संदीप कपूर ने चाहा होगा कि उनकी जिंदगी के प्रसंग को फिल्म का रूप देकर सच, नैतिकता और समाज में प्रचलित हो रहे जुगाड़ को मिलाकर दर्शकों को मनोरंजन के साथ संदेश दिया जाए। जुगाड़ देखते हुए निर्माता की यह मंशा झलकती है। उन्होंने एक्टर भी सही चुने हैं। सिर्फ लेखक और निर्देशक चुनने में उनसे चूक हो गई। इरादे और प्रस्तुति के बीच चुस्त स्क्रिप्ट की जरूरत पड़ती है। उसी से फिल्म का ढांचा तैयार होता है। ढांचा कमजोर हो तो रंग-रोगन भी टिक नहीं पाते।
जुगाड़ दिल्ली की सीलिंग की घटनाओं से प्रेरित है। संदीप कपूर की एक विज्ञापन कंपनी है,जो बस ऊंची छलांग लगाने वाली है। सुबह होने के पहले विज्ञापन कंपनी के आफिस पर सीलिंग नियमों के तहत ताला लग जाता है। अचानक विज्ञापन कंपनी सड़क पर आ जाती हैं और फिर अस्तित्व रक्षा के लिए जुगाड़ आरंभ होता है। इस प्रक्रिया में दिल्ली के मिजाज, नौकरशाही और बाकी प्रपंच की झलकियां दिखती है। विज्ञापन कंपनी के मालिक संदीप और उनके दोस्त आखिरकार सच की वजह से जीत जाते हैं।
रोजमर्रा की समस्याओं को लेकर रोचक, व्यंग्यात्मक और मनोरंजक फिल्में बन सकती हैं। जुगाड़ में भी संभावना थी, लेकिन लेखक और निर्देशक ने ज्यादा रिसर्च नहीं किया। सिर्फ एक विचार को लेकर वे फिल्म बनाने निकल पड़े। इस विचार का ताना-बाना इतना कमजोर है कि समर्थ अभिनेताओं के बावजूद कहानी चारों खाने चित्त हो जाती है। दृश्यों की परिकल्पना सुसंगत नहीं है। संवादों में दोहराव है। एक प्रसंग में फिल्म का नायक पांच पंक्तियों में तीन बार जरूरत शब्द का बेजरूरत इस्तेमाल करता है। संवाद सपाट हों तो दृश्य में निहित भाव प्रभाव नहीं पैदा कर पाते। आश्चर्य होता है कि मनोज बाजपेयी जैसे सशक्त और समर्थ अभिनेता फिल्में चुनने में ऐसी गलती कैसे कर रहे हैं। अपनी संजीदगी और प्रतिभा के दम पर वे किसी कमजोर और ढीली फिल्म से दर्शकों को नहीं बांध सकते। इस फिल्म में मनोज बाजपेयी के साथ विजय राज, गोविंद नामदेव और संजय मिश्र जैसे अभिनेता भी थे, लेकिन निर्देशक ने किसी का उचित उपयोग नहीं किया है। जुगाड़ अच्छे इरादों को लेकर बनी साधारण फिल्म है।
अजय ब्रह्मात्मज
द्वारा इरशाद अली

PRIYANK DUBEY said...

its a very gud film. u r increadible...as usual..people are having fun in theatres. gd luck bhai...regards,priyank

कुमार आलोक said...

जुगाड तो देखूंगा ही लेकिन सुना है कि आनेवाले आमचुनाव में आप भी किसी पार्टी के टिकट के लिये बिहार से जुगाड में है ...सच है तो बताइयेगा । आप जैसे लोगों को तो राजनीति में अवश्य आना चाहिये ।

KANISHKA KASHYAP said...

bhaiya! raua ta aghari aitna vyast baani ki.. kabo pahilka din ke yaad taza kare khatir, promotiono ke bahane ..mandi house ki or aayin.. bada niman laagi.

Nitish Raj said...

दायित्व आप पर ज्यादा ही होगा फिल्म के टाइटल से ही लगता है। लेकिन साथ ही दिल्ली की किन किन जगह पर आपने शूटिंग की वो फिल्म देख कर कुछ तो अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन बताना तो आपको ही होगा, कुछ फिल्म से जुड़े किस्सों के साथ एक लेख हो जाए। चाहेंगे की कम लागत में बनी ये फिल्म पिछले दिनों कम लागत की फिल्मों की तरह ही सुपरहिट हो जाए।

vrush said...

मनोज जी,

ये आपके फ़िल्म की समीक्षा है "नई दुनिया" अखबार में. यहाँ समीक्षक "अनहद" ने फ़िल्म के साथ आपकी और आशुतोष राणा की समीक्षा भी कर दी है. हालाकि ये मेरे विचार नहीं हैं फिर भी में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.

धयन्वाद,
रवि कपूर

फिल्म को निर्देशक का माध्यम कहा ही इसलिए जाता है कि इसमें अच्छे से अच्छे कलाकार को भी बुरा निर्देशक चौपट कर सकता है और बुरे अभिनेता से भी अच्छा अभिनय करवा कर कामयाब फिल्म बना सकता है। फिल्म "जुगाड़" में निर्देशक के पास मनोज वाजपेयी जैसा समर्थ अभिनेता था, विजय राज जैसा मंझा हुआ कलाकार था, रिशिता भट्ट जैसी हीरोइन थी, कुछ कलाकार ऑफिस-ऑफिस वाले भी थे, गोविंद नामदेव भी थे, फिर भी निर्देशक आर. आनंद कुमार कोई तीर नहीं मार सके। बहुत ही बचकाने आइडिए पर ये फिल्म बनी है। जुगाड़ शब्द के आस-पास फिल्म की कहानी रची गई है और निर्देशक को भी इस शब्द से विशेष प्यार है।

कहानी का आधार दिल्ली में पिछले दिनों हुई एक सरकारी कवायद है, जिसमें रहवासी इलाकों से ऑफिस हटाए गए थे। निर्माता संदीप कपूर शायद उस हादसे के भुक्त -भोगी हैं। तभी उन्हें यह मुगालता हुआ कि उनकी आपबीती पर फिल्म बने और उसे दुनिया देखेगी। फिराक गोरखपुरी का शेर है- सबको अपने-अपने दुःख हैं, सबको अपनी-अपनी पड़ी है/ ऐ दिले-गमगीं तेरी कहानी कौन सुनेगा, किसको सुनाएँ? फिल्म में मुख्य किरदार मनोज वाजपेयी निभा रहे हैं और उनका नाम भी संदीप कपूर ही है। इससे और भी लगता है कि ये निर्माता की रामकहानी है। मगर ऑफिस बंद होना इतना बड़ा दुःख शायद नहीं होता। ऑफिस बंद होने से बैंक खाते नहीं सील हो जाते। मनोज वाजपेयी यहाँ कुछ ज्यादा ट्रेजिक हो गए हैं।

खैर इस पर तो बहस हो सकती है कि ऑफिस सील हो जाने से आदमी कितना दुःखी होता है, पर इस पर कतई बहस नहीं हो सकती कि फिल्म का निर्देशन बेहद बुरा है। अगर मनोज वाजपेयी को ऐसे निर्देशक और ऐसी ढीली स्क्रिप्ट पर काम करना पड़ रहा है, तो समझा जा सकता है कि वे कितने बुरे दिन गुज़ार रहे हैं। "सत्या" की कामयाबी के बाद "वीर-ज़ारा" ही उनकी उल्लेखनीय फिल्म थी। इसके बाद मनोज वाजपेयी ने न जाने कैसे फैसले लिए कि दिखाई देना ही बंद हो गए और अब दिखे भी हैं तो इस बकवास-सी फिल्म में। आशुतोष राणा के साथ भी यही हुआ। ये दोनों ही बहुत प्रतिभाशाली होने के बावजूद सफल नहीं हैं और कारण है इनके फैसले। दोनों ने जमकर रोल ठुकराए हैं और हीरो का रोल माँगा है। दोनों को ही खलनायक के रोल मिल सकते थे। अन्य छोटे-मोटे रोल जब अजनबियों को मिल जाते हैं, तो इनको भी मिल जाते मगर गलत सलाहों के कारण दोनों डूब गए। जहाँ तक जुगाड़ का सवाल है इसे इस साल की सबसे कमज़ोर फिल्म बेहिचक कहा जा सकता है।

-अनहद
नई दुनिया

singhsdm said...

जुगाड़ के लिए हमारी तो पहले से ही शुभकामनाएं. हम तो आपके ऐसे प्रशंसक हैं की कोई भी फ़िल्म देखना नही भूलते ........

Gagagn Sharma, Kuchh Alag sa said...

क्या सत्या, जुबेदा या पिंजर के लिये लोबिंग की थी? तो अब क्यूं मन में डर समा रहा है? अच्छी होगी तो जरूर लोग देखेंगे। लाफिंग के मंच से किये गये प्रोपेगंडे का क्या फायदा मिला था। आपकी पहचान अलग हट कर है इस तरह की दुकानदारी से हमें हीन भावना का एहसास होता है।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

ज़रूर देखल जाई भाई जी…

atulkushwaha said...

मजेदार आलेख है... बालीवुड टाकीज में आपका स्वागत है... अतुल