Friday, February 27, 2009

अब तो स्लमडॉग को लेकर विवाद बंद हो...

स्लमडॉग मिलिनेयर बनी। प्रदर्शित भी हुई। और दुनिया भर में वाहवाही भी लूटी। हमारे अपनों ने इसमें भारी योगदान दिया है। दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कार के मंच पर भारत की प्रतिभा का प्रतिनिधित्व किया है। मैं ए आर रहमान, रसूल, श्री गुलजार साहब और फिल्म से जुड़े तमाम छोटे और बड़े भारतीय कलाकारों को बधाई देता हूं।

इस पूरी सफलता की यात्रा के बाद आज भी टेलीविजन चैनल पर बहस का दौर जारी है कि क्या पश्चिम के लोग हमारी गरीबी को बेचते हैं। हम कहीं से भी स्वीकार करने को तैयार ही नहीं कि जिस किसी को भी ये प्रतिष्ठा मिली है, उसने पूरे देश और देश की फिल्म इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व किया है और हमें उन पर गर्व होना चाहिए। बल्कि हम इसी खींचातानी में लगे हैं कि कैसे इनकी टांग पकड़कर नीचे किया जाए। कैसे हम साबित करें कि जो प्रतिष्टा हमारे कलाकारों को मिली है,उसमें उनका योगदान नहीं है। फिर से वही घिसी पीटी बहस जारी है कि गरीबी और गरीबी को भुनाने वालों के संबध क्या हैं।

शर्म आती है मुझे जब मैं लोगों की जलन को इस ऊंचाई तक जाते हुए देखता हूं। अगर आज इनको प्रतिष्ठा मिली है तो कल आपको भी मिलेगी। धैर्य रखें। और न भी मिले तो इस बात की संतुष्टि रखिए कि स्वर्गीय श्री सत्यजीत रे ,भानु अथैया सहित स्लमडॉग के कलाकारों ने इस फिल्म इंडस्ट्री का नाम और यहां के संगीत का लोहा दुनिया में मनवाया।उसे ऑस्कर के मंच से रोशन किया है। लेकिन, हममें से कई लोग फिर भी जलभुन कर राख हुए जा रहे हैं।

ये एक नाराजगी थी जो मैं यहां पर लिखना चाहता था। मन की भड़ास निकालना चाहता था। बाकी मेरे दिल में रहमान, रसूल, गुलजार साहब और सारे कलाकारों को देने के लिए हुत सारी बधाइयां हैं,जो मै अपने ब्लॉग के जरिए दे रहा हूं। वो इसे स्वीकार करें।

मैं चाहूंगा कि जो भी इसे पढ़े। पढ़ने के बाद और कुछ नहीं तो सिर्फ मेरे ब्लॉग के जरिए या किसी और माध्यम से उन कलाकारों तक अपनी बधाई पहुंचाए। तभी उनकी उपलब्धि सही मायने में कामयाब मानी जाएगी।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ
आपका मनोज बाजपेयी

21 comments:

इरशाद अली said...

मनोज जी आप भले और साफ दिल के आदमी है, इसलिए ऐसी बातें करते है, लेकिन सिक्के के दूसरे पहलू को जानना भी जरूरी है। बालीवूड दूनिया में दूसरे नम्बर पर है। यहां की फिल्में अब दुनियाभर के लिए है। जब-जब भारत की कोई सून्दरी मिस वल्र्ड या मिस यूनिवर्स बनती है बल्कि बार-बार बनती है तो इसका मतलब ये नही लेना चाहिए सून्दरता हमारे यहा बेतहाशा है बल्कि ये जानना चाहिए कि अब हम अन्र्तराष्ट्रीय बाजार का हिस्सा हो रहे है इसलिए वो हमें मिस वल्र्ड की उपाधियों से नवाजते है। ऐसा ही अबकी बार हुआ एक लम्बे अर्से से आस्कर हमारे पास नही था। लेकिन स्लमडाॅग को बहाना बनाकर हमें ये दे दिया गया। जिस गीत के लिए आस्कर मिला है वो पहले रहमान ने यूवराज के लिए बनाया था लेकिन सूभाष जी को वो गीत पसन्द ही नही आया। दूसरी सबसे बड़ी बात कि भारत में रहमान ही अब उस श्रेणी में आते है जिनको इस सम्मान से नवाजा जा सकता था। और साथ में गुलजार साहब भी। क्योकि गुलजार साहब का लेखन जिस तरह का है उसके आस-पास भी हमारे बालीवुडिया लिखने वाले फटकते भी नही। आप गवाह रहना मैं भविष्यवाणी कर रहा हूं हम फिर से अगला आस्कर लेने वाले है। शेखर कपूर भारत के लिए अगला आस्कर जीतेगे। अब इसकी झड़ी लगने वाली है।

अंशुमाली रस्तोगी said...

मनोजजी, मैं जानता हूं आप इसका विरोध नहीं करेंगे क्योंकि आप भी उसी फिल्मी दुनिया से आते हैं जहां सबकुछ बाजार के अनुसार चलता है।
मेरे ख्याल से आपको विरोध को समझने की भी कोशिश करनी चाहिए।

*KHUSHI* said...

Jai Ho.. A.R.Rahman ki...!!!!

Oscar milne se pata to chala ki sacche sangeetkaar ki, jo khud apna sangeet banate hai,( nahi kisi ka snageet churate hai) unki duniyabhar mai kadar honi hai.
aur Rahman ki safalta mai unka zameen pe tike rahne ka swabhaav hai woh dikhai padta hai, jo insaan chote kad mai hai lekin aasmaan ki unchahi ko choo raha hai woh inta aatmiya kyu lag raha hai?? uski wajah sirf unki sadgi hai.

baaki rahi slum yahi gandi basti ki baat to woh ek aissa pahelu hai jise aankhmicholi ki ja rhai hai. sirf haamre Bharat mai nahi balki samagra vishwa mai aissa hai lekin, kai kisi ki baat ghar mai chupi hoti hai to kisi ki baat khul jaati hai.

Jai Ho..ooo O...OSCAR

^ jai ho ko oscar mila hai hamare scar ko dikhane ka...

Suresh Chiplunkar said...

इरशाद जी से सहमत… पहले विश्व सुन्दरियाँ, फ़िर खास विचारधारा के लोगों को नोबल या बुकर, और अब खास तरह की फ़िल्मों को ऑस्कर मिलने का दौर आया है… आगे-आगे देखिये क्या होता है… वाकई भारत के लोग बहुत "भोले"(?) हैं… जय हो…

bhawna said...

manoj ji aapke madhayam se main bhi badhai dena chahungi , badhai ho ki "HAME OSCAR MILA ". manoj ji aapse main sahmat hoon . ajeeb lagta hai jab hum apne ghar ki uplabdhi par garv karne ki bajaay duniya ko ghar me hoti nokjhonk batane /sunane lag jate hain . sab mansikta ka pratibimb hai aise logon par naraaj hone se ya bhadas nikalne se hum khud ko takleef de rahe hain . aapka kahna sahi hai ki dheeraj rakhna chahiye .aur irshaad ji ki sirf ek baat se sahmat hoon ki ab oscar hame milte rahenge :) khastaur par main bhavishya me anya pratibhashaali kalakaron ke sath saath aapko bhi oscar pate dekhna chahti hoon . mujhe vishvaas hai ki ek din aisa aayega !
vaise aap hollywood me kyon nahin prayaas karte ? sahi samay hai ,koshish kijiye ,agar kismat ne aapki mehnat ka saath diya to kya pata aap madhayam ban jaaye anya saathi bhartiya kalakaaron ko us manch tak pahuchaane ka ! hai naa achhi aasha :)

निशाचर said...

मैं इरशाद जी की बात से सहमत हूँ. भारत में जब से सिनेमा बनाने की शुरूआत हुई है तब से अब तक लाखों फिल्में बन चुकी है और उनमे से कम से कम सौ डेढ़ सौ फिल्में ऐसी हैं जो ऑस्कर की हकदार थी ( अगर ऑस्कर ही सही मायनों में कला को परखने का मानक और अंतिम पैमाना है), लेकिन उन सभी को छोड़कर एक स्लमडॉग को ही क्यों?? रहमान ने स्वयं 'जय हो' से हज़ार गुना बेहतर संगीत दिया है लेकिन ऑस्कर मिला.......किसे??
यह सब भारतीय फिल्मकारों- कलाकारों को इस बात के लिए प्रेरित करने के लिए किया जा रहा है कि आप अपन समाज, संस्कृति को गाली दीजिये, उसे नीचा दिखाइए, दुत्कारिये .....बदले में हम आपको ऑस्कर देंगे.
मनोज जी मैं आपकी फिल्म सब न सही परन्तु अधिकतर देख चुका हूँ और आपकी अभिनय प्रतिभा का कायल हूँ..... परन्तु अगर आपको स्लमडॉग जैसी किसी फिल्म के लिए ऑस्कर मिले तो निश्चित ही वह आपकी अभिनय क्षमता का सम्मान नहीं होगा.

निशाचर said...

आपने कमेन्ट मोडरेशन लगा दिया. क्या आप आलोचना से डरते है??........... एक कलाकार अगर आलोचना से डर गया तो समझो वह चुक गया.

kumar sanjeet said...

puruskar kabhi bhi rachna se bada nahi hota aur koi bhi acchee rachna puruskaro ki mohtaz nahi hote, bharat main aise bahut se filme bane hai jinhe oskar mil sakta tha, lekin main dekh raha hu logo ne oskar ko kuch jyada hi hipe de dea hai, slumdog wastav main oskar se aage ki chiz hai kuki yeh film authentic roop se bharat ki ek gareeb basti main rahne walo ki puri sanskriti ko factual thareke se pes karti hai, jo ki yaha ke rehne wale nahi kar sake, aditya chopra, karan joher jaise filmkar sirf amiri ko mahima mandit karte hai un per koi critisizm nahi hota, bimal ray etc. iska apwad ho sakte hai, aamir khan ki film laagan ko filmfare se nawaja gaya to janab ne isse lene ki jahmat nahi uthaeee, lekin laggan ke oskar ke lea unhone edde choti ek kar de, lekin unkee waha daal nahi gali,
aab baat phir se slumdog ke karte hai main sirf itan kahana chahta hu ki slum dog jaise filme kisi purskar ki mohtaz nahi hote hamare yaha ki janta nai usko purskar is film ko pasand karke de diya hai, brahman wadi logo ko is prakar ki filme pasand nahi ati to na aya kare, unke pasand na pasand se kuch hone wala nahi hai, dalit or hasseaa ke log filmo main aapne bhumika le rahe, ye to trailer hai film to abhi baake hai mere dost, deny boel ko bahut bahut mubarakbaad, aise topic lene ke lea, manoj ji aapse bhi kuch jubeda type rachnatmakta ki ummede hai, madhur ke saath aapke picture ka future accha lag raha hai, subhkaamnaae aapke lea

इरशाद अली said...

निशाचर प्रिय, मनोज आलोचना से नही डरते ये प्रमाणित हो चूका है। क्योकि पिछले दिनों मैंने चवन्नी चैप की एक बेहद आलोचनात्मक समीक्षा जो ’जुगाड़’ के बारे में थीं खूद मनोज के ब्लाग पर ही चैप दी। और मुझे पूरा यकीन था कि मनोज इसे अपने ब्लाग पर नही डालेगे। लेकिन उन्होने न सिर्फ समीक्षा को पोस्ट किया बल्कि मेरा और चवन्नी छाप (अजय भाई) का शुक्रिया भी किया। इसलिए ये कहना बेकार है कि मनोजवा अलोचना से घबराते है, सही नही लगता।

विनय said...

चाहे कोई बुराई करे या तारीफ़ के पुल बाँधे इससे अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। अगर यह सब इतना ही बुरा होता तो गुल्ज़ार और रहमान जैसे बुद्धिजीवी ऐसी फ़िल्में ही क्यों साइन करते? लेकिन बात जो सबको समझनी चाहिए वह यह है कि रहमान भले ही बहुत उम्दा संगीतकार हैं लेकिन उनकी विजय आस्कर नहीं निर्धारित करता हम भारतीय करते हैं। रहमान ने सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिए आस्कर जीता कि अंग्रेजी फिल्मों में साउंडट्रैक का रिवाज़ नहीं है अगर वह कभी नोहरा जोन्स या कार्लोस सन्टाना कि तरह ग्रैमी आवार्ड जीता पाये तो मैं उनके संगीत को सलाम करूँगा। भारतीय पक्ष से संगीत में रहमान आज भले ही धुरन्धर नज़र आते हैं लेकिन क्या उनका संगीत पाश्चात्य संगीत से नहीं जुड़ा है? शिव-हरि और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को हम क्यों भूल जाते हैं जिनके गाने आज भी लोग गुनगुनाने से नहीं चूकते। जो हुआ उसे भूल जाइए, अब कहने से कोई फ़ायदा नहीं क्यों कि फ़िल्म रिलीज़ हो गयी है और सबने देख ली है और रुपये और सम्मान भी कमाये जा चुके हैं। मेरी तरफ़ से सभी रेसियल मामलों से हटकर पूरी स्लम्डॉग टीम को आस्कर जीत पर बधाई!

nitin thakur said...

manoj ji,oscar jeetaa hai humne eske liye rahman aur guljaarji ko shubhkaamnaien......magar kyon es film ne jeeta jabki esse behtar film bollywood ne di hain,ye ek vichaarniya prashna hai....

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

मनोज जी
अपुर-ससार" मे सत्यजित रॉय ने "मेघे ढाका तारा" और " ऋत्विक घटक", और अकुर मे श्याम बेनेगल ने अपनी कलात्मक और तीखी शैली मे गरीबी और सामाजिक अन्याय का गहरा रिस्ता दिखाया था। लिकिन सत्यजित रॉय को उनकी मृत्यू शैया पर पहुचने के बाद ही हॉलिवुड ने ऑस्कर के योग्य समझा।
"स्लमडॉग" एक निष्ठुर फिल्म है, जिसके निर्देशक गरीब के सपनो का मजाक उडाते हुये अनाथ बालक को पाखाने से भरे कुन्ड (वेल) मे डुबकी मारते हुये दिखाता है।

उसी गन्दगी मे सना वह अमिताभ के सामने जाकर ऑटोग्राफ मागता है। जरा सोचिये यह कैसी कल्पना है ?
शीशे कि तरह पारदर्शी हृदयहीन फिल्म "स्लमडाग" हमे यह याद दिलाती है कि भारत मे अनाथ बच्चो के लिये एक ही जगह है जहॉ उन्हे अन्धा बनाकर भीख मॉगने के लिये मजबुर किया जाता है। भारत मे पले बढे बच्चे के लिये करोडपति होना सजोग ही हो सकता है।
आस्कर देकर इसबात पर मोहर लगाने एवम मनोवैज्ञानिक “गहन-पैठ” वाली बात चरितार्थ करने कि कोशिश कि गई।
क्या हमे भारत कि इस गरीबी के जश्न मे शामिल होना चाहिये?

Mukul said...

Manoj Ji,
Jai Shri Krishna.
Shayad aapko maloom hi nahi hai ya aap samajhna hi nahi chahate hain ki SLUMDOG MILLENIUR film ko OSCAR puraskar kyon mila hai. Mein aapko batata hoon ki is film ko OSCAR kyon mila. Vastav mein, is film ko OSCAR isliye mila kyonki is film mein------

1. Hamare Bharat Desh ki garibi ko pradarshit kiya gaya hai.

2. SLUMDOG shabda ke bahane hi sahi, bhartiy logo ke liye DOG shabda ka prayog kiya gaya hia.

3. Bhartiy logon ko aalsi aur nikamma bataya gaya hai kyonki film mein HERO ko apni mehnat se amir bante hue nahi dikhaya gaya hai balki JUAA khelkar amir bante hue dikhaya gaya hai.

4. Is film ko angreji bhasha mein banaya gaya hai.

------Is prakar se is film ke dwara pure Bharat Desh ka apmaan kiya gaya. Lekin videshi logon ne jan-bujhkar is film ko OSCAR diya taaki is film ka vyapak prachar ho aur is prakar se puri duniya mein Bharat Desh ka apmaan lambe samay tak hota rahe.

Is film se jude hue sabhi logon ne keval mota dhan aur shohrat kamane ke liye hi pure Bharat Desh ka apmaan kiya hai isliye is film se jude hue sabhi logon ke virudh INDIAN PENAL CODE KI DHARA 295, 295-A, 298, 124-A, 120-A KE ANTARGAT MUKADMA CHALYA JANA CHAKIYE.

Is film ke lekhak ke virudh bhi INDIAN PENAL CODE KI DHARA 107, 295, 295-A, 298, 124-A, 120-A KE ANTARGAT MUKADMA CHALYA JANA CHAKIYE.

Is film ko paas karne vale SENCER BOARD se jude logon ko bhi dandit kiya jana chahiye.

Mukul Goyal Advocate
Mathura (U.P.)

Date : 2 March 2009

E-Mail : mukulgoyalmtr@gmail.com

neeshoo said...

मनोज जी सबसे पहले इस आलेख के लिये धन्यवाद आपको । जहां तक भारत की गरीबी का सवाल है तो इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि विकासशील भारत के पीछे क ऐसा दृश्य पहले किसी गोरी चमड़ी वाले न ना दिखाया था। आस्कर मिलने की खुशी तो बहुत है पर दुख इस गरीबी का है । जिसका समाधान अभी तक न मिल सकता है । हां प्रयास जारी है । साथ ही ऐसा नहीं की स्लमडाग से अच्छी फिल्म भारत में नहीं बनी या फिर नामित नहीं हुई सिर्फ पुरस्कार नहीं पा सकी । लेकिन पुरस्कार ही अच्छी फिल्मों के मानक बिल्कुल नहीं। आपकी फिल्म शूल इसका उदाहरण है।

ssiddhant said...

मनोज जी, फिल्म गुरु में एक संवाद है की जब लोग आपके खिलाफ बोलने लगें तो यह समझ लो की तुम तरक्की कर रहे हो. शुरू में यह मुझे काफी अटपटा और उलझन भरा लगा सा लगा क्योकि यह मेरे प्रायोगिक जीवन के अनुकूल नहीं था, लेकिन ऑस्कर के बाद इसका सही अर्थ मैंने समझा.
द सन्डे इंडियन के फरवरी के शुरूआती अंक में सही शब्दों में कहा जाये तो खुले मुंह से Slumdog को गाली दी गई है. इसमें यह कहा गया है की भारतीयता का अपमान करती है, सच्चाई के साथ खिलवाड़ करती है और हिंदुत्व का मज़ाक उडाती है.
रहमान और गुलज़ार की बुद्धिजीविता और पुरस्कार ने आलोचकों को सही तौर पर आइना दिखाया है. आशा है की लोगों के मन में सही बात जल्द ही बैठेगी और अब ज्यादा से जायदा ऑस्कर भारत आयेंगे.
भविष्य के लिए शुभकामनायें.....

ज़ाहिद मुख़र्जी said...

मनोज जी ,

मेरी समझ में इस मामले के दो पहलू हैं जिन पर अलग-अलग चर्चाएँ होनी चाहिए ।

(प्रथम) : एक भारतीय फ़िल्म एक विदेशी मंच पर सम्मानित हुई है जिस मंच को पूरे संसार में अन्तर्राष्ट्रीय मंच समझा जाता है और उस मंच से सम्मानित फ़िल्म को पूरी दुनिया सर्वोच्च-स्तर का सम्मान देती है । इस कसौटी पर इस फ़िल्म ने हमारे देश का सिर ऊंचा किया है और इसे किसी भी तर्क के आधार पर विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए । गुलज़ार साहब , रहमान भाई और इस टीम के अन्य सभी सदस्य बधाई के पात्र हैं जिन सब का किसी भी रूप में इसे फ़िल्म के निर्माण में योगदान है ।

(द्वितीय) : जहाँ तक अन्य विचारों / तर्कों का प्रश्न है तो उन्हें एक अलग अध्याय की तरह (एक बिल्कुल अलग अध्याय की तरह) चर्चा का विषय बनाया जाना चाहिए । एक जन्तान्त्रिक देश में ऐसी चर्चाएँ ही न हों तो यह चिन्ता की बात होनी चाहिए; पर इन चर्चाओं में इतनी समझ और इतनी परिपक्वता तो होनी ही चाहिए कि वे निर्विवाद रूप से ----
(i) देश को मिले हुए सम्मान और
(ii) इस सम्मान को दिलवाने वाले हाथों को मिलनेवाली बधाईयों
----से निर्लिप्त हों ।

उपर्युक्त प्रथम पहलू के अर्न्तगत मैं अपनी हार्दिक बधाईयाँ "स्लमडॉग..." की पूरी भारतीय टीम को देता हूँ , कृपया उन सब तक मेरी भावनाएं पहुंचाने की कृपा करें ।

द्वितीय पहलू के अर्न्तगत जो बातें मैं कहना चाहता हूँ उन्हें आगे सिलसिलेवार तौर पर रखने की कोशिश करुँगा :

(1) जो लोग कुछ विशिष्ट कार्य कर गुजरते हैं या कर रहे होते हैं वे वह सब पुरस्कार के लिए नहीं करते । उनके कार्यों का असल मूल्यांकन तो वह पीढ़ी और आनेवाली पीढीयाँ करती हैं । पुरस्कार देनेवाली समितियों के अपने आग्रह/ पूर्वाग्रह /दुराग्रह होते हैं। कभी उनकी निष्पक्षता निष्पक्ष नहीं होती और कभी उनसे चूकें होती हैं । महात्मा गांधी को दो-दो बार नोबेल प्राइज़ दिए जाने की मंशा और जरूरत महसूस की गयी पर ( संभवतः चर्चिल की दुर्भावना जन्य अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप के कारण ) दी नहीं गयी । अब देखिये कि क्या इससे गांधी जी की महत्ता घट गयी ? हरगिज नहीं । उल्टे नोबेल प्राइज का कद थोड़ा और बढ़ जाने से रह गया -- उसे नुकसान ही हुआ । तथाकथित विकसित दुनिया को हम अविकसित भारतीय भला कब भाने लगे ? हमारा भारतीय मष्तिस्क जब यूरोप और अमेरिका में आई० टी० समेत अन्य क्षेत्रों में अपने झंडे गाड़ता है तो क्या उनके कलेजे नहीं फटते ? ऐसे में उनकी नीयत में खोट हो तो आश्चर्य कैसा ?

(2) नोबेल पुरस्कार / ऑस्कर / बुकर इत्यादि ढेर सारे पुरस्कार जब प्रारम्भ हुए होंगे तब की कौन जाने , पर ताजा तारीखों का सच - बारीक विश्लेषण की कसौटी पर - तो आराम से यह हकीकत बयान करता ही है कि दुनिया के अमीर देशों का अर्थशास्त्र इन पुरस्कारों की गुणवत्ता को प्रभावित करता है ... और तमाम सुंदरियों के चयन को भी।

(3) साहित्य समाज का दर्पण है , सच है । पर क्या साहित्य के नाम पर वह कूड़ा-करकट भी नहीं छपता जो बुक-स्टॉलों पर " पॉकेट-बुक्स" के रूप में धड़ल्ले से बिकता है ? किशोर-वय के स्वाद को ध्यान में रख कर तयशुदा फार्मूले में ( संजोग + रोमांस + मिला-बिछडा + हाई टेक जिंदगी + अनैतिक /अव्यावहारिक /अतिभावुकता से भरपूर सेक्स इत्यादि, इत्यादि ) कहानियां लिखी जाती हैं और खूब कमाई करती हैं । पर यह साहित्य हमारे समाज का आईना नहीं दिखाता। "स्लमडॉग..." में भी बहुत होशियारी से - सच दिखाने के नाम पर, सच में बहुत कुछ सच दिखा देने के बावजूद -- क्या ठोस यथार्थ के रूप में निष्कर्ष दिखाया है फिल्मकार ने ? नहीं , कदापि नहीं । एक हवाई स्थिति , एक संजोग , संजोगों की एक के बाद एक कड़ियाँ ........ क्या यही हमारे भारतीय समाज की वास्तविक तस्वीर है ?

(4) क्या यह महज संजोग है कि (सत्यजीत राय के बाद) भारत में "गांधी " (सर रिचर्ड ऐटिनबरो) के बाद ऑस्कर लाने वाली दूसरी फ़िल्म भी एक विदेशी ने ही बनाई ? क्या भारत में ऑस्कर लाने के योग्य फिल्में नहीं बनाई जातीं -- ख़ुद भारतीयों के द्वारा ? सच जो हर बार बताया जाता है , ऑस्कर की निर्णायक-मंडली के द्वारा, वह हजम नहीं होता ।

(5) बातें और भी हैं , दर्द और भी हैं .....चर्चाएँ होती रही हैं , होती रहेंगी .... फिलहाल तो समाँ है खुशियाँ मनाने का ।

तुमने बहाने से ही सही , चोर-दरवाजे से ही सही , हमारी महत्ता तो समझी ....यह संकेत भी है कि तुम आनेवाले समय में हमें और भी बढ़िया ढंग से समझने पर मजबूर होओगे ।

और तबतक ? ....... जय हो !!

http://z-mukherjeespeaks
.blogspot.com

राजीव रंजन said...

बात गरीबी बेचने की नहीं है। गरीबी तो यहां के फिल्‍मकार भी बेचते हैं। लेकिन, मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि स्‍लमडॉग मिलिनेयर ऐसी कोई कालजया फिल्‍म नहीं है, जितना उसका गुनगान किया जा रहा है। जहां तक ऑस्‍कर मिलने की बात है, तो इस ऑस्‍कर से गुलजार, रहमान और भारतीय प्रतिभाओं को मत आंकिए। बाकियों की बात तो छोडि़ए, गुलजार और रहमान (रसूल के बारे में मुझे जानकारी नहीं है) ने जो काम अब तक किया है, इस हिसाब (स्‍लमडॉग मिलिनेयर को अगर पैमाना माना जाए तो) से उन्‍हें कम से कम दर्जन भर ऑस्‍कर तो मिल ही जाते, अगर वे फिल्‍में हॉलीवुड की फिल्‍में होती। स्‍लमडॉग मिलिनेयर जैसी फिल्‍में हर साल बॉलीवुड में बनती हैं। इस बात से आप भी इत्‍तेफाक रखते होंगे। कम से कम आपकी तीन फिल्‍में- सत्‍या, शूल और पिंजर मुझे स्‍लमडॉग मिलिनेयर से बेहतर फिल्‍में लगीं। पिछले साल प्रदर्शित हुई तारे जमीन पर और चक दे इंडिया किस मायने में स्‍लमडॉग मिलिनेयर किस मायने में कम थीं। अभिनय, निदेर्शन, गीत, संगीत, पटकथा, संवाद या प्रस्‍तुतिकरण के मामले में? दरअसल, हम एक अजीब सी हीनभावना से ग्रस्‍त हैं, इसलिए हमें लगता है कि हॉलीवुड की मान्‍यता ही हमें महान बना सकती हैं। शेखर कपूर को हमने वर्ल्‍ड क्‍लास का डायरेक्‍टर तब माना, जब उन्‍होंने विदेशों में झंडा गाड़ा। फिल्‍मों के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी जो मुझे है, उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि भारत में पहले भी केवल हिंदी में (क्षेत्रीय भाषाओं के सिनेमा को छोड़ भी दें तो) कई फिल्‍में बन चुकी हैं और आज भी बन रही हैं, जो ऑस्‍कर की योग्‍यता रखती हैं। हमें हीनभावना के इस खोल से निकलना होगा। इसमें कोई शक नहीं कि स्‍लमडॉग मिलिनेयर अच्‍छी फिल्‍म थी। उसके लिए उससे जुड़े सभी भारतीय और बाहर के कलाकार बधाई के पात्र हैं।

राजीव रंजन

ANJALI said...

well said Manoj, i really appreciate your feelings, and attitude towards life, i too had a feeling of ambivalence while watching the oscar cermony, since i am in USA , it was a matter of pride and honour as an Indian .

विनय said...

अरे छोड़ो यह राग आलापना, जो बुराई कर रहे हैं वह ख़ुद ही बतायें कि क्या अगर उनको इस फ़िल्म की टीम का हिस्सा बनने के लिए कहा जाता तो क्या वह नहीं बनते। मूर्ख किसे बना रहे हैं। आज आदमी आदमी को नोच रहा है। फ़िल्म के डारेक्टर ने बिल्कुल सही बात कही है: यह आस्कर सिर्फ़ उनके लिए जो अपने देश का सच जानते हैं और उसको अभिव्यक्त करते हैं। अगर आपको इतनी ही चिढ़ है इस फ़िल्म से तो आपने उनको ऐसी फ़िल्म बनाने का मौक़ा ही क्यों दिया। हम साठ साल में क्यों ग़रीबी नहीं मिटा सके? क्योंकि जब तक अंग्रेज थे तब तक वह बुरे थे, अब देश में मुस्लमान हैं तो वह बुरे हैं, चलिए अब इनको भी देश से भगा दिया तो हम फिर चार भागों में बँट गये, और ऐसे बँटे की फिर अगले को सहारे का हाथ नहीं दिया, आरक्षण का विरोध करते रहें। पहले अपना गरेबाँ झाँकों फिर कुछ बोलो!

Milan said...

The economic growth and presence in global forum shows India is now one of the topmost country of the world. But still there are many problems as shown in the film. I think they just tried to show those problems.

The film was awarded Oscar, not because the problems were shown but for the artistic way to show the reality. They just awarded the art of movie not the poverty of India.


But yes, as much as i know, the movie does not represent the whole India.

Abhilasha Sinha said...

Hi,
I am Abhilasha(Astrologer)i am a big fan of you,may i know your-birth-detail,i want to make your horoscope and through that i want to know more about you,will you help me?