Saturday, March 7, 2009

खोज जारी है.....

आज ही ख़त्म किया “राजनीति” का पहला शिड्यूल भोपाल में। वापस मुंबई जाने की तैयारी है। अच्छा समय निकला यहाँ। पहली बार नाना पाटेकर, अजय देवगन, अर्जुन रामपाल और कुछ एक थिएटर एक्टर, जिनका नाम लिखना चाहूंगा जैसे दयाशंकर पांडे और चेतन, इनके साथ काम किया और बहुत अच्छा समय निकला।

लगातार जद्दोजहद रहती है हर शॉट में। कोशिश रहती है कि उस समय की क़ाबिलियत और शक्ति के मुताबिक़ उस शॉट में अपनी अधिकतम ऊर्जा डाल पाऊँ। इसी में दिन निकल जाता है। जबतक आप अपने होटल के कमरे में पहुंचते हैं, आप मानसिक रुप से पूरी तरह से थक चुके होते हैं। अगले दिन के लिए आपको फ़िट भी रहना है, सो जिम भी जाना होगा। इसलिए थोड़ी शारीरिक मेहनत भी करनी होगी। पूरा दिन थकाने वाला होता है। खाने-पीने की सुध नहीं रहती। फिर भी करना तो है। क्योंकि यही सोचा था कि यही काम करेंगे। और कितने लोग हैं दुनिया में, जो वो करना चाहते थे, वही कर रहे हैं? मैं अपने आप को इस बारे में बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ।

ख़ैर, अभी मैंने भोपाल के दोस्त विजय जाजौरिया को बुलाया है। ताकि उनके साथ कुछ समय काट सकूँ। विजय भोपाल में ही रहता है। मेरे साथ दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। वो मेरे अच्छे दोस्तों में है। उससे मिलना कम होता है, क्योंकि भोपाल से मुंबई की दूरी कुछ ज़्यादा ही है। “शूल” की शूटिंग के दौरान भोपाल आया था, तब उससे मिला था। इस बार जब भी “राजनीति” की शूटिंग के लिए आता हूँ, उससे और उसके परिवार से मुलाक़ात हो जाती है। उसे ख़ुश देखना अच्छा लगता है। और वो ख़ुश है अपने परिवार के साथ, अपने व्यापार के साथ। विजय ने दिल्ली, मुंबई सब देखा लेकिन भोपाल का मोह नहीं छोड़ पाया। वो एक सुकून चाहता था, जो उसे भोपाल में मिला। उसने जीवन में शांति और सुकून को ज़्यादा महत्ता दी और वो इसीलिए भोपाल जैसी जगह पर रह गया। वो जैसा रहना चाहता था वैसा रह रहा है। मुझे उस पर गर्व है।

मैं आज जीवन के ऐसे दौर से गुज़र रहा हूँ, जहाँ पर मुझे मुंबई से निकलना ज़्यादा अच्छा लगता है। छोटे शहरों में शूटिंग करना ज़्यादा अच्छा लगता है। लोगों से ज़्यादा-से-ज़्यादा मिलना मुझे बहुत अच्छा लगता है। बड़े शहर अब रास नहीं आते हैं। लेकिन हमारे अभिनय का काम पूरी तरह से मुंबई में होने की वजह से कहीं-न-कहीं एक मजबूरी भी है बड़े शहर में रहने की। बहरहाल, मेरी शांति और सुकून की जद्दोजेहद और खोज जारी है। और मैं भी आशा करता हूँ कि इसका रास्ता भी मिल ही जाएगा।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

14 comments:

neeshoo said...

राजनीति फिल्म की शूटिंग भोपाल में हो रही है टी वी के माध्यम से जान पाया था । फिल्म इंड्रस्टी हो या कोई और क्षेत्र वहां अपना पूरा सौ प्रतिशत देने के लिए जी तोड़ मेहनत तो करना ही पड़ता है । दैनिक दिनचर्या व्यस्त हो जाती है । रोजी रोटी के लिए हम सभी भाग रहें हैं पर सुकून नहीं मिलता । दोस्त से मिलिये और मजे कीजिये । होली की ढ़ेर सारी बधाईयां ।

अंशुमाली रस्तोगी said...

कम लोग होते हैं जो छोटे शहरों को महत्व देते हैं। आपने दिया आपका शुक्रिया। वैसे अब तो छोटे शहर भी बड़े शहर होने-बनने के नक्शेकदम पर हैं।

इरशाद अली said...

यकिनन ’राजनीती’ एक अलग किस्म की फिल्म होगी। और आपका काम इसमें देखने लायक होगा। आप अपने आत्मिय क्षणों का साझा करते है ये बेहद रोचक लगता है। आपको अपने काम से वाकई बड़ा लगाव और प्यार हैं। कभी किसी पोस्ट में अपनी जीवनसगंनी के बारे में भी दिल की बात बताए, बालबच्चों की खबर दे। इतना हक तो लोगो का बनता ही है।

Yayaver said...

aap kee aane wale film rajneeti se humein kafee apekhchhayeen hain. choote saher ka hone ke alag fayde aur nuksaan hote hain. zindagee aur vichaar hain, mausam ke tarah badlate rahte hain.aap ke aane wale din achhe hoon,hum umeed karte hain.

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

श्री मनोजजी वाजपेयी
मै आपका ब्लोग नियमित पढता हु मुझे आपकी लेख्नी जो हिन्दी है बडी ही सरल व सुगम है अच्छी लगती है। आप सिने स्टार है पर लिखाई मे आपने वो झलकने नही दी, इस बात पर भी मै आपका कायल हु। आपने हमेशा आपने ब्लोग पर उचीत मुद्दो पर विचार एवम भावनाए व्यक्त कि जो मन तक पहुचती है।
@"बहरहाल, मेरी शांति और सुकून की जद्दोजेहद और खोज जारी है। और मैं भी आशा करता हूँ कि इसका रास्ता भी मिल ही जाएगा।"
शहरी जीवन से अमुमन लोग उब चुके है। आपकी इस छोटी सी पक्ति मे खासा सार छुपा हुआ है। आपने अपने मन कि बात को व्यक्त किया, कई लोग यह हिम्म्त नही जुटा पाते है कि वो सच्चाई लिख सके। वास्तव मे गावो एवम छोटे शहरो मे अपनापन होता है। हमदर्द दोस्त होते है। शुध्द वातावरण होता है। एक दुसरे के प्रती रिस्ता, प्यार, आदर होता है जो मुम्बई मे या बडे शहरो मे देखने को नही मिलता। आपकि खोज जल्दी पुर्ण हो मेरी हार्दीक शुभकामानाऐ है। आपकी नई फिल्म का इन्तजार है।

priye said...

manoj bhayya PRAKASH JEE TO BETIA SE RAJNITI ME UTAR GAYE HAIN..
AAP BHI BALMIKINAGAR SE UTAR JAIYE

creativekona said...

आदरणीय मनोज जी ,
दुनिया में कम लोग ही ऐसे भागाशाली होते हैं जो अपने कम से खुश रहते हों .खासतौर से भारत में तो हर दूसरा आदमी अपने का(व्यवसाय ,नौकरी )से असंतुष्ट दिखेगा .
आप अपने व्यस्त शेड्यूल में से इतना समय निकल ले रहे हैं ब्लॉग के लिए .ये आपकी पाठकों ,दर्शकों दोनों के प्रति स्नेह का प्रतीक है .
आपको होली की ढेरों मंगलकामनाएं .
हेमंत कुमार

varsha said...

उसने जीवन में शांति और सुकून को ज़्यादा महत्ता दी और वो इसीलिए भोपाल जैसी जगह पर रह गया। वो जैसा रहना चाहता था वैसा रह रहा है।
बड़े शहर अब रास नहीं आते हैं। such kaha aapne

Dipti said...

पता नहीं हम क्या चाहते हैं। छोटे शहरों में जब रहते हैं तो बड़े शहरों की सफल ज़िंदगी अच्छी लगती हैं और जब वहाँ पहुंच जाते हैं तो फिर वही छोटे शहर याद आने लगते हैं। मैं भोपाल की रहनेवाली हूँ और दिल्ली अपनी मर्ज़ी से आई हूँ। लेकिन, आज इस दौड़ भाग में भोपाल का सूकून रह रहकर याद आता है। शायद यही है हम जो पास नहीं उसके पीछे....

Nirmla Kapila said...

apki rajneeti ka intjaar rahega shubhkaamnayen aur aashirvaad

abhishek Tripathi said...

aaj aapka blog dekha, laga ki koi real theatre person hai blogging ke liye....i am always admired to the persons of theatre apart from NSD...and i always wanted to meet a person who don't have any prejudice regarding acting, in reference of NSDian and Non-NSdian generations. I want to say one thing about your blog...it looks more like a diary notes of Manoj Bajpayi..I hope that you will write specially for aspirants of theatre and films too. I am also blogging for theatre and music....basically i theatre activist and music composer. You can see my blog, you will really enjoy to see it. My blog is www.rewatheatre.blogspot.com
Thank you for blogging again
Abhishek Tripathi

विक्षुब्ध सागर said...

अजब कहानी है , गज़ब तमाशा है ...ये छोटे शहरों में रहना और सपने बुनना बड़े बड़े शहरों के ! ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं , विशाल चौडी चौडी सड़कें ...आपस में उलझते गुंजलों में होड़ लगाते पुल और कहीं कहीं दीखता आकाश का एक छोटा सा टुकडा ....फिर दूसरी तरफ बड़े शहरों में रह कर अपनी ज़मीन की सौंधी खुशबू ढूंढते रहना ...!

मृग तृष्णा है ...!!!!

भागते रहो भागते रहो ....और जब मारीच मिल जाये तो मालूम पड़ता है की वहां पीछे सीता हरण हो चुका है ! सो भैय्या अजब कहानी है गज़ब तमाशा है !

लेकिन आपके उदगार पढ़कर सच में बहुत सुखद महसूस हुआ ! इन एहसासों को खोने मत दीजियेगा !!

" राजनीति" के लिए हार्दिक शुभकामनायें !!

*KHUSHI* said...

Raajniti.... usse sirf filmi parde tak hi rakhiyega..kyu ki aaj kal chunaav ki hawa kafi tez hai. baaki baat hai mumbai se bahar jana, woh to hai hi shai baat, mumbai ki life se kahi durr jake srusti se najdik basera karna,hum sab mumbaiwalo kak hwab hota hai. aur owh khwaab pura karne kel iye hcuttiya manane bhaag jaate hai, kintu baad mai laut kar to yahi aana hai..

anand said...

dear manoj bhai,abhinay aap doob jaate hain ye to aapaki filmen dekhakar hi pata chal jaataa hai.
mann ko sukoon aur shaanti to sirf tabhi milati hai jab aadami kisi mission ke liye jeetaa hai.filme naye jamaane ki kitaben hain.jaise kuchh kitaabon ne duniya kaa itihaas badalaa hai waise filmen bhi badal sakati hain.
manoj bhai .aapake vichar padhakar khushi hoti hai aur ek ummid ki kiran jagati hai ki samaaj ke haalaat ke prati baukhalahat bollywood ke logon men bhi hai.
RAMJAS COLLEG ,DELHI me jab 88 me maine admission liya to samaj ko badalane ke liye ek organigation banaayaa thaa.parantu laakh koshishon ke bawajood usame safal nahin ho paayaa,
usi samay mujhe ehsaas hua ki desh kaa bauddhik varg sirf apana swarth dekhata hai.
kaise bachega rashtra jab beimaani ,jhooth aur swath kaa shaitaan kundali maare hamare bhitar hi baitha hai. apakaa---amar dayal singh, bihar