Tuesday, March 31, 2009

बदल रहा है मेरा व्यक्तित्व

कुछ दिनों से मेरी कोशिश रही है कि लोग मुझे चाहे जितना भी कठिन क्यों न समझें, या फिर मेरे बारे में ग़लतफ़हमियाँ पाले बैठे रहें या उनको किसी बात से नाराज़गी हो, जिसका मुझसे कोई लेना देना भी नहीं; मैं ही उन्हें स्वयं संपर्क करुँ और करता रहूँ, चाहे वो अपनी नाराज़गी दूर करना चाहें या न करना चाहें।

एक प्रयोग करते रहना भी सत्य की तरफ़ जाने का इशारा होता है। क्योंकि शत-प्रतिशत अपने बारे में कह पाना कि आप ही सही हैं, ये उचित होगा नहीं। हाल-फ़िलहाल में कई ऐसी घटनाएँ घटीं, जब किसी ने मेरे बारे में कोई ग़लतफ़हमी पाली, या उस व्यक्ति को मुझसे नाराज़गी हुई, जिससे मेरा कोई वास्ता नहीं था। फिर भी जब मैंने उस व्यक्ति की तरफ़ लगातार अपना हाथ बढ़ाया तो संबंध सुधरे या बिगड़े या फिर वैसे ही रहे। इन संबंधों से मुझ पर असर नहीं हुआ। दरअसल, असर उस प्रकिया से हुआ जो मैंने शुरु की है। मैं अपने व्यक्तित्व में एक बदलाव-सा महसूस कर रहा हूँ। और अच्छा लग रहा है। यहाँ पर आप ख़ुद के 'मैं' से ऊपर उठना चाहते हैं। एक सुखद अनुभूति होती है इससे।

कुछ महीनों से मेरी ये भी कोशिश रही है कि अगर किसी का काम मेरे दिल को छू जाए तो चाहे मैं उसे जानता हूँ या न जानता हूँ - उस व्यक्ति से ख़ुद ही संपर्क करके मैं उसे बता सकूँ कि मैंने उसके काम को किस हद तक सराहा है। उदाहरण के लिए 'मुंबई मेरी जान' के निर्देशक निशिकांत कामत, 'वेडनसडे' के निर्देशक नीरज पांडे और 'ओए लकी...' के निर्देशक दिवाकर बैनर्जी, 'देवडी' के निर्देशक अनुराग कश्यप, 'दिल्ली छः' के निर्देशक राकेश मेहरा और गुलाल के कुछ अभिनेता जिनके काम से मैं बहुत उत्साहित हुआ था। उनसे बात करके, उनके काम के बारे में चर्चा करके और उनको बधाइयाँ देकर मैंने जिस आनंद की अनुभूति की, वो मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता।

ऐसा नहीं था कि पहले लोगों का काम अच्छा नहीं लगता था। लेकिन पहले मैं ख़ुद उनसे संपर्क नहीं करता था। अनायास मुलाक़ात के वक़्त ही बधाई देता था। लेकिन, इस तरह के बदलाव और इस तरह के प्रयोग करने के बाद मेरे अंदर की बहुत सारी गांठें खुली हैं। और ये प्रक्रिया जारी रहेगी।

हाल फिलहाल में 'गुलाल' के गाने और संगीत को लेकर मेरे पुराने दोस्त पीयूष मिश्रा से बातचीत हुई। मुझे अच्छा लग रहा है कि पीयूष की प्रतिभा के बारे में अब लोग जानना शुरु कर चुके हैं। जिसके हम सब बड़े कायल रहे हैं। बहुत कुछ सीखा है उनसे। बहुत कुछ साथ में देखा, झेला और अनुभव किया है। मेरी शुभकामनाएँ पीयूष के साथ रही हैं और रहेंगी। और मेरा अपना मानना यह है कि हमने तो उनके कई रंग-रुप देखे हैं, दुनिया अब देखना शुरु करेगी। आप भी उनके काम का लुत्फ़ लीजिए। निश्चित तौर पर यह सिर्फ़ एक शुरुआत है। पीयूष को इन्हीं शुभकामनाओं के साथ...

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

18 comments:

अनिल कान्त : said...

इंसान का व्यक्तित्व सशक्त होता है जब वो "मैं" से ऊपर उठता है .....ये बिलकुल सही है .....पियूष जी की अदाकारी, लेखन , संगीत और गायकी कमाल की है .....उन्होंने गुलाल में कमाल कर दिया है .....उनके गाने कई बार सुन चूका हूँ ......एकदम से रोमांचित हो उठता हूँ .....मेरे शरीर में कुछ होने लगता है ....पियूष मिश्र जी प्रतिभा के बहुत धनी हैं ....उनके लिए शुभकामनाएं ...


मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Yayaver said...

'मैं' के ऊपर उठने में बहुत दिक्कत होती है,लेकिन एक बार सिलसिला शुरू हो जाता है तो बहुत अच्छा लगता है।ज़िन्दगी मौसम ki तरह है बदलते रहती है, आज कुछ लोग खुस हैं तो कल नाराज़ रहेंगे। यह पढ़ के अच्छा लगा की आपको सुखद अनुभूति हुई।थिएटर से जुड़े लोगों मैं सिफ़र से शिखर तक जाने की चमता रहते है.आप मैं वो बात है।
अच्छी फिल्में बनती देख कर न केवल आपको बल्कि जनता को भी खुशी होती है।उम्मीद है आप भी कोई तात्पर्य जनक सिनेमा को हमरे सामने रखेनेगे।
आपके ब्लॉग पे आपके बेबाक अभिव्यक्ती देख कर अच्छा लगा।

अपना अपना आसमां said...

आज के हर पल बदलते दौर में रिश्तों कि बनाए रखना बेहद कठिन होता जा रहा है। दरअसल लोग कोशिश भी नहीं करते। पर खुशी है कि ग्लैमर जगत में रहकर भी आपकी नजर में इसकी अहमियत है।

sameer said...

achhaa, badlaaw ki nirantarataa me hee wyaktitwa kaa wikaas hota hai nahi t ek jagah rukas hua pani peene ke laayak nahee rahataa. piyush mishraa ki charchaa shuru ho gai hai,aakhir heere ki chamak kab tak chhupi rah sakati hai. act one ko delhi ke rang premi bhule nahi hain abhi.

कंचन सिंह चौहान said...

Gulal dekhane ke baad virala hi koi hoga jo piyush JI ka mureed na hua ho...!

as an actor, music director and lyricist, he did the best job..! appreciable..!

विनय said...

क्या आप अपना ई-मेल मुझे दे सकते हैं। कुछ आवश्यक बातों की चर्चा करना चाहता हूँ!


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तख़लीक़-ए-नज़र

somadri said...

परिवर्तन संसार का नियम है..

creativekona said...

आदरणीय मनोज जी ,
"मै" ही तो किसी व्यक्ति को ऊपर उठाने ,नीचे ले जाने और उस व्यक्ति को सम्मान दिलाने में महत्व पूर्ण भूमिका निभाता है .मै की भावना आदमी को सम्मान तब तक दिलाती है जब तक वो अपने मैं को सबके हित ,सबके कल्याण के लिए लगता है ...जिस दिन व्यक्ति का मैं आत्मकेंद्रित हो जाता है ,वो अपने बारे में एक झूठा अहम् पल लेता है ...बस उसका ग्राफ नीचे की और चल पड़ता है ...
आप अपने मित्रों ,सहयोगियों ,क्रियु मेम्बर्स के साथ इतना लगाव रखते हैं ....ये आपका बड़प्पन है .
शुभकामनाओं के साथ .
हेमंत कुमार

*KHUSHI* said...

bahut khub Manojji..khud ka vyktitva badal na itna aasaan nahi hai aur usse jyada katheen hai ki sab ko ye batlana... jo apane kitni aasani se apne iss blog ke jariye kiya hai...iske liye aap ko dhanywaad. jaisa aapne kaha ki aap film success hone par ruraru abhinanadan karte hai to humari ek vinanti hai.. ki jaise aap bollywood se jude hai waise yaha blog ki duniya mai bhi kai anjaan logo se jude hai.. to kabhi unhe bhi koi tippani mil jaaye aapse.

प्रवीण जाखड़ said...

आप पहले से ज्यादा मुखर हो रहे हैं मनोज भाई। अच्छा लगा, इस नजरिए के लिए हम कायल हो गए। ऐसा होता है जिंदगी में किसी को ओर सकारात्मक भाव से हाथ बढ़ाया जाए, तो फल मीठे होते हैं। विचार, भाव, प्रतिक्रिया सब में एक खुशी होती है, उल्लास भरा होता है। जितना मैं समझ पा रहा हूँ, आप उस उल्लास को अंतर्मन में इस समय भरपूर जी रहे हैं।

वैसे भी मेरी निजी राय है- हम जितना मुस्कुराएं, जितना जिएं, जितनी खुशी किसी को दे सकें, करना चाहिए। छोटी सी जिंदगी है। जितना पाया, लाजवाब है। जितना पाएंगे, बेमिसाल होगा। निरंतर जुटे रहेंगे, बिना हार माने। मैं, अहं ये सब तो दूरियां ही बनाते हैं। आपने देखा होगा, बच्चों में ऐसा कोई भाव नहीं होता, उनके चेहरे की खुशी, तेज सबसे ज्यादा होता है। वह पूरा जी पाते हैं। ...और हम जैसे जैसे बड़े होते हैं अहं और मैं जैसे विषय जाने कहां से जुड़ जाते हैं। लेकिन खुशी हुई, आपने जो दिल से जाहिर किया, उसे आपका यह छोटा भाई दिल से महसूस कर रहा है।

एक निवेदन था अगर आप स्वीकार करें। मैं राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में हूँ। ...और इसी परिशिष्ट में हमने देश की बड़ी हस्तियों का राजनीति के प्रति नजरिया जनता के सामने लाने की कोशिश की है। यह बातचीत पर आधारित कॉलम होता है और आप राजनीति और राजनेताओं के बारे में क्या सोचते हैं, बस यही सब कॉलम की नींव होती है। अगर आप इस निवेदन को स्वीकारें, तो अच्छा लगेगा। न केवल मुझे ही, बल्कि राजस्थान सहित गुजरात, चेन्नई, पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश जहां भी हमारा अखबार जाता है, पाठकों को भी आपका यह पक्ष जानने का मौका मिलेगा। आपकी सुविधा के लिए मैं अपना मोबाइल नंबर यहीं छोड़ रहा हंू। 09414249676.
हां, पूरा विश्वास है आप सहमत होंगे और हमारी जल्दी ही बात होगी।

आपका प्रवीण

आकांक्षा~Akanksha said...

Bahut sundar vichar hain !!

शिवराज गूजर. said...

बहुत ही अच्छी शुरुआत. मन खुश हो गया. किसी के भी काम की आगे होकर तारीफ करना उस आदमी मैं एक अलग ही जोश भर देता है. जब सामने पड़ गया और हमने भी बधाई दे दी तो वो ओपचारिकता मात्र होती है. जो हमें भी महसूस होता है और सामने वाले को भी. इसलिए आपकी यह पहल स्वागत योग्य है. इस पहल से आप देखना दोस्तों की एक अलग ही जमात आपको मिलेगी जो आपको हर कदम साथ देगी. एक बार फिर बधाई.

Yayaver said...
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मोहन वशिष्‍ठ said...

मनोज जी बहुत सुंदर विचार एक काम तो आप आजसे ही कर सकते हैं और वो काम है कि आप अपने बेहद ही व्‍यस्‍त समय में से कुछ समय निकाल कर ब्‍लाग पर कमेंट कर दें बाकी जैसी आपकी मर्जी बहुत ही अच्‍छा लगता है आपके विचार सुनकर बहुत बहुत आभार

irdgird said...

वैचारिक और व्‍यवहारिक।

रवीन्द्र रंजन said...

बहुत अच्छा विचार है। जल्दी कीजिए।

इरशाद अली said...

आज तो हरि भाई ने आपकी पोस्ट पर टिप्पणी कर दी ’वैचारिक और व्यवहारिक।’ कहकर बड़ी बात माने। खैर आपका व्यक्तित्व बदल रहा हैं, बड़ी ही अच्छी नही बल्कि बहुत अच्छी बात मैं इसे मान रहा हूं कि अब आप भी कही थोड़ा महसूस कर रहे है कि कही पर जठिलताए थी। पीयूष जी के बारे में बात की और अन्य दोस्तों के। फिर से सिद्ध होता है कि तुम सार्थक चीजों को ही चुनते हों। मुझे लगता है आपके पास बहुत सारी कीमती चीजों में आपका नजरिया और चुनाव भी हैं। बाकि छोटी-छोटी बातों और चीजों मंे भी ऊर्जावान बने हुए हो और खुशियां तलाश कर लेते हो तो पता चलता है किसी बात से ज्यादा परेशान रहे हैं।
इरशाद

िकरण राजपुरोिहत िनितला said...

खम्मा घणी मनोज सा हुकम!!!!!
आज पहली बार ही आपका पन्ना पढ कर मैं आपकी मुरीद हो गई हूं। सचमुच आप अपने मन की तहों के भीतर उतर उतर कर एक मुलायम छू लेने वाली संवेदना के साथ स्वयं को उजागर कर हमें भी एक अनेाखी रोशनी हथेली में देकर पर्दे के पीछे छुप से जाते है।
सच ही है! कि दूसरों के छोटे बड़े काम की सराहना कर उसको तो जो मिलता है वह अमूल्य है लेकिन हम भी एक हल्कापन महसूस करते है जो किसी पुण्य को करके होता है। जैसे मुस्कुराहट दो व्यक्तियों को करीब लाती है वैसे ही सराहना भी दो जन को एक अनोखे बंधन में बांध देती है। बल्कि मुझे तेा लगता है कि जिससे हम अनायास ही इष्र्या महसूस करते हैं ,‘‘यद्यपि हम वास्तव में इष्र्यालु नही होते हैं फिर भी हर इंसान कहीं न कहीं ,कभी न कभी इस से ग्रसित होता रहता है’’ उसके काम की सराहना कर अपने मन की इस धुंध से मुक्त हो रहे होते है और कुछ कुछ वह भी इससे।
गुलाल मेरी भी मनपसंद फिल्म बन चुकी है। खासकर पीयूष जी के जोशीले और जीवन दर्शन से भरपूर गीत और गायकी।ये गाने सुनकर मुझे सारी दुनिया बदसूरत और बेमानी लगने लगती है। ऐसा लगता है जैसे दुनिया में अच्छा कहने को कुछ बचा ही नही है। क्या सबको ऐसा ही लगता है??

एक सुबह केा अच्छी बनाने के लिये धन्यवाद।
मैं अपने ब्लाॅग के लिंक भेज रही हूं। समय निकाल कर देखें ,
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