Monday, April 13, 2009

हद हो गई अभद्र बयानबाजी की !

हद हो गई है। अब तो न समाचार देखने को मन करता है, न पढ़ने का। इस बार के चुनाव में राजनेता न सिर्फ अपनी मर्यादा पार कर चुके हैं, बल्कि उसकी परिभाषा भी बदल चुके हैं। कोई किसी को कुचल रहा है, कोई किसी को काट रहा है। कोई किसी को मारने की धमकी दे रहा है। और कोई किसी के अस्तित्व को मिटाने की बात कर रहा है।

लेकिन, इसके बीच भी आपको मन को समझाना है कि प्रजातंत्र को बचाए रखने के लिए वोटिंग में हिस्सा लेना जरुरी है और इन्हीं में से किसी एक को चुनना है। इस लोकतंत्र का एक वोटर, जो पूरी तरह से अपना विश्वास खो चुका है- न सिर्फ इस तंत्र में बल्कि अपने आप में, उसे इस तरह की भाषा, इस तरह के भाषण और इस तरह के नेता कहीं से भी मदद नहीं कर रहे।

आज कोई भी पार्टी ये दावा नहीं कर सकती कि उसने अपने चुनाव प्रचार में जनता को निराश नहीं किया है। सभी ने किया। उनके हर नेता ने निराश किया। और अभी 16 तारीख दूर है। पता नहीं क्या क्या झेलना होगा और क्या क्या सुनना होगा। एक मजाक सा बन गया है ये चुनाव। और इस तरह के सारे चुनाव। किसी के पास कोई ठोस आदर्श नहीं हैं, न मेनिफेस्टो है, न विचारधारा है और न राजनीति है। मुझे हंसी आती है जब सबके सब ताल ठोंकर न सिर्फ चुने जाने का दावा करते हैं, बल्कि भविष्य के प्रधानमंत्री भी खुद को ही बताते हैं। सच कहूं कि हंसी के साथ डर भी लगता है कि कहीं इस तरह के तंत्र में यही व्यक्ति सबसे ऊंचे पद पर न बैठ जाए।

लेकिन,फिर भी दिल को कहता हूं हिम्मत न हारो। उम्मीद न छोड़ो। अराजकता से ही शायद एक सही रास्ता निकलेगा। अराजक तत्वों के बीच से ही शायद अचानक सही राजधर्म निभाने वाला आएगा।

वैसे, इन दिनों अपनी फिल्म 'जेल' की शूटिंग में व्यस्त हूं। फिल्म की आउटडोर शूटिंग के लिए करजक जा रहा हूं। वहीं पर रहना होगा। मुंबई में रहते हुए भी मुंबई से 100 किलोमीटर दूर रहना होगा। इस भीड़ भीड़ से दूर। इस अराजकता से दूर। कोशिश करुंगा कि प्रजातंत्र में अपने वोट देने के अधिकार का उपयोग कर पाऊं क्योंकि अधिकार के नाम पर यही तो है,जिसे हम पूरी तरह से उपयोग कर सकते हैं। सारे दोस्तों से यही गुजारिश है कि पार्टी और नाम पर न जाएं। सिर्फ उम्मीदवार के काम और चलन को देखने के बाद ही अपना वोट डालें।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

19 comments:

अनिल कान्त : said...

दिल दुखता है जब ऐसे नेता और नेताओं के हाथ में अपने देश को देखता हूँ ...उनकी बयानबाजी...आपसी छीछालेथन .....और न जाने क्या क्या .....

आपको आपकी जेल फिल्म के लिए शुभकामनाएं ...आप अच्छा अच्छा काम करें और ढेर सारा नाम कमाएं .....

आपका प्रशंसक
अनिल कान्त
मेरा ब्लॉग : मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

कंचन सिंह चौहान said...

आपके ब्लॉग मे लिखी चीजें आम जनता का दर्द होती हैं....! आज सबके सामने यही प्रश्न है किसे चुने सभी तो भ्रष्ट दिखते हैं और अगर स्वयं नही हैं तो दल है...! आये कोई पिसेंगी जनता...!

इस तरह भावाभिव्यक्ति पढ़ के अच्छा लगता है

cmpershad said...

अभी क्या था, अभी क्या है
इसी का नाम दुनिया है....यही राजनीति है:)
सुबह ज़रूर आएगी, सुबह का इंतेज़ार कर :(

हिन्दी साहित्य मंच said...

मनोज जी यही राजनीति है इसकी पराकाष्ठा अभी बाकी है हम सब दर्शक और श्रोता है असली अभिनय तो नेता लोग ही कर रहे हैं । खून पसीना एक किये हुए है दिन रात का पता नहीं । शोर से कान पक चुका है । तु्च्छ और घटिया राजनीति अपने चरम पर है । चुनाव नतीजे आने दीजिये फिर देखिये - चोर चोर मौसेरे भाई बन जायेंगें । फिर आज तो विचारधारा नहीं मिल रही है कुर्सी मिलते ही प्यार , स्नेह , गिले , शिकवे सब दूर हो जायेंगें । हम तो वोट दें या न दें समझ ही नहीं आता । आखिर किस चोर को चुना जाये जो कम चोरी कर सके ।

आप को शुभकामनाएं फिल्म जेल की शूटिंग के लिए ।

neeshoo said...

मनोज जी , आपने राजनीति पर काफी कुछ आज लिखा और पहले भी कुछ पोस्ट में जिक्र किया । मैं तो कुछ खास न कह सकूँगा बेहूदा , घटिया राजनीत पर । जेल की शूटिंग के लिए शुभकामनाएं ।

prabhat gopal said...

is bar ka election netaon ki bayanbaji ke lie jana jayega

creativekona said...

आदरणीय मनोज जी ,
आज राजनीति ...चुनाव ..वोट ये सब ऐसे शब्द हो गए है जिनसे चिढ सी होने लगी है .हमारे देश में न तो कोई ढंग का नेता दिखाई पड़ रहा है न ही कोई पार्टी ..लेकिन जो कुछ भी है उसी में से जनता को चुनाव करना है .आपका कहना सही है कि ये नेता जिस ढंग से एक दूसरे के खिलाफ़ बयानबाजी कर रहे है उससे अब चिढ हो रही है ...आप जरा सोचिये यही नेता संसद पहुँचने के बाद क्या करेंगे ..
आज के नेताओं का चरित्र देखना हो तो समय निकलकर ..मेरे ब्लॉग पर मेरी दो लघुकथाएं .1.दूरदर्शी २ उत्तराधिकारी... पढियेगा ....
शुभकामनाओं के साथ .
हेमंत कुमार

ajay kumar jha said...

yaar manoj bhai aapne bilkul theek hee aashankaa jaahir kee hai aur yakeen maaniye aap ek din aisaa hee hone wala hai ki pradhaanmantree shaayad koi nirdalyeey ho, haan aajkal apne abhinetaaon ka bhee raajniti se kuchh jyada hee judaav ho gaya hai kuchh us bare mein bhee ho jaye. jail ke kuchh anubhav adhik lene ke liye tihar jaroor dekhein shaayad kuchh naya mil jaaye, aakhir kiran bedi kee tapasyaa lagee huee hai. aapkee pikcharon mein pinjar mujhe sarwaadhik pasand hai aur shool mere dil ke jyada kareeb hai. ab aataa hee rahungaa.

विक्रांत said...

अच्छा लगा आपका लेख पढ़कर. आपके विचार जानकार भी तसल्ली हुई.

पर बुरा लगा संजय दत्त का मुलायम यादव के साथ देखकर. मुन्नाभाई के पास तो बहुत रुपया-पैसा होगा, क्यों गलत नेतायों का साथ दे रहे हैं.

Zafar Anjum said...

Manoj Bhai, good to see you blogging. Bahut achcha laga ke aap apne khayalat ko yun sab ke saath share karne ke liye samay nikaal rahe hain. It's wonderful. Please keep it up and with all my best wishes. Regards, Zafar

प्रवीण जाखड़ said...

कल शाम जब मैं आज तक देख रहा था, नीचे चल रही स्क्रिप्ट में शेखर सुमन के राज ठाकरे को चैलेंज की स्ट्रिप चल रही थी। उन्होंने कहा था कि ठाकरे बिहार में रैली निकाल कर दिखाएं।

आखिर ऐसी ही अलग-अलग बयानबाजियां नेता, फिल्म स्टार और प्रचार अभियान में जुटे लोग कर रहे हैं। बेचारा चुनाव आयोग शिकायत बॉक्स बन गया है। किस-किस की शिकायत सुने, किस-किस पर नियंत्रण कसे। मर्यादाओं से पार जाकर चुनाव का तमाशा बना दिया है नेताओं ने।

आपकी फिक्रमंदी जायज है। लेकिन बिगड़ते माहौल के पीछे शायद हमारा भी रोल है। क्योंकि हम वोटर हैं। जब चुनाव के एक-दो दिन बचते हैं, समीकरण बदल जाते हैं। पहले वोटर बात मुद्दों की, विचारों की, भलेपन की करता है, लेकिन समय आने पर वह भी जातिवाद, क्षेत्रवाद और वंशवाद पर जा टिकता है। ऐसा नहीं कह रहा हंू कि हर वोटर जिम्मेदार है। लेकिन एक बड़ा वर्ग है, जो इसी से अपना फैसला लेता है।

कोशिश कीजिएगा व्यस्तताओं के बीच आप वोट जरूर डालें। जायज-नाजायज के मसले अपनी जगह हैं, लेकिन आपका वोट और हमारा वोट अपने कर्तव्य और विचारधारा के अनुरूप भी जाएगा, तो जरूर भविष्य की नींव में एक पत्थर हमारे हाथों भी लगा माना जाएगा।

...जेल के बारे में और जानने की जिज्ञासा है। उम्मीद है आप अगली पोस्ट तक जरूर कुछ खुलासा करेगे।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वेश्या जैसे जैसे बूढी होती जाती है, ग्राहक कम होते जाते हैं, उसकी सुशीलता, विनय, लज्जा, मुस्कराहट, नम्रता भी गुम होने लगती हैं. वो बदजुबान और बेहया होती जाती है...आज बुढाते हुए लीडरों का यही हाल है...झूट बोलने की हद ६० साल से ज्यादा क्या होगी, इनका तिलिस्म अब चल नहीं रहा है, वोट की ठेकेदारी में वो दम रहा नहीं, जनाधार घट रहा है... यही वजह है इन खिसियाये हुए लोगों के भी बदजुबान और बेहया होते जाने का. यह बात दीगर है की नए आते हुए लोग भी इस तालाब में यही सीख रहे हैं....

*KHUSHI* said...

Rajniti ke dal dal ko durrr se pranaam..!!! ek dusre ke girebaan ppakadnewale, apne girebaan mai kabhi janak ke dekhe ki woh khud bhi dal dal mai fasey hue hai.
Manojji, aap shooting ke dauraan waqt nikal ke vote jaroor kijiyega.. shaayad ek vote kisi ki taqdeer badal de.

SATYENDRASHALABH said...

manoj ji lajwab vichar hain aapke ki inhi arakkon k beech se koi pradhanmantri ban gaya to. wah aap jaisa soch aur bhay aaj har bhale aadmi ko hai.

अल्पना वर्मा said...

is baar sab se adhik tikhii bayan baziyan huin...yah badey hi dukh ki baat hai

archana said...

when we think of a leader who deserves to be a chief minister or prime minister there is no one eligible. every one is corrupt & want to serve themselves not our nation.
Good that atal bihari is not there in elections this time, there is no place for good people in politics.
But in his party only he was good non other especially Mr. Advani is
not at all a suitable candidate for becoming a PM.
& what about congress who show that young Rahul is a PM material, Please just being the son of a previleged mother & previleged royal family is not enough for you to get selected.
People are not having even a single good option.
Well done Manoj for your dare.
Archana Tiwari.

विजय कुमार झा said...

लड़ाई लोकतंत्र की अच्‍छाइयों पर हावी हुई बुराइयों से है
- वि‍जय कुमार झा, दैनिक जागरण, नोएडा
मत केवल दस फीसदी लोगों का मि‍ला, पर सत्‍ता हाथ में आ गई। देश के बहुतेरे राज्‍यों में इतना या इससे कम मत पाने वाली पार्टियां सरकार चला रही हैं। मात्र एक वि‍धानसभा क्षेत्र के लोगों का प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करने वाले नि‍र्दलीय वि‍धायक को पूरे राज्‍य (झारखंड) पर राज करते भी हम देख चुके हैं। कोई पार्टी चुनिंदा करीब आधा दर्जन राज्‍यों की सारी संसदीय सीटें जीत ले तो केंद्र में सरकार बनाने के उसके दावे पर कोई अंगुली नहीं उठा सकता। बाकी करीब दो दर्जन राज्‍यों की जनता के मत कोई मायने नहीं रखते। बहुसंख्‍य जनता द्वारा नकार दी जाने वाली पार्टि‍यां एक साथ आकर सरकार बना कर जनादेश को अंगूठा दि‍खाने में भी जरा शर्म-संकोच महसूस नहीं करतीं। 1999 में अंति‍म क्षणों में संसद में बहुजन समाज पार्टी ने पाला बदला और कांग्रेस के साथ जाकर वि‍श्‍वास मत के खि‍लाफ मतदान कि‍या। नतीजा रहा बस एक वोट से अटल बि‍हारी वाजपेयी सरकार का गि‍र जाना। याद रहे इस सरकार को अग्‍नि‍परीक्षा अन्‍नाद्रमुक के स्‍वार्थ की वजह से देनी पडी थी, तो इसकी शहादत बसपा के स्‍वार्थ के चलते हुई।नए चुनाव हुए और दो पार्टि‍यों के स्‍वार्थ के चलते बेचारी जनता के अरबों रुपये होम हो गए। बात यहीं तक सीमि‍त नहीं है। वि‍धायि‍का में दागी-भ्रष्‍टाचारी और अनपढ. सांसदों की भरमार होती जा रही है।
कुल मि‍ला कर कहा जाए तो लोकतंत्र की अच्‍छाइयों पर उसकी बुराइयां हावी हो गई हैं। इसलि‍ए जनता का, जनता के लि‍ए और जनता के द्वारा शासन वाली यह व्‍यवस्‍था वास्‍तव में न तो जनता का रह गया है, न उसके लि‍ए और न उसके द्वारा। ऐसा नहीं कि‍जनता को इसका अहसास नहीं है। पब्‍लि‍क सब जानती है, पर नेताओं को कोसते हुए, खुद को असहाय महसूस करते हुए उसी ढर्रे पर लोकतंत्र को धकेलती जा रही है। इस गलती को सुधारने का मौका अभी ही है। पैसा, जाति‍, धर्म आदि‍के प्रभाव में आकर वोट डालने या सि‍स्‍टम को कोसते हुए मतदान के दि‍न घर बैठे रहने की आदत से बाज आना होगा। उम्‍मीदवार को इस कसौटी पर परखना होगा कि‍उसमें जनता का नेता बनने की काबि‍लि‍यत है भी या नहीं। ठीक वैसे ही, जैसे बेटे के लि‍ए बहू या बेटी के लि‍ए दामाद चुनते वक्‍त परखते हैं। घर-परि‍वार हो या देश-समाज, दोनों मूल रूप से एक जैसे सि‍द्धांतों से ही चलते हैं। जि‍स तरह परि‍वार के मुखि‍या की कामयाबी हर सदस्‍य को मूलभूत जरूरतों के साथ शि‍क्षा, सुरक्षा, प्‍यार और अपनापन देने में नि‍हि‍त है, वैसे ही देश के नेता की कामयाबी जनता को जीने के बेहतर मौके उपलब्‍ध कराने और सुख-दुख में साथी बनते हुए आगे बढाने में ही नि‍हि‍त है। ये गुण जि‍स उम्‍मीदवार में नजर आते हों, सि‍र्फ उन्‍हें ही अपना जनप्रति‍नि‍धि‍बनाने का संकल्‍प लेना ही होगा। यह इसलि‍ए भी जरूरी है क्‍योंकि‍हमें अपना जनप्रति‍नि‍धि‍वापस बुलाने का हक नहीं है। एक बार चुन लि‍या तो पांच साल कुछ नहीं कर सकते। सो, अभी ही ठोक-बजा कर फैसला लेना होगा। अपने बीच से ही उम्‍मीदवार चुनना होगा। कोई पार्टी नाकाबि‍ल उम्‍मीदवार थोपे तो शुरू से ही वि‍रोध दर्ज कराना होगा। उसे अपना फैसला बदलने के लि‍ए मजबूर करना होगा। अंत तक यह संभव नहीं हुआ तो मतदान के दि‍न कि‍सी भी उम्‍मीदवार के पक्ष में वोट नहीं डालने का वि‍कल्‍प आजमाने की भी सोच सकते हैं। संवि‍धान से मतदाताओं को यह हक मि‍ला हुआ है। आखि‍री वि‍कल्‍प के तौर पर इसे आजमाने से हि‍चकना नहीं चाहि‍ए। हम अपना नेता चुन रहे हैं, सही फैसला लेने के लि‍ए हमें ही आगे आना होगा। तो लेते हैं संकल्‍प। लोकतंत्र के सर्वाधि‍क सुंदर शासन व्‍यवस्‍था होने की परि‍भाषा सार्थक करने का।

राजीव रंजन said...

क्‍योंकि सपना है अभी भी...

इसलिए तलवार टूटी, अश्‍व घायल

कोहरे डूबी दिशाएं

कौन दुश्‍मन, कौन अपने लोग

सबकुछ धुध-धूमिल

किंतु कायम युद्ध का संकल्‍प
है अपना अभी भी

क्‍योंकि सपना है अभी भी...

RAJ said...

Manoj ji desh ki durdasha dekh ke aap hi nahi ham sab bhi dukhi hain...
Mera manna hai Kewal ek vote hi hamen aur is desh ko nahi bacha sakta uske vote is desh ko tab tak nahi badal sakta jab tak yaha 100% litracy na ho.....
Ab to janta kam Bheed jyada najar aati hai aisi bheed jo kisi se pyar nahi karti ........
Kash ham aur aap desh ke liye kuch kar sakte....