Thursday, May 14, 2009

हर नया किरदार बहुत पीड़ा देता है...

अभी तक मैं करज़त में ही हूं। शायद एक दो दिन में वापस मुंबई जाने के लिए अपनी पैकिंग शुरु करुं। बहुत गर्मी है यहां । लेकिन, शाम का समय अच्छा गुजर जाता है। बाकी कुछ सह कलाकार पनवेल के एक होटल में रुके हैं। दो दिन से उन्हीं के साथ जाकर गपशप मारता हूं, जब भी शूटिंग से वक्त मिलता है। क्योंकि ऐसी जगह पर जहां पर शूटिंग के अलावा और कोई गतिविधि न हो आप कितना पढ़ लेंगे, कितना टीवी देख लेंगे या कितना टहल लेंगे।

थोडी सी ऊब भी होने लगी है। शायद इसलिए क्योंकि मन जानता है कि अब हम जाने वाले हैं। बाकी की शूटिंग मुंबई शहर में ही होगी। फिल्म की शूटिंग का अपना एक उतार चढ़ाव होता है। ज्यादातर लोग ऐसे मिलते हैं, जिनके साथ आपने कभी काम नहीं किया होता। शुरुआत के दिनों में आपको चरित्र को लेकर घबराहट महसूस होती है। नए डायरेक्टर, नए सहकलाकारों और नये तकनीशियनों के साथ जान पहचान न होने के कारण अमूमन आप संबंधों को विकसित होने देना चाहते हैं, जिसमें वक्त लगता है। जब तक फिल्म खत्म होती है, तब तक आप एक दूसरे से इस कदर जुड़ जाते हैं कि छूटने का अफसोस होता है।

आईपीएल के मैच चल रहे हैं। उसने भी अच्छा खासा समय लिया है। चाहे देखने में हो या बैठकर मैच के बारे में बात करने में । लेकिन, कुल मिलाकर ये कहूंगा कि ‘जेल’ की शूटिंग के दौरान बहुत मजा आया । एक ऐसा रोल करने का मौका मिला, जिसके पास संवाद बहुत कम है। मेरा किरदार सिर्फ अपनी आंखों से भावनाओं को व्यक्त करता है। मुश्किल है लेकिन हर नया किरदार अपने तरीके की मुश्किलें लाता ही है।

फिल्म पर्दे पर आने से पहले कई स्तरों से गुजरती है। जिसमें एडिटिंग एक बहुत बड़ा पहलू होता है। देखें, उस अवस्था के बाद फिल्म कैसी लगती है और मेरा अभिनय कैसा निकलकर आता है। आत्मशंका अभिनेता के साथ हमेशा ही जुड़ी रहती है। वो दुनिया के सामने क्यों न शर्ट के बटन खोल कर घूम रहा हो लेकिन अंदर से हमेशा घबराया होता है कि क्या वो हकदार है पैसे का, प्रेम का, नाम का, जो उसे मिल रहा है?

अभिनय करने से पहले वो घबराहट अपना बड़ा स्वरुप ले लेती है। नया चरित्र निभाने के समय वो कई बार अपने आपको इसी प्रश्न के घेरे में लेता है कि क्या वो अच्छा अभिनेता है। या फिर अभिनेता है या नहीं है। बड़ी पीड़ा होती है अभिनय करते हुए। उस पीड़ा के बाद काम सही निकल कर आ जाए तो उससे ज्यादा खुशी भी कहीं नहीं मिलती। मेरे ख्याल से हर रचनात्मक काम में कलाकार को ऐसी ही पीड़ा होती है।


राजनीति की गहमागहमी हमें सुनायी देती रहती है। क्रिकेट के चौके- छक्के मौके मिलने पर देखे जाते हैं। लेकिन, इन सबसे दूर हम अपनी एक बहूमूल्य फिल्म ‘जेल’ की गतिविधि में जुटे हैं। आशा करता हूं कि मुंबई इंडियंस अपना स्थान सेमीफाइनल में बना पाएगा। उम्मीद करता हूं कि एक स्वस्थ और काबिल सरकार हमें पांच सालों के लिए मिलेगी। ये प्रार्थना करता हू कि ‘जेल’ में जो मेहनत की, उसका फल हमें अच्छा मिलेगा।

इसी आशा, उम्मीद और प्रार्थना के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

16 comments:

डॉ .अनुराग said...

हम मंबई इंडियंस के तो फैन नहीं है धोनी एंड टीम के है ......पर हाँ जेल के आपके किरदार की इंतजार रहेगी.....

रंजीत said...

बहुत सही बात कही है आपने, शंकाओं-आशंकाओं के परिधि में पीसकर ही कोई कलात्मक काम आकार पाता है। इसमें अतर्द्वंद्व होना स्वाभाविक है क्योंकि जब कभी हम कोई कलात्मक काम करते हैं तो प्रकारांतर से परानुभूति को आत्मानुभूति में बदलने की कोशिश करते रहते हैं। यह साधारण काम नहीं होता। टीएस एलियट ने लिखा भी है- रचनाकार, जो रचते है और भोक्ता जो भोगते हैं, उनके बीच हमेशा एक दूरी होती है और जो रचनाकार इस दूरी को जितना कम कर पाता है वे उतने ही बड़े कलाकार होते हैं। "शूल' में आपने भी इस दूरी को नणण्य कर दिया है। शुभकामना।

kaptan said...

hiiiiiii sir

इरशाद अली said...

मनोज जी आप तो सदैव ही बहुत अच्छे आत्मकथ्य लिखते है। लेकिन आपको नही लगता ये आप ब्लाॅगिंग सिर्फ एकतरफा तरीके से करते है। हिन्दी ब्लागिंग समाज को आपसे कुछ शिकायते हैं। जिसका जिक्र आज ही मैंने अपनी एक पोस्ट में किया है। आज बढ़िया मौका है, उन सबकी शिकायतों को दूर करने का।
स्नेकाकांक्षी
इरशाद
हिन्दी ब्लॉगिंग में अब तक के सबसे बड़े 25 सच
http://irshadnama.blogspot.com/

विजय वडनेरे said...

पहले तो आगामी फ़िल्म के लिए शुभकामनाएँ।

रही दूसरी बात, जो कि मैं पहले कहना चाहता था, वह यह कि क्या आप कोई पोस्ट लिख कर उसपर दुबारा लौटते हैं? उसपर आई हुई टिप्पणियाँ पढने के लिए, और उन टिप्पणियों पर खुद कोई टिप्पणी करने??

या फ़िर आप किसी और का कोई ब्लाग पढते हैं??

यह शिकायत नहीं है, महज एक कुलबुलाहट है। :)

neeshoo said...

अच्छा कार्य सदैव ही सराहा जाता है हां उसको लेकर मन में जरूर कुछ न कुछ उठापटक चलती रहती है । आपकी अपने वाली फिल्म जेल का इंतजार है , अब आईपीएल में आज मैच मजेदार रहेगा देखते हैं क्या होता है , साथ ही सरकार भी ।

*KHUSHI* said...

Mumbai Indians ko hum bhi support karte hai... aakhir hum bhi to mumbai se hai.. :) jaisa apane kaha, Jail mai aapka abhinay anakho ke jariye jyada nikhara gaya gaya. to hame ek song yaad aa gaya.. *Anaakhe bhi hoti hai dil ki jubaan...* agar editing mai kuch bura nahi huaa to hame aapka abhinay dekhne ko milega...
wel ocme bk to mumbai.. after all, kahi bhi jaao.. anth mai Home Sweet Home.. chahe mahal ho yaa jhopdi.. ghar ghar hi hota hai.. ek sukoon...

pukhraaj said...

डियर मनोज जी,
पहली बार आपके ब्लॉग पर विज़िट किया , अच्छा लगा ....
यूँ तो आपकी बहुत सी मूवी देखी हैं और आपके केरेकटर को पसंद
भी किया है ....पर आप मुझसे पूछेंगे की कौन की मूवी ....
तो सच बोलूं ....मुझे ज़्यादा मूवी के नाम याद नही रहते ....
पर हमेशा ही जहाँ कुछ डिफ़रेंट हो और अपने किरदार के
साथ ईमानदारी बरती गयी हो , पसंद आ जाती है.....
आप अपने किरदार के साथ सौतेला व्यवहार नही करते
ये सबसे अच्छी बात है ....
बाकी इंडिया मे गवेरमेंट वही आए , जो विकास की बातें
करे , देश जिसकी प्राथमिकता हो..... आई होप सो ....

Ashwin said...

manoj bhai..ashwani here..mere blog pe bhi ek nazar daalein..http://dekhadekhi.blogspot.com/

creativekona said...

आदरणीय मनोज जी ,
आपका कहना सही है की हर किरदार बहुत पीडा देता है .मुझे लगता है हर रचनाकार को इस पीडा से गुजरना ही होता है .
चाहे वह चित्रकार हो ,लेखक हो ,अभिनेता हो या और भी किसी कला से जुड़ा रचनाकार .बिना इस पीडा से गुजरे हुए कोई भी अच्छा क्रियेशन नहीं कर सकता .
ख़ास तौर से अभिनेता को तो पूरी तरह से उस किरदार को आत्मसात करके उसमें डूब जाना होता है जिस किरदार को वह अभिनीत कर रहा है .
और आप इस कार्य को बखूबी अंजाम देते हैं .
मेरी शुभकामनायें .
हेमंत कुमार

pukhraaj said...

आपको एक और नये किरदार मे देखने का
इंतज़ार.....शंका और घबराहट के बावजूद
नये चरित्र मे खुद को खो देना आप जैसे
कुशल अभिनेता की निशानी है

रानी पात्रिक said...

अरे करज़त से बाहर भी तो निकलिए। इतना लम्बा समय हो गया और कोई नयी बात नहीं।

कुलदीप मिश्र said...

Film ke liye shubhkaamnayein!!

Deepak Sharma said...

बुद्धम शरणं गच्छामि................


दो पल सुख से सोना चाहे पर नींद नही पल को आए
जी मचले हैं बेचैनी से ,रूह ना जाने क्यों अकुलाए
ज्वाला सी जलती हैं तन मे ,उम्मीद हो रही हंगामी .....
बुद्धम शरणं गच्छामि................


मन कहता हैं सब छोड़ दूँ मैं,पर जाने कैसे छुटेगा ये
लालच रोज़ बढ़ता जाता हैं,लगती दरिया सी तपती रेत
जब पूरी होती एक अभिलाषा ,खुद पैदा हो जाती आगामी......
बुद्धम शरणं गच्छामि................


नयनो मे शूल से चुभते हैं, सपने जो अब तक कुवारें हैं
कण से छोटा हैं ये जीवन और थामे सागर कर हमारे हैं
पागल सी घूमती रहती इस चाहत मे जिन्दगी बे-नामी........
बुद्धम शरणं गच्छामि................


ईश्वर हर लो मन से सारी, मोह माया जैसी बीमारी
लालच को दे दो एक कफ़न ,ईर्ष्या को बेवा की साड़ी
मैं चाहूँ बस मानव बनना ,मांगू कंठी हरि नामी ....
बुद्धम शरणं गच्छामि................




( सर्वाधिकार सुरक्षित @ कवि दीपक शर्मा )


http://kavyadhara-team.blogspot.com
http://shayardeepaksharma.blogspot.com
http://www.kavideepaksharma.co.in

raman said...

hiiii manoj ji, sir i am very much inspired from your acting in the movie"PINJAR' ,SIR r u again working going to to work in these type of movies

pradeep gupta said...

namste manoj ji.......
mai apka shubh chintak hoon , apka blogs mughhe padh ke bahut hi achha lagta ,or mai apke ane wale next blogs ki intjar me hoon..



apka shubh chinta ,pradeep gupta
from u.p. gorakhpur se.