Tuesday, June 2, 2009

विरोध हो, लेकिन कायदे से

एयरफ्रांस के विमान के दुर्घटना ग्रस्त होने की खबर देखी तो दिल दहल उठा। मैं दुर्घटनाग्रस्त लोगों के परिवार वालों की हालत सोचकर ही सिहर उठ रहा हूं। और क्या हाल हुआ होगा उनका, जो इस हवाई जहाज में सवार होंगे। हवाई जहाज की यात्रा सबसे सुरक्षित यात्राओं में मानी जाती है। लेकिन, जब इतने बड़े जहाज का यह हश्र होता है तब कहीं भी यात्रा करने से पहले आदमी यही सोचता है कि वो आखिरी बार परिवार वालों से मिल रहा है। मेरी संवेदनाएं उन सभी दुर्घटनाग्रस्त लोगों के परिवार वालों के साथ है। और जो लोग इस हादसे में मारे गए हैं,भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।

टेलीविजन पर देखा कि कुछ लोगों ने श्रमजीवी एक्सप्रेस को जला दिया। उनकी शिकायत थी कि ट्रेन ने कुछ स्टेशनों पर रुकना बंद कर दिया था। पहली बात तो ये कि शिकायत जायज थी। लेकिन शिकायत दर्ज कराने का ये कौन सा तरीका है? जो ट्रेन, बस आपकी सुविधा के लिए बनायी गई है, आप उन्हीं को तोड़फोड़ देते हैं या आग के हवाले कर देते हैं। ट्रेन रहेगी ही नहीं तो रुकेगी क्या खाक आपके स्टेशन पर।

विरोध दर्ज कराने के कई तरीके हैं। उनका सहारा जरुर लेना चाहिए। लोगों को मारना, चोट पहुंचाना, बिल्डिंगे जला देना, बस फूंक देना - क्या हम अपना ही नुकसान नहीं करते हैं। ये सोचने के लिए गंभीर विषय है।

अभी मैं मधुर भंडारकर की फिल्म से फारिग हुआ हूं। ‘जेल’ की भूमिका के लिए जो चेहरा बदला था, उस चेहरे को वापस मनोज बाजपेयी बनाने में लगा हुआ हूं ताकि अगली फिल्म पर काम किया जा सके। इसी बीच, हैदराबाद जाने का भी प्लान बना है। वहां से मैं दिल्ली चला जाऊंगा। शुरु के कुछ दिन अपने ससुराल वालों से मिलने के बाद अपने माता पिता और भाई बहनों के साथ रहूंगा। ऐसी मेरी योजना है।

इस बीच कहीं पर पढ़ा कि एक अभिनेता का ब्लॉग सबसे ज्यादा पढ़ा जा रहा है। टेलीविजन वालों ने इस पर एक प्रोग्राम ही बना दिया। टेलीविजन वालों को एक चींटी ने हाथी को काटा- अगर इस विषय पर भी प्रोग्राम बनाने का मौका मिले तो वो आधे घंटे का सदुपयोग कर सकते हैं। जरुरी ये नहीं है कि कितने लोगों ने पढ़ा। जरुरी ये है कि जो लिखा जा रहा है, वो कितना सामयिक है, कितना सही है और कितना न्यायंसंगत है। मैं खुश हूं कि मैं अपनी एक हफ्ते की सारी बातें अपने ब्लॉग पर लिख कर अपने मन की भढ़ास निकाल लेता हूं। मैं खुश हूं कि मैं किसी पर छींटाकशी नहीं करता। मैं खुश हूं कि जितने भी लोग मेरे साथ जुड़े हैं, वो मेरे दोस्त बने हैं।

आशा करता हूं कि ब्लॉग की ये यात्रा इसी तरह सकुशल तरीके से आगे और बहुत आगे तक जाएगी। क्या ये यात्रा का उद्देश्य नहीं होता कि हम सही सलामत अपनी मंजिल तक पहुंचे। कितनी जल्दी पहुंचे, क्या ये मायने रखता है। अगर नहीं तो मेरे जीवन की, अभिनय की और ब्लॉग की यात्रा जारी है।

ब्लॉग के जरिए जो लोग मेरे साथ जुड़ रहे हैं, उन सभी को मेरी तरफ से धन्यवाद और शुभकामनाएं।

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

21 comments:

सतीश पंचम said...

सिस्टम से विश्वास जब उठ जाता है तो ऐसे ही हिंसात्मक विरोध का तरीका लोग अपनाते है। ये गलत है ।

लेकिन यह कहना कि लोग रेल्वे को नुकसान पहुँचा कर अपनी संपत्ति को नुकसान पहुँचा रहे हैं तो मेरा मानना है कि लोग अभी तक उस लेवल तक सजग नहीं है। मानसिकता नहीं बनी है।
अभी तक लोगों में वह भावना नहीं आई है कि रेल्वे या अन्य सरकारी संस्थान हमारी संपत्ति है...जिस दिन ये भावना आ जायेगी....उस दिन से विरोध का स्वरूप बदल जायेगा।

वैसे कहा जाता है कि - बाहर वालों से तो हम निपट लेते हैं लेकिन लोग अपनों से ही हारते हैं । मोह, बंधन..बांध लेता है। यहां सरकारे अपनी जनता से हार जाती हैं , उन पर सख्ती करना यानि अपने ही घर के सदस्य को मारना पीटना। इस बढती हिंसा के पीछे अपनत्व का घुन भी लग गया है।

ससुरारी जा रहे हैं तो संभल कर जाईयेगा, सुना है ससुराल में साली-सलहजें बहुत तंग करती हैं :)
ओटर- कोटर से झांकती रहती हैं :)

yuva said...

VIRODH KEE RAJNEETI KA VIRODH WAALA YAH AALEKH ACHCHHA LAGA. APNI FILM KE BAARE MEN AUR VISTAAR SE BATAYEN. INTJAAR RAHEGA.

RAJNISH PARIHAR said...

विरोध प्रदर्शन को आजकल ना जाने क्यूँ हिंसा से जोड़ दिया गया है !भारत शांति और अहिंसा का देश है फिर विरोध हिंसात्मक क्यों?आखिर सार्वजानिक सम्पति भी तो हमारी ही है उसे जलाने से हमारा ही तो नुक्सान है,पर शायद ये बात हमारे नेता कभी नहीं समझना चाहेंगे...

अनिल कान्त : said...

मैं आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ ....जहाँ लोगों को विरोध का सही तरीका अपनाना चाहिए ...वही टीवी वालों ने तो हर चीज़ का नाटक बा रखा है ...

मुझे आपको पढ़कर ख़ुशी होती है ...आपके ब्लॉग को पढ़कर अपनापन सा लगता है ...यही इसकी खासियत है

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

डॉ .अनुराग said...

हैरान होता है ये खबरे देखकर .ऐसा लगता है जैसे जंगल राज में रह रहे हो...ट्रेन जला देना कोई मजाक बात नहीं है .वैसे जो रिपोर्ट आ रही है इसमें कुछ सियासती रंग है ........

संध्या आर्य said...

मनोज जी

आपने सवाल बिल्कुल सही किया कि .......

''लेकिन शिकायत दर्ज कराने का ये कौन सा तरीका है? जो ट्रेन, बस आपकी सुविधा के लिए बनायी गई है, आप उन्हीं को तोड़फोड़ देते हैं या आग के हवाले कर देते हैं। ट्रेन रहेगी ही नहीं तो रुकेगी क्या खाक आपके स्टेशन पर।''


पर आप इस सवाल को उन लोगों तक कैसे रख पायेगे जो लोग अपने लोगों पर अत्याचार जता के महाराष्ट्ररा मे हो रहे उत्तरभारतवासियो पर अत्याचार का विरोध,महाराष्ट्रा से जा रहे ट्रेन को जलाकर और यात्रियो पर अत्याचार करके करते है?


यह एक सवाल नही,मुझे एक ऐसी समस्या लगती है जिसका समाधान पहले होना चाहिये कि बिहार के बुध्दिजीवी वर्ग को निस्वार्थ होकर एक बहुत बडी जनसंख्या को सबसे पहले चेतनशील प्राणी बनाना होगा, तब जाकर हम यह समझा पाने मे समर्थ हो पायेगे,शायद!


वरना यह सवाल भैस के आगे बिन बजाने जैसी है क्योकि वहाँ की बहुत्त बडी जनसंख्या निरक्छ्रर है .

Sachi said...

मैं भी यही सब सोचता हूँ, लेकिन हम इतने जाहिल हो चुके हैं कि अकल घास चरने चली गयी है.....

अगर यही सब करना है, तो आतंक वादियों के खिलाफ करो, लेकिन अपने ही देश में, अपनी ही सामान को जला कर खुश होते हैं, तब तो हमारा भगवान् ही मालिक हैं...

आप बिहार से जुड़े हैं, अच्छा लगा.

Yayaver said...

यहाँ विरोध सिर्फ़ विरोध करने के लिए होता है ,समस्या का हाल कोई नही ढूनदना चाहत्ता. Media की तो बात निराली है, पहले अर्श पर उठाना,, फिर फर्श पे पटक देना, यही दस्तूर है उनकी रूज़मरा का.. content पड़ने के लिए समय चाहे, संवेदनाए चाहिए. sensationalized न्यूज़ के ज़माने में sensitive बात कौन सुनेगा. आपका ब्लॉग में सिर्फ़ इसलिए पड़ता हूँ, क्योंकि यह किसे बड़े स्तर के द्वारा appointed ghost writers का ब्लॉग नही है. यह आपके अंतर्मन के सच को शब्दों में दर्शाता है. आप ऐसे ही लिखते रहिए, ज़िंदगी के हर मुकाम पर हम आपके साथ हैं.

सागर नाहर said...

ट्रेन जलाने के इस मामले में तो पता नहीं पर तोड़फोड़ की अधिकांश घटनाओं में पढ़े लिखे लोगों का हाथ होता है, अब हम यह भी तो नहीं कह सकते कि शिक्षा का अभाव है।
मीडिया के बारे में आपने एकदम सही लिखा। एक बार एक समाचार चैनल पर एक विख्यात अभिनेत्री के बारे में बताया जा रहा था।
कैमरा उस अभिनेत्री के पेट पर फोकस कर बताया जाता है कि देखिये पेट कुछ बड़ा सा लग रहा है, फिर कैमरा चेहरे पर फोकस होता है फिर कहते हैं कि देखिये चेहरे की रंगत भी उड़ी हुई है; हो ना हो यह अभिनेत्री जल्द ही हमें खुशखबरी सुनाने वाली है। इस बात को दो साल होने आये अभिनेत्री क्या खुशखबर सुनाती, जब ऐसी कोई बात होती।
मेरे कहने का मतलब है मीडिया के घटियापन, ओछेपन का यह कितना निचला स्तर था। मां बनना हर स्त्री का निजी मामला है और ये समाचार वाले उसके लिये भी आधे घंटे का स्पेशल कार्यक्रम बना चुके थे।
हैदराबाद में आपका स्वागत है।
Sagar Nahar
66173487

Jayant Chaudhary said...

बातें तो आप सच कर रहें हैं...
पर समझा नहीं कि, आप किन लोगों की बातें कर रहे हैं?
जो सरकारी और सार्वजनिक संपत्ति को 'अपनी' के रूप में नहीं देखते हैं, वोही ऐसा कार्य करते हैं.

और तो हमारे महान देश में, कोई भी नियम कानून नहीं बचा है.
मेरी समझ से तो यह कोई भी तरीका नहीं है और इस तरह के लोगों को सजा मिलनी चाहिए.

गांधी जी के देश में ही, लोगों ने गांधी जी को भुला दिया..
मेरी एक कविता पढ़े (यदि समय हो तो):
http://jayantchaudhary.blogspot.com/2009/05/blog-post_06.html

और अमेरिका जैसे देशों में आज भी उनके बताये तरीके से लोग विरोध प्रदर्शन करते हैं,
और अपनी बात मनवाते हैं..

किन्तु यह भी तो सही है कि...
यदि 'हिंसक' विरोध ना हो तो कोई भी उनपर ध्यान ना दे..
खासकर मीडिया और न्यूज़ चैनल वाले!!!!!
फिर कोई क्यों शांति-पूर्वक विरोध करे??

क्या विसंगतियां हैं!!!

~जयंत

सचिन .......... said...

मनोज जी मैं आपको इंडस्ट्री के सबसे हुनरमंद कलाकारों के अलावा समझदार शहरी के तौर पर भी याद करता रहा हूं. इधर कुछ दिनों से आपके ब्लॉग पर लगातार आपकी समझ से इतर चीजें देखने को मिल रही हैं. क्या हमारा मनोज बदल रहा है? "ट्रेन रहेगी ही नहीं तो रुकेगी क्या खाक आपके स्टेशन पर" जैसी लाइनों की भरमार सुधार की जिस प्रक्रिया की तरफ इशारा करती है, उस राजनीति को आप अच्छी तरह समझते हैं. हमारे सामाजिक और राजनीतिक ढांचे में विरोध के तरीकों का भी एक तटबंध बनाया जाता है. व्यवस्था विरोध के जो साधन मुहैया कराती है वे उसकी सुविधा के लिए ही होते हैं, लेकिन हर रोज जीने की जद्दोजहद करने वाले से आप सिस्टेमेटिक विरोध की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं! जब हक मारा जाता है, तो विरोध किसी भी तरीके से होता है
एयरफ्रांस की दुर्घटना पर मुझे कुछ नहीं कहना. तकलीफों का सिलसिला खत्म होता कब है?

pukhraaj said...

आपकी विचारधारा से मॅ शत प्रतिशत सहमत हूँ,
राजनीति के रंगों से रंगे ये विरोध कहाँ तक सही
हैं इस बात को सियासत की गद्दी पर बैठे लोग
समझ नही सकते ,विरोध प्रदर्शन के और भी
तरीके हो सकते हैं , काश ये बात तोड़ फोड़ मे
विश्वास रखने वाले लोग समझ सकते ....

विक्षुब्ध सागर said...

विरोध की आग में धूं धूं जलती रेलगाडी के डिब्बों को देख एक अजीब सी कसमसाहट होती रही...रेलगाडी अब फलां स्टेशन पर नहीं रुकेगी तो इसे फूंक ही डालो ! ना रहेगी गाडी ऑर न ही बचेगा उसके चलने -रुकने का कोई सवाल ...सारी परेशानी ख़त्म ! वाह क्या सोच है ! लेकिन क्या वाकई यह सोच एक आम आदमी की सोच है ? वो आम आदमी जो सड़क पर चलता है ....रेल में सफ़र करता है ...दो वक़्त की रोटी के लिए जीता मरता है ! क्या वाकई यह उसकी सोच है ? अगर हाँ तो इस सोच पर बहुत कुछ सोचने की ज़रुरत है ऑर अगर नहीं तो यह किसकी सोच है जो कहीं पीछे रहकर ...आगे बहुत कुछ कर रही है या करवा रही है ?

CHANDAN said...

बहुत दिनों बाद आपने लिखा है । विरोध के तरीके पर आपने जो सवाल उठाया है उससे मैं सहमत हुं लेकिन इसमें देखना ये भी होगा कि क्या ये विरोध अपनेआप था या फिर कोई दुसरी ताकत इसके पीछे काम कर रही थी । अमुमन ऐसा होता है कि तत्कालिक विरधो जता रहे हाथों को कोई और अपने तरीके से नियंत्रित कर रहा होता है । तो ऐसे में जरूरत पर्दे के पीछे छीपे हाथों को पहचानने की है । वैसे आप सुसराल जा रहे हैं तो इसके लिये बधाई

ranjit kumar ranjan said...

मनोज जी अपने बिलकुल सही लिखा है कि विरोध हों लेकिन कायदे से. लेकिन कायदे से विरोध करने से आम जनता की बात ऊपर तक पहुँचती कहाँ है? आखिर ट्रेनों का स्तोपगे बंद करने का क्या कारण था? आम जनता के पास कोई दूसरा उपाय नहीं था. प्लीज़ आम लोगों कि परेशानियों को भी समझिये.

ranjit kumar ranjan said...

मनोज जी अपने बिलकुल सही लिखा है कि विरोध हों लेकिन कायदे से. लेकिन कायदे से विरोध करने से आम जनता की बात ऊपर तक पहुँचती कहाँ है? आखिर ट्रेनों का स्तोपगे बंद करने का क्या कारण था? आम जनता के पास कोई दूसरा उपाय नहीं था. प्लीज़ आम लोगों कि परेशानियों को भी समझिये.

anand said...

manoj bhai,main ramajas college me aapase teen saal junior thaa.do mahine pahale aapakaa blog dekha to mann ko ye sochakar sukoon milaa ki bhalaa ek to maadhyam mila jisase apani baat aap tak main pahooncha sakata hoon.manoj bhai mere mann me jivan ki kuchh ghatanaon se itani khalabali machi hui hai ki ek sashakt kahani aakar le rahi hai.main bhi bihar se hoon.mujhe lagata hai ki ye kahani cinema ke madhyam se desh ke saamane aani chahiye,jisase logon ke saamane chand sawal rakhe jaa saken .aap kaa e mail id mil sake to bahoot kripa hogi,shayad seedhe sanwad se mujhe ek margdarshan mile.
aapaka---amar dayal singh
varanasi

भारतपूत्र said...

आजकल के जमाने मे कोइ कुछ वाचन कर रहा हे| तो उससेभी टीवी वालो को समस्या हे| जाने किसी ने उन के पेट पर लात मारदी| वेसे उस विमान दु्रघटना का एक नया पहलु ये सामने आया की चार यात्री उडान चुक गाये| वही तो हमारे गुजराती मे एक कहावत हे "राम राखे तेने कोण चाखे"- भारतपुत्र

rohit said...

बंधु सवाल यह नही है की लोगो ने क्या किया सवाल यह है की उन्होने ऐसा किसके कहने पर किया. वो कोन थे जिन्होने लोगो को ऐसा करने के लिए उकसाया क्या किसीने रेलवे का वो ऑर्डर भी देखा था या सिर्फ़ एक अफवाह के आधार पर यह कदम उठाया. बंधु इस देश की सबसे बड़ी समस्या है की हम लोगो मे देश प्रेम नही है इस मामले मे हम चाइना, जापान , इस्रएल से कोसो दूर है . इसका शायद एक कारण यह भी हो सकता है की हमे एक सही, ज़िम्मेदार नेत्रत्व नही मिला सस्ते गुणडो को हमने नेता मान लिया और उनका ही अनुकरण करने लगे सही भी है यथा राजा तथा प्रजा . लेकिन सिर्फ़ इतना कह देने से हमारी ज़िम्मेदारी ख़त्म भी तो नही होती. हमे ही लोगो को जागरूक बनाना होगा. समाज को उसकी ज़िम्मेदारियो को सीखना होगा. हम सरकार से माँगे करते है यदि किसी कारणवश वो माँगे पूरी नही हो पाती तो इस तरह का विरोध प्रदर्शन करना क्या सही है. क्या हम अपने घर मे भी ऐसा ही करते है अगर हमारे मा बाप किसी माँग को पूरी नही कर पाते तो क्या हम अपने घर मे आग लगा देते है. यदि नही तो फिर देश भी तो एक घर है उसमे आग लगाना देश की संपत्ति को नुकसान पहुँचना कहा तक सही है.येह एक सवाल है इसका जवाव दीजिए

creativekona said...

आदरणीय मनोज जी ,
आपका कहना बिलकुल सही है ..रेल ,बस,बिजली ,पानी ,सड़क ...ये सब तो हमारी यानी आम जनता की खुद की संपत्ति है .हमें इसकी सुरक्षा करनी चाहिए ..न की विनाश .लेकिन भीड़ या जनता तो सिर्फ चद लोगों के भड़काने पर कुछ भी करने पर आमादा हो जाती है .ये इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा .आप अपनी फिल्म से खाली हुए और अपने पाठकों से रूबरू हुए ..पढ़
कर अच्छा लगा ...क्या कभी आप बच्चों के लिए भी कोई फिल्म करेंगे ...अगर संभव हो तो अपना ई मेल पता दे दें .
हेमंत कुमार

Parvez Sagar said...

Dear Manoj Bhai. I pray to god u,ll be fine.
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