Saturday, April 25, 2009

जन्मदिन पर भावुक बनाया 'जेल' की यूनिट ने

कुछ दिनों से मैं करजक में ही हूं। किसी से बात नहीं हो पाती क्योंकि मोबाइल नेटवर्क ठीक नहीं है यहां। इस कारण सुकून भी है। लेकिन,थोड़ी परेशानी भी क्योंकि कहीं न कही मोबाइल फोन अब जीवन का हिस्सा भी बन चुका है।करज़क में एक रिजॉर्ट में रुका हूं। मेरे ठीक सामने वाले कमरे में फिल्म के अहम कलाकार नील नीतिन मुकेश ने अपना पूरा घर बसाया हुआ है। करज़क की खासियत ये है कि मुंबई शहर से थोड़ा सा दूर होने के बावजूद मुंबई की भागमभाग से अलग है।

यातायात की असुविधा के कारण करज़क पहुंचने में दो ढाई घंटे लग जाते हैं। यहां जिस स्टूडियो में काम चल रहा है,वो मेरे रिजॉर्ट से 15 मिनट की दूरी पर है। अमूमन रोल कुछ ऐसा है कि मेरी जरुरत दोपहर के खाने के बाद होती है। सुबह आराम से उठकर मेकअप कराके समय पर जरुरत के मुताबिक पहुंच जाता हूं।

23 अप्रैल को ही मेरा जन्मदिन गुजरा। उसके दिन दिन पहले ही घर जाकर आया था ताकि पत्नी को कहीं जन्मदिन छूटने का अहसास न हो। वैसे, हम दोनों का मानना है कि जन्मदिन के अवसर पर काम करना शुभ होता है। 'जेल' फिल्म की यूनिट ने मुझे उस वक्त आश्चर्यचकित कर दिया, जब मैं काम में व्यस्त था और सभी ने अचानक टेबल सजाकर उस पर मेरे नाम का केक लाकर रख दिया। थोड़ी शर्मिन्दगी हुई क्योंकि जन्मदिन ऐसे मनाना कभी अपने व्यवहार में रहा नहीं है। इतने लोगों ने जन्मदिन का गाना गाया। बधाई दी। केक खाया। काफी भावुक क्षण था। मन ही मन मैं सबको धन्यवाद दे रहा था।

'जेल' का अनुभव अभी तक अच्छा रहा है। भगवान से मैं यही प्रार्थना करता हूं कि आगे भी अच्छा रहे। मेरा अपना मानना है कि फिल्म से ज्यादा अनुभव का अच्छा होना जरुरी है तभी हम अच्छी फिल्म बना सकते हैं। तभी हम अच्छा काम कर सकते हैं।फिल्म के बारे में ज्याद बात नहीं कर सकता। सिर्फ इतना कह सकता हूं कि बहुत ही कम संवाद वाला चरित्र करते हुए, उसके भावों को प्रदर्शित करने में कठिनाई का सामना करते हुए, निर्देशक के सामने अपने आप को पूरी तरह समर्पित करते हुए एक अलग तरह का अनुभव हो रहा है।

मधुर भंडारकर मेरे 14 साल पुराने जान पहचान के हैं। उस वक्त हम दोनों संघर्ष करते थे। मधुर की सफलता से मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत खुशी होती है। इसलिए जब मधुर ने मुझे इस रोल का प्रस्ताव दिया तो बिना ज्यादा समझे सुने हुए मैंने स्वीकार कर लिया। क्योंकि मधुर के जीवन के किसी क्षण में उसकी सफलता का हिस्सा बनना चाहता था मैं। बाकी सब कुछ मैंने मधुर के ऊपर छोड़ा है,और मैं जानता हूं कि वो न्याय कर पाएगा।

एक दिन का ब्रेक मिला है। मुंबई जाकर फिर लौटूंगा। इस बीच, शूटिंग जारी रहेगी। ब्लॉग पर लिखना भी जारी रहेगा और आशा करता हूं कि जीवन भी जारी रहेगा।

फिलहाल इतना ही
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Monday, April 13, 2009

हद हो गई अभद्र बयानबाजी की !

हद हो गई है। अब तो न समाचार देखने को मन करता है, न पढ़ने का। इस बार के चुनाव में राजनेता न सिर्फ अपनी मर्यादा पार कर चुके हैं, बल्कि उसकी परिभाषा भी बदल चुके हैं। कोई किसी को कुचल रहा है, कोई किसी को काट रहा है। कोई किसी को मारने की धमकी दे रहा है। और कोई किसी के अस्तित्व को मिटाने की बात कर रहा है।

लेकिन, इसके बीच भी आपको मन को समझाना है कि प्रजातंत्र को बचाए रखने के लिए वोटिंग में हिस्सा लेना जरुरी है और इन्हीं में से किसी एक को चुनना है। इस लोकतंत्र का एक वोटर, जो पूरी तरह से अपना विश्वास खो चुका है- न सिर्फ इस तंत्र में बल्कि अपने आप में, उसे इस तरह की भाषा, इस तरह के भाषण और इस तरह के नेता कहीं से भी मदद नहीं कर रहे।

आज कोई भी पार्टी ये दावा नहीं कर सकती कि उसने अपने चुनाव प्रचार में जनता को निराश नहीं किया है। सभी ने किया। उनके हर नेता ने निराश किया। और अभी 16 तारीख दूर है। पता नहीं क्या क्या झेलना होगा और क्या क्या सुनना होगा। एक मजाक सा बन गया है ये चुनाव। और इस तरह के सारे चुनाव। किसी के पास कोई ठोस आदर्श नहीं हैं, न मेनिफेस्टो है, न विचारधारा है और न राजनीति है। मुझे हंसी आती है जब सबके सब ताल ठोंकर न सिर्फ चुने जाने का दावा करते हैं, बल्कि भविष्य के प्रधानमंत्री भी खुद को ही बताते हैं। सच कहूं कि हंसी के साथ डर भी लगता है कि कहीं इस तरह के तंत्र में यही व्यक्ति सबसे ऊंचे पद पर न बैठ जाए।

लेकिन,फिर भी दिल को कहता हूं हिम्मत न हारो। उम्मीद न छोड़ो। अराजकता से ही शायद एक सही रास्ता निकलेगा। अराजक तत्वों के बीच से ही शायद अचानक सही राजधर्म निभाने वाला आएगा।

वैसे, इन दिनों अपनी फिल्म 'जेल' की शूटिंग में व्यस्त हूं। फिल्म की आउटडोर शूटिंग के लिए करजक जा रहा हूं। वहीं पर रहना होगा। मुंबई में रहते हुए भी मुंबई से 100 किलोमीटर दूर रहना होगा। इस भीड़ भीड़ से दूर। इस अराजकता से दूर। कोशिश करुंगा कि प्रजातंत्र में अपने वोट देने के अधिकार का उपयोग कर पाऊं क्योंकि अधिकार के नाम पर यही तो है,जिसे हम पूरी तरह से उपयोग कर सकते हैं। सारे दोस्तों से यही गुजारिश है कि पार्टी और नाम पर न जाएं। सिर्फ उम्मीदवार के काम और चलन को देखने के बाद ही अपना वोट डालें।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी