Tuesday, June 23, 2009

मुंबई में अब कहां बची है खुली जगह

शाम को टहलने निकला तो बहुत अच्छा लग रहा था। आज पहली बार यहां रहते हुए सुंदर से पार्क में अलग अलग से चेहरों को देखते हुए, उनकी गतिविधियों और हावभाव को निहारते हुए अपनी वॉक पूरी कर रहा था। यहां ठीक मेरी बिल्डिंग के सामने टहलने के लिए एक बहुत ही कम जगह में पार्क बनाया गया है। इसमें आसपास के लोग वर्जिश करने या टहलने के लिए उमड़ पड़ते हैं। आखिर क्यों न करें। यहां पर खुली जगह की कितनी कमी है !

लेकिन, टहलते वक्त ही अचानक मुझे ख्याल आया है कि इस पूरे मुंबई शहर में अब खुलापन बचा ही नहीं है। बच्चों के पार्क खत्म हो गए हैं। पेड़-पौधे भी जा रहे हैं। शहर बढ़ता ही जा रहा है। विकास के नाम पर इमारतें खड़ी हो रही हैं। खाली जगहों को गगनचुंबी ढांचों से भरा जा रहा है। एसईजेड बन रहे हैं, जिसके बारे में मैं थोड़ा अज्ञानी हूं। वर्जिश और टहलने के नाम पर जिम बनाए जा रहे हैं। मतलब ये कि अब हरे भरे पेड़, खेत-खलिहान सब धीरे धीरे विकास की भेंट चढ़ा दिए जाएंगे। कितना भयावह दृश्य होगा-पूछिए मत! सरकार को, लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए।

इस बीच हिंसा का तांडव चारों ओर लगातार दिख रहा है। लोग जितने उदास थे। नाखुश थे। अब गुस्सा हो रहे हैं। सोफियान हो या फिर लालगढ़। इन सबका निदान ढूंढना अब सरकार के ही हाथ में है। ऐसा क्यों होता है, जब हिंसा से लोग अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं, तभी सरकार सुनती है। वोट बैंक की राजनीति कम होने का नाम ही नहीं लेती। पहले लोकसभा चुनाव और उसे जीतने के हथकंडे। अब विधानसभा के चुनाव और उसे जीतने के हथकंडों में वक्त लगा रही है। लोगों की समस्याएं, उनके अंतरमन को छू भी नहीं पाती है। लोग अब भेड़ बकरी हो चुके हैं या शायद पहले भी थे। इन नेताओं, अफसरों की दृष्टि में। तभी शायद आज तक हमें अनदेखा किया जाता रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि हम शीघ्र इनके बारे में सोचें नहीं तो ये लोग सिस्टम पर ही सवाल खड़ा करना शुरु कर देंगे। फिर क्या बचेगा।

ये एक भड़ास थी मन के अंदर की, जो मैं अपने ब्लॉग के जरिए निकाल रहा हूं।

वैसे, ब्लॉग पर पाठकों की प्रतिक्रियाएं लगातार आती हैं तो अच्छा लगता है। कुछ लोगों ने शिकायत भरे लहजे में कहा है कि मैं पढ़ता भी हूं या नहीं तो मैं कहना चाहूंगा कि पढ़ता जरुर है। जवाब देना हर बार मुमकिन नहीं होता। हां, अगली पोस्ट में पिछली कई पोस्ट में पूछे सवालों और बातों का जवाब देने की कोशिश करुंगा।

बस, इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, June 2, 2009

विरोध हो, लेकिन कायदे से

एयरफ्रांस के विमान के दुर्घटना ग्रस्त होने की खबर देखी तो दिल दहल उठा। मैं दुर्घटनाग्रस्त लोगों के परिवार वालों की हालत सोचकर ही सिहर उठ रहा हूं। और क्या हाल हुआ होगा उनका, जो इस हवाई जहाज में सवार होंगे। हवाई जहाज की यात्रा सबसे सुरक्षित यात्राओं में मानी जाती है। लेकिन, जब इतने बड़े जहाज का यह हश्र होता है तब कहीं भी यात्रा करने से पहले आदमी यही सोचता है कि वो आखिरी बार परिवार वालों से मिल रहा है। मेरी संवेदनाएं उन सभी दुर्घटनाग्रस्त लोगों के परिवार वालों के साथ है। और जो लोग इस हादसे में मारे गए हैं,भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।

टेलीविजन पर देखा कि कुछ लोगों ने श्रमजीवी एक्सप्रेस को जला दिया। उनकी शिकायत थी कि ट्रेन ने कुछ स्टेशनों पर रुकना बंद कर दिया था। पहली बात तो ये कि शिकायत जायज थी। लेकिन शिकायत दर्ज कराने का ये कौन सा तरीका है? जो ट्रेन, बस आपकी सुविधा के लिए बनायी गई है, आप उन्हीं को तोड़फोड़ देते हैं या आग के हवाले कर देते हैं। ट्रेन रहेगी ही नहीं तो रुकेगी क्या खाक आपके स्टेशन पर।

विरोध दर्ज कराने के कई तरीके हैं। उनका सहारा जरुर लेना चाहिए। लोगों को मारना, चोट पहुंचाना, बिल्डिंगे जला देना, बस फूंक देना - क्या हम अपना ही नुकसान नहीं करते हैं। ये सोचने के लिए गंभीर विषय है।

अभी मैं मधुर भंडारकर की फिल्म से फारिग हुआ हूं। ‘जेल’ की भूमिका के लिए जो चेहरा बदला था, उस चेहरे को वापस मनोज बाजपेयी बनाने में लगा हुआ हूं ताकि अगली फिल्म पर काम किया जा सके। इसी बीच, हैदराबाद जाने का भी प्लान बना है। वहां से मैं दिल्ली चला जाऊंगा। शुरु के कुछ दिन अपने ससुराल वालों से मिलने के बाद अपने माता पिता और भाई बहनों के साथ रहूंगा। ऐसी मेरी योजना है।

इस बीच कहीं पर पढ़ा कि एक अभिनेता का ब्लॉग सबसे ज्यादा पढ़ा जा रहा है। टेलीविजन वालों ने इस पर एक प्रोग्राम ही बना दिया। टेलीविजन वालों को एक चींटी ने हाथी को काटा- अगर इस विषय पर भी प्रोग्राम बनाने का मौका मिले तो वो आधे घंटे का सदुपयोग कर सकते हैं। जरुरी ये नहीं है कि कितने लोगों ने पढ़ा। जरुरी ये है कि जो लिखा जा रहा है, वो कितना सामयिक है, कितना सही है और कितना न्यायंसंगत है। मैं खुश हूं कि मैं अपनी एक हफ्ते की सारी बातें अपने ब्लॉग पर लिख कर अपने मन की भढ़ास निकाल लेता हूं। मैं खुश हूं कि मैं किसी पर छींटाकशी नहीं करता। मैं खुश हूं कि जितने भी लोग मेरे साथ जुड़े हैं, वो मेरे दोस्त बने हैं।

आशा करता हूं कि ब्लॉग की ये यात्रा इसी तरह सकुशल तरीके से आगे और बहुत आगे तक जाएगी। क्या ये यात्रा का उद्देश्य नहीं होता कि हम सही सलामत अपनी मंजिल तक पहुंचे। कितनी जल्दी पहुंचे, क्या ये मायने रखता है। अगर नहीं तो मेरे जीवन की, अभिनय की और ब्लॉग की यात्रा जारी है।

ब्लॉग के जरिए जो लोग मेरे साथ जुड़ रहे हैं, उन सभी को मेरी तरफ से धन्यवाद और शुभकामनाएं।

आपका और आपका
मनोज बाजपेयी