Thursday, July 30, 2009

खुश हूं कि तेलुगु निर्देशकों की कसौटी पर खरा उतरा

इन दिनों मेरा आना जाना हैदराबाद लगा रहता है। हैदराबाद में तेलुगु इंडस्ट्री में लोग सुबह सात बजे से काम करना शुरु कर देते हैं। मेरे दोस्त आशीष विद्यार्थी तेलुगु फिल्मों में काफी व्यस्त हैं। उनका अपना मानना है कि आंध्र प्रदेश में बचपन से ही बच्चों को कड़ी मेहनत करना सिखाया जाता है और तेलुगु इंडस्ट्री इससे अछूती नहीं है। मुंबई के लोग भी काफी प्रोफेशनल हैं लेकिन तेलुगु में काम करने का आनंद बहुत ही कमाल का रहा है। ऐसा लग रहा है कि इतनी मेहनत तो मैंने कभी की ही नहीं थी। मेरे दोनों फिल्मों के निर्देशक मुझसे खुश नजर आए और कहीं न कहीं मुझे लगा कि इनकी कड़ी मेहनत की परिभाषा पर मैं खरा उतरा हूं।

मेरी शूटिंग लगातार चल रही है। सुबह साढ़े छह बजे काम पर निकलता हूं। शाम को आठ बजे अपने होटल पहुंचता हूं। फिर, वर्जिश करने के लिए जिम जाता हूं । डेढ़ घंटे अपने शरीर पर काम करने के बाद करीब साढ़े नौ बजे फिर होटल के कमरे में पहुंचता हूं। इसके बाद, तैयार होकर उन सभी मुंबई के कलाकारों से मिलता हूं,जो उसी होटल में ठहरे हैं। उनसे गपशप करके और साथ खाना खाकर 11 बजे तक सो जाता हूं। बस, यही मेरी दिनचर्या है।

इस बीच, मैं मुंबई दो दिन के लिए गया था। ‘एसिड़ फैक्ट्री’ तीन अक्टूबर को रीलिज होने वाली है। इसके प्रोमो और प्रचार के सारे सामान मीडिया के सामने रखा गया। कई महीनों की शूटिंग के बाद सारे कलाकार एक साथ इस आयोजन में शरीक हुए। उनके फिर से मिलने का अनुभव बहुत कमाल का रहा। हम इस कार्यक्रम के बाद भी तीन बजे रात तक निर्माता संजय गुप्ता के घर पर जमे रहे। कोई घर जाने को तैयार नहीं था। सब खुश थे क्योंकि सबने पूरी फिल्म देख रखी है और सभी अंतिम परिणाम से संतुष्ट हैं। आपके फिल्म बनाने के अनुभव पर चार चांद लग जाते हैं अगर आप अंतिम परिणाम से संतुष्ट हों।

एक दो हफ्ते के बाद फिल्म के प्रोमो आना शुरु हो जाएंगे। लेकिन, एक बात मैं पूरे आश्वासन के साथ कह सकता हूं कि एक साफ सुथरी रोमांचक फिल्म का अनुभव अगर आपको लेना है,तो एसिड़ फैक्ट्री जरुर देखें। बाकी देखने और न देखने का निर्णय हमारे दर्शकों के हाथ में है। मैं बार-बार आपके पास आता रहूंगा और अपने अनुभवों को आपके साथ बांटता रहूंगा।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, July 9, 2009

सिर्फ लिखता नहीं, ब्लॉग पढ़ता भी हूं

मैंने माइकल जैक्सन से बड़ा सितारा इस उम्र में न तो देखा और न सुना। एक ऐसा सितारा, जो मेरे गांव से लेकर अमेरिका की गली गली में जाना पहचाना गया। विवादों से घिरी जिंदगी, परिवार से दूर जिंदगी, अकेलेपन से घिरी जिंदगी, प्यार की खोज में भटकती जिंदगी और बहुत सारी सफलताओं से भरी जिंदगी। वो अचानक अकेलेपन में ही खो गई। माइकल जैक्सन के जाने के बाद लोगों को अहसास हो रहा है कि उन्होंने कितनी बड़ी प्रतिभा को खोया है। ऐसा मशहूर सितारा शायद आने वाले कई सालों तक हमें देखने और सुनने को नहीं मिलेगा। मेरी तरफ से माइकल जैक्सन को श्रद्धांजलि। भगवान उनके बच्चों को स्वस्थ और सुरक्षित रखे।

पिछली पोस्ट में मैंने लिखा था कि पाठकों की प्रतिक्रियाओं का उत्तर देने की कोशिश करुंगा। मुझे अच्छा लगता है कि लोग ब्लॉग पढ़ते हैं, और अपनी राय रखते हैं।

मेरी पिछली पोस्ट “मुंबई में खुली जगह कहां” पर कई पाठकों ने सहमति जताई। इसका शुक्रिया। वैसे,मैं सिविल इंजीनियरिंग के मामले में बिलकुल नादान हूं, इसलिए इसका सटीक हल मेरे पास नहीं है,लेकिन इतना विश्वास है कि अगर एक्सपर्ट लोग इस गंभीर समस्या के हल के बारे में सोचें तो कुछ हल जरुर निकल सकता है।

किसी पोस्ट की प्रतिक्रिया में भाई इरशाद अली और विजय वडनेरे ने पूछा है कि आप दूसरों के ब्लॉग भी पढ़ते हैं या सिर्फ अपना ब्लॉग देखते हैं? मैं कहना चाहूंगा कि शायद सभी ब्लॉग नहीं पढ़ पाता हूं,लेकिन जब मौका मिलता है कि तो खास और आम सभी के ब्लॉग देखने की कोशिश करता हूं।

संध्या आर्य ने भी एक पोस्ट की प्रतिक्रिया में क्षेत्रवाद के बाबत बात की है। मुझे लगता है कि बढ़ता क्षेत्रवाद गंभीर विषय है। इसकी जितनी निंदा की जाए,उतनी कम है। राजनेता अपने बैंक को सुरक्षित रखने के लिए इस तरह की बातों को हवा दे रहे हैं। मेरे बहुत सारे मराठी दोस्त हूं। मैं आम लोगों में भी घूमता फिरता हूं। वो इस सारी घटना पर अफसोस जताते हैं। और हम सभी ने खुले शब्दों में इसकी निंदा भी की है। टेलीविजन के माध्यम से और समाचार पत्रों के जरिए भी। अगर कोई कानून हाथ में लेता है तो कानून उसे सजा दे। हम और आप एक दूसरे से झगड़ा करके, उसका निदान नहीं निकाल पाएंगे।

जिन दिनों मैं करजत में जेल की शूटिंग कर रहा था, कुछ पोस्ट मैंने वहीं से लिखीं। उन पोस्ट में करजत का लगातार जिक्र आया था। इस दौरान रानी पात्रिक ने एक कमेंट में लिखा कि करजत से आगे की बात कीजिए। तो लीजिए मैं उन्हें बता दूं कि अब मैं करजत में नहीं हैदराबाद में हूं। अपने एक तमिल मित्र की तेलुगु फिल्म के सिलसिले में। अनुभव बहुत अच्छा है। यहां के लोग बहुत मेहनती हैं। यहां का खाना बहुत अच्छा लग रहा है। ढाई साल पहले, जब से सिगरेट छोड़ी है, अलग-अलग तरीके के खाना खोजने और खाने में मजा आने लगा है। क्योंकि मेरा मानना है कि भोजन भी एक क्षेत्र की संस्कृति का हिस्सा होता है। वो संस्कृति की बात भी कहता है और खुद में इतिहास भी समेटे रहता है। रानी जी, कभी हैदराबाद आना हो, तो एक रेस्तरां है अंजपर। पंचगुटा में। वहां खाना जरुर खाइएगा। केले के पत्ते पर खाना खाने का जो मजा आपको आएगा,वो आप कई दिनों तक याद रखेंगी।

वैसे, प्रतिक्रियाओं को देखते हुए एक बात अच्छी लगी कि कई पाठक बहस को आगे बढ़ाते हैं,तो कई किसी समस्या का हल खोजने की कोशिश में आगे आते दिखते हैं। हेमंत कुमार, गिरजेश राव, राजीव रंजन, अनिल कांत, सतीश पंचम, अजय कुमार झा, सागर नाहर, पुखराज, यायावर जैसे कई पाठक लगातार कमेंट कर हौसला बढ़ा रहे हैं। सभी का नाम लेना संभव नहीं है,लेकिन आप सभी का शुक्रिया।

कई पाठकों ने मेरी आने वाली फिल्मों के बारे में पूछा है कि तो मैं कहना चाहूंगा कि मेरी आने वाली फिल्में हैं-एसिड़ फैक्ट्री, जेल और राजनीति। इन सभी पर काम चल रहा है। सितंबर से ये फिल्में रीलिज होना शुरु होंगी। अवश्य देखें। मुझे काम करने में मजा आया। उम्मीद है कि आपको देखने में भी मजा आएगा।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी