Saturday, October 31, 2009

प्रचार बिन सब सून

अपनी नयी फिल्म ‘जेल’ के प्रमोशन के लिए मैं फैशन वीक में रैंप पर उतरा तो कई लोगों ने मुझसे एक सवाल किया कि क्या रैंप पर उतरना फिल्म कलाकारों के लिए अब फैशन हो गया है? या इस हथकंडे से फिल्म के सफल होने की गारंटी मिल जाती है? ये सवाल शायद इसलिए भी बार बार पूछा गया क्योंकि रैंप पर ‘जेल’ के सभी सदस्य यानी मैं, नील, मुग्धा और डायरेक्टर मधुर भंडारकर साथ-साथ उतरे और मैंने और नील ने तो कैदी की यूनिफॉर्म पहनी थी, और हाथ में हथकड़ी लगायी हुई थी। लेकिन, बात रैंप पर चलने की नहीं, इस बारे में पूछे गए सवालों की है।

फिल्म के प्रमोशन के लिए रैंप पर चलना इन दिनों आम हो गया है-इसमें कोई शक नहीं है। दरअसल, कंज्यूमरिज़्म के इस दौर में फिल्म भी एक प्रोडक्ट है और बॉलीवुड को यह बात अब अच्छी तरह समझ आ चुकी है। एक प्रोडक्ट को बेचने के लिए जिस तरह एडवरटाइजिंग की जरुरत होती है,उसी तरह फिल्म को बेचने के लिए भी एडवरटाइजिंग की जरुरत होती है। लेकिन, फिल्म और दूसरे प्रोड्क्ट में एक बड़ा अंतर यह है कि फिल्म का हश्र रिलीज के तीन दिनों के भीतर तय हो जाता है। ऐसे में, फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए जिन जिन तरीकों या कभी कभार हथकंडों की जरुरत होती है, उनका सहारा लिया जाता है। रैंप पर चलना सबसे सस्ते तरीकों में हैं,जहां आप कोई रकम खर्च नहीं कर रहे अलबत्ता पब्लिसिटी बटोर रहे हैं।

बहुत से लोग इस बारे में सवाल कर सकते हैं कि क्या पब्लिसिटी से फिल्म हिट हो सकती है? क्योंकि कई बड़े बजट की फिल्मों को धुआंधार पब्लिसिटी के बावजूद औंधे मुंह गिरते लोगों ने देखा है। जी हां, इसमें कोई दो राय नहीं है कि सिर्फ पब्लिसिटी ही सब कुछ नहीं होती। लेकिन,माफ कीजिए बहुत कुछ होती भी है। आखिर,दर्शकों को रिलीज हुई फिल्म के बारे में पता तो चलना चाहिए। उस फिल्म की कहानी-कलाकार आदि के बारे में कुछ तो पता होना चाहिए, तभी तो वो थिएटर तक फिल्म देखने की मशक्कत करेगा।

करियर के शुरुआती दौर में मैं पब्लिसिटी को अहम नहीं मानता था। लेकिन, अब मुझे लगता है कि मैं गलत था। दरअसल, अपनी फिल्मों की खराब पब्लिसिटी का हश्र मैंने कई बार भुगता है। मेरी फिल्म ‘स्वामी’ को आलोचकों ने बहुत सराहा, लेकिन फिल्म पिट गई क्योंकि दर्शकों को इसके बारे में पता ही नहीं चला कि फिल्म कब आई और कब गई। मैं अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘1971’ को मानता हूं। इसी फिल्म को इस साल बेस्ट हिन्दी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है। लेकिन, इस फिल्म की खराब पब्लिसिटी का ही नतीजा था कि दर्शकों को इस फिल्म के बारे में पता नहीं चला। टेलीविजन पर लोग फिल्म देखकर अब फोन करते हैं और पूछते हैं कि ये कौन सी फिल्म है, जिसमें मैंने इतना बढ़िया अभिनय किया है। हाल में प्रदर्शित हुई एसिड फैक्ट्री के बारे में भी मेरा यही मानना है कि फिल्म की पब्लिसिटी ठीक नहीं हुई।

आज के युग में फिल्मों के प्रचार प्रसार के लिए जरुरी है कि आप यानी कलाकार और फिल्म से जुड़े लोग हर संभव मंच से चिल्ला चिल्लाकर बताएं कि अमुक फिल्म रिलीज हो रही है। लोग कहते हैं कि क्या अब माउथ पब्लिसिटी के लिए कोई जगह नहीं है। तो मेरा यही मानना है कि नहीं है। वो इसलिए क्योंकि फिल्म का धंधा सिर्फ तीन दिनों का है,क्योंकि अगर तीन दिनों के भीतर लोग थिएटर तक नहीं पहुंचे तो फिर अगले हफ्ते तीन-चार फिल्में रिलीज के लिए तैयार होती हैं।

निश्चित तौर पर छोटे निर्माताओं को अपनी फिल्म के प्रचार में अब खासी मुश्किलें आती हैं, और उनके लिए यही रास्ता है कि वो सभी मुमकिन मंच से फिल्म का प्रचार करें। रिएलिटी शो में जाएं, रैंप पर कलाकारों को उतारें, वेबसाइट पर चैट करें वगैरह वगैरह। कुल मिलाकर सच्ची बात यही है कि बिन प्रचार सब सून है। दर्शकों द्वारा फिल्म पसंद या खारिज तो तब की जाएगा,जब बड़ी संख्या में लोग फिल्म को देखें और बिना पब्लिसिटी यह मुमकिन नहीं है। इसलिए ‘जेल’ या अपनी किसी दूसरी फिल्म के लिए जब मैं रैंप पर उतरता हूं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं चाहता हूं कि लोग फिल्म को देखने के बाद अपना फैसला दें।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, October 25, 2009

चटोरी जुबान रुकती नहीं !

अभी मैं भोपाल में हूँ। ‘राजनीति’ की अंतिम चरण की शूटिंग जारी है। इस पूरी शूटिंग के दौरान खाने का सिलसिला लगातार चल रहा है। कभी-कभार वर्जिश कर लेता हूँ। लेकिन पता नहीं क्यों चटोरी ज़ुबान रुकती ही नहीं ! हर दिन कहीं-न-कहीं से चिकन बिरयानी आता है या फिर मटन आता है। एक दिन खाना खाने के बाद अगले दिन के खाने की प्लानिंग शुरु हो जाती है। कोशिश कर रहा हूँ कि इस सिलसिले को थोड़ा रोकूँ, वरना वजन बढ़ जाएगा। लेकिन फिर यह लगता है कि पता नहीं भोपाल कब आना होगा और कब इस तरह का स्वाद फिर मिलेगा। ढाई साल पहले सिगरेट छोड़ने के बाद खाने का स्वाद पहली बार महसूस करना शुरु किया है। और अब खाना खाने में बहुत मन लगता है। इतने साल मैं सिगरेट पीता रहा तो खाना खाने का स्वाद जाता रहा था और सच कहूं तो खाना खाने में दिलचस्पी भी नहीं थी।

ख़ैर, इसके बाद वापस “जेल” के प्रचार प्रसार में लगूंगा। फिर एक नयी फ़िल्म को दर्शकों तक पहुँचाने की प्रक्रिया शुरु करुंगा। “जेल” में मेरा किरदार बहुत ही अनोखा है। एक सूत्रधार का रोल कर रहा हूँ। एक ऐसा व्यक्ति जो आजीवान कारावास की सज़ा काट रहा है, जिसने अपने जीवन को भगवान के सहारे छोड़ दिया है और कहीं-न-कहीं ऊपर वाले की मर्ज़ी से उसने समझौता कर लिया है।

मधुर भंडारकर ने जब फिल्म ऑफ़र की थी, तो मैं उसे बिना सुने भी करने को तैयार था। क्योंकि मधुर से मेरी संघर्ष के दिनों से जान-पहचान थी। श्री राम गोपाल वर्मा को वो असिस्ट किया करते थे और इन्होंने अभी-अभी सहायक निर्देशक का काम छोड़कर अपना काम तलाशना शुरु किया था। और मैंने “दौड़” की शूटिंग शुरु की थी राम गोपाल वर्मा के साथ। काफ़ी मिलना-जुलना रहा है। और उसने “जेल” फ़िल्म भी अच्छी बनायी है।

मधुर मुख्यधारा की ही फ़िल्में बनाते हैं, लेकिन विषय का चुनाव और जिस तरह से वो फ़िल्म का निर्देशन करते हैं, उससे वो फ़िल्में थोड़ी अलग दिखती हैं। ख़ास बात ये कि कहीं-न-कहीं सामाजिक सरोकार इनकी फ़िल्मों में दिखता है, जो बात मुझे बहुत अच्छी लगती है। मैं जानता हूँ कि लोग इस फ़िल्म को पसंद करेंगे। अब ये देखना कि लोग कितनी तादाद में सिनेमाहॉल के भीतर जाते हैं। एक सार्थक और यथार्थ से भरपूर फ़िल्म को देखने के लिए। मेरी दुआएँ मधुर भंडारकर और पूरी टीम के साथ हैं। और उनको मैं धन्यवाद देता हूँ मेरा पूरा ख़्याल रखने के लिए। मैं चाहूंगा कि फ़िल्म सफल से सफलतम साबित हो। इसमें दर्शकों के सहयोग की ख़ासी आवश्यकता होगी। “जेल” फ़िल्म देखें और अपना सुझाव या आलोचना भेजना न भूलें।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी

Tuesday, October 13, 2009

वोट न डालने का अफसोस है

‘एसिड़ फैक्ट्री’ का प्रदर्शन हो चुका है। मेरे अभिनय की लोग तारीफ कर रहे हैं। अच्छा लग रहा है कि मेहनत सफल हुई। दुख इस बात का है कि जिसके ऊपर फिल्म के प्रचार की जिम्मेदारी थी, वो अपना काम पूरा नहीं कर पाए। अमूमन संजय गुप्ता की फिल्में ठीक तरीके से दर्शकों तक पहुंचा दी जाती है। संजय गुप्ता को इस काम में महारथ हासिल है। लेकिन चूंकि इस बार फिल्म किसी और ने खरीद ली थी और इसके प्रमोशन की जिम्मेदारी उसी व्यक्ति के हाथों पर थी और हम सब एक असहाय दर्शक की भांति अपने ही बनाए गए काम को धराशायी होते देखते रहे।

ऐसा ही मेरी एक फिल्म ‘1971’ के साथ 2007 में हुआ था। और इस साल उसी फिल्म को बेस्ट हिन्दी फीचर फिल्म-2007 का राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया गया। दुख इस बात का है कि ‘एसिड़ फैक्ट्री’ एक मनोरंजक फिल्म है और इससे दर्शकों को अवगत होना चाहिए। लेकिन फिर वही गलती दोहराई गई। बहुत दुखी हूं ये सोचकर कि इतनी मेहनत का फिर क्या फायदा। स्वाभाविक है मेरा दुखी होना। फिर भी, मैं अपने दोस्तों से कहूंगा कि एसिड फैक्ट्री को देखें। ये एक मनोरंजक फिल्म है,जो आपको हंसाएगी और रोमांचित करेगी।

पूरे महाराष्ट्र ने वोट डाला। मैं चूंकि हैदराबाद में शूटिंग कर रहा हूं इसलिए अपने इस अधिकार का उपयोग नहीं कर पाया। और वैसे भी वोटर लिस्ट में दो दो बार रजिस्ट्रेशन करा चुका है लेकिन अभी तक न तो मेरे पास वोटर कार्ड है, और न ही ऐसी कोई खबर है। लेकिन, इस बार मुंबई में हूं नहीं तो पता नहीं कर पाया कि मेरा लिस्ट में नाम है कि नहीं। हां आईडी नहीं मिला है ये तो पता है मुझे।

आशा करता हूं कि इस इस बार जनता ने सोच समझकर अपने प्रतिनिधि का चुनाव किया होगा। ताकि उसे पांच साल तक पछताना न पड़े। अगली बार विस्तृत पोस्ट लिखूंगा।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, October 1, 2009

अपने मुँह मियाँ मिट्ठू !

“राजनीति” की शूटिंग अच्छी रही भोपाल में। दशहरा के दिन अपने दोस्त विजय जाजोरिया के घर खाना भी अच्छा रहा। कुल मिलाकर ये दस दिन अच्छे कटे। अब, मुंबई लौट रहा हूँ। “एसिड फैक्ट्री” के प्रमोशन के लिए। वैसे, टीम तो हैदराबाद और कोलकाता जा चुकी है, लेकिन बंगलोर और दिल्ली का सफ़र अभी बाक़ी है। शायद मैं दोनों ही शहरों में एसिड फैक्ट्री के प्रचार-प्रसार के लिए निकल पड़ूँ।

इस बीच कुछ एक निर्देशक हैं, जिनसे मिलना है। जिनसे कहानियाँ सुननी हैं या जिनसे स्क्रिप्ट लेनी है। साथ-ही-साथ मधुर भंडारकर की फिल्म “जेल” के कुछ प्रमोशन कार्यक्रमों का हिस्सा बनना है। पहले ऐसा कभी मेरे साथ हुआ नहीं कि एक ही महीने में मेरी दो फिल्में आई हों। लेकिन संयोग ऐसा बन पड़ा है कि एक महीने में एसिड फैक्ट्री और जेल सिनेमाघरों में पहुंच जाएंगी। एसिड फैक्ट्री सबसे पहले नौ अक्टूबर को रिलीज़ हो रही है। दोनों अलग तरीक़े की फिल्में हैं। दोनों में मेरी भूमिका उत्तर-दक्षिण की तरह अलग-अलग हैं। आशा करता हूँ कि सभी दर्शकों को न सिर्फ़ ये फिल्में अच्छी लगें, बल्कि ये प्रयोग भी उन्हें नया लगे।

एसिड फैक्ट्री का प्रमोशन करते वक़्त मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं अपने मुँह ही मियाँ मिट्ठू हो रहा हूँ। और शायद यह कहें कि हर फिल्म के प्रमोशन के वक़्त ही ऐसा लगता है। ये प्रमोशन का सबसे वीभत्स अनुभव होता है, जब आप ख़ुद ही फिल्म की तारीफ़ कर रहे होते हैं, और ख़ुद ही भूमिका के बारे में बातें कर रहे होते हैं। ये एक ऐसा पहलू है प्रचार-प्रसार का, जो मुझे रास आता नहीं है। लेकिन, ज़माना ऐसा बदला है कि जिन फिल्मों का प्रचार-प्रसार हुआ नहीं, जिन फिल्मों की तारीफ़ उनके अपने अभिनेताओं ने की नहीं, वो भी प्रदर्शन के पहले, तो दर्शक उन फिल्मों को देखने ही नहीं गए।

तो ठीक है। अगर दर्शकों के फिल्म देखने की शर्त यही है तो यही सही। आशा करता हूँ कि इस ब्लॉग से जुड़े सारे मेरे दोस्त मेरी फिल्मों से संतुष्ट होंगे। आपकी प्रतिक्रियाओं के लिए धन्यवाद। एसिड फैक्ट्री के रिलीज़ के बाद एक बार फिर आपसे प्रतिक्रियाओं को लेकर बात करुंगा।

इसी के साथ

आपका और सिर्फ़ आपका
मनोज बाजपेयी