Tuesday, December 22, 2009

कब साफ रखना सीखेंगे अपने समुन्दर के किनारों को....

गौराई बीच। समुन्दर का एक किनारा है और मुंबई में होते हुए भी मुंबई से अलग है। यहां मेरी एक फिल्म की शूटिंग चल रही है। यहीं एक क्लब में रहना हो रहा है। करीब चालीस मिनट की दूरी पर लॉकेशन पर वापस सुबह सुबह आना होता है। मुंबई में रहते हुए भी मुबंई की चकाचौंध और भीड़-भाड से दूर रहकर सुकून मिल रहा है। अफसोस एक ही बात का है कि हम अपने समुन्दर के किनारे कब साफ रखना सीखेंगे। सरकार और प्रशासन कब इस तरफ ध्यान देंगे?

एक तरफ विदेशों के समुन्दरी किनारे हैं, जो शहरों से लगे हुए हैं। उनकी खूबसूरती देखिए। दूसरी तरफ मुंबई के समुन्दर के किनारे, जो गंदगी से लबालब है। साफ सुथरी जगह तक नहीं मिलती, जहां आप पांव रख सकें।

खैर ये बात रही मेरे शूटिंग स्थल की। अभी बस फोन ही आया था भाई का कि वो गांव जा रहे हैं। मेरे माता पिता और बाकी लोग जा चुके हैं। छुट्टियां बिताने दिल्ली से। मन कर रहा है कि सब छोड़कर कुछ दिनों के लिए गांव जाऊं। लेकिन ऐसी कुछ परिस्थितियां बन पड़ी हैं कि कुछ भी छोड़ नहीं सकता। अपने घर-गांव और राज्य की याद तो खैर सबको आती है और वैसे ही मुझे भी आती है। शायद मार्च अप्रैल में जाने का अवसर मिले। लेकिन, इस गांव जाने के विचार के साथ ही न जाने कहां से ये विचार भी आता है कि हम बड़े क्यों हुए। रोजी रोटी का चक्कर इतना बड़ा कैसे हो गया कि हमें सबकुछ छोड़ना पड़ा।

लेकिन, फिर दिमाग में एक बात कौंधती है कि बात दाने पाने की नहीं थी। बात अभिनय से लगाव की थी। प्यार की थी। एक जुनून की थी। फिर भी,गांव बहुत याद आता है।

आज शूटिंग के बीच से वक्त निकाला है,इसलिए ज्यादा कुछ लिख नहीं पा रहा। लेकिन,अगली बार जरुर कुछ ज्यादा बातें होंगी।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Monday, December 7, 2009

अधूरा रह गया दुबई देखने का ख़्वाब

पिछले हफ्ते दुबई में था। दुबई कभी गया नहीं था। उसके बहुत सारे कारण थे। जब भी ऐसे मौके मिले तो मैंने उस प्लान को खारिज कर दिया या वो प्लान खुद ही खारिज हो गया। इस बार मौका लगा तो मन में खुशी थी कि दुबई देखने का मौका मिलेगा। दुबई एयरपोर्ट पर उतरे, गाड़ी में बैठे और गाड़ी करीब दो घंटे चलने के बाद होटल हिल्टन पर रुकी। मैंने ड्राइवर से पूछा कि ये दुबई ही है न? तो उसने जवाब में कहा- दुबई एक अलग अमीरात है। हम दो अमीरात पार करके किसी तीसरे ही अमीरात में पहुंचे हैं। इसका नाम है रस अल खेमा।

आप सोच सकते हैं कि मैं कितना उदास रहा होऊंगा। एक छोटा और बहुत ही छोटा सा शहर जो अभी विकसित हो नहीं पाया है। लेकिन शूटिंग वहीं होनी थी। छह सात दिन की शूटिंग करके वापस दुबई हवाई अड्डे पर उतरा और फिर दिल्ली आ गया। दुबई देखने और घूमने की इच्छा अधूरी ही रह गई।

इधर,दिल्ली में प्रवासी भारतीय फिल्म फेस्टीवल की योजना बन रही है। जिसके अवॉर्ड की ट्रॉफी के अनावरण के उपलक्ष्य में समारोह रखा गया था, मुझे उसमें भाग लेना था। बहुत अच्छा समारोह रहा। श्री अशोक चक्रधर, श्री राजीव शुक्ला, श्री साबिर अली इन सभी लोगों ने अपने अपने भाषण से लोगों का मन मोह लिया। लेकिन जो सबसे बड़ी उपलब्धी थी इस समासोह की तो वो मॉरिशस के राष्ट्रपति महामहिम अनिरुद्ध जगन्नाथ की उपस्थिति। वो इस समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में मौजूद थे। उनकी सादगी देखकर मैं आश्चर्यकित और भौचक रह गया।

ऐसे लोगों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। बचपन से सादगी मुझे लुभाती रहती है। ऐसे ही जीने की इच्छा है। जब बड़े पद पर बैठे लोग आपके सामने उदाहरण पेश करते हैं तो फिर व्यक्ति अपनी ही सादगी पर सवाल खड़े करना शुरु करता है और अपने आप को सुधारने की दिशा में काम करना शुरु करता है।

मुझे जीवन में आराम चाहिए। आधारभूत सुविधाओं की इच्छा रखता हूं। लेकिन, सादगी से एक सम्मोहन और एक आकर्षण रहा है। और आशा करता हूं कि मैं इसी तरह से आगे का जीवन भी व्यतीत करता रहूं। आप पाठकों की प्रतिक्रियाएं लगातार उत्साह बढ़ाती हैं, और मैं देखता हूं कि कुछ पाठक लगातार उत्साहवर्धन करते हैं। सभी की प्रतिक्रियाओं को लेकर बातचीत जल्दी ही।

फिलहाल, सादगी भर अभिनंदन के साथ आपका और आपका
मनोज बाजपेयी