Sunday, November 28, 2010

मुझे सपनों पर बहुत विश्वास है

बिहार में नीतीश कुमार जी की सरकार बनने के बाद बहुत सारे दोस्तों से बात हुई। सभी में उत्साह है। और उस उत्साह का पता टेलीविजन के माध्यम से भी पता चल रहा है। अमूमन ऐसा होता है कि हम उम्मीदें बहुत करते हैं और उस उम्मीद पर कोई जरा सी भी चूक रह जाती है तो हम फिर से आलोचना के लिए खड़े हो जाते हैं। उम्मीदें उतनी ही रखें जितना पांच साल में हुआ है। चाहे वो किसी की भी सरकार हो, चमत्कार तो कोई कर नहीं सकता। लेकिन, इस बात की खुशी है कि बिहार में रहने वाले बिहारवासी अपनी खुशी के लिए सचेत हुए हैं। और अब वो एक बेहतर जीवन चाहते हैं। इस जीत से मुझे इसकी भनक आती है। और अच्छा अहसास होता है। जिस बिहार ने कई सालों तक सपने देखना छोड़ दिया था, आज वो हर समय सपने बुन रहा है। यह खुद की सफलता और विकास के लिए पहला कदम है। लोग चाहे किसी की सरकार बनाए, लेकिन अपनी उम्मीदों के लिए, अपनी चाहत के लिए, लड़ाई लड़ना न छोड़े, ये सबसे बड़ी बात है।

इस सरकार को बहुत बड़ा मौका मिला है काम करने के लिए। और लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए। सरकार अपना काम करेगी और अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरेगी, ये तो पांच साल में पता चलेगा। लेकिन लोग लगातार अपनी उम्मीदें जगाएं रहें, और अपनी चाहत बनाए रखें, ये सबसे आवश्यक है। प्रजातमंत्र का यह सबसे खूबसूरत पहलू है कि पांच साल के बाद आपको हर सरकार को तराजू पर तौलने का मौका मिलता है। और मैं काफी आशान्वित हूं कि जिस तरह से लोगों की उम्मीद पर पिछले पांच साल खरे उतरें है। आगे के पांच साल भी बिहार की बेहतरी के उस मापदंड पर नीचे नहीं जाएंगे।

इधर, मीडिया का उत्साह देखकर मजा भी आ रहा था। और लग रहा था कि लगातार कई सारे प्रोग्राम दोहराए जा रहे हैं। मीडिया को अचानक अपने स्लॉट को भरने का मौका मिला। एक हद तक खबर की ओर लौटने का मौका भी मिला। अच्छा यह लग रहा था कि पूरे दिन बिहार की बात हो रही थी। जिस बिहार के बारे में बातें करने के लिए किसी के पास समय नहीं था। जिस बिहार को हर कोई खासकर मीडिया नकार चुका था, भूल चुका था। आज अचानक वो बिहार को पूरा दिन दे रहा था। बहुत अच्छा लग रहा था। बस, ऐसे ही राज्य और राज्य के लोग प्रगति की राह पर चलते रहें। उम्मीदें बांधे रहें। सपने बुनते रहें। चाहत बरकरार रखें। इससे अधिक खुशी बिहार के बाहर रहने वाले एक व्यक्ति के लिए और क्या हो सकती है। आज मैं बहुत खुश हूं। बिहार जाने का मौका खोज रहा हूं। वहां की सड़कों पर अपनी यात्रा को मैं अभी से देख रहा हूं। सड़क के किनारे पर ढाबे पर चाय पीते खुद को पा रहा हूं। मैं भी सपने ही बुन रहा हूं। और बुनता हूं तो सच होता है। मुझे सपनों पर बहुत विश्वास है।

इसी के साथ

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, October 17, 2010

"दस तोला"

हाल में कई राजनीतिक दलों का प्रस्ताव आया कि मैं उनके लिए बिहार चुनावों में प्रचार करुं। लेकिन, मन माना नहीं। मीडिया के अलग-अलग चैनलों और अखबारों के जरिए मैंने अपना संदेश बिहार की जनता तक पहुंचाने की कोशिश की है। आशा है कि वो मतदान के अधिकार का सही इस्तेमाल करेंगे। सही उम्मीदवार को, बिना आपराधिक छवि वाले उम्मीदवार का चुनाव करेंगे।

इस बीच मैं रामायण थ्री डी एनिमेशन फिल्म के प्रचार प्रसार में लगा। फिल्म इसी शुक्रवार को प्रदर्शित हुई है। उसकी भूरि भूरि प्रशंसा हो रही है। मैं सभी माताओं-पिताओं से अपील करुंगा कि वो बच्चों को यह फिल्म दिखाएं क्योंकि न केवल यह एनिमेशन की दुनिया में क्रांति है बल्कि बच्चों को अपनी सांस्कृतिक धरोहर से परीचित कराने का इससे बेहतर क्या माध्यम हो सकता है। इस फिल्म में मैंने भगवान राम के किरदार को अपनी आवाज़ दी है।

वैसे, अब मेरा पूरा ध्यान ‘दस तोला’ पर है। दस तोला एक छोटी किंतु बहुत ही सुंदर फिल्म बन पड़ी है। शायद सिनेमा के इतिहास में पहली बार एक सुनार फिल्म की कहानी के केंद्र में होगा। यह एक सुनार की कहानी है। सुनार के प्यार की कहानी है। सुनार के घरबार की कहानी है। अपनों से ही दुत्कार की कहानी है। उसके सोने के हार की कहानी है। कैसे एक दस तोले सोने का हार, जो बनाता है, उसके जीवन को पलट कर रख देता है। इसकी कहानी है दस तोला। पैंतीस दिनों की शूटिंग के बाद यह फिल्म बनी। ज्यादा ताम झाम नहीं है फिल्म में। सीधी सीधी कहानी और सीधा सीधा मनोरंजन है। कहानी का सार यही है कि शरीफ आदमी के धैर्य की परीक्षा न लें। शरीफ आदमी के प्यार की परीक्षा न लें। मैं इस फिल्म के चुनाव से बहुत संतुष्ठ और खुश हूं। खुश हूं कि मैंने ऐसी कहानी ही नहीं चुनी बल्कि ऐसा निर्देशक यानी अजय वर्मा को भी चुना, जो नयी कहानी कहाना चाहता है, नयी तरीके की फिल्म बनाना चाहता है। निर्देशक अजय लोककथाओं, कस्बों और गांवों की कहानी कहना चाहते हैं, जो आजकल कम ही दिखायी देते हैं सिनेमा के पर्दे पर। शहर के लोगों को उनकी जीवन की सारी सुविधाएं शहर में ही मिल जाती हैं. तो सिवाय विदेश जाने के वो किसी और चीज के बारे में सोचते ही नहीं। गांव जाना तो दूर की बात, गांव की सरहद से भी गुजरना वो उचित नहीं समझते। 

दस तोला में सभी कलाकारों ने बहुत ही अच्छा काम किया है। इस फिल्म के जरिए एक नयी लड़की का फिल्म जगत में आगमन हो रहा है। पल्लवी शारदा। पल्लवी आस्ट्रेलिया में पली बढ़ी हैं। कानून की शिक्षा ली है और भरतनाट्यम में पारंगत हैं। मैं तो बस इस फिल्म के प्रचार प्रसार में लगा हूं। सोमवार को इसी फिल्म के लिए दिल्ली और मेरठ जाना होगा। आप सोचेंगे कि मेरठ क्यों ? दरअसल, इस फिल्म के निर्माता मेरठ के हैं और उनकी बहतु सारी जमीन- जायदाद मेरठ में है। मजा आएगा मेरठ में। मैं पहली बार वहां इतनी देर रकूंगा। लोगों से रुबरु होऊंगा। मैं सबसे ज्यादा इंतजार कर रहा हूं बाजरे की रोटी, सब्जी और लहसन-मिर्जी का। उसके बाद एक ग्लास लस्सी मिल जाए तो कहना ही क्या ! पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खासियत है कि खाना जितना सादा होता है,उतनी ही मन को भाता है।

बहरहाल,अभी तो सिर्फ दस तोला ही दिमाग में घूम रही है। आगे की जानकारी से आप सभी को अवगत कराता रहूंगा। आप पूरे परिवार के साथ फिल्म देखिए और इसका पूरा आनंद उठाइए।

फिलहाल,इतना ही....

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Thursday, September 16, 2010

एक सपना सर्वोत्तम बिहार का

कई दिनों से लिखना नहीं हो रहा है। न मन में कोई उम्माद उमड़ा और न किसी बात पर गुस्सा आ रहा था। न ही ऐसा लगा कि किसी व्यक्तिगत बात पर लिखूं। थोड़ी पारिवारिक व्यस्तताएं हैं, और थोड़ी व्यवसायिक उलझनें। इस बीच बिहार में चुनाव का ऐलान हो गया है। मीडिया से जुड़े कई लोगों ने मुझसे कहा कि मुझे बिहार के राजनीतिक हालात पर कुछ लिखना चाहिए। लेकिन, मेरा कहना है कि मैं कोई राजनीतिक समीक्षक तो हूं नहीं। सिर्फ एक आम बिहारी हूं, जो अपनी रोजी रोटी की तलाश में मुंबई आया हुआ है। मुंबई में बैठकर बिहार की राजनीतिक समीक्षा करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है।
वैसे, बिहार से कटा मैं कभी नहीं रहा। अपने गृह राज्य के बारे में पढ़ता रहता हूं। जो देखता-पढ़ता हूं, उसी को आधार बनाकर कभी कभार बातें भी कर लेता हूं। बहुत सारे मेरे बुद्धिजीवी मित्र हैं, जिनका बिहार से खास नाता है। उनसे लगातार बातचीत होती रहती है। और उनकी बातों से भी बिहार की स्थिति-परिस्थिति के बारे में पता चलता रहता है।

चुनाव जब भी आते हैं, लोग कहते हैं कि आप कुछ बोलें। कुछ टिप्पणी करें चुनाव से जुड़े मुद्दों पर। लेकिन चुनाव तो हर पांच साल बाद आते हैं और चले जाते हैं। सवाल यह है कि क्या कुछ काम हुआ? बात यह है कि क्या भविष्य में काम होगा ? अगर काम हुआ है तो उसकी भरपूर प्रशंसा होनी चाहिए। आम लोगों तक तरक्की के ग्राफ की सूचना पहुंचनी चाहिए। लेकिन, अगर काम नहीं हुआ तो उसकी भी खुले मन से निंदा होनी चाहिए।

मेरा मानना है कि अगर आप सरकार के राजकाज के तरीके से सहमत हैं या नहीं है तो इसे व्यक्त करें। सरकार की निंदा या प्रशंसा चुनाव के वक्त लोग अपने वोट के जरिए कर सकते हैं। मेरा निवेदन है हर बिहारवासी से कि वो चुनाव के दौरान थोड़ी तकलीफ उठाए और अपने मन के विचार को वोट में तब्दील कर ईवीएम का बटन दबाए।

निश्चित तौर पर मेरे लिए किसी भी राजनीतिक पार्टी का पक्ष लेना मुश्किल है। मेरा मानना है कि जो भी काम करेगा, बिहार में रहने वाली जनता उसका भरपूर साथ देगी। और जो जनता को विश्वास में नहीं लेगा, वो बाहर जाएगा। चुनाव में यही तो होता है। राजनेता चाहे जो समझें, पर जनता को धोखे में रखना संभव नहीं है।

मैं अपनी तरफ से सारी राजनीतिक पार्टियों से निवेदन कर सकता हूं कि वो राज्य के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। गरीबी हटाएं,भुखमरी हटाएं, बेरोजगारी हटाएं। किसानों को सुविधाएं दें। सबको समान शिक्षा दिलाने की व्यवस्था करें। पटना-गया-मुजफ्फरपुर-दरभंगा-हजारीबाग-बेतिया-इन सब शहरों का नवीनीकरण करें। पर्यटकों को लुभाने वाली जितनी भी योजनाएं हो सकती हैं, उन पर विशेष काम करें। बिहार का इतिहास कोई दस-पचास साल का तो है नहीं कि इसे करने में कोई बड़ी परेशानी हो। भगवान बुद्ध से लेकर सीता मैया और मौर्यवंश से जुड़े सारे अवशेष पड़े हैं। सारी जगह मौजूद हैं। नालंदा-गया को हवाई रास्ते से जोड़ना चाहिए। एक बार विश्व के नक्शे पर बिहार पर्यटकों के लिए बेहतरीन राज्य के तौर पर उभर गया तो फिर राजस्व का बढ़ा स्रोत मिलेगा। और कई किस्म के रोजगार निर्मित होंगे।

दरअसल, करने के लिए तो बहुत कुछ है। जो भी सरकार बनाए, वो इन सब बातों पर ध्यान दें। मैं तो एक काम आदमी के नाते यही निवेदन कर सकता हूं। मैंने पिछले दिनों मुख्यमंत्री जी को एक ज्ञापन दिया था। कई बातें थीं उसमें। मेरा निवेदन होगा कि अगर वो सरकार में वापस आएं तो उस पर जरुर ध्यान दें। कोई और सत्ता संभाले तो संभव हो तो वो भी ज्ञापन पर ध्यान दें। हर बिहारवासी की तरह से मेरी भी दिली तमन्ना है कि मैं अपनी ही जिंदगी में बिहार को सर्वोत्तम राज्य होते हुए देखूं। ये एक सपना है। क्या यह सपना कभी पूरा हो पाएगा? शायद होगा। जरुर होगा। आशावादी आदमी हूं इसलिए उम्मीद कभी नहीं छोडूंगा।

Thursday, August 12, 2010

लिखने में नहीं लागे मन...

आजकल कुछ लिखने का मन नहीं करता। मस्तिष्क में ऐसी कोई बात नहीं आ रही है, जिसे ब्लॉग पर लिखकर मन की भड़ास निकाली जा सके। बुद्धि कुंद-सी है। न किसी तरह की क्रिया कर रही है और न किसी बात पर अपनी प्रतिक्रिया दे रही है। ऐसा होते-होते कुछ समय निकल गया। फिर लगा कि नहीं, लिखने के दबाव में ही कुछ-न-कुछ लिख दिया जाए।

शायद यह इसलिए भी हो रहा है कि अभी मेरा सारा ध्यान अपने परिवार की ओर लगा हुआ है। दूसरे काम मेरी प्राथमिकता के दायरे में आ ही नहीं रहे हैं... और अच्छा भी लगता है घर पर समय बिताना। आजकल किसी फ़िल्म की शूटिंग चल नहीं रही है। अनुराग कश्यप ने अपनी फ़िल्म की शूटिंग की तारीख़ आगे बढ़ा दी है और आज ही पता चला कि प्रकाश झा ने अपने अगली फ़िल्म ‘आरक्षण’ की शूटिंग जनवरी के मध्य से शुरु करने की घोषणा कर दी है। उनका इस संदर्भ में फ़ोन भी आया था।

उनके फ़ोन के बाद अचानक मैं अपनी नींद से जागा। अपने नाकारा बदन और मस्तिष्क को जगाने की कोशिश भी की कि इस बीच किया क्या जाए? क्योंकि जो पटकथा आजकल लोग मेरे पास लेकर आ रहे हैं, ज़्यादातर उनमें से नए लोग हैं। नए लोगों के साथ मैंने हमेशा काम किया है। कई लोगों की मदद की और उन्हें प्रोत्साहित किया। उनमें से कई अच्छा काम कर रहे हैं।

लेकिन जो लोग मुझे पटकथा दे रहे हैं, उसमें से एक भी ऐसी नहीं लगी कि जिसे मैं छू सकूँ। तो कुल मिलाकर बात यह है कि मुझे घर पर बैठना पड़ रहा है, जब तक अनुराग अपनी फ़िल्म की शूटिंग शुरु न करें। इसका फ़ायदा यह उठा रहा हूँ कि अपना वज़न मैंने कम भी किया अनुराग की फ़िल्म के लिए। और कम करुंगा। घर के काम में हाथ बंटाने में मज़ा भी आ रहा है और संतुष्टि भी है। बीच में दो-चार व्यावसायिक मुलाक़ात कर रहा हूँ, स्क्रिप्ट पढ़ता हूँ और एक्सरसाइज़ करता हूँ। दिन इसी में निकल जाता है।

इस आशा में बैठा हूँ कि कोई नया या पुराना निर्देशक ऐसी स्क्रिप्ट दे, जिसे पढ़कर मैं उछलकर कमरे से बाहर आ जाऊँ। अभी ऐसा हो नहीं रहा है। अभी मेरे पास कुछ कहने को नहीं है। लेकिन इसी आशा में बैठा हूँ कि शायद कोई अगले ही पल आएगा या भाग्य ऐसा मेहरबान होगा कि पूरी एक लंबी पोस्ट ब्लॉग पर देने का मसाला मिल जाएगा। अपने इस हाल से मैं परेशान भी हूँ और आश्वस्त भी। परेशान इसलिए हूँ क्योंकि काम करने की चाह हमेशा रहती है और आश्वस्त इसलिए हूँ कि जो मुझे अच्छा नहीं लगता, वो नहीं कर रहा हूँ। फिर भी अच्छा होने की उम्मीद है। अच्छा काम आने की उम्मीद है। इसी उम्मीद के साथ...

आपका और सिर्फ़ आपका

मनोज बाजपेयी

Tuesday, July 6, 2010

अनुराग कश्यप से दोस्ती कीजिए, उन्हें कठघरे में मत खड़ा कीजिए

पिछले दिनों काफी गहमागहमी रही। यहां का दस्तूर ही कुछ ऐसा है। जब तक आपकी फिल्म हिट न हो आपको व्यस्त नहीं रखा जाता। अभी तक मैं अपने जीवन में मशगूल था। अपने तरीके की छोटी बड़ी फिल्में करता था। लेकिन, कुछ दिनों से एक हिट का मुंह नहीं देखा था। इस कारण लोगों की नजरों में चढ़ा नहीं था। इज्जत थी, प्यार था, लेकिन गहमागहमी से दूर था। लेकिन, राजनीति की सफलता के साथ काफी कुछ बदल गया है। एक फिल्म के सफल होने के साथ ही कई सारे लोगों की आशाओं को पूरा करना पड़ता है। और फिर पारिवारिक जिम्मेदारियां। घर में सिर्फ मैं और मेरी पत्नी। और पूरा करने के लिए घर के बहुत सारे काम। इसी में उलझा रहा और लिखने से दूर भागता रहा। लेकिन, एक दो दिन पहले जब मुझे एक हिन्दी वेबसाइट द्वारा आयोजित बहस में अनुराग कश्यप को बुलाने और उनसे हुई बहस के बारे में जानकारी हुई तो मैंने उसे पढ़ा और फिर मुझे लगा कि लिख ही डालूं।

मेरी बहुत बड़ी शिकायत है हमारे पत्रकार मित्रों से। बहुतों से मैं लगातार मिलता हूं और कइयों से पहचान है मेरी। अनुराग कश्यप को बुलाकर उनके होने पर ही सवाल उठाकर आप क्या साबित करना चाहते हैं? जब अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, दिबांकर चटर्जी, नीरज पांडे जैसे युवा निर्देशक सामने आए तो उनकी संगत का भरपूर मजा लीजिए। न कि उनको कठघरे में खड़ा करना शुरु कीजिए। क्योंकि उन्होंने अपने सिनेमाई करियर की शुरुआत से लेकर अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया है, जिसे लेकर उनहें भड़कने पर मजबूर किया जाए। अनुराग कश्यप से समाज को बदलने की अपेक्षा क्यों रखी जाती है? अनुराग कश्यप अगर सिनेमाई भाषा की परिभाषा बदलने में लगे हैं तो उन्हें बधाई दीजिए। उनके साथ चाय पीजिए और उस याद को घर लेकर जाइए।

दलितों पर फिल्म नहीं बनायी जा सकती है, एक अच्छी कहानी पर फिल्म बनायी जा सकती है। और उस कहानी के केंद्र में दलित हो सकते हैं। उनके सामाजिक पहलू हो सकते हैं। और एक फिल्म बनाने के लिए एक कहानी की सख्त जरुरत होती है। सिनेम समाज नहीं बदलता। मैं ये कई साल से कहता आ रहा हूं। अगर ऐसा होता तो गोविंद निहलाणी और श्याम बेनेगल के वक्त में समाज कब का बदल गया होता। अमिताभ बच्चन जैसा सुपरस्टार हिन्दुस्तानी फिल्म इंड्स्ट्री ने कभी नहीं देखा, जिन्होंने रुपहले पर्दे पर हमेशा दबे कुचले लोगों का नेतृत्व किया। तो फिर दबे कुचले लोगों की स्थिति क्यों नहीं सुधर गई?

हमारे सीनियर नसीरुद्दीन शाह ने कहा था कि सिनेमा से सिर्फ हेयर स्टाइल बदलता है, समाज नहीं। बहुत सही कहा था। ये बात सही है कि सिनेमा की रचनात्मकता को बरकार रखा जाना चहिए। उसके विकास पर लगातार काम होता रहना चाहिए। इसमें अऩुराग कश्यप अग्रणी हैं। क्या उनके साथ सिनेमा की बदलती भाषा पर बात नहीं हो सकती? क्या उनसे किसी ने पूछा कि इस पूरे कमर्शियल बाजार में वो अपनी फिल्में भी कैसे बना लेते हैं? क्या किसी ने उनसे पूछा कि उन्होंने इस दौड़ में क्या क्या खोया है? क्या किसी को यह पता है कि वो अपनी फिल्म को आज तक रीलिज क्यों नहीं कर पाए? क्या आपको पता है कि ब्लैक फ्राइडे के रिलीज होने तक अऩुराग कश्यप की क्या दुर्दशा रही? अपने सिनेमा की भाषा के प्रति इमानदार रहने की जिद में अनुराग कश्यप भी एक तेवर वाले निर्देशक हो चुके हैं। आप उन्हें भड़काइए मत। उन्हें आदर दीजिए। आप उन पर सवाल मत खड़े कीजिए। उनसे दोस्ती कीजिए। और उनसे बातें कीजिए। आपके सारे सवालों का जवाब तभी मिलेगा। और शायद हमारे कुछ बंधुओं को यह मालूम नहीं कि वो सचमुच में एक फिल्म, जिसके लिए मुझसे हामी ले चुके हैं, उसमें दलित केंद्र बिंदु पर है।

लेकिन मैं जानता हूं कि वो कभी भी इस तरह की बहसबाजी के वक्त इस बात को उठाकर अपना बचाव नहीं करेंगे। आप हमसे सिर्फ सिनेमा के प्रति ईमानदार होने की ही आशा कीजिए। अगर हम वो भी कर जाते हैं तो भी हम समाज में कहीं न कहीं अपना योगदान दे रहे हैं। अगर आपको हिन्दुस्तान के फिल्म इंडस्ट्री के बाजारुपम का अहसास नहीं है तो आपको सवाल करने का भी कोई हक नहीं है। यहां पर वो लोग पूजे जाते हैं, जिन्हें नाचना आता है, जिन्हें दूसरे के बोलों पर सलीके होंठ हिलाना आता है। उनके बीच भी खालिस फिल्म बनाना और अच्छी फिल्म बनाना बड़ी बात है। खैर, मेरा आपसे निवेदन है कि जो बहस हो चुकी है, वो हो चुकी। जिसे जो भड़ास निकालनी थी, निकाल चुका। अपने लेखों में। अपने इंटरव्यू में। मेरी गुजारिश है कि अपने देखने के नजरिए में थोड़ा सा बदलाव लाए। थोड़ी इज्जत अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज जैसे लोगों और हम लोगों को भी दीजिए क्योंकि क्योंकि आपकी एक थप्पी से हमें बहुत साहस मिलेगा। आशा करता हूं कि मेरी किसी बात से आपको दुख नहीं पहुंचा होगा। उस बहस को पढ़कर मुझे जो दुख हुआ, उसी को मैंने आपके सामने रखा है।

इसी के साथ,
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Friday, June 18, 2010

धन्यवाद के अलावा मेरे पास आपके लिए शब्द नहीं

“राजनीति”की अपार सफलता और आप लोगों का अपार स्नेह मिलने के बाद मैं जिस तरह से अपने जीवन में नम्र हुआ हूं...शायद इसकी कमी थी मुझमें। आज ऐसा लगा रहा है जैसे सब मेरा इंतजार ऐसी ही किसी बड़ी फिल्म में कर रहे थे। टेलीविजन पर लोगों की बातें, अखबार वालों के इंटरव्यू, मेरे साथी कलाकारों का मेरे प्रति उत्साह और इज्जत और श्री प्रकाश झा जी का मेरे ऊपर विश्वास- ये सब देख कर, सुनकर मैं कई बार भावविह्वल हो उठता हूं। सब मुझमें पता नहीं क्या क्या देखते हैं, जो शायद मैं कभी नहीं देख पाया।

मैं अपनी पूरी यात्रा में ऊपर वाले का, थिएटर के हर डायरेक्टर का, साथी कलाकारों का, फिल्म निर्देशकों का और आप सारे दर्शकों का स्नेह स्नेह पा पाकर ही यहां तक पहुंचा हूं। नहीं तो एक ऐसे गांव के लड़के की क्या मजाल, जो गांव बिहार के नक्शे में भी नहीं दिखता, वो ऐसे सपने भी देख सके। मेरे पास धन्यवाद और धन्यवाद कहने के सिवा और कोई शब्द नहीं है। शब्द न सिर्फ कम पड़ रहे हैं बल्कि मैं बोल भी चुका हूं।

बहुत दिनों से ब्लॉग लिखा नहीं। उसका कारण सिर्फ इतना था कि राजनीति के प्रचार प्रसार के अलावा मेरे जीवन में कुछ और नहीं था। और जब तक फिल्म प्रदर्शित नहीं हो जाए, जनता के बीच न चली जाए, तब तक मैं अपनी राय कैसे प्रगट कर सकता था। मैं ये मानता हूं कि हर अच्छी फिल्म सफल नहीं होती और हर बुरी फिल्म असफल नहीं होती। लेकिन, जिस तरह का प्यार फिल्म को और मुझे मिला है, शायद मैं ये सत्या के बाद महसूस कर रहा हूं। पहली बार जब मैंने फिल्म देखी एक ट्रायल में तो अपनी पत्नी शबाना का फिल्म देखने का मजा ही किरकिरा कर दिया। सिर्फ अपनी कमियों का जिक्र करके। दूसरी बार प्रीमियर पर जब फिल्म देखी तो उन्हें भी संतोष हुआ और मैं भी थोड़े बहुत मजे ले पाया।

लोग मुझसे कहते हैं कि समीक्षक की क्या महत्ता है आपके जीवन में? मेरे अपने रंगमंच के दोस्त, मेरी पत्नी, वो लोग, जिनके विचारों की मैं इज्जत करता हूं, उन लोगों की समीक्षा से मुझे कोई परहेज नहीं है। मैं सिर झुकाए उनसे अपनी कमियों को, अपने बारे में उनके विश्लेषण को सुनता हूं। उसके बदले मेरे मुंह से चूं तक नहीं निकलती। लेकिन अखबार के समीक्षकों के बारे में मेरी राय थोड़ी अलग है। एक-दो लोग हैं, जिनसे मैं बात करता हूं। वरना ज्यादातर समीक्षक फिल्म से अलग जाकर किसी और फिल्म की ही समीक्षा करते हैं। न सिर्फ अपने लिए बल्कि किसी और की फिल्म की समीक्षा को भी पढ़ना मैं उचित नहीं समझता। लेकिन उन्हें लेकर मेरे मन में नाराजगी नहीं है। वो अच्छा लिखे या बुरा लिखें, मैं उनका अनुग्रहीत हूं कि उन्होंने मेरी फिल्म देखी और उसके बारे में कुछ भी लिखा। ये कोई तेवर है न कोई दंभ है, ये सिर्फ एक विचार है।

अभी तो मैं अपने ट्विटर एकाउंट पर आते संदेशों और मोबाइल के मैसेज बॉक्स में फोन की बजती हुई घंटी से ही खुश हो रहा हूं। हां, बता दूं कि इन दिनों ट्विटर पर सक्रिय हूं। मेरा खाता हूं-@bajpayeemanoj …।

लेकिन, राजनीति की सफलता से मैं अति उत्साही नहीं हूं क्योंकि अब इडंस्ट्री में 16 साल हो गए हैं। सफलता भी देखी और असफलता भी। लेकिन काम की प्रशंसा लोग हमेशा करते रहे और उसी से मैं प्रोत्साहित होता हूं। न कि इस बात से कि एक फिल्म ने कितने करोड़ रुपए कमाए। वो भी जरुरी ताकि मेरा निर्माता आगे फिल्में बनाता रहे। लेकिन उसके पैसे कमाने में मेरी कोई भूमिका हो ही नहीं सकती। मुझे तो फिल्म में लिया गया है अभिनय के लिए और मैं उसके साथ पूरी ईमानदारी बरतता हूं। और जितना हो सके अपनी तरफ से आप लोगों का स्वस्थ्य मनोरंजन करने की कोशिश करता हूं।
मेरी फिल्म ‘दस तोला’ जल्द प्रदर्शित होगी। अभी थोड़ा काम बचा है और फिर उसे किसी वितरक को बेचा जाएगा। जो उसके प्रदर्शन के साथ न्याय कर सके। तब तक आप लोगों के स्नेह और अपार प्रशंसा का मैं शुक्रगुजार हूं। ब्लॉग पर भी कई लोगों ने फिल्म देखकर प्रतिक्रिया देखी, उन सभी पाठकों का भी तहे दिल से शुक्रिया।

राजनीति नहीं देखी है तो अवश्य देखें। आपका और प्रकाश जी का सधन्यवाद करते हुए..
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Wednesday, June 2, 2010

‘राजनीति’ के लिए...

एक महीने की भागादौड़ी के बाद घर में बैठने का मौका मिला। बस ‘राजनीति’ के प्रचार प्रसार में लगा था। बहुत बडी फिल्म है। तो बड़ा कमिटमेंट भी था। हर जगह उपस्थित रहना था। बीच में बीमार भी पड़ा, जिसके कारण टीम के साथ दुबई नहीं जा पाया। इस बीच लगातार गिने हुए मेहमानों और दोस्तों के लिए शो रखे गए। हर शो के बाद मित्र-परीचित तारीफ के पुल बांध रहे हैं। तारीफ सुनकर किसे अच्छा नहीं लगता?

कल रात यानी मंगलवार को को मैंने अपनी पत्नी को फिल्म दिखायी और अब तक हमारी बातें खत्म नहीं हुई हैं। मुझे अपनी फिल्मों को देखना अच्छा नहीं लगता। क्योंकि मैं अपनी फिल्म और काम से ज्यादा अभिनय की बारीकियों को ध्यान से देखता हूं। फिर ऐसा लगता है कि मैं बहुत कुछ कर सकता था पर चूक गया।

लेकिन, राजनीति में जिस तरह लोग मेरे काम को पसंद कर रहे हैं तो मुझे विश्वास ही नहीं होता कि आखिर क्यों । लेकिन अभिनेता का दिमाग अपने काम को अच्छे से अच्छा करने में लगा होता है। दर्शकों का दिमाग सिर्फ उसे ही दिखता है,जो पर्दे पर दिखता है। खैर, संतुष्ट हूं कि सभी को काम पसंद आ रहा है और श्री प्रकाश झा का फिल्म भी खूब पसंद आ रही है।

गुरुवार को मुंबई में फिल्म का प्रीमियर है। क्या पहनूं- इस पर दिमाग लगा हुआ है। ये मेरे लिए बहुत बड़ा सिरदर्द है। शायद किसी उत्सव में नहीं जाने का सबसे बड़ा कारण यही है मेरे लिए। कपड़े इतने जरुरी क्यों हो जाते हैं। कपड़े का रंग, कपड़े का डिजाइन वगैरह-लोग इन पर ध्यान देते हैं। अजीब लगता है। उफ..एक अजीब सी संकट की घड़ी है मेरे लिए। फिर भी इसे करते हुए 16 साल हो गए हैं इस इंड्स्ट्री में । इस बार भी हो ही जाएगा। उत्सुकता है लोगों की प्रतिक्रिया जानने की। जो लोग प्रीमियर में आएंगे और फिल्म देखेंगे। लेकिन जिन्होंने देखी है, उनकी प्रतिक्रिया से मैं बहुत खुश हूं। अब सिर्फ ऊपरवाले का और मेरे निर्देशक प्रकाश झा का शुक्रिया अदा कर रहा हू।

आप लोग भी फिल्म देखें और अपनी प्रतिक्रिया ब्लॉग पर दें...आपका आभारी रहूंगा।

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, May 9, 2010

व्यस्तता के बीच बिहार यात्रा

इन दिनों मारामारी चल रही है। तारीखों के बंटवारे की। फिर, मैंने अपने आपको पूरी तरह ‘राजनीति’ के प्रचार प्रसार में समर्पित किया हुआ है। लेकिन इसके बावजूद बहुत सारे कमिटमेंट्स हैं या फिर कुछ लोग चाहते हैं कि आप उनके इंटरव्यू दें या उनके किसी कार्यक्रम में जाएं। और घर बार की जिम्मेदारी भी पूरी करते रहिए। आलम ये है कि क्रिकेट को मैं दीवानगी की हद तक चाहते हुए भी टी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप नहीं देख पा रहा हूं।

‘राजनीति’ की रिपोर्ट बहुत अच्छी है। जिससे मिलो वही उस फिल्म को देखना चाहता है। दर्शकों में उत्साह है। ये देखकर अच्छा लगता है। मेरी कई सारी बेहतरीन फिल्में बिना प्रचार प्रसार के दर्शकों में अपना उत्साह नहीं जगा पाई और दर्शक थिएटर तक नहीं पहुंचे। अब मुझे लगता है कि जरुरी ये है कि छोटी-अच्छी फिल्मों से ज्यादा उन अच्छी फिल्मों पर ही ज्यादा ध्यान दिया जाए, जिनके निर्माता बड़े हैं और जिनमें प्रचार प्रसार का माद्दा है।

कुछ एक कहानियों को सुना है और कुछ एक पसंद आई हैं। एक बार मैं उन्हें साइन कर लूं। एक बार तारीखों पर बात हो जाए तो मैं आपको बताऊं।
हाल फिलहाल मैं बिहार गया था। भोर नामक संस्था द्वारा शुरु किए जा रहे हॉस्पीटल के शिलान्यास के लिए। बहुत आनंद लिया। अपने घर से पचास किलोमीटर की दूरी पर हॉस्पीटल का शिलान्यास करने के बाद संस्थापक के घर पर शुद्ध रुप से शुद्ध बिहारी खाना खाना और बगल के नुक्कड़ से पान की लेकर मुंह में चबाना और फिर अपने सफर पर निकल जाना बहुत ही आनंददायक अनुभव रहा। अचानक मैं अपने पच्चीस साल पूर्व के जीवन में चला गया। रास्ते में रुककर नन्हें मुन्हे से एक कांच के गिलास में चाय पीना, मूंगलफली लेकर पटना तक का सफर तय करना-ये जल्दी भूले नहीं भूलेगा।

खुशी इस बात की है कि अपने इलाके के एक बहुत अच्छे काम में शामिल हुआ। मैं बस आशा करता हूं कि भोर नामक संस्था जल्द से जल्द डोनेशन जमा करके इस हॉस्पीटल का निर्माण अतिशीघ्र कराके जनता की सेवा के लिए उपल्बध कराएगी। पटना आने के बाद मुख्यमंत्री जी से भी मुलाकात हुई। अपने इलाके के दस बिन्दू थे, जिन पर मैं उनका ध्यान आकर्षित करना चाहता था। जिसमें थारु जनजाति के समाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की बात कही गई थी और साथ ही साथ बिहार में एक फिल्म सिटी और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तर्ज पर एक संस्था खुलवाने की भी मांग की गई थी।

मुख्यमंत्री महोदय ने मुझे कम से कम पैतालीस मिनट का समय दिया। मेरे साथ ही ज्ञानदेव त्रिपाठी, जो शिक्षाविद् हैं, उन्होंने शिक्षा संबंधी नीतियों पर बात की। अनुरंजन झा, जो भोर संस्था के संस्थापक हैं, उनके चैरिटेबल हॉस्पीटल के बारे में जानकारी ली। और इसी के साथ हमने मुख्यमंत्री महोदय से विदा ली। उनका बहुत बहुत धन्यवाद हमें इतना सारा समय देने के लिए।

वापस फिर वही फ्लाइट वही मुंबई नगरी की अपनी चकाचौंध में पहुंच गया हूं। ऐसा लगा, जैसे इक झटके से सपने से किसी ने उठा दिया हो। यकीं जानिए कि जल्द नहीं भूलूंगा इस यात्रा को।
आपका और आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, April 18, 2010

‘राजनीति’ के बहाने राजनीतिक विमर्श

राजनीति। ये ऐसा विषय है, खासकर हिन्दुस्तान में, जिस पर फिल्म बनाना अति कठिन कार्य है। दरअसल, राजनीति में सिर्फ राज की नीति शामिल नहीं होती। इसमें मानव व्यवहार के कई पहलू शामिल हो जाते हैं। लालच, दंभ, घृणा, साम, दाम, दंड, भेद और न जाने क्या क्या। और इन सभी पहलुओं को ढाई घंटे की एक फिल्म में दिखा पाना आसान काम नहीं है। लेकिन, प्रकाश झा की फिल्म ‘राजनीति’ ने इन तमाम पहलुओं को न केवल टटोलने की कोशिश की है, बल्कि राजनीति को कहीं गहरे देख गंभीर पड़ताल की कोशिश भी की है।

इस फिल्म के जरिए एक बार फिर देश की ‘राजनीति’ को देखना-समझना हुआ। पहले फिल्म की बात करता हूं। श्री प्रकाश झा ने ‘राजनीति’ के लिए जब मुझे बुलाया गया तो मेरे भीतर कई शंकाएं उभरीं। आखिर, राजनीति पर गंभीर लेकिन व्यवसायिक फिल्म बनाना आसान काम नहीं है ! लेकिन, जिस तरह से उन्होंने अपने व्यक्ति, निर्देशक, समाज सेवक और राजनीति के जीवन के अनुभव को पर्दे पर जीवंत किया, वो समचमुच बेमिसाल है। फिर महाभारत के कुछ एक पात्र भी हमारी इस फिल्म ‘राजनीति’ में दर्शकों को देखने को मिल जाएंगे। महाभारत के बहुत सारे चरित्र अपनी दुविधा और द्वंद के साथ लड़ाई करते हुए इस फिल्म में दिखेंगे। एक व्यापक अनुभव रहा इस फिल्म में काम करना। एक ऐसा अनुभव, जो कैमरे के पीछे से लेकर कैमरे के सामने तक एक अभिनेता के पूरे सपने की भरपाई करता है।

फिल्म की खासियत का बखान करना मेरा मकसद नहीं है। लेकिन, राजनीति की शूटिंग राजनीति से दूर रही, और हर काम तय शिड्यूल से हुआ। हां, एक उदाहरण जरुर देना चाहूंगा। इस फिल्म में भीड़ के दृश्य को जीवंत बनाने के लिए दस हजार लोगों की भीड़ भोपाल में इकठ्ठा की गई। दस हजार लोगों की भीड़ का ख्याल रखना, उनको ट्रेनिंग देना और उनको अपने निर्देशन के काबिल बनाना, उनसे सहायता लेना और उनकी आवश्यकताओं को पूरा करना- वहां ये सब ऐसे हो रहा था, जैसे पता नहीं कितने महीनों की अभिनय की क्लास लगाई गई हो। बाद में पता चला कि बहुत सारे छोटे-छोटे रोल, जो आपको इस भीड़ में दिखायी देंगे, उन सबके लिए बाकायदा आठ महीने तक एक कार्यशाला का आयोजन किया गया था। मैं हतप्रभ रहा गया और आज तक चकित हूं कि ये सब आखिर मुमकिन कैसे हुआ। अब जाकर मैंने अपनी डबिंग खत्म की है और लग रहा है कि कुछ बड़ा और अच्छा काम किया है।

लेकिन, फिल्म ‘राजनीति’ की शूटिंग के दौरान लगातार राजनीतिक चरित्रों के बीच खुद को घिरा हुआ पाया, और इसी दौरान एक राजनीतिक विमर्श भी शुरु हुआ कि आखिर भारतीय राजनीति इतनी पतित क्यों हो गई है? क्या आज की राजनीति सफलता पूर्वक अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रही है? राजनेताओं को समाज से जुड़े रहने में कठिनाई क्यों होती है? और विवाद से जुड़े होने में वो असहज क्यों नहीं होते ? और क्या हम जैसे सामान्य लोगों को अब राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव की आवश्यकता महसूस नहीं होती?

लेकिन, बात राजनीति या राजनेताओं की नहीं है। बात है आम लोगों की। लोकतंत्र ने जनता के हाथों में ऐसा हथियार दिया है, जिसके आगे बड़े बड़े निरंकुश राजनेताओं की भी बोलती बंद हुई है। ये है वोट। असल परेशानी यह है कि आम लोग भी छोटे छोटे स्वार्थों के लिए अपने साथ छल होने देते हैं। कभी उन्हें इसका अहसास नहीं होता, और कभी होता भी है,तो भी वो चुप्पी साधकर बैठ जाते हैं। फिर, भारतीय राजनीति की वर्तमान व्यवस्था ने आम लोगों की सोच को भी बहुत हद तक जड़ बना दिया है। जिसे बदलना चाहिए। लोग सिस्टम को बदलने में नहीं, उसमें शामिल होने में यकीं रखने लगे हैं-ये असल दिक्कत है।

राजनीति की शूटिंग करते वक्त ये भी लगा कि क्या फिल्म राजनीतिज्ञों के लिए आइने का काम कर पाएगी? क्या आम लोग फिल्म के जरिए राजनेताओं के हथकंडों को समझ पाएंगे। अगर फिल्म ‘राजनीति’ ऐसा करती है तो मुझे अपनी फिल्म पर बहुत गर्व होगा। लेकिन, अगर लोग आइने में देखकर खिसियानी बिल्ली की तरह हंसी निपोर कर आगे लोग बढ़ जाएं तो फिर फिल्मों से ही क्यों शिकायत हो कि वो समाज को बदलने में कोई सहायता नहीं करती। फिल्म ‘राजनीति’ अपना काम करेगी। वो दर्शकों का मनोरंजन करेगी। उन्हें हंसाएगी, रुलाएगी और उद्देलित करेगी। फिल्म राजनीति उन सवालों से एक बार फिर दर्शकों को रुबरु कराएगी, जिन्हें जानते हुए भी वो शायद उनकी अहमियत समझ नहीं पाते या नादानी में उनकी तरफ देखना ही नहीं चाहते। अब ये उन लोगों के ऊपर है, जो इस देश को चलाना चाहते हैं या चला रहे हैं कि इस तस्वीर से कुछ सीख पाते हैं या नहीं। सीखने को बहुत कुछ है। जानने को बहुत है। और अपने फिल्मी अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि शायद ये पहली हिन्दी फिल्म होगी जो आज की राजनीति में कहीं गहरे उतर उसे टटोलने का प्रयास करेगी।

Tuesday, April 6, 2010

लिखने-पढ़ने का मन नहीं

आज-कल न लिखने का मन कर रहा है, न पढ़ने का। बस, यूं ही फांके मस्ती का मन कर रहा है। और कोई काम जबरदस्ती नहीं होता मुझसे। दिल और दिमाग में सामंजस्य ने बैठे तो क्या फायदा। ब्लॉग पर पहले लिखने के बारे में सोचा, फिर अचानक लगा कि लिखा नहीं जाएगा। तो सोचा, कुछ मित्रों की बातों का जवाब दे दूं।

मैंने जबसे ब्लॉग लिखना शुरु किया है,तब से कई कमेंट में इसका जिक्र रहा है कि मुझे अपनी मुंबई यात्रा के बारे में लिखना चाहिए। किसी पोस्ट में पंकज शुक्ला जी ने कहा-आप मुंबई यात्रा को कलमबद्ध क्यों नहीं करते? वैसे, कुछ दोस्त कहते हैं कि मैं दिल्ली की यात्रा के बारे में लिखूं। कुछ कहते हैं कि रंगमंच से जो सीखा, उसके बारे में लिखूं। पंकज कह रहे हैं कि मुंबई की यात्रा पर लिखूं। सच कहूं तो अभी इन सबके बारे में कहने का मन नहीं है और न लगता है कि ऐसा महत्वपूर्ण कुछ किया है,जिसके बारे में लिखा जा सके। समाज से जुड़ी अपनी अंतरंग भावनाओं को ब्लॉग के जरिए आप लोगों से बांटता रहता हूं। वो ही काफी है। अपने बारे में, अपने संघर्ष के बारे में लिखना अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने जैसा लगता है। जिस दिन ऐसा लगेगा कि मेरे अनुभवों से बाकी लोगों को दिशा मिल सकती है या फायदा मिल सकता है तब अवश्य लिखूंगा।

कई लोगों की शिकायत है कि मुझे ब्लॉग जगत के लोगों से संवाद बनाना चाहिए। गिरजेश राव, महफूज अली, प्रिया और कई मित्र कमेंट भी यही कहते दिखे। अब मैं क्या कहूं ? लिखने के लिए समय निकालना ही काफी मुश्किल होता है। सोचना और लिखने के बाद फिर से अपने जीवन में लग जाना-ये भी आवश्यक है। कई सारी जिम्मेदारियां निभानी होती है। इस बीच जितना पढ़ पाता हूं और जितना लिख पाता हूं, उतना जरुर करने की कोशिश करता हूं। फिर, दिन में जितना समय और ऊर्जा बचती है, उसका उपयोग व्यक्तिगत और व्यवसायिक जीवन में लगा रहता है। मैं लेखक नहीं हूं, इसलिए ब्लॉग लिखने के लिए खुद तैयार करना भी मानसिक रुप में एक जिम्मेदारी भरा काम होता है। हिन्दी में कई ब्लॉग पढ़े हैं मैंने और कुछ मित्र लिंक भेजते हैं तो उन्हें भी देखता हूं....लेकिन ब्लॉगिंग से इतर कामों में बहुत वक्त लगता है।

कुछ मित्रों ने प्रकाश झा की 'राजनीति' के बारे में पूछा है। अभी 'राजनीति' के पहले प्रमोशन के लिए हम लोग दिल्ली गए थे एक दिन के लिए। काफी हंसी मजाक चला। प्रेस से मुखातिब भी हुए। एक बहुत ही महत्वपूर्ण फिल्म है मेरे लिए 'राजनीति'। क्योंकि मैंने प्रकाश झा के साथ काम किया है, जिनका गांव मेरे गांव के पास ही है। बहुत सारा सहयोग मुझे उनसे मिला। बहुत सारा प्यारा और विश्वास उन्होंने मुझ पर उड़ेला। वो मेरे अभिनेता से जिस कदर प्यार करते हैं, वो भी मेरे लिए अनमोल वरदान है। अच्छी फिल्म बन पड़ी है। मैं बस सिर्फ यह चाहता हूं कि आप लोग हॉल में जाकर उनके इस विशालकाय कार्य को देखें और सराहें।......

कई मित्रों के कमेंट नियमित दिखते हैं। उनका नाम लेना चाहता था, लेकिन फिर लगा कि कई छूट जाएंगे। कभी फुर्सत ने बाकी बातों पर चर्चा करुंगा।
इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Friday, March 12, 2010

सूर्या सेन का किरदार जीना अद्भुत अनुभव है

अभी-अभी ‘चिटगोंग’ फिल्म की शूटिंग करके लौटा हूं। इस फिल्म में मैंने मास्टर दा उर्फ सूर्या सेन का किरदार निभाया है। पूरी प्रक्रिया में रहने का बहुत मजा आया। एक अजीब सी बात यह है कि सारा हिन्दुस्तान इतने बड़े क्रांतिकारी के योगदान से बिलकुल अनभिज्ञ है। जबकि पूरा बंगाल और बांग्लादेश उनकी पूजा करता है।

ऐसा क्यों होता है कि स्वतंत्रता सेनानियों को एक ही राज्य से जोड़कर हम देखते हैं। सूर्या सेन पूरे भारत वर्ष के हैं। उनका योगदान पूरे भारत की स्वतंत्रता के लिए बहुत ही अहम रहा है। आखिर फिर उन्हें किसी एक क्षेत्र में ही सिमटा कर क्यूं रख दिया गया। एक ऐसा व्यक्ति, जो पूरे चिटगोंग शहर को कब्जे में लेता है। उस समय के और उस इलाके के जितने भी युवा मस्तिष्क थे, उनको सोचने की एक दिशा देता है। देश उससे अंजान है।

चलिए कम से कम मेरी फिल्म ‘चिटगोंग’ और अभिषेक बच्चन की फिल्म ‘मास्टर दा’ के बाद न सिर्फ हिन्दुस्तान बल्कि विदेश में भी इस महान पुरुष के बारे में लोग जानेंगे और समझेंगे। और कुछ बड़ी जानकारियां लेने की कोशिश करेंगे। तो क्या फिल्म ही अब एक जरिया रह गया है, इतिहास को टटोलने का। जानने का। मुझे खुशी है कि मैंने ये किरदार निभाया है।

एक अजीब सी बात यह हुई कि मैं अपनी दो फिल्मों के बीच में एक लंबा अंतराल देने की कोशिश करता हूं। लेकिन जब इस फिल्म का प्रस्ताव आया मेरे पास तब निर्देशक और निर्माता बिलकुल जल्दी में थे। वो इस फिल्म को जल्द बनाना चाहते थे। उन्होंने खुद ही कहानी पर बहुत काम किया था। बहुत खोजबीन की थी। और वो एकदम से इसे बनाना चाहते थे। उनकी कई सालों की मेहनत अब उनको चैन से सोने नहीं दे रही थी। वो किसी भी तरीके से इस फिल्म को बना देना चाहते थे। बात चली तब मैं फिल्म ‘दस तोला’ कर रहा था। और ‘दस तोला’ करने के एकदम बाद मुझे उनकी फिल्म की शूटिंग के लिए निकलना पड़ा। और जो भी मेरी जानकारी थी मास्टर दा उर्फ सूर्या सेन के बारे में, वो मुझे निर्देशक से विस्तार से मिली।

लेकिन मैं खुश हूं अपने निर्णय से कि मैंने मास्टर दा का किरदार निभाया। उनके किरदार को करते हुए सीखा। उनको जानने की भरपूर कोशिश की। और जब मैं दिल्ली लौटा हूं, अपनी शूटिंग के बाद तो बिना सूर्या सेन उर्फ मास्टर दा के अकेला महसूस कर रहा हूं। फिल्मों पर इल्जाम लगते हैं कि वो युवा मस्तिष्क को बिगाड़ देते हैं। भटका देते हैं। लेकिन सत्य ये भी है कि आज फिल्में ही लोगों तक हिन्दी भाषा को लेकर जाती हैं। आज फिल्में ही भगत सिंह और मास्टर दा जैसे महापुरुषों के बारे में लोगों को सोचने पर मजबूर करती है।

कई दिनों के व्यस्तता के बाद मैं थका हुआ हूं। अब दो महीने का अंतराल है मेरे पास। जिसमें मैं सिर्फ आराम करुंगा। दिल्ली आया हूं। अब कुछ दिनों तक अपने किए उन कामों के बारे में सोचकर मुस्कुराऊंगा, जिनसे मुझे संतुष्टि मिलती है। और वो सब काम करुंगा,जो इतने कई दिनों तक मैंने नहीं किया। वो है परिवार के साथ छुट्टियां बिताना। फिल्में देखना। दोस्तों के साथ वक्त बिताना या बाहर किसी शहर घूमने जाना। अभी तो सिर्फ मेरा यही उद्देश्य है। अगर आपको मौका मिले तो आप मास्टर दा के बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश करें। नहीं तो आप बहुत बड़े व्यक्तित्व को जानने से रह जाएंगे। वैसे, मास्टर दा पर बन रही दोनों फिल्मों के आने में अभी थोड़ा वक्त है, पर मैं चाहूंगा कि लोग दोनों ही फिल्में देखें। क्योंकि फिल्मों से ज्यादा जरुरी यह है कि अधिक से अधिक जानकारी दर्शकों को इस व्यक्तित्व के बारे में मिल सके।
फिलहाल इतना ही, लेकिन अब पाठकों की तरफ से आई प्रतिक्रिया का जवाब जरुर दूंगा। क्योंकि अब मैं फिल्मों में व्यस्त नहीं हूं कुछ दिन...सो प्रतिक्रिया दीजिए..।

इसी के साथ

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Saturday, February 20, 2010

बहुत याद आओगे निर्मल तुम

मेरे दोस्त स्वर्गीय श्री निर्मल पांडे को मेरी तरफ से श्रद्धांजलि। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उसके परिवार को इस परिस्थिति से उबरने की शक्ति दे। जब मुझे अचानक एक एसमएस आया, अपने प्रिय मित्र अनिल चौधरी का कि निर्मल का देहांत हो गया तो कुछ देर के लिए मैं सुन्न बैठा हुआ था। और फिर आंखों से आंसू निकल पड़े। मन बेचैन हो उठा। फिर लगातार अनिल चौधरी के साथ संपर्क बनाए रखा। आगे की जानकारी के लिए। मैं अपनी सारी मीटिंग्स खत्म करता जा रहा था, लेकिन मन में कुछ और ही चलता जा रहा था। सारी यादें और वो सारे पल जो निर्मल के साथ बिताए थे, मन में उमड़ने लगे।

मुझे अभी भी याद है उसका एक नाटक-राउंड हेड पीक हेड। इस नाटक में उसने अनूठा अभिनय किया था। मुझे अभी भी याद है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बाहर नीम के पेड़ तले एक दूसरे की टांग खींचते रहना। मुझे अभी भी याद है कि जब मैं विक्रम मल्लाह के रोल के लिए चुना गया था, तब मुझे सिर्फ यही डर था कि कहीं निर्मल पांडे शेखर कपूर से न मिल ले। क्योंकि अगर वो मिला तो निश्चित तौर पर मुझसे यह रोल छिन जाएगा। वो दिखने में इतना सुंदर था। हुआ वही। जब शेखर से निर्मल मिला तो मुझे उस रोल से हटाकर मान सिंह का रोल दे दिया गया और निर्मल को विक्रम का रोल दे दिया गाय। शेखर ने उसके बारे में कहा कि वो ईसामसीह जैसा दिखता है।

वो था भी इतने सुंदर व्यक्तित्व का मालिक। उस पर दिल हीरे जैसा। बड़े शहर की कोई भी काली छाया उसके दिल को छू नहीं पाई थी। नैनीताल के पहाड़ से आया था। और उस कमाल के व्यक्ति की कमजोरी यही थी कि वो यहां पहाड़ को खोजता रहा। शायद ये हाल हम सभी का है,जो छोटी जगहों से आए हैं। लेकिन, निर्मल कुछ ज्यादा सोचता था इन सबके बारे में। ये शहर की मारधाड़, काटाकाटी उसे पसंद नहीं आती थी।

कुछ दिनों से संपर्क टूटा हुआ था। वो अपने जीवन में रमा था। हम सभी अपने जीवन में अलग अलग व्यस्त थे। जब मैंने उसका पार्थिव शरीर कूपर हॉस्पीटल में देखा तो मैं फफक फफक कर रो पड़ा। कोशिश ये करते हुए कि कोई मुझे देखे नहीं। मैं बस किसी तरीके से वहां से निकल जाना चाहता था। क्योंकि उस दृश्य़ ने विचलित कर दिया था। और सबसे दुख की बात यह है कि इस खबर को मैं कहीं भी नहीं देखता हूं। एक ऐसे व्यक्ति का देहांत हुआ है, जो ‘बैंडिट क्वीन’ के बाद एक हवा के झोंके की तरह आया था। जिसे इस इंडस्ट्री ने सिर आंखों पर बैठाने की कोशिश की थी। लेकिन आज वो ही इंडस्ट्री उसके देहांत की खबर से बेखबर है। बड़ा अजीब है ये सब।

वो चिड़ियों से बातें करता था बैंडिट क्वीन की शूटिंग के दौरान। वो चिड़िया की आवाज के साथ गुनगुनाता था और मुझसे कहता था- मनोज सभी सुर इनकी आवाज में है। इसके बाद वो सारेगामा के सुर निकालकर दिखाता था। और घंटो बैठा रहता था चिड़ियों से बातें करते हुए और सामने तालाब के पानी को देखते हुए। ऐसा लगता था मानो नैनीताल का ताल उसे नजर आ रहा है।

मेरे दोस्त निर्मल तुम बहुत याद आ रहे हो। तुम्हारे साथ बिताए कई पल याद आ रहे हैं। ये उम्र नहीं थी जाने की। लेकिन तुम जहां भी रहो तुम्हें शांति मिले, खुशी मिले। मेरी यही दुआ है ईश्वर से।

तुम्हारा और आपका
मनोज बाजपेयी

Friday, February 5, 2010

घातक है संकीर्ण राजनीति का विष

सपनों के शहर मुंबई में इससे पहले ऐसा वातावरण कभी नहीं था। एक अंजान सी चेतावनी हमेशा कानों से टकराती रहती है। घर से बाहर न निकलो। घर में दुबककर रहो। घर से बाहर सड़क पर जाओगे तो वो दूसरे के क्षेत्र में होगा। सड़क के पार जाओगे तो वो भी किसी और का दायरा होगा। अपना दायरा समझो और घर के भीतर रहो। निकलोगे तो मारे जाओगे। मार-मार के भगाए जाओगे।

लेकिन,सवाल यह है कि क्या देश आपका नहीं है। राज्य आपका नहीं है। अब इस सवाल का संवैधानिक जवाब भले हां हो, लेकिन मायानगरी में रहते हुए कई बार अहसास होता है कि जवाब हां मानना आसान नहीं है। वैसे, ये सिर्फ मेरा सोचना नहीं है। बहुत से लोग यही सोचते हैं। दरअसल, क्षेत्रवाद का ज़हर कुछ लोग इस कदर फैला रहे हैं कि उसके बीच से निकलता हर रास्ता विषैला लगने लगता है।

इन दिनों क्षेत्रवाद का यह विषैला डंक फिर मुंबई की नसों को जहरीला कर रहा है। कलाकार और मजदूर सॉफ्ट टारगेट हैं। दरअसल, उत्पातियों का पहला नारा है-डराओ-धमकाओ कलाकारों को। मारो मजदूरों को। वो भागेंगे तो मीडिया के कैमरे देखेंगे। इससे निश्चित तौर पर उनकी दहशत बढ़ेगी। और उन लोगों को मानना है कि इससे उनका वोट बैंक बढ़ेगा।

लेकिन,लाख टके का सवाल यह है कि क्या कुछ लोग यह गुंडई करते रहेंगे? क्या हाथ में लाठी लिए लोग किसी को भी सरेराह पीट सकते हैं? घसीट सकते हैं? क्या सरकार नाम की कोई चीज आम लोगों के लिए है या नहीं? ये मासूम सवाल मेरे और मेरे जैसे हजारों आम लोगों के हैं,क्योंकि वो हिंसा के खौफ के बीच दो जून की रोटी की जुगाड़ के साथ अपने बचने का रास्ता खोज रहे हैं।

दरअसल, क्षेत्रीय अस्मिता की बात को इस तरह पेश किया जा रहा है,मानो दूसरे राज्य का हर शख्स स्थानीय निवासियों का दुश्मन है। हालांकि, संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक उत्तर भारतीयों के साथ मारपीट और क्षेत्रवाद के नारे को अलोकतांत्रिक करार दे चुके हैं। राज्य सरकार ने भी इसे घातक करार दिया है। लेकिन, आम लोगों के बीच खौफ बढ़ता जा रहा है। आम लोगों के जेहन में भी अब एक बात घर करने लगी है कि सरकार उन्हें नहीं बचाएगी क्योंकि उसे अपने वोट बैंक खोने का डर है। क्योंकि, अगर सरकार को आम लोगों की चिंता होती तो कुछ उपद्रवी तत्व इस तरह दशहत फैला ही नहीं पाते।

लेकिन, फिर वही सवाल सामने है कि अगर सरकार बेबस है तो आम लोग जाएं तो जाए कहां? संविधान निर्माताओं ने देश का संघीय ढांचे तय किया तो राष्ट्र के वैविध्य के मद्देनजर शक्तियों के संतुलन के तहत लॉ एंड ऑर्डर को राज्य का विषय बनाया। लेकिन, आज राज्य हाथ पर हाथ धरे बैठा है तो लगता है कि संविधान ही बदल डालो। आखिर, कब तक यूं ही डराया-धमकाया जाएगा।

एक कलाकार होने के नाते मेरी और मेरे जैसे कई कलाकारों की अलग पीड़ा है। संविधान में आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, लेकिन हालात इतने निरंकुश हैं कि आप सिनेमाई पर्दे पर भी विचारों के पंख नहीं फैला सकते। आप सिनेमा में भी कुछ कहेंगे तो किसी को बुरा लग सकता है। और अगर ये किसी खास दल से संबंधित हुआ तो आपकी फिल्मों के पोस्टर फाड़े जाएंगे। थिएटरों में आग लगाई जा सकती है और दर्शकों की पिटाई भी हो सकती है। यानी जिस फिल्म को बनाने में आपने महीनों लगाए और निर्माता ने करोड़ों रुपए खर्च किए वो सिर्फ इसलिए दर्शकों तक नहीं पहुंच सकती क्योंकि किसी दल को अपने मिजाज से मेल खाती नहीं दिखी। हाल के दिनों में हम कई फिल्मों के साथ ऐसा देख चुके हैं।

फिर, सिनेमाई पर्दे पर ‘लार्जर दैन लाइफ’ की इमेज लोगों के बीच हमें एक उम्मीद की तरह पेश करती है। मीडिया मुझसे कई बार सवाल पूछता है कि आप कुछ कहते क्यों नहीं? लेकिन, मैं बोलता हूं तो बाकी लोग चुप रहते हैं। मेरे अकेले बोलने से क्या होगा? मैं तो बोलता रहता हूं। लेकिन,क्या कोई साथ आया। देखना यही है कि क्या अब इस वीभस्त मानसिकता के खिलाफ कोई आंदोलन खड़ा हो पाएगा?

वैसे,सोचने वाली बात यह भी है कि दुनिया के नक्शे पर सबसे बड़े वित्तीय शहर के रुप में पहचान रखने वाले मुंबई शहर को सिर्फ ‘मराठीमानुस’ के नाम पर अलग किया जा सकता है? इस शहर पर आतंकवादियों का हमला होता है,तो हर धर्म-हर क्षेत्र के लोग शहीद होते हैं। इसी तरह आतंकियों को ढेर करने वाले पुलिसकर्मी और कमांडो के जवान भी सिर्फ एक राज्य के नहीं। यह शहर हम कलाकारों के ही नहीं, यहां रहकर दो जून की रोटी कमाने वाले लाखों लोगों के लिए अपना घर है- और इस लिहाज से हम सभी मुंबईकर हैं। फिर, जिन धंधों पर मराठी मानुस की राजनीति तले निशाना साधा जा रहा है, वह हमेशा से गैर-महाराष्ट्रीयन करते रहा है।

दरअसल, सवाल उत्तर भारतीय और महाराष्ट्रीयनों का नहीं है। सवाल है, उस संकीर्ण राजनीति का,जो क्षेत्रवाद की राजनीति को पनपने देती है। निश्चित तौर पर मायानगरी का अपना आकर्षण है,जो न सिर्फ महाराष्ट्र के भीतर से बल्कि पूरे देश से लोगों को मुंबई जाने के लिए विवश करता है, पर मुंबई पर आबादी के बढ़ते बोझ के बीच दूषित राजनीति ने गंभीर सवाल को खौफ और आतंक के खांचे में डाल दिया है। इस तरह सवाल का जवाब मिलना मुश्किल है,क्योंकि खांचा हमेशा अपने आकार में पदार्थ को ढलने के लिए विवश करता है। ऐसे में सवाल यही है कि आम लोग क्या करें। मैं बोल रहा हूं। मैं बोलता रहूंगा, लेकिन देखते है कि क्या सबके सब साथ बोलेंगे। शायद नहीं, क्योंकि हम सब डरे हुए हैं, सहमे हुए हैं। वो बोलते रहेंगे। घसीटते रहेंगे-पीटते रहेंगे क्योंकि उनके पास भीड़ है। और हमारी भीड़ तो कबकी तितर बितर हो चुकी है। सब घरों के भीतर हैं। बाहर नहीं निकलना चाहते। निकलते हैं तो सन्नाटे के बीच दबे कदमों के साथ। इस माहौल को जल्द बदलना होगा।

Monday, January 25, 2010

जिसे ज़रुरत उसे नसीब नहीं उनका ‘प्यार’

कुछ दिनों से मैं बिलकुल सुन्न हो चुका हूं। मस्तिष्क में कोई सवाल नहीं उठ रहा। और सवाल नहीं उठे तो फिर जवाब भी नहीं है। द्वंद भी नहीं है। फिर एक शहर से दूसरे शहर काम की अफरातफरी में भाग रहा हूं। महाबलेश्वर में अपनी फिल्म ‘दस तोला’ की शूटिंग पूरी की है। इलके बाद तीन दिनों के लिए हैदराबाद गया। वहां भी एक और शूटिंग खत्म की। अब वापस मुंबई आया हूं। कुछ औपचारिकताएं खत्म करने के बाद कलकत्ता जाऊंगा अपनी नयी फिल्म ‘चितगौंग अपराइजिंग’ की शूटिंग शुरु करने के लिए।

कभी मैंने इस तरह से काम नहीं किया था। लेकिन कभी इस तरह से एक के बाद एक अच्छी फिल्में भी मेरे पास नहीं आई थीं। भागना तो अच्छा लग रहा हैं। काम करना तो हमेशा ही अच्छा लगा। और उस पर अगर अच्छा काम है तो बहुत ही अच्छा लगता है।

इस बार मेरा परिवार गांव गया। और वायदे के बावजूद व्यस्त होने के कारण मैं नहीं जा पाया। गांव की याद तो बहुत आती रही। हर बार फोन करके अपने भाई बहनों को पूछता रहा कि क्या खाया, कहां हो ? उनसे जलन भी हो रही थी और खुशी भी हो रही थी कि सब के सब गांव में हैं। शायद मेरा बुढ़ापा गांव में बीतना तय है।

कितने दिनों बाद फिर टेलीविजन देखने बैठा तो चैनल बदल बदल कर प्रोग्राम टटोल रहा हूं। लेकिन टेलीविजन पर वही पुराने घिसे पिटे प्रोग्राम हैं। टेलीविजन चैनल हर बड़ी नयी फिल्म को इस तरह से सजा संवारकर पेश करते हैं, जैसे उन बड़े निर्माताओं और अभिनेताओं से इन्हें पैसा मिलता हो। किसी छोटी अच्छी फिल्म के आने पर ये आधे घंटे का प्रोगाम नहीं बनाते। ये उसके हिट होने पर या सफल होने पर ही उसकी बात करते हैं। दुखद है। बड़ी फिल्मों को मुफ्त में ये चैनल बड़ा प्रचार देते हैं और जिन्हें आवश्यकता है, उसके लिए ये टीआरपी की दुहाई देते हैं। कृपया मुझसे कोई सवाल न करे कि ये भ्रम है। क्योंकि मैंने ऐसी बाते करते हुए अपने कई सारे दोस्तों को सुना है, जो बेचारे मीडिया से जुड़े हैं। बहुत सारे पत्रकार मित्रों के साथ आज भी संबंध कायम हैं जो कि रंगमंच के समय से जारी हैं। इस बारे में भी उन्हें सोचना चाहिए। ये मैं जली कटी नहीं सुना रहा हूं। सिर्फ मन के दर्द को अपने ब्लॉग के जरिए आप तक पहुंचा रहा हूं। बाकी वो अपने मालिक खुद हैं।

आज कुछ दोस्त मेरे घर आने वाले हैं। उनके आवाभगत की तैयारी में हूं। इसलिए आपसे विदा लूंगा। इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, January 10, 2010

नए साल का संकल्प

नए साल की आप सभी को बहुत सारी शुभकामनाएं। मैं कभी दिल्ली,कभी मुंबई,कभी महाबलेश्वर और कभी हैदराबाद में कुछ शूटिंग तो कुछ दूसरे कामों मेंम व्यस्त रहा, इसलिए एक तारीख को ब्लॉग पर पोस्ट नहीं लिख पाया। दिल्ली की ठंड बर्दाश्त के बाहर थी। लेकिन, इस बात का सुकून भी था कि यहां मुझे तीन दिनों से ज्यादा रहना नहीं है। लेकिन, सच कहूं तो दया आ रही थी उन लोगों पर,जो वहां रह रहे हैं।

मौसम का हाल यह है कि सब एक दूसरे पर ही तोहमत मढ़े जा रहे हैं। लोग एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं तो देश मिलते हैं तो वो भी आपस में जिम्मेदारी डाल रहे हैं ग्लोबल वार्मिंग की। कुल मिलाकर बात ये है कि इस संकट से उबरने का कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। लेकिन जो संकट आने वाला है, वो सबको दिखेगा और दिखना शुरु हो चुका है।

लोग चीख चीख कर कहते रहे कि प्लास्टिक बंद करो, पेड़ लगाओ, प्रदूषण न फैलाओ, मोटर गाड़ी की जगह अन्य विकल्प तलाशो,लेकिन हर व्यक्ति स्वार्थी है। चाहे वो उद्योगपति हो या उपभोक्ता। सब केवल अपने घर को ही साफ रखने में लगे हैं। बाहर की गली में कचरे की बदबू से बचने के लिए खिड़की भी बंद कर लेते हैं। और अब तो कमरे को खुशबूदार करने के लिए तरह तरह के परफ्यूम भी मिल रहे हैं। लेकिन,जिस समस्या की शुरुआत अभी हुई है-वो एक दैत्य का रुप लेता हुआ दिखायी देगा। उससे बचने का क्या रास्ता हो सकता है। इस पर बात करने के लिए समय भी नहीं बचेगा। संभलिए। शायद आप बच जाएं और ये दुनिया बच जाएं। शायद नए वर्ष पर यही संकल्प लेने की आवश्यकता है।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी