Sunday, January 10, 2010

नए साल का संकल्प

नए साल की आप सभी को बहुत सारी शुभकामनाएं। मैं कभी दिल्ली,कभी मुंबई,कभी महाबलेश्वर और कभी हैदराबाद में कुछ शूटिंग तो कुछ दूसरे कामों मेंम व्यस्त रहा, इसलिए एक तारीख को ब्लॉग पर पोस्ट नहीं लिख पाया। दिल्ली की ठंड बर्दाश्त के बाहर थी। लेकिन, इस बात का सुकून भी था कि यहां मुझे तीन दिनों से ज्यादा रहना नहीं है। लेकिन, सच कहूं तो दया आ रही थी उन लोगों पर,जो वहां रह रहे हैं।

मौसम का हाल यह है कि सब एक दूसरे पर ही तोहमत मढ़े जा रहे हैं। लोग एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं तो देश मिलते हैं तो वो भी आपस में जिम्मेदारी डाल रहे हैं ग्लोबल वार्मिंग की। कुल मिलाकर बात ये है कि इस संकट से उबरने का कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। लेकिन जो संकट आने वाला है, वो सबको दिखेगा और दिखना शुरु हो चुका है।

लोग चीख चीख कर कहते रहे कि प्लास्टिक बंद करो, पेड़ लगाओ, प्रदूषण न फैलाओ, मोटर गाड़ी की जगह अन्य विकल्प तलाशो,लेकिन हर व्यक्ति स्वार्थी है। चाहे वो उद्योगपति हो या उपभोक्ता। सब केवल अपने घर को ही साफ रखने में लगे हैं। बाहर की गली में कचरे की बदबू से बचने के लिए खिड़की भी बंद कर लेते हैं। और अब तो कमरे को खुशबूदार करने के लिए तरह तरह के परफ्यूम भी मिल रहे हैं। लेकिन,जिस समस्या की शुरुआत अभी हुई है-वो एक दैत्य का रुप लेता हुआ दिखायी देगा। उससे बचने का क्या रास्ता हो सकता है। इस पर बात करने के लिए समय भी नहीं बचेगा। संभलिए। शायद आप बच जाएं और ये दुनिया बच जाएं। शायद नए वर्ष पर यही संकल्प लेने की आवश्यकता है।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

15 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

इन सबका ऐक ही इलाज है और वह है आदत डाल लेना :)

अजय कुमार झा said...

मनोज भाई जानते हैं आपकी पोस्ट की सबसे बेहतरीन बात क्या होती है , आप जाते जाते भी, अपनी सारी बातों के कहने के साथ ही एक सामाजिक संदेश दे जाते हैं । हम तो आप लोग हैं, मगर जैसा आज समाज में प्रचलित है कि यदि आप जैसा कोई स्थापित कलाकार कहे तो शायद किसी का मन इस ओर पसीजे , इंसान को अपने इस कर्म या कहूं कि कृतघ्नता का खामियाजा तो देर सवेर भुगतना ही पडेगा , दिल्ली आए जानकर अच्छा लगा
अजय कुमार झा

शोभना चौरे said...

बहुत शुभ संकल्प है शुरुआत हम खुद करे कुछ दिन एयर कन्डीशन बंद कर दे कुछ दूर तक पैदल चले |बिसलेरी या अन्य पैक पानी खरीदना छोड़ दे |डिस्पोजल सामग्री खरीदना छोड़ दे और भी रोजमर्रा कि चीजो आदत बनाना छोड़ दे जो बाद में घातक सिद्ध हो |

Yayaver said...

Aapko naya saal mubarak ho. Rajniti film ka bahut intezaar hai. Mere to pichle saal ke sankalp pure nahin ho paa rahen hain, aur aap naye saal pe nayi yojna banane ko lakaar rahe hain.

उम्दा सोच said...

मनोज भाई नया साल आप के लिए प्रगति एवं उपलब्धियों का साल बने कामना है !

आप का ब्लॉग पहली बार पढ़ा , आप ने अति गंभीर विषय की और ध्यानाक्रिष्ट कराया है और प्रदूषण प्रति उदासीनो को संज्ञा दी है "स्वार्थी "!

मनोज जी स्वार्थी तो वो होता है जो अपने स्वार्थ के प्रति भली भाति अवगत हो,घर की सफाई और घर के बाहर की सफाई दोनों ही सर्वत्र परस्पर आवश्यक है, प्रदूषण तो जनमानस का हन्ता है, प्रदूषण के प्रति उदासीनता अकर्मण्यता एवं संकीर्ण मानसिकता का द्योतक है !

आप का ब्लॉग के माध्य से पर्यावरण के प्रति जागरूकता का ये अभियान तथा आप का ये संकल्प सराहनीय है !

chandan said...

मनोज मैं आपका ब्लॉग पढ़ता हूं। अच्छा लगता है कि आप जैसे लाग भी इस तरह से सोचते हैं। एक ऊंचाई के बाद शायद लोग आप की तरह नहीं सोचते हैं।

संध्या आर्य said...

नए साल की शुभकामना आप भी।
सही कहा आपने जो संकट आ रहा या आने वाला है वह संकट सबको दिखने लगा है । सही है ......पर जागरुकता आ रही है यह तो नही दिख रही है ना । ऐसी हालात बहुत ही दयनिय होती है कि आप अपना सन्देश दे रहे हो और सामने वाला सुनने को तैयार नही हो या सुन भी रहा है और उसका असर ही नही हो रहा है तो क्या करें ।
बनावटी खुशबूओ से कोई नुकसान नही होता है क्या? हरएक चीज का बिकल्प है पर क्या वह प्रक़ृति के समानांतर है नही क्योकि कोई भी ऐसी चीज जो विकल्प के रुप मे उपयोग किया जा रहा है वह स्वास्थ के लिये घातक है .......ऐसे मे क्या कहा जा सकता है चन्द गिने चुने लोग कब तक जागृत करते रहेंगे सोये हुये मानसिकता को ।
यह मुझे एक बडी समस्या दिखती है .....सबको जागने का वक्त है बहुत ही गहाराई से सोचने की जरुरत है पर न जाने कब वो दिन आयेगा सब लोग सिर्फ घरो की सफाई ही नही बल्कि अपने शहर को भी साफ रखने की कोशिश करेंगे.....जब सब लोग एक साथ कदम से कदम मिलाकर चलेंगे और प्रदूषण जैसे महमारी से निजात मिलेगा और सभी तरफ हरियाली ही हरियाली होगी और सुनहरा भारत लहरायेगा अपने तिरंगा मे .......आईये हम सब ऐसे ख्वाब देखे और पूरा करें ।


आपके ब्लोग को पढकर अच्छा लगताहै क्योकि इसकी आत्मा बिल्कुल पाक होती है और इसके एक एक शब्द आत्मा को भी छूती है ।और कुछ लिखने को भी मजबूर करती है ।

RA said...

मनोज जी,
आपकी पर्यावरण पर टिप्पणी और नए साल का संकल्प पढ़कर अच्छा लगा|
यदि हर एक व्यक्ति'Think globally act locally'जैसे विचार पर अमल करे तो परिवर्तन अवश्य संभव हैं |

Priya said...

arye khud to koi sudharna nahi chahta......sab sochte hai doosre ko shuwaat karne do...agar fayda hua to ham bhi saath ho lenge....ab to ye aadat si ban gai hai.....jawab suniya.....ye saare kaam neta ya officers ke hai hamare nahi......kya kare manoj ji.....Ye aadteein bha na azeeb hoti hai :-)

मथुरा कलौनी said...

हमें अपनी संवेदनशीलता को उभारने की बहुत आवश्‍यकता है।
क्‍या फर्क पड़ता है कोई नहीं देख रहा है वाली मानसिकता तो हमारी आदत बन चुकी है।

नए साल के लिये शुभकामनाएं।

ASIT NATH TIWARI said...

भइया प्रणाम,
राउर प्रयास बड़ा सार्थक बा, बाकी हमरा समझ से सबसे जरुरी बा समझ आ सोंच के स्तर बढ़ावे के। माने इ कि साफ समझ जबले ना पैदा होई, दोसर कौनो सफाई के भावना आदमी में ना आई। भइया निहोरा ई बा कि तनी हमरो ब्लॉग chauthinazar.blogspot.com पढ़ीं आ कुछ मार्गदर्शन करीं।

असित नाथ तिवारी
बेतिया, बिहार

प्रदीप कांत said...

अरे मनोज भाई, आदमी को अपने ही घ्रर साफ करने की फुर्सत नहीं, बाहर क्या करेगा?


हालांके आद्त डाल ली है। फिर भी बेच बीच मे मैं भी चिल्ला लेता हूँ।


खैर, कभी तो असर होगा।

abhilasha said...

nice

Parul said...

kuch behtar karne ke aapke jajbe ko salaam!

~ V I V ~ said...

ap itne khamos kyon dikhte ho ?