Friday, March 12, 2010

सूर्या सेन का किरदार जीना अद्भुत अनुभव है

अभी-अभी ‘चिटगोंग’ फिल्म की शूटिंग करके लौटा हूं। इस फिल्म में मैंने मास्टर दा उर्फ सूर्या सेन का किरदार निभाया है। पूरी प्रक्रिया में रहने का बहुत मजा आया। एक अजीब सी बात यह है कि सारा हिन्दुस्तान इतने बड़े क्रांतिकारी के योगदान से बिलकुल अनभिज्ञ है। जबकि पूरा बंगाल और बांग्लादेश उनकी पूजा करता है।

ऐसा क्यों होता है कि स्वतंत्रता सेनानियों को एक ही राज्य से जोड़कर हम देखते हैं। सूर्या सेन पूरे भारत वर्ष के हैं। उनका योगदान पूरे भारत की स्वतंत्रता के लिए बहुत ही अहम रहा है। आखिर फिर उन्हें किसी एक क्षेत्र में ही सिमटा कर क्यूं रख दिया गया। एक ऐसा व्यक्ति, जो पूरे चिटगोंग शहर को कब्जे में लेता है। उस समय के और उस इलाके के जितने भी युवा मस्तिष्क थे, उनको सोचने की एक दिशा देता है। देश उससे अंजान है।

चलिए कम से कम मेरी फिल्म ‘चिटगोंग’ और अभिषेक बच्चन की फिल्म ‘मास्टर दा’ के बाद न सिर्फ हिन्दुस्तान बल्कि विदेश में भी इस महान पुरुष के बारे में लोग जानेंगे और समझेंगे। और कुछ बड़ी जानकारियां लेने की कोशिश करेंगे। तो क्या फिल्म ही अब एक जरिया रह गया है, इतिहास को टटोलने का। जानने का। मुझे खुशी है कि मैंने ये किरदार निभाया है।

एक अजीब सी बात यह हुई कि मैं अपनी दो फिल्मों के बीच में एक लंबा अंतराल देने की कोशिश करता हूं। लेकिन जब इस फिल्म का प्रस्ताव आया मेरे पास तब निर्देशक और निर्माता बिलकुल जल्दी में थे। वो इस फिल्म को जल्द बनाना चाहते थे। उन्होंने खुद ही कहानी पर बहुत काम किया था। बहुत खोजबीन की थी। और वो एकदम से इसे बनाना चाहते थे। उनकी कई सालों की मेहनत अब उनको चैन से सोने नहीं दे रही थी। वो किसी भी तरीके से इस फिल्म को बना देना चाहते थे। बात चली तब मैं फिल्म ‘दस तोला’ कर रहा था। और ‘दस तोला’ करने के एकदम बाद मुझे उनकी फिल्म की शूटिंग के लिए निकलना पड़ा। और जो भी मेरी जानकारी थी मास्टर दा उर्फ सूर्या सेन के बारे में, वो मुझे निर्देशक से विस्तार से मिली।

लेकिन मैं खुश हूं अपने निर्णय से कि मैंने मास्टर दा का किरदार निभाया। उनके किरदार को करते हुए सीखा। उनको जानने की भरपूर कोशिश की। और जब मैं दिल्ली लौटा हूं, अपनी शूटिंग के बाद तो बिना सूर्या सेन उर्फ मास्टर दा के अकेला महसूस कर रहा हूं। फिल्मों पर इल्जाम लगते हैं कि वो युवा मस्तिष्क को बिगाड़ देते हैं। भटका देते हैं। लेकिन सत्य ये भी है कि आज फिल्में ही लोगों तक हिन्दी भाषा को लेकर जाती हैं। आज फिल्में ही भगत सिंह और मास्टर दा जैसे महापुरुषों के बारे में लोगों को सोचने पर मजबूर करती है।

कई दिनों के व्यस्तता के बाद मैं थका हुआ हूं। अब दो महीने का अंतराल है मेरे पास। जिसमें मैं सिर्फ आराम करुंगा। दिल्ली आया हूं। अब कुछ दिनों तक अपने किए उन कामों के बारे में सोचकर मुस्कुराऊंगा, जिनसे मुझे संतुष्टि मिलती है। और वो सब काम करुंगा,जो इतने कई दिनों तक मैंने नहीं किया। वो है परिवार के साथ छुट्टियां बिताना। फिल्में देखना। दोस्तों के साथ वक्त बिताना या बाहर किसी शहर घूमने जाना। अभी तो सिर्फ मेरा यही उद्देश्य है। अगर आपको मौका मिले तो आप मास्टर दा के बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश करें। नहीं तो आप बहुत बड़े व्यक्तित्व को जानने से रह जाएंगे। वैसे, मास्टर दा पर बन रही दोनों फिल्मों के आने में अभी थोड़ा वक्त है, पर मैं चाहूंगा कि लोग दोनों ही फिल्में देखें। क्योंकि फिल्मों से ज्यादा जरुरी यह है कि अधिक से अधिक जानकारी दर्शकों को इस व्यक्तित्व के बारे में मिल सके।
फिलहाल इतना ही, लेकिन अब पाठकों की तरफ से आई प्रतिक्रिया का जवाब जरुर दूंगा। क्योंकि अब मैं फिल्मों में व्यस्त नहीं हूं कुछ दिन...सो प्रतिक्रिया दीजिए..।

इसी के साथ

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

20 comments:

गिरिजेश राव said...

गान्धी नेहरू से फुरसत मिलेगी तब न जानेंगे सूर्य सेन जैसों को।
सूर्या नहीं सूर्य सेन।
फुरसत में हैं तो थोड़ा दूसरे हिन्दी ब्लॉगरों को पढ़िए और अपनी प्रतिक्रियाओं से उन्हें अवगत भी कराइए। हो सकता है आप की कोई टिप्पणी विमर्श को नई दिशा ही दे दे।

अजय कुमार झा said...

मनोज भाई ,
सूर्या दा के बारे में तो इतिहास में खूब पढा है ..मगर जाना नहीं है सचमुच ..चलिए आपने कहा है तो एक बार फ़िर उसी इतिहास को अलग नजरिए से पढते हैं ...और क्या नया मिला जरूर बताने का प्रयास करेंगे ..और हां अब दनादन पोस्ट मारिए ..

अजय कुमार झा

सतीश पंचम said...

सूर्य सेन के बारे में मैंने इतिहास की किताबों में केवल एकाध लाईनें ही पढी हैं ज्यादा नहीं।

हो सकता है इसके पीछे कई वैचारिक कारण रहे हों।
वैसे, इतिहासकारों की भी एक जमात होती है जो कि मार्कसिस्ट, संघी या नेशनलाईट में बंटी है। जो चीज बंगाल के इतिहासकार को महत्वपूर्ण लगती है वह पंजाब के इतिहासकार को नहीं लगती। और ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि हर कोई अपने क्षेत्र के प्रति, वहां से जन्में लोगों के प्रति एक सहज
स्नेह का अनुभव करता है।

इसके अलावा कोर्स में जो किताबें पढाई जाती हैं उन पर सावधानी का मुलम्मा चढा कर पढाया जाता है ताकि किसी की भावनाओं को ठेस न लगे।

जिस दिन तोड फोड, ढेला फेंकू, दहशत से परे होकर इतिहास लिखा जायगा, तब शायद वह सच्चा
इतिहास होगा। फिलहाल तो हम 'इतिहास का इतिहास' ही पढ रहे हैं ।

उम्मीद है कि सूर्या सेन के बारे में अब फिल्म बनने से और जानकारी मिलेगी लोगों को। फिल्म के लिये शुभकामनाएं।

प्रमोद ताम्बट said...

सूर्यासेन नहीं सूर्यसेन थे वे और सही नाम चटगांव है चिटगांग नही। आप फिल्म वालें इतिहास की खटिया खड़ी करने में काफी माहिर है।

प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.blog.co.in

रानी पात्रिक said...

बहुत दिनों बाद आपकी नयी पोस्ट देख कर अच्छा लगा। आप सही कहते हैं-फिल्मों के बहाने ही सही पर लोग हिन्दी सुनते तो हैं पर अब धीरे-धीरे फिल्मों पर भी अंग्रेज़ी हावी होती दिख रही है और फिल्म वाले तो हिन्दी कम ही बोलते, लिखते हैं। आपके हिन्दी के प्रति प्रेम के लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं। हिन्दी भाषी लोगों को और सफलताएं मिलें और वह अपने हिन्दी प्रेम को सार्वजनिक करें यही मेरी अभिलाषा है।

अंग्रेजी आना आवश्यक है यह मैं मानती हूँ पर अंग्रेजी में जीना ज़रूरी नहीं।

आपके कहे अनुसार सूर्य सेन के बारे में अवश्य पढ़ूगी। आपकी सभी फिल्मों का इन्तज़ार रहता है।

Tarkeshwar Giri said...

मनोज जी आपको को मेरा नमस्कार,
फिल्मे समाज का आइना होती है, जैसा आप लोग दिखायेंगे लोग उसे उसी तरह से देखेंगे। पसंद करना और नापसंद करना ये सब फिल्म के अन्दर विषय वास्तु और फिल्मांकन पर निर्भर करता है। बहुत ही अफ़सोस की बात है की उस मास्टर को हम नहीं जानते जिसके बारे मैं आपने कहा है, लेकिन शाम तक उनकी कहानी के बारे मैं जरुर लिखूंगा

Tarkeshwar Giri said...

सूर्य सेन जी २२ मार्च १८९४ को चित्तागोंग जिले (बंगलादेश) मैं पैदा हुए और १२ जनवरी १९३४ को अंग्रेजो ने उनको फांसी दे दी।

Munna kumar "arya" said...

Good Morning Manoj Bhaiya,
Jab mai aapka ye article pada to laga ki mai ek naye personality se mil raha hu.kyoki iske pahle mai SURYA SEN ko janta tak nahi tha. Ab jab aapka blog paada tab google pe search karke mai unke baare me jana. Really , unka kaam ekdum BHAGAT SINGH se milta julta hai. Ye aapka ahobhagya hai ki aap unka role play kar rahe hai. Ho bhi kya nahi, aap to uss jagah se taluk rakhte hai jaha se MAHATMA GANDHI ne national movement ki suruyat ki thi. Ab aap usko cinema ke madhyam se aage bada rahe hai jo unke dusre vision developed india ko pura karne me pura help karega.
Thank you for playing the role of SURYA SEN. Ab humlog is movie ka wait karte hai jo youth ko motivate jarur karega aapne desh ke liye kuchh karne liye.


Munna Kumar Arya
(www.khwab.yolasite.com)

gs said...

धन्यवाद, स्वतंत्रता सग्राम के कई ऐसे हीरो है जिन्हें हम नहीं जानते है. इस देश को मिली आजादी के यज्ञ में हजारो लाखो की आहुति पडी है. में इस हीरो के बारे में जानने का प्रयास करूँगा.

anjule shyam said...

फिल्म और टीवी का एक कट्टर दर्शक.कुछ भी दिखावो हम जरुर देखेंगे.मनोज सर बात ये नहीं है की दर्शक कितने शहीदों को जानते हैं.अब तो शहीदों का मजाक भी बनाया जाने लगा है..प्रीटी जिंटा जी,की टीम जब मच खेलेगी तो भगत सिंह .राजगुरु और सुखदेव उनका स्वागत करेंगे..वाह क्या दूर की कोडी लें आई हैं शहीदों को याद करने का.ये अलग बात है लोगों को ये बात हजम नहीं हो रही की ये अपमान है या सम्मान ..शहीदों से आज के यूथ की दुरी का जिम्मेदार कोंन है..?हमारे नीतिनियंता निति निर्धारक वेरना किसी शहीद के बारे में जानने की दिलचस्पी आज की यूथ में भी है मगर वे करें क्या??मम्मी से लेकर फिल्में और तेअचेर तक यही तो बताते हैन्बजर के बारे में जानो ना की किसी महापुरुस के बारे मैं बाजार को नहीं समझा तो जी नहीं पवोग्व...शहीदों के बारे में जानने या सुनने की जरुरत नहीं है...
भवंस कॉलेज मुंबई ...में 24 फ़रवरी को 'रे फिल्म फेस्टिवल के दोरान जब एक्टर चेतन पंडित ने लोगों से पुछा की कितने लोग लोकनायक जय प्रकाश नारायण को जानते हैं तो 600 -700 की भीड़ में केवल पञ्च हाथ उठे.सिहर उठा मैं क्या यही यूथ देश को आगे लेजायेगी..इसी के दो घंटे बाद का नजर..डिरेक्टर दिबाकर बनर्जी जब diretion workshop शुरू करने के पहले पुछ की भाई हिंदी में में क्लास हो या एन्घ्लिश में ....आश्चर्य पूरा आडिटोरियम हिंदी हिंदी की आवाज से गूंज उत ..वों भी उस मुंबई में जहान ठाकरे के गुंडे मराठी मानुस के नाम पे लोगगों और मुंबई को तबाह करने पे उतारू हैं...तो लगा यूथ नहीं गड़बड़ है गड़बड़ है हमारे परेंट्स और हमारी सरकार और हमारे study का तरीका....

yogesh said...

Dear Manoj Jee
Main aapke blog ka niyamit pathak hun . Main aapko abtak dekha hi nahin mahsoos kiya hai ki aap jo bhi karte hai apna 100% dete hain. Pahli baar maine aapko Imtihaan serial mein dekha tha aur us time hi mujhe laga ki aap bahut hi umda kalakaar hain .Baat aapka bilkul stya hain ab to film hi ek zariya bacha hai jiske badaulat hum in mahapurushon ko yaad karte hain nahin to bacche kitaab mein bhi ek course ki tarah padh ke bhool jaate hain. kahna to bahoot kuchh chahte hain lekin shyad lekin samay ka khyaal rakhte hue yehin samapt karta hun waise to aapse milne ki bahoot iksha hoti hai aur jaanta bhi hun kab kab aap delhi aate hain lekin jab bhi pata lagta hain tabtak bahoot der ho gayee hoti hai

Regards
Yogesh (9818060900)

शरद कोकास said...

सूर्य सेन को जानकर अच्छा लगा ।

Yayaver said...

Log aaj kal cinema se itihaas jante hain, itihaas se cinema nahi. Umeed hai bharat ki aazadi ka yeh unchuaa pahlu des ke samne aa jayegaa. Aap apne kaam mein aise hee vibintaein late rahen, hum darshakoon ko intezaar rahega. Manoj ji namaskar.

mk said...

PART II-------

5-- Film ek aisa saadhan hai jo aam janta ko-- BAHUT JALDI aur BAHUT JYADA-- prabhavit karta hai. Lekin aazdi ke baad Filmkaaron ne bhi to apni jimmedaari ko nahi samjha. Kahne ka matlab yeh hai ki-- kisi bhi filmkaar ne krantikaariyon ke vishay me sahi filme nahi banaai. Halanki krantikaariyon per kuch filme bani hain lekin unme sahi jaankari nahi di jaati hai. Udaharan ke liye—
A--- Bhagat Singh ko jab fansi lagi to unki aayu keval 23 saal thi. Ab “The legend of Bhagat Singh” film me 40 saal ke Ajay Devgan se vah rol karaya gaya hai. Ab 40 saal ke aadmi par vo tej kahaan se dikhegaa jo 23 saal ke yuva me hota hai.
B--- Kuch saal pahle film bani thi “Saja e Kalapaani”. Is film me kuch minton ke liye Veer Saverkar ka paatr bhi joda gaya hai lekin usko Angrje Sarkaar ki jay bolte hue dikhaya gaya hai. Jabki sach to yeh hai ki-- Veer Saverkar ne kabhi bhi Angrejo ki jai nahi boli thi.
C--- Aamir khar ne film banaai thi “Lagaan”. Is film me yeh dikhayaa hai ki—Bharat Desh ko aazadi Cricket khelkar mili hai. Yeh to krantikaariyon ka sabse bada apmaan tha, phir bhi yeh film bani to anek filmkaaron ne iski taariph ki. Aakhir Kyon ?


Kul milaakar kahna yeh hai ki-- Jin logon par krantikaariyon ke jivan ki sahi jaankri ko aam janta tak pahuchaane ki jimmedaari thi, unme se kisi ne bhi apni jimmedaari ko nahi nibhaya. Ek Surya Sen ko log kam jaante hain to aapko aaschary hota hai lekin-- Tatya Tope, Ramsingh Kuka, Vadudev Balvant Phadke, Khudiram, Veer Saverkar aadi ke vishay me hi log kitna jaante hain. Netaji Subhash Chandra Bose jaisa vyakti to shaayad pure vishw me hua hi nahi kyonki-- vah apne ghar se to khaali haath nikle the lekin jab laute to apne desh ko aajad karaane ke liye SENA lekar-- unke vaare me hi log kitna jaante hain ?

Kisi aadmi se puchiye ki-- vah antim ghatna kya thi, jis se hamaare desh ko Aazadi mili, koi nahi bataa payega, shaayad Manoj Bajpai bhi nahi. Vah antim ghatna thi-- Azad Hind Fauj ke senaniyon par mukdma (jo Delhi ke Lal Kila me chalaya gaya tha).

Agar janta sachche itihaas ko nahi jaanti to isme dosh kiska hai ? In tino ka—
1- Shaasan ka, 2- Itihaaskaaron ka, 3- Filmkaaron ka.

In tino me se bhi sabse jyada doshi hain-- Filmkaar ka, kyonki—
Jo jitna jyada sadhan-sampann hota hai, uski jimmedaari utni hi jyada hoti hai, aur filmkaar log apni jimmedaari puri nahi karte hain.
Shubhkaamnayen.

Mukul Goyal Advocate
Mathura (U.P.)

Date : 16 March 2010
E-Mail : mukulgoyalmtr@gmail.com

राकेश पाठक said...

कलाकार का संवेदनशील होना बेहद ज़रूरी है और आपके इस पोस्ट ने ये बताया कि आखिर मनोज बाजपेयी का अभिनय इतना जीवंत क्यों होता है। प्रभावशाली है यूं ही संवेदनशील बने रहिए अगर कलाकार को बचाए रखना है। ईश्वर तो आपके साथ हैं ही।

RA said...

एक क्रांतिकारी का किरदार निभाने के अनुभवों को हम तक पहुंचाने का धन्यवाद|आपकी बातों से सहमति है कि इतिहास के पात्रों को फ़िल्में आम आदमीं तक लातीं हैं और भाषा सीखने की शुरुआत भी फिल्मों के ज़रिये हो सकती है|ज़रूरी है कि इस बात पर ध्यान दिया जाए कि फिल्मकार इतिहास को ज़रुरत से ज़्यादा तोड़ मरोड़ न दें और भाषा का स्तर अच्छा रखें |आपका लिखा पढ़कर कि दर्शकों को अपनी जानकारी जुटानी चाहिए,इस फिल्म के निर्माता,निर्देशक के बारे में पढ़ा गया |
आशा है अवकाश का समय परिवार के साथ दिल्ली में अच्छा बीतेगा |

abhishek said...

aap ka blog hindi mein dekhkar kar achcha laga. per ye comment mai computer pe Hindi fonts na hone ki wajeh se english mein hi post kar raha hu
per us-se bhi acche aap k vichar lage.
mai aapka blog padhne se pehle "Surya Sen" ko jaanta nahi tha, per aap ka blog padhne k baad maan Wikipedia per un ko search karne ko majboor hua.
dar asal ye samasya shyad shiksha vibhagon ki hai. agar Surya Sen ko shiksha pathya-kram me padhaya jata to ye samasya nahi hoti.
aap ke aaj kal ke fursat ke dino k liye Shubhkaamnaye

अविनाश वाचस्पति said...

परंतु आजकल तो सब
फिल्‍म स्‍टारों को जान समझकर ही
हो जाते हैं संतुष्‍ट
मास्‍टरों के बारे में बतलाओ तो
हो जाते हैं रुष्‍ट।

Manish Raj Singh.... said...

मैं अबकी बार आपके ब्लाग पर देर से आया। कारण आप भी बीच में गायब हो जाते हैं। सूर्य सेन जैसे कई अनजान क्रांतिकारी हैं जिनके बारे में लोग जब जानेंगे तब आश्चर्य करेंगे कि अच्छा ऐसे भी लोग थे...पागल ? अभी पिछले दिनों अमिताभ जी के बारे बारे लोगों की उल जुलूल बाते सुनकर मन दुखी हुआ। अब हर बात में राजनीति घुस जाती है। इंदिरा और राजीव के जमाने में जो अमिताभ की एक नजर भर में मूत सकते थे वो अब पूछने लगे हैं कि अ. ने देश को दिया क्या है ? रही बात सूर्य सेन जैसे नायकों की तो गनीमत है कि किसी ठाकरे ने ये नहीं कहा कि महाराष्ट्र में सूर्य सेन का क्या योगदान है। फिल्म के क्रम में आपको प्रीतलता वादेदार के बारे में भी आपको मालूम हुआ होगा...किसने ज्यादा प्रभावित किया? बताइगा। मुझे मेल भी कर सकते हैं।

jitendrajha jitu said...

apki release sari movi maine dekhe hai.swabhiman sansdhoan drohkal and sare movi dekhe hai, accha laga ki aap is nayak ki move kar rahe hai. political parties ne hume gandhi nehry ke alwa kuch janne ve nahi dia.surya sen,birsa munda jaise kai log hai.apko badhai is film me kam karne ki .apse reqest hai ki birsa pe ve kam kare.