Tuesday, July 6, 2010

अनुराग कश्यप से दोस्ती कीजिए, उन्हें कठघरे में मत खड़ा कीजिए

पिछले दिनों काफी गहमागहमी रही। यहां का दस्तूर ही कुछ ऐसा है। जब तक आपकी फिल्म हिट न हो आपको व्यस्त नहीं रखा जाता। अभी तक मैं अपने जीवन में मशगूल था। अपने तरीके की छोटी बड़ी फिल्में करता था। लेकिन, कुछ दिनों से एक हिट का मुंह नहीं देखा था। इस कारण लोगों की नजरों में चढ़ा नहीं था। इज्जत थी, प्यार था, लेकिन गहमागहमी से दूर था। लेकिन, राजनीति की सफलता के साथ काफी कुछ बदल गया है। एक फिल्म के सफल होने के साथ ही कई सारे लोगों की आशाओं को पूरा करना पड़ता है। और फिर पारिवारिक जिम्मेदारियां। घर में सिर्फ मैं और मेरी पत्नी। और पूरा करने के लिए घर के बहुत सारे काम। इसी में उलझा रहा और लिखने से दूर भागता रहा। लेकिन, एक दो दिन पहले जब मुझे एक हिन्दी वेबसाइट द्वारा आयोजित बहस में अनुराग कश्यप को बुलाने और उनसे हुई बहस के बारे में जानकारी हुई तो मैंने उसे पढ़ा और फिर मुझे लगा कि लिख ही डालूं।

मेरी बहुत बड़ी शिकायत है हमारे पत्रकार मित्रों से। बहुतों से मैं लगातार मिलता हूं और कइयों से पहचान है मेरी। अनुराग कश्यप को बुलाकर उनके होने पर ही सवाल उठाकर आप क्या साबित करना चाहते हैं? जब अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, दिबांकर चटर्जी, नीरज पांडे जैसे युवा निर्देशक सामने आए तो उनकी संगत का भरपूर मजा लीजिए। न कि उनको कठघरे में खड़ा करना शुरु कीजिए। क्योंकि उन्होंने अपने सिनेमाई करियर की शुरुआत से लेकर अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया है, जिसे लेकर उनहें भड़कने पर मजबूर किया जाए। अनुराग कश्यप से समाज को बदलने की अपेक्षा क्यों रखी जाती है? अनुराग कश्यप अगर सिनेमाई भाषा की परिभाषा बदलने में लगे हैं तो उन्हें बधाई दीजिए। उनके साथ चाय पीजिए और उस याद को घर लेकर जाइए।

दलितों पर फिल्म नहीं बनायी जा सकती है, एक अच्छी कहानी पर फिल्म बनायी जा सकती है। और उस कहानी के केंद्र में दलित हो सकते हैं। उनके सामाजिक पहलू हो सकते हैं। और एक फिल्म बनाने के लिए एक कहानी की सख्त जरुरत होती है। सिनेम समाज नहीं बदलता। मैं ये कई साल से कहता आ रहा हूं। अगर ऐसा होता तो गोविंद निहलाणी और श्याम बेनेगल के वक्त में समाज कब का बदल गया होता। अमिताभ बच्चन जैसा सुपरस्टार हिन्दुस्तानी फिल्म इंड्स्ट्री ने कभी नहीं देखा, जिन्होंने रुपहले पर्दे पर हमेशा दबे कुचले लोगों का नेतृत्व किया। तो फिर दबे कुचले लोगों की स्थिति क्यों नहीं सुधर गई?

हमारे सीनियर नसीरुद्दीन शाह ने कहा था कि सिनेमा से सिर्फ हेयर स्टाइल बदलता है, समाज नहीं। बहुत सही कहा था। ये बात सही है कि सिनेमा की रचनात्मकता को बरकार रखा जाना चहिए। उसके विकास पर लगातार काम होता रहना चाहिए। इसमें अऩुराग कश्यप अग्रणी हैं। क्या उनके साथ सिनेमा की बदलती भाषा पर बात नहीं हो सकती? क्या उनसे किसी ने पूछा कि इस पूरे कमर्शियल बाजार में वो अपनी फिल्में भी कैसे बना लेते हैं? क्या किसी ने उनसे पूछा कि उन्होंने इस दौड़ में क्या क्या खोया है? क्या किसी को यह पता है कि वो अपनी फिल्म को आज तक रीलिज क्यों नहीं कर पाए? क्या आपको पता है कि ब्लैक फ्राइडे के रिलीज होने तक अऩुराग कश्यप की क्या दुर्दशा रही? अपने सिनेमा की भाषा के प्रति इमानदार रहने की जिद में अनुराग कश्यप भी एक तेवर वाले निर्देशक हो चुके हैं। आप उन्हें भड़काइए मत। उन्हें आदर दीजिए। आप उन पर सवाल मत खड़े कीजिए। उनसे दोस्ती कीजिए। और उनसे बातें कीजिए। आपके सारे सवालों का जवाब तभी मिलेगा। और शायद हमारे कुछ बंधुओं को यह मालूम नहीं कि वो सचमुच में एक फिल्म, जिसके लिए मुझसे हामी ले चुके हैं, उसमें दलित केंद्र बिंदु पर है।

लेकिन मैं जानता हूं कि वो कभी भी इस तरह की बहसबाजी के वक्त इस बात को उठाकर अपना बचाव नहीं करेंगे। आप हमसे सिर्फ सिनेमा के प्रति ईमानदार होने की ही आशा कीजिए। अगर हम वो भी कर जाते हैं तो भी हम समाज में कहीं न कहीं अपना योगदान दे रहे हैं। अगर आपको हिन्दुस्तान के फिल्म इंडस्ट्री के बाजारुपम का अहसास नहीं है तो आपको सवाल करने का भी कोई हक नहीं है। यहां पर वो लोग पूजे जाते हैं, जिन्हें नाचना आता है, जिन्हें दूसरे के बोलों पर सलीके होंठ हिलाना आता है। उनके बीच भी खालिस फिल्म बनाना और अच्छी फिल्म बनाना बड़ी बात है। खैर, मेरा आपसे निवेदन है कि जो बहस हो चुकी है, वो हो चुकी। जिसे जो भड़ास निकालनी थी, निकाल चुका। अपने लेखों में। अपने इंटरव्यू में। मेरी गुजारिश है कि अपने देखने के नजरिए में थोड़ा सा बदलाव लाए। थोड़ी इज्जत अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज जैसे लोगों और हम लोगों को भी दीजिए क्योंकि क्योंकि आपकी एक थप्पी से हमें बहुत साहस मिलेगा। आशा करता हूं कि मेरी किसी बात से आपको दुख नहीं पहुंचा होगा। उस बहस को पढ़कर मुझे जो दुख हुआ, उसी को मैंने आपके सामने रखा है।

इसी के साथ,
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

25 comments:

रानी पात्रिक said...

बात तो बहुत सही कही आपने और मैं आपके साथ हूँ। रचनात्मक लोगों से रचनात्मकता के आधार पर ही बात की जानी चाहिए।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बेहद ईमानदार अभिव्यक्ति है आपकी मनोज जी। दरसल यह पत्रकार बिरादरी बाइट के चक्कर में हलकान है। मालिक तभी पैसे देता है जब ये तगड़ी बाइट लाकर देते हैं। ऐसी ऊल-जलूल हरकतों से और कुछ हो चाहे न हो, बाइट का जुगाड़ तो हो ही जाता है।

शिवम् मिश्रा said...

मनोज भाई
प्रणाम !

twitter पर भी मैं आप को follow कर रहा हूँ ! मैंने अक्सर देखा है आप बहुत से मामलो में अपनी राय बड़ी बेबाकी से देते है .............इस आदत को बनाये रखें !

शेष शुभ |

शुभकामनायो सहित
आपका अनुज
शिवम् मिश्रा
मैनपुरी
उत्तर प्रदेश

amit said...

आपका लेख पढ़ा... आपने सत – प्रतिशत सही कहा है... शायद आपके इस लेख से उन लोगों के समझ में कुछ बात आ जाये... जो अनुराग कश्यप पर सवाल उठा रहे हैं... हम भी कुछ पत्रकार और लेखको की बात पढ़ चुके हैं... इन तथाकथित लोगों ने साहित्य से कौन सा सामाज में बदलाव ला दिया है... मुझे तो ये लगता शायद इन लोगों में से किसी ने कृषी प्रधान कहे जाने वाले भारत के कृषी और दलितो के व्यवस्था सुधार पर एक लेख भी नहीं लिखा होगा... और ना हीं मै किसी भी ऐसे किसान को जानता हुं... जिन्होने ऐसा कोई लेख पढ़ा हो... क्योंकि इनकी सारी लेखनी सिमीत क्षेत्र तक है... आज अगर एक व्यक्ति पेज थ्री से निकल कर दलित पर कुछ बनाना चाहता है... तो इनको डर है वह घर – घर पहुंच जायेगा... क्योंकि सिनेमा... घर – घर पहुंचता है...

सन्ध्या आर्य said...

आपने सच कहा कि फिल्म समाज को नही बदल सकती ...........जैसे आइना चेहरे को नही बदल सकती सिर्फ दिखा सकती है ठीक वैसे ही ..........शायद आपने पढी हो वो किताब जिसका नाम है 'अक्करमाशी' .....जो दलित समाज का नंगा चित्रण है .......जिसके लेखक का नाम मुझे फिलहाल याद नही आ रही है कोई दलित माराठी लेखक है.........कृपया अवश्य
पढे आप जैसे सम्वेदनशील कलाकार को अवश्य अच्छी लगेगी !

jitendrajha jitu(akshra arts) said...

aapne sahi kaha ki cinema samaj ko badlta nahi hai..aur badalna hoto to amit ji ke time me hi badlata.nasser ji ne jo kaha hai ki cinema se haier sirf badlta hai ...unhe ka ek interview tha jo maine padha tha z patrika me ....naseer ne spasht kaha tha ki amitabh apne jamane me chahte to apne man mutabik script likhwa sakte the..jo nahi hua.............
ek baat aur ki anurag jaise directors is aati ghor commericial me apne man mutabik kam kar rahe hai to wo bilkul badhai ke patra hai....nahi to yaha ke directors forean ke problem ko lekar film banate hai....ek baat ye ki kai bade commercial director jinki film flop hoti hai..like sanjay gadhavi...punit malhotra....fir ve inhe bade producation house inhe film dete hai..wahi neeraj panday...ya suruati daur me anurag ji ko apni film ke release ke lea kada struggle karna padta hai...anurag jaise director ko salam karna chaiya because wo indiam darshak ko acchi movi ki aadat laga rahe hai..jaha tak apne kaha hai ki dalit ko lkar film nahi balki kisi story ka main patra ho sakta hai..sahi hai...jo log hall karte hai ...unhe samajhna chaiya ki bawander....mohandas jaise filme ayye the kitne logo ne dekha.....
...jinhe jo kahna hai ..kahe...youth anurag ke saath hai...jo cinema ki naye paribhasa gadhne ke lea katibaddh hai...salute anurag ....rajniti ki safalta ke lea again badhai.

Yayaver said...

Is serious issue pe aapko stand lete hue bahut achha kaga. Wo bhi yeh media ke un logon ke khilaaf jo kuch naya karne waloon ko khatghare mein khada kar dete hain aur saaloon se bekaar film banane waloon ke talwe chatte hain. Manoj Ji, Achi cinema dekhne waloon ka support hai aapke aur in yuva nirdeshkoon ke pass. And aapke 'rajneeti' film ke kirdaarke shabdoon mein --- kararaa jawaab milegaa !

Basant Raj said...

बिल्कुल सटीक बाते कही है आपने....वस्तुतः समाज न किसी के बिगाड़े बिगड़ता है न किसी के बनाये बनता है .
उसकी अपनी एक चाल होती है .एक अच्छी कहानी फिल्म की आत्मा,एक अच्छी treatment/screenplay उसका शरीर और अच्छा अभिनय उसके कपडे होते है.
बाकि सब श्रृंगार है जिससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता.अनुराग कश्यप से मै अपने कॉलेज AJK Mass Communiction Research Centre,Jamia Millia Islamia,N.Delhi में मिला हु apne film making and visual effect course ke dauran,उन् जैसे सोच के फ़िल्मकार वाकई दुर्लभ है.
वैसे मै आपसे भी मिला हु ..मोतिहारी में शूल फिल्म की शूटिंग के दौरान.

Rangnath Singh said...

मजेदार सलाह है आपकी।

प्रवीण जाखड़ said...

मनोज भाई पत्रकार जानते हैं कि उन्हें क्या पूछना चाहिए और क्या नहीं। एक बात बताएं, जैसे आपको बुरा लगा क्योंकि पत्रकारों ने अनुराग भाई पर सवाल उठाए, आपको नहीं लगता कि आप पत्रकारों के कामकाज, उन्हें क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए जैसी सीख और सवाल दाग कर उन्हें यह सिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि पत्रकारिता कैसे करनी चाहिए। वो अपना काम बखूबी कर रहे हैं। मीडिया स्वतंत्र है। वो अपने स्वतंत्र धर्म को निभाते हुए जुटे हुए हैं। आप सिर्फ उन्हें कह सकते हैं, टोक सकते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि अपनी निजी जिंदगी को किस तरह दांव पर रखकर, अपने सभी सगे-संबंधियों से दूरिया बनते-बनते यही पत्रकार आप और आपके, साथियों के बारे में लिखने-पढऩे में जुटे रहते हैं।

मैं तो यही कहंूगा, आप भी हमारे भाई हो और वो पत्रकार भी जिन पर आप सवाल उठा रहे हो हमारे भाई हैं। किसी के काम पर सवाल मत उठाओ भाई। क्योंकि यह गलत है। आपको कभी कोई पत्रकार यह नहीं कहेगा कि मनोज भाई राजनीति फिल्म के उस सीन में आपको यह डायलॉग नहीं, यह डायलॉग बोलना था। जैसे एक्टिंग की वैसे नहीं, ऐसे करनी चाहिए थी। भले ही वह पत्रकार फिल्म में आपके उस संवाद से बेहतर संवाद की रचना करने में सक्षम हो, लेकिन आपको ऐसा नहीं कहेंगे। इसलिए आप भी यह ना कहें कि आपको यह पूछना चाहिए था, यह नहीं बोलना चाहिए था, यह करना चाहिए था और यह नहीं करना चाहिए था। इन बातों में कुछ नहीं रखा मनोज भाई।

जिस तरह का निवेदन आपने पत्रकारों से किया है कि वे अनुराग से दोस्ती करें, उन्हें कठघरे में खड़ा ना करें। वैसे ही मेरा आपसे निवेदन है कि आप भी पत्रकारों से दोस्ती कीजिए, सवाल मत दागिए। उनके साथ बातचीत और दोस्ती बनाइए, उन्हें नसीहत ना दीजिए। उनसे साक्षात्कार प्रकाशित करवाइए, करेंगे। लेकिन उनकी कलम को पकड़ कर तोडऩे, मरोडऩे या अपने शब्दों से लिखने की कोशिश ना करें। हर क्षेत्र, काम की गरीमा होती है, पत्रकार अपनी गरिमा में काम कर रहे हैं आप भी गरिमा में सहयोग बनाए रखें।

पंकज शुक्ल said...

शिखर जीतने वाले का भी कुछ तो अंतर्द्वन्द्व है,
खिलखिलाने से पहले मुस्कुराहट देर तक सोचती है.

CHANDAN LAL GUPTA said...

sinema ak tarah ka darpan hae jo samaj ko swarta hae aur dusri tarah se sachaaewo ka ahsas dilata hae....ANURAG JI jaese log yadi sinema ki dunia me hae to yah khusnasibi ki bat hamare lia hae....aese logo pe sawal uthana hamari bewkuphi hae jo sachaewo se hame awgat karate hae... CHANDAN LAL GUPTA CHAPRA BIHAR.

ѕαηנαу ѕєη ѕαgαя said...

प्रवीण जाखड़ जी..
पत्रकारों की स्वंत्रता तब तक ही जायज होती है जब तक की किसी और की विचारधारा को वो अपनी विचारधारा से कुचलें न..
''राजनीति'' में एक जगह कहा गया है की मीडिया की आजादी किसी के लिए भी आतंक नहीं चाहिए..

SANJEEV JHA said...

आपका पोस्ट पढ़ कर बहुत अच्छा लगा...आप लगातार आम लोगों से इंटेरैक्ट करते रहे हैं... ऐसे गंभीर और जरुरी मुद्दों पर लिखते रहे हैं... अपनी राय देते रहे हैं... शायद आपको नही पता कि हम लोग आपके अभिनय से अलग.. आपके इन वाजिब रुझानों पर भी चर्चा करते हैं... पत्रकारों और आलोचकों पर से शायद हम लोगों का भी भरोसा उठता जा रहा है... जैसा आपने इस पोस्ट में लिखा है कि “ दलितों पर फिल्म नहीं बनायी जा सकती है, एक अच्छी कहानी पर फिल्म बनायी जा सकती है। और उस कहानी के केंद्र में दलित हो सकते हैं...” ऐसी बात वो कौन आलोचक या पत्रकार है जो कर रहा है... कोई नही... लेकिन अचंभा देखिए कि ये वही अनुराग कश्यप हैं जिनकी एक फिल्म के बारे में एक आलोचक ने कहा था- ‘ never go to watch this film ’... और अब उस हालिया कार्यक्रम से वापस आने के बाद जब बहस छिड़ी तो लोगों ने उनकी भाषा को आधार बनाकर क्या से क्या कह डाला... कोई मुद्दे की बात ही नही कर रहा... मूल बात को छोड़ कर सब बातें हो रही हैं... बहरहाल, नसीरुद्दीन शाह कि इस बात में बहुत दम है कि सिनेमा से सिर्फ हेयर स्टाइल बदलता है, समाज नहीं ।
मुझे याद नही आता कि कोई सभा या सेमिनार अनुराग जी कि रुकी हुई... या बंद पड़ी फिल्मों के लिए किया गया हो... FTII पूणे में “सिनेमा और साहित्य” पर हुए एक सेमिनार में ममता कालिया से लेकर और भी कई लोग थे जो देवदास के रुपांतरण पर उन्हे कोस रहे थे... जबकि उनकी देवदास कई वजहो से एक बेहतरीन रुपांतरण है...
बड़े भाई... आपने खुल कर और बिना किसी लाग-लपेट के यह पोस्ट लिखा है... आपका बहुत बहुत आभार और शुभकामनाएं...

SANJEEV JHA said...

@ प्रवीण जी... ये आप कैसी बात कर रहे हैं...!! आपको पता भी है कि सब कुछ के बावजूद आम आदमी का पत्रकारों से भरोसा उठ गया है... और ये पत्रकार बंधू क्या कुछ पढ़ते रहते हैं... लिखते रहते हैं और दिखाते रहते हैं, ये किससे छुपा है...? ज्यादा उदाहरण नही दूंगा बस इतना कहना चाहूंगा पत्रकारिता जैसी कोई चीज अब शायद नही रही... कुछ लोग हैं जो अच्छा कर रहे है... और सचमुच उन्होंने जान जोखिम में डाला है... लेकिन, किसी भी क्षेत्र का आकलन ओवरऑल होता है... जैसे साहित्यिक आलोचना को अगर आप देखें तो वहां आपको एक से एक जीनियस मिलेंगे... लेकिन क्या वजग है कि ज्यादातर लेखक आपको आलोचकों द्वारा प्रताड़ित किया हुआ ही मिलेगा... चेखव कहता था कि आलोचक घोंड़े के पुट्ठे पर हुए घाव पर बैठा मख्खी है, जो उसे बार-बार अपनी रफ्तार बढ़ाने पर मजबूर कर रहा है... अब मीडिया की ही जैसी समीक्षा नॉम चोमस्की करते हैं, वैसी कौन करता है...तो वो तो रेअर है...
मैं मनोज जी की बातों से शत-प्रतिशत सहमत हूं... मनोज जी पर लिखने वाले और उनका साक्षात्कार प्रकाशित करने वाले पत्रकारों की कमी है, ऐसा मुझे तो नही लगता... इन दिनो तो वैसे भी मीडिया वाले उनकी बहुत प्रशंशा कर रहे हैं... जो वाजिब है... लेकिन इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत के साथ अपनी जो बात रखी है, वह काबिलेतारिफ है... और आप मीडियावालों से जो नजदीकी बनाए रखने की बात कर रहे हैं... तो मैं इसी से उनको मना कर रहा हूं... एक अच्छे अभिनेता को किसी मीडिया वाले से नही, अपने किरदार से, अपने समय, अपने समाज और अपने अभिनय ने नजदीकी बयाए रखना चाहिए...

Aparna said...

baat sirf Films ki nahi. yu bhi har rachnakar ko freedom milni chahiye abhiwyakti ki, uske antas ke vicharo ko kisi bhi form me samaj ke samne rakhne ki. baat sirf kisi story ki nahi baat yaha freedom ki hai. ham khud se pooche apne hise ki swatrantra le paye kya samaj se hum?


Rgds
Aparna

Arbendra Pratap said...

Namaskaar sir, aap kaise hai...aaj kal kya chal raha hai....

ashwin said...

काफी लोग लिख चुके है, मैं बहुत ज्यादा नहीं लिखुंगा सिर्फ यही कहुंगा कि आज पत्रकारिता महज एक धंदा बन गया है, और ये धंदा करने वाले कला कि क़द्र क्या जानेंगे, उन्हें बस मसालादार ख़बरों से मतलब है फिर वो कुछ भी लिखे,
बोले या छापे; कोई नहीं रोक सकता उन्हें .. . पता है क्यों, क्यूंकि वो पत्रकार है .. पत्रकार ...
जहां तक बात है अनुराग कश्यप जैसे इंसान कि वो एक इमानदार फिल्मकार हैं, और ये बात निरंतर उनकी फिल्मों में देखनो को मिलती है और आगे मिलती रहेगी .. और यही पत्रकार जो इन्हें आज कठघरे में ला रहे है, आप जल्द ही देखेंगे उनके पीछे पीछे भागते नज़र आयेंगे ... मनोज जी को बधाई और शुक्रिया.. विचार रखने के लिए .... अंत में अनुराग कश्यप कि आने वाली फिल्म से कुछ लाइन लिख रहा हूँ जो उन्होंने खुद कहीं है फिल्म में भी, उम्मीद है पत्रकार भाइयों को भी समझ में आएगी ...

हर बाल की खाल की ये छाल भी खा जाए, इसके हाँथ पड़ जाए तो महीने.. साल भी खा जाए;
किसी बेहाल का बचा जो हाल, बेहाल भी खा जाये, बेमौत मरते मन का मलाल खा जाए;
लालू का लाल खा जाये, नक्सलबारी की नाल खा जाये, बचपन का धमाल खा जाए बुढ़ापे की शाल खा जाए;
हया तो छोड़ो, बेहया की चाल भी खा जाए, और अगर परोसा जा सके तो ख़याल भी खा जाए ....

धन्यवाद
अश्वनी सिंह ...

mridula pradhan said...

ekdam khra sona jaisa baat-vichar hai.

nilesh mathur said...

मनोज भाई, प्रणाम,
राजनीति देखी, आप ही आप छाए रहे पूरी फिल्म में, आप के एक संवाद ने अजय देवगन का पत्ता साफ़ कर दिया " हमें किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है" कमल का अभिनय किया है आप ने, बधाई!

shahteer said...

film samaj ka aaina hoti hai rajniti movi bhi yahi bata rahi hai ki aaj rajniti kitni bhrashat ho chuki hai lekin mai kahana chahuga ki ye film aur bhi behatar ho sakti hai

सतीश पंचम said...

मनोज जी,

एक काम किया जाय।

जब कभी उलूल जूलूल टाइप कोई सवाल हो तो तुरंतै पीपली लाईव वाली बुढ़िया अम्मा की तरह पहले एकाध बीड़ी जैसी मांग.... जैसे कि चिलम वगैरह मांग लिजिएगा.....और जब चिलम देने लगे तो कहिएगा कि भई जरा वो बनारसी पत्ता भी ले आना तो बतियाने में मन भी लगेगा।

बाइट के चक्कर में ससुरा न लपक कर सौ ग्राम गाँजा पत्ती तोड़ लाया तो कहिएगा...और फिर जमकर नैतिकता और समाज पर बहस चलने दिजिए......क्योंकि इस तरह की बातें नशे में ही ठीक लगती हैं....किसी के पास पैसे का नशा है तो किसी के पास पद का नशा है....वही लोग नैतिकता और समाज की दुहाई देते ज्यादा नजर आते हैं जो खाए पिए अघाए होते हैं। उन्हें यह चिंता नहीं कि अनुराग कश्यप किन किन तकलीफों से गुजर कर यहां पहुंचे हैं...उन्हें यह फिक्र नहीं कि कौन किस मोड़ से गुजर कर यहां तक पहुंचा है।

नसरूद्दीन शाह जी की बात सच है कि सिर्फ हेयर स्टाईल बदलता है समाज नहीं...लेकिन हेयर स्टाईल के साथ साथ मेरा मानना है कि एक और चीज बदलती है और वह है - सिनेमाघर में परदे के पास सबसे आगे की रो में बैठने वालों की जमात....जो कि समय बीतने के साथ पीछे और पीछे की सीट चाहने लगती है....क्योंकि तब उसे आगे की सीट पर बैठ पैसे फेंकना या सीटी बजाना बेतुकापन लगने लगता है :)

और कपड़ों की स्टाईल पर तो कहना ही क्या....शर्ट की एक बटन तोड़ कर अमिताभ जी की तरह गाँठ बाँधने की देर है ....देखिए कितनी तेजी से लोग उसे अपनाते हैं :)

बढ़िया पोस्ट।

सतीश पंचम said...

मनोज जी,

एक काम किया जाय।

जब कभी उलूल जूलूल टाइप कोई सवाल हो तो तुरंतै पीपली लाईव वाली बुढ़िया अम्मा की तरह पहले एकाध बीड़ी जैसी मांग.... जैसे कि चिलम वगैरह मांग लिजिएगा.....और जब चिलम देने लगे तो कहिएगा कि भई जरा वो बनारसी पत्ता भी ले आना तो बतियाने में मन भी लगेगा।

बाइट के चक्कर में ससुरा न लपक कर सौ ग्राम गाँजा पत्ती तोड़ लाया तो कहिएगा...और फिर जमकर नैतिकता और समाज पर बहस चलने दिजिए......क्योंकि इस तरह की बातें नशे में ही ठीक लगती हैं....किसी के पास पैसे का नशा है तो किसी के पास पद का नशा है....वही लोग नैतिकता और समाज की दुहाई देते ज्यादा नजर आते हैं जो खाए पिए अघाए होते हैं। उन्हें यह चिंता नहीं कि अनुराग कश्यप किन किन तकलीफों से गुजर कर यहां पहुंचे हैं...उन्हें यह फिक्र नहीं कि कौन किस मोड़ से गुजर कर यहां तक पहुंचा है।

नसरूद्दीन शाह जी की बात सच है कि सिर्फ हेयर स्टाईल बदलता है समाज नहीं...लेकिन हेयर स्टाईल के साथ साथ मेरा मानना है कि एक और चीज बदलती है और वह है - सिनेमाघर में परदे के पास सबसे आगे की रो में बैठने वालों की जमात....जो कि समय बीतने के साथ पीछे और पीछे की सीट चाहने लगती है....क्योंकि तब उसे आगे की सीट पर बैठ पैसे फेंकना या सीटी बजाना बेतुकापन लगने लगता है :)

और कपड़ों की स्टाईल पर तो कहना ही क्या....शर्ट की एक बटन तोड़ कर अमिताभ जी की तरह गाँठ बाँधने की देर है ....देखिए कितनी तेजी से लोग उसे अपनाते हैं :)

बढ़िया पोस्ट।

cinemanthan said...

मनोज जी सिनेमा और मानव का मिला जुला इतिहास देखकर आपकी इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि सिनेमा समाज को नहीं बदलता। सिनेमा आदमी को बदलता है और समाज आदमी से ही बनता है। ये और बात है कि समाज विभिन्न किस्म के व्यक्त्तियों से मिल कर बना है तो एकदम से सिनेमा का असर समाज पर नहीं दिखायी देता, खासतौर पर भारत जैसे विशाल देश में।
एक तय समय में सिनेमा समाज को पूरी तरह से बदले भले ही न, पर उसे बहुत हद तक प्रभावित जरुर करता है।
समाज व्यक्ति से बना है और अगर एक छोटे से गाँव में पला बढ़ा कोई व्यक्ति फिल्म देखकर प्रभावित हो जाता है और बड़ा होकर फिल्म संसार में काम करने लगता है तो कैसे मान सकते हैं कि सिनेमा बदलता नहीं?
सिनेमा अगर व्यक्ति को बदल सकता है तो समाज को भी, भले ही छोटे स्तर पर ही सही, बदलता तो है ही।
ऐसे सैंकड़ों उदाहरण दिये जा सकते हैं जहाँ जीवन पर सिनेमा का असर बहुत गहरा पड़ा है। अगर साहित्य का असर पड़ सकता है तो सिनेमा का क्यों नहीं और भारत जैसे देश में तो सिनेमा बहुत गहरी पैंठ रखता है।

Sneh Bhaskar said...

kahan gayab ho gaye sir...bahut dino se aapka post nahi padha.. i hope u r well and happy.