Monday, January 25, 2010

जिसे ज़रुरत उसे नसीब नहीं उनका ‘प्यार’

कुछ दिनों से मैं बिलकुल सुन्न हो चुका हूं। मस्तिष्क में कोई सवाल नहीं उठ रहा। और सवाल नहीं उठे तो फिर जवाब भी नहीं है। द्वंद भी नहीं है। फिर एक शहर से दूसरे शहर काम की अफरातफरी में भाग रहा हूं। महाबलेश्वर में अपनी फिल्म ‘दस तोला’ की शूटिंग पूरी की है। इलके बाद तीन दिनों के लिए हैदराबाद गया। वहां भी एक और शूटिंग खत्म की। अब वापस मुंबई आया हूं। कुछ औपचारिकताएं खत्म करने के बाद कलकत्ता जाऊंगा अपनी नयी फिल्म ‘चितगौंग अपराइजिंग’ की शूटिंग शुरु करने के लिए।

कभी मैंने इस तरह से काम नहीं किया था। लेकिन कभी इस तरह से एक के बाद एक अच्छी फिल्में भी मेरे पास नहीं आई थीं। भागना तो अच्छा लग रहा हैं। काम करना तो हमेशा ही अच्छा लगा। और उस पर अगर अच्छा काम है तो बहुत ही अच्छा लगता है।

इस बार मेरा परिवार गांव गया। और वायदे के बावजूद व्यस्त होने के कारण मैं नहीं जा पाया। गांव की याद तो बहुत आती रही। हर बार फोन करके अपने भाई बहनों को पूछता रहा कि क्या खाया, कहां हो ? उनसे जलन भी हो रही थी और खुशी भी हो रही थी कि सब के सब गांव में हैं। शायद मेरा बुढ़ापा गांव में बीतना तय है।

कितने दिनों बाद फिर टेलीविजन देखने बैठा तो चैनल बदल बदल कर प्रोग्राम टटोल रहा हूं। लेकिन टेलीविजन पर वही पुराने घिसे पिटे प्रोग्राम हैं। टेलीविजन चैनल हर बड़ी नयी फिल्म को इस तरह से सजा संवारकर पेश करते हैं, जैसे उन बड़े निर्माताओं और अभिनेताओं से इन्हें पैसा मिलता हो। किसी छोटी अच्छी फिल्म के आने पर ये आधे घंटे का प्रोगाम नहीं बनाते। ये उसके हिट होने पर या सफल होने पर ही उसकी बात करते हैं। दुखद है। बड़ी फिल्मों को मुफ्त में ये चैनल बड़ा प्रचार देते हैं और जिन्हें आवश्यकता है, उसके लिए ये टीआरपी की दुहाई देते हैं। कृपया मुझसे कोई सवाल न करे कि ये भ्रम है। क्योंकि मैंने ऐसी बाते करते हुए अपने कई सारे दोस्तों को सुना है, जो बेचारे मीडिया से जुड़े हैं। बहुत सारे पत्रकार मित्रों के साथ आज भी संबंध कायम हैं जो कि रंगमंच के समय से जारी हैं। इस बारे में भी उन्हें सोचना चाहिए। ये मैं जली कटी नहीं सुना रहा हूं। सिर्फ मन के दर्द को अपने ब्लॉग के जरिए आप तक पहुंचा रहा हूं। बाकी वो अपने मालिक खुद हैं।

आज कुछ दोस्त मेरे घर आने वाले हैं। उनके आवाभगत की तैयारी में हूं। इसलिए आपसे विदा लूंगा। इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

Sunday, January 10, 2010

नए साल का संकल्प

नए साल की आप सभी को बहुत सारी शुभकामनाएं। मैं कभी दिल्ली,कभी मुंबई,कभी महाबलेश्वर और कभी हैदराबाद में कुछ शूटिंग तो कुछ दूसरे कामों मेंम व्यस्त रहा, इसलिए एक तारीख को ब्लॉग पर पोस्ट नहीं लिख पाया। दिल्ली की ठंड बर्दाश्त के बाहर थी। लेकिन, इस बात का सुकून भी था कि यहां मुझे तीन दिनों से ज्यादा रहना नहीं है। लेकिन, सच कहूं तो दया आ रही थी उन लोगों पर,जो वहां रह रहे हैं।

मौसम का हाल यह है कि सब एक दूसरे पर ही तोहमत मढ़े जा रहे हैं। लोग एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं तो देश मिलते हैं तो वो भी आपस में जिम्मेदारी डाल रहे हैं ग्लोबल वार्मिंग की। कुल मिलाकर बात ये है कि इस संकट से उबरने का कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। लेकिन जो संकट आने वाला है, वो सबको दिखेगा और दिखना शुरु हो चुका है।

लोग चीख चीख कर कहते रहे कि प्लास्टिक बंद करो, पेड़ लगाओ, प्रदूषण न फैलाओ, मोटर गाड़ी की जगह अन्य विकल्प तलाशो,लेकिन हर व्यक्ति स्वार्थी है। चाहे वो उद्योगपति हो या उपभोक्ता। सब केवल अपने घर को ही साफ रखने में लगे हैं। बाहर की गली में कचरे की बदबू से बचने के लिए खिड़की भी बंद कर लेते हैं। और अब तो कमरे को खुशबूदार करने के लिए तरह तरह के परफ्यूम भी मिल रहे हैं। लेकिन,जिस समस्या की शुरुआत अभी हुई है-वो एक दैत्य का रुप लेता हुआ दिखायी देगा। उससे बचने का क्या रास्ता हो सकता है। इस पर बात करने के लिए समय भी नहीं बचेगा। संभलिए। शायद आप बच जाएं और ये दुनिया बच जाएं। शायद नए वर्ष पर यही संकल्प लेने की आवश्यकता है।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी