Saturday, February 20, 2010

बहुत याद आओगे निर्मल तुम

मेरे दोस्त स्वर्गीय श्री निर्मल पांडे को मेरी तरफ से श्रद्धांजलि। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उसके परिवार को इस परिस्थिति से उबरने की शक्ति दे। जब मुझे अचानक एक एसमएस आया, अपने प्रिय मित्र अनिल चौधरी का कि निर्मल का देहांत हो गया तो कुछ देर के लिए मैं सुन्न बैठा हुआ था। और फिर आंखों से आंसू निकल पड़े। मन बेचैन हो उठा। फिर लगातार अनिल चौधरी के साथ संपर्क बनाए रखा। आगे की जानकारी के लिए। मैं अपनी सारी मीटिंग्स खत्म करता जा रहा था, लेकिन मन में कुछ और ही चलता जा रहा था। सारी यादें और वो सारे पल जो निर्मल के साथ बिताए थे, मन में उमड़ने लगे।

मुझे अभी भी याद है उसका एक नाटक-राउंड हेड पीक हेड। इस नाटक में उसने अनूठा अभिनय किया था। मुझे अभी भी याद है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बाहर नीम के पेड़ तले एक दूसरे की टांग खींचते रहना। मुझे अभी भी याद है कि जब मैं विक्रम मल्लाह के रोल के लिए चुना गया था, तब मुझे सिर्फ यही डर था कि कहीं निर्मल पांडे शेखर कपूर से न मिल ले। क्योंकि अगर वो मिला तो निश्चित तौर पर मुझसे यह रोल छिन जाएगा। वो दिखने में इतना सुंदर था। हुआ वही। जब शेखर से निर्मल मिला तो मुझे उस रोल से हटाकर मान सिंह का रोल दे दिया गया और निर्मल को विक्रम का रोल दे दिया गाय। शेखर ने उसके बारे में कहा कि वो ईसामसीह जैसा दिखता है।

वो था भी इतने सुंदर व्यक्तित्व का मालिक। उस पर दिल हीरे जैसा। बड़े शहर की कोई भी काली छाया उसके दिल को छू नहीं पाई थी। नैनीताल के पहाड़ से आया था। और उस कमाल के व्यक्ति की कमजोरी यही थी कि वो यहां पहाड़ को खोजता रहा। शायद ये हाल हम सभी का है,जो छोटी जगहों से आए हैं। लेकिन, निर्मल कुछ ज्यादा सोचता था इन सबके बारे में। ये शहर की मारधाड़, काटाकाटी उसे पसंद नहीं आती थी।

कुछ दिनों से संपर्क टूटा हुआ था। वो अपने जीवन में रमा था। हम सभी अपने जीवन में अलग अलग व्यस्त थे। जब मैंने उसका पार्थिव शरीर कूपर हॉस्पीटल में देखा तो मैं फफक फफक कर रो पड़ा। कोशिश ये करते हुए कि कोई मुझे देखे नहीं। मैं बस किसी तरीके से वहां से निकल जाना चाहता था। क्योंकि उस दृश्य़ ने विचलित कर दिया था। और सबसे दुख की बात यह है कि इस खबर को मैं कहीं भी नहीं देखता हूं। एक ऐसे व्यक्ति का देहांत हुआ है, जो ‘बैंडिट क्वीन’ के बाद एक हवा के झोंके की तरह आया था। जिसे इस इंडस्ट्री ने सिर आंखों पर बैठाने की कोशिश की थी। लेकिन आज वो ही इंडस्ट्री उसके देहांत की खबर से बेखबर है। बड़ा अजीब है ये सब।

वो चिड़ियों से बातें करता था बैंडिट क्वीन की शूटिंग के दौरान। वो चिड़िया की आवाज के साथ गुनगुनाता था और मुझसे कहता था- मनोज सभी सुर इनकी आवाज में है। इसके बाद वो सारेगामा के सुर निकालकर दिखाता था। और घंटो बैठा रहता था चिड़ियों से बातें करते हुए और सामने तालाब के पानी को देखते हुए। ऐसा लगता था मानो नैनीताल का ताल उसे नजर आ रहा है।

मेरे दोस्त निर्मल तुम बहुत याद आ रहे हो। तुम्हारे साथ बिताए कई पल याद आ रहे हैं। ये उम्र नहीं थी जाने की। लेकिन तुम जहां भी रहो तुम्हें शांति मिले, खुशी मिले। मेरी यही दुआ है ईश्वर से।

तुम्हारा और आपका
मनोज बाजपेयी

Friday, February 5, 2010

घातक है संकीर्ण राजनीति का विष

सपनों के शहर मुंबई में इससे पहले ऐसा वातावरण कभी नहीं था। एक अंजान सी चेतावनी हमेशा कानों से टकराती रहती है। घर से बाहर न निकलो। घर में दुबककर रहो। घर से बाहर सड़क पर जाओगे तो वो दूसरे के क्षेत्र में होगा। सड़क के पार जाओगे तो वो भी किसी और का दायरा होगा। अपना दायरा समझो और घर के भीतर रहो। निकलोगे तो मारे जाओगे। मार-मार के भगाए जाओगे।

लेकिन,सवाल यह है कि क्या देश आपका नहीं है। राज्य आपका नहीं है। अब इस सवाल का संवैधानिक जवाब भले हां हो, लेकिन मायानगरी में रहते हुए कई बार अहसास होता है कि जवाब हां मानना आसान नहीं है। वैसे, ये सिर्फ मेरा सोचना नहीं है। बहुत से लोग यही सोचते हैं। दरअसल, क्षेत्रवाद का ज़हर कुछ लोग इस कदर फैला रहे हैं कि उसके बीच से निकलता हर रास्ता विषैला लगने लगता है।

इन दिनों क्षेत्रवाद का यह विषैला डंक फिर मुंबई की नसों को जहरीला कर रहा है। कलाकार और मजदूर सॉफ्ट टारगेट हैं। दरअसल, उत्पातियों का पहला नारा है-डराओ-धमकाओ कलाकारों को। मारो मजदूरों को। वो भागेंगे तो मीडिया के कैमरे देखेंगे। इससे निश्चित तौर पर उनकी दहशत बढ़ेगी। और उन लोगों को मानना है कि इससे उनका वोट बैंक बढ़ेगा।

लेकिन,लाख टके का सवाल यह है कि क्या कुछ लोग यह गुंडई करते रहेंगे? क्या हाथ में लाठी लिए लोग किसी को भी सरेराह पीट सकते हैं? घसीट सकते हैं? क्या सरकार नाम की कोई चीज आम लोगों के लिए है या नहीं? ये मासूम सवाल मेरे और मेरे जैसे हजारों आम लोगों के हैं,क्योंकि वो हिंसा के खौफ के बीच दो जून की रोटी की जुगाड़ के साथ अपने बचने का रास्ता खोज रहे हैं।

दरअसल, क्षेत्रीय अस्मिता की बात को इस तरह पेश किया जा रहा है,मानो दूसरे राज्य का हर शख्स स्थानीय निवासियों का दुश्मन है। हालांकि, संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक उत्तर भारतीयों के साथ मारपीट और क्षेत्रवाद के नारे को अलोकतांत्रिक करार दे चुके हैं। राज्य सरकार ने भी इसे घातक करार दिया है। लेकिन, आम लोगों के बीच खौफ बढ़ता जा रहा है। आम लोगों के जेहन में भी अब एक बात घर करने लगी है कि सरकार उन्हें नहीं बचाएगी क्योंकि उसे अपने वोट बैंक खोने का डर है। क्योंकि, अगर सरकार को आम लोगों की चिंता होती तो कुछ उपद्रवी तत्व इस तरह दशहत फैला ही नहीं पाते।

लेकिन, फिर वही सवाल सामने है कि अगर सरकार बेबस है तो आम लोग जाएं तो जाए कहां? संविधान निर्माताओं ने देश का संघीय ढांचे तय किया तो राष्ट्र के वैविध्य के मद्देनजर शक्तियों के संतुलन के तहत लॉ एंड ऑर्डर को राज्य का विषय बनाया। लेकिन, आज राज्य हाथ पर हाथ धरे बैठा है तो लगता है कि संविधान ही बदल डालो। आखिर, कब तक यूं ही डराया-धमकाया जाएगा।

एक कलाकार होने के नाते मेरी और मेरे जैसे कई कलाकारों की अलग पीड़ा है। संविधान में आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, लेकिन हालात इतने निरंकुश हैं कि आप सिनेमाई पर्दे पर भी विचारों के पंख नहीं फैला सकते। आप सिनेमा में भी कुछ कहेंगे तो किसी को बुरा लग सकता है। और अगर ये किसी खास दल से संबंधित हुआ तो आपकी फिल्मों के पोस्टर फाड़े जाएंगे। थिएटरों में आग लगाई जा सकती है और दर्शकों की पिटाई भी हो सकती है। यानी जिस फिल्म को बनाने में आपने महीनों लगाए और निर्माता ने करोड़ों रुपए खर्च किए वो सिर्फ इसलिए दर्शकों तक नहीं पहुंच सकती क्योंकि किसी दल को अपने मिजाज से मेल खाती नहीं दिखी। हाल के दिनों में हम कई फिल्मों के साथ ऐसा देख चुके हैं।

फिर, सिनेमाई पर्दे पर ‘लार्जर दैन लाइफ’ की इमेज लोगों के बीच हमें एक उम्मीद की तरह पेश करती है। मीडिया मुझसे कई बार सवाल पूछता है कि आप कुछ कहते क्यों नहीं? लेकिन, मैं बोलता हूं तो बाकी लोग चुप रहते हैं। मेरे अकेले बोलने से क्या होगा? मैं तो बोलता रहता हूं। लेकिन,क्या कोई साथ आया। देखना यही है कि क्या अब इस वीभस्त मानसिकता के खिलाफ कोई आंदोलन खड़ा हो पाएगा?

वैसे,सोचने वाली बात यह भी है कि दुनिया के नक्शे पर सबसे बड़े वित्तीय शहर के रुप में पहचान रखने वाले मुंबई शहर को सिर्फ ‘मराठीमानुस’ के नाम पर अलग किया जा सकता है? इस शहर पर आतंकवादियों का हमला होता है,तो हर धर्म-हर क्षेत्र के लोग शहीद होते हैं। इसी तरह आतंकियों को ढेर करने वाले पुलिसकर्मी और कमांडो के जवान भी सिर्फ एक राज्य के नहीं। यह शहर हम कलाकारों के ही नहीं, यहां रहकर दो जून की रोटी कमाने वाले लाखों लोगों के लिए अपना घर है- और इस लिहाज से हम सभी मुंबईकर हैं। फिर, जिन धंधों पर मराठी मानुस की राजनीति तले निशाना साधा जा रहा है, वह हमेशा से गैर-महाराष्ट्रीयन करते रहा है।

दरअसल, सवाल उत्तर भारतीय और महाराष्ट्रीयनों का नहीं है। सवाल है, उस संकीर्ण राजनीति का,जो क्षेत्रवाद की राजनीति को पनपने देती है। निश्चित तौर पर मायानगरी का अपना आकर्षण है,जो न सिर्फ महाराष्ट्र के भीतर से बल्कि पूरे देश से लोगों को मुंबई जाने के लिए विवश करता है, पर मुंबई पर आबादी के बढ़ते बोझ के बीच दूषित राजनीति ने गंभीर सवाल को खौफ और आतंक के खांचे में डाल दिया है। इस तरह सवाल का जवाब मिलना मुश्किल है,क्योंकि खांचा हमेशा अपने आकार में पदार्थ को ढलने के लिए विवश करता है। ऐसे में सवाल यही है कि आम लोग क्या करें। मैं बोल रहा हूं। मैं बोलता रहूंगा, लेकिन देखते है कि क्या सबके सब साथ बोलेंगे। शायद नहीं, क्योंकि हम सब डरे हुए हैं, सहमे हुए हैं। वो बोलते रहेंगे। घसीटते रहेंगे-पीटते रहेंगे क्योंकि उनके पास भीड़ है। और हमारी भीड़ तो कबकी तितर बितर हो चुकी है। सब घरों के भीतर हैं। बाहर नहीं निकलना चाहते। निकलते हैं तो सन्नाटे के बीच दबे कदमों के साथ। इस माहौल को जल्द बदलना होगा।