Sunday, May 9, 2010

व्यस्तता के बीच बिहार यात्रा

इन दिनों मारामारी चल रही है। तारीखों के बंटवारे की। फिर, मैंने अपने आपको पूरी तरह ‘राजनीति’ के प्रचार प्रसार में समर्पित किया हुआ है। लेकिन इसके बावजूद बहुत सारे कमिटमेंट्स हैं या फिर कुछ लोग चाहते हैं कि आप उनके इंटरव्यू दें या उनके किसी कार्यक्रम में जाएं। और घर बार की जिम्मेदारी भी पूरी करते रहिए। आलम ये है कि क्रिकेट को मैं दीवानगी की हद तक चाहते हुए भी टी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप नहीं देख पा रहा हूं।

‘राजनीति’ की रिपोर्ट बहुत अच्छी है। जिससे मिलो वही उस फिल्म को देखना चाहता है। दर्शकों में उत्साह है। ये देखकर अच्छा लगता है। मेरी कई सारी बेहतरीन फिल्में बिना प्रचार प्रसार के दर्शकों में अपना उत्साह नहीं जगा पाई और दर्शक थिएटर तक नहीं पहुंचे। अब मुझे लगता है कि जरुरी ये है कि छोटी-अच्छी फिल्मों से ज्यादा उन अच्छी फिल्मों पर ही ज्यादा ध्यान दिया जाए, जिनके निर्माता बड़े हैं और जिनमें प्रचार प्रसार का माद्दा है।

कुछ एक कहानियों को सुना है और कुछ एक पसंद आई हैं। एक बार मैं उन्हें साइन कर लूं। एक बार तारीखों पर बात हो जाए तो मैं आपको बताऊं।
हाल फिलहाल मैं बिहार गया था। भोर नामक संस्था द्वारा शुरु किए जा रहे हॉस्पीटल के शिलान्यास के लिए। बहुत आनंद लिया। अपने घर से पचास किलोमीटर की दूरी पर हॉस्पीटल का शिलान्यास करने के बाद संस्थापक के घर पर शुद्ध रुप से शुद्ध बिहारी खाना खाना और बगल के नुक्कड़ से पान की लेकर मुंह में चबाना और फिर अपने सफर पर निकल जाना बहुत ही आनंददायक अनुभव रहा। अचानक मैं अपने पच्चीस साल पूर्व के जीवन में चला गया। रास्ते में रुककर नन्हें मुन्हे से एक कांच के गिलास में चाय पीना, मूंगलफली लेकर पटना तक का सफर तय करना-ये जल्दी भूले नहीं भूलेगा।

खुशी इस बात की है कि अपने इलाके के एक बहुत अच्छे काम में शामिल हुआ। मैं बस आशा करता हूं कि भोर नामक संस्था जल्द से जल्द डोनेशन जमा करके इस हॉस्पीटल का निर्माण अतिशीघ्र कराके जनता की सेवा के लिए उपल्बध कराएगी। पटना आने के बाद मुख्यमंत्री जी से भी मुलाकात हुई। अपने इलाके के दस बिन्दू थे, जिन पर मैं उनका ध्यान आकर्षित करना चाहता था। जिसमें थारु जनजाति के समाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की बात कही गई थी और साथ ही साथ बिहार में एक फिल्म सिटी और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तर्ज पर एक संस्था खुलवाने की भी मांग की गई थी।

मुख्यमंत्री महोदय ने मुझे कम से कम पैतालीस मिनट का समय दिया। मेरे साथ ही ज्ञानदेव त्रिपाठी, जो शिक्षाविद् हैं, उन्होंने शिक्षा संबंधी नीतियों पर बात की। अनुरंजन झा, जो भोर संस्था के संस्थापक हैं, उनके चैरिटेबल हॉस्पीटल के बारे में जानकारी ली। और इसी के साथ हमने मुख्यमंत्री महोदय से विदा ली। उनका बहुत बहुत धन्यवाद हमें इतना सारा समय देने के लिए।

वापस फिर वही फ्लाइट वही मुंबई नगरी की अपनी चकाचौंध में पहुंच गया हूं। ऐसा लगा, जैसे इक झटके से सपने से किसी ने उठा दिया हो। यकीं जानिए कि जल्द नहीं भूलूंगा इस यात्रा को।
आपका और आपका
मनोज बाजपेयी