Monday, September 5, 2011

खुश हूं अन्ना का आंदोलन सफल हुआ और ‘आरक्षण’ भी

‘आरक्षण’ को लेकर काफी व्यस्त रहा। फिर घर में बेटी के आगमन के बाद जब भी घर पर होता हूं, अवसर ही नहीं मिल पाता कि मैं कुछ लिखने बैठूं। खैर, आज इस मौके को गवाउंगा नहीं। ‘आरक्षण’ ने अच्छा व्यापार किया।

आरक्षण के प्रचार के दौरान अधिकतर जगहों पर मेरा और श्री अमिताभ बच्चन जी का साथ जाना हुआ। उनके अपार प्रशंसक समुदाय को देखने-सुनने का मौका मिला। कई बार ये सोचता भी रहा कि श्री बच्चन की लोकप्रियता का जो दौर मैंने अपने बचपन में देखा था, वो आज तक कहीं रुका नहीं है बल्कि बढ़ता ही गया है। पटना पहुंचने के बाद तो ऐसा लगा कि पूरा शहर ही श्री अमिताभ बच्चन के आने के इंतजार में था।

‘आरक्षण’ ने कई बहस को जन्म दिया। कई सारी पुरानी बहस भी नयी हो गईं। इस कारण कुछ एक राज्यों में फिल्म को नुकसान भी उठाना पड़ा। अंतत: फिल्म ने अच्छा व्यापार किया। लोगों ने काफी सराहना की और इससे फिल्म से जुड़े सभी लोगों को संतोष है। बड़ी फिल्म करने का यह फायदा अवश्य है कि प्रचार प्रसार में बहुत अधिक खर्चा किया जाता है, जिससे दर्शक वर्ग उस फिल्म को देखने के लिए उत्सुक रहता है। लेकिन कहीं न कहीं दुख भी होता है उन छोटी और अच्छी फिल्मों के लिए, जिनके पास इतना पैसा नहीं होता जो बड़े स्तर पर प्रचार प्रसार कर सकें। इसके कारण दर्शक वर्ग कई बार उनमें रुचि ही नहीं दिखाता। यह अपने आप में विडंबना है। फिर भी मैं बहुत खुश हूं। न सिर्फ अपने लिए बल्कि प्रकाश झा जी के लिए भी, जिनकी मेहनत सफल हुई।

इस फिल्म के बाद लगातार घर पर रहना हुआ। अन्ना हजारे जी के आंदोलन को देखने सुनने समझने का मौका हाथ लगा। खुशी इस बात की है कि आंदोलन सफल रहा। और भ्रष्टाचार आज हमारे समाज और हमारे देश में सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। इस मुद्दे को अभी तक मुद्दा माना ही नहीं जाता था। अन्ना हजारे ने एक बड़ी अच्छी बात कही। वह यह कि सिर्फ टोपी ही नहीं पहनों बल्कि अपने चरित्र को भी बदलो। यह अपने आपमें बहुत बड़ी बात है। बदलाव हम सब को अपने घर से और अपने आप से ही शुरु करने हैं। फिर हमें ताकत मिलेगी हर उस सरकार से अपनी मांग करने की, जो सत्ता में है।

अभी मेरी बेटी फिर से मेरे साथ होने की मांग कर रही है और मैं उसके पास जा रहा हूं। लेकिन वादा करता हूं कि जल्द ही फिर से लिखूंगा।

इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

15 comments:

शिवम् मिश्रा said...

मनोज भईया प्रणाम ,
आपको और परिवार में सब को बहुत बहुत बधाइयाँ बिटिया के आगमन की ... हम सब की ओर से बहुत बहुत हार्दिक स्नेहाशीष दीजियेगा बिटिया को !

‘आरक्षण’ की कामयाबी पर आपको और आपकी पूरी टीम को बहुत बहुत बधाइयाँ ! आपकी आने वाली फिल्मो के लिए भी हम यही दुआ करते है कि वो सब भी बहुत बहुत कामयाब रहे !

शेष शुभ ... अपना ख्याल रखें ... शुभकामनायों सहित
सादर आपका अनुज
शिवम् मिश्रा
मैनपुरी , उत्तर प्रदेश

Er. सत्यम शिवम said...

happy teacher's day....a lot of congrats & blesses:)

प्रवीण पाण्डेय said...

अमिताभजी के साथ साथ हमें आपका भी अभिनय सशक्त लगता है। आपकी बिटिया को ढेर सा स्नेह।

Anand Rathore said...

Manoj ji, hum bhi bahut khush hain... aapki film aur Anna ke liye aur dono ki safalta ke liye. bitiya ko humari taraf se bahut sara sneh.

सुशान्त सिंहल said...

नमस्कार! आरक्षण देखी और आप पर (अर्थात्‌ मिथलेश सिंह पर) बहुत गुस्सा आता रहा। मुझे लगता है कि यदि दर्शक दो-ढाई घंटे में ही किसी नकारात्मक किरदार से नफरत करने लगें तो उस किरदार को निभाने वाले कलाकार को एक चॉकलेट दी जानी चाहिये इनाम में - फिर भले ही वह उस इनाम को अपनी बेटी को ही क्यों न दे दे!

आरक्षण में सब कुछ अच्छा ही अच्छा था, ये तो मैं नहीं कहूंगा, पर हां, एक अच्छे विषय पर ईमानदारी से कार्य किया गया है। आरक्षण की कहानी यह भी सिद्ध करती है कि अन्ना की देश को बहुत जरूरत है पर यह अन्ना एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक अवधारणा का, एक सद्‌ प्रयास का नाम है। यह अवधारणा जिस दिन देश के जन-जन के अन्तर्मन में उतर जायेगी, अन्ना का प्रयास सफल हो जायेगा।

कौशलेन्द्र said...

मनोज जी ! अवसर मिला तो आरक्षण भी देखेंगे. पर मैं शिक्षा और शासकीय सेवाओं में आरक्षण के सख्त खिलाफ हूँ. अन्ना के आन्दोलन को हम तो तभी सफल मानेंगे जब जनलोकपाल बिल क़ानून बन जाए.
बिना विज्ञापन वाली छोटी बज़ट की फिल्मों के लिए मुझे भी दुःख होता है.....भीड़ के मनोविज्ञान को पैसे वालों ने कैश कर लिया है भाई. आपलोग ही कुछ उपाय खोज सकते हैं. बूची के हमरो असीस दिहा.
रहा बाँस का बाँस ही बिरवा, ना बन पाया मीठा गन्ना.
टोपी पर लिख देने से क्या, हो जाएगा तू भी अन्ना..
हम भ्रष्ट आचरण संरक्षित कर , पढ़ते और पढ़ाते गीता.
खींची तो थी लक्ष्मण रेखा, नहीं बची थी फिर भी सीता..
भली बात क़ानून बनाना, असल बात है अमल में लाना.
ग्रंथों में तो लिखा है सब कुछ, पढ़ा सभी ने सबने जाना..
भ्रष्टाचार हमीं से पोषित, समझ-समझ कर भी न समझना.
टोपी पर लिख देने से क्या, हो जाएगा तू भी "अन्ना"..

क़ानून के डर से साधू बनना, ये तो कोई बात नहीं है.
आत्म नियंत्रण से बढ़कर कोई, दुनिया का क़ानून नहीं है..
क़ानून बना देने भर से क्या, खुद ही संयम करना होगा.
हम रावण बध कर-कर हारे, अब राम स्वयं बनना होगा ..
देव नहीं, अवतार नहीं ये, साँचा मानुस भर है अन्ना.
साँचा मन करले हर कोई, हर ओर दिखेगा अन्ना-अन्ना..

सब टोपी पहन-पहन कर आये, कुछ केवल भीड़ जुटाने आये.

भ्रष्टाचार की चाबी घर में, कहीं सुरक्षित रखके आये
स्वर्ग बनेगा देश हमारा, आधी भीड़ ये कर दे वादा .
भ्रष्ट आचरण त्याग अभी से, जीवन अपनाएंगे सादा ..

रहा बाँस का बाँस ही बिरवा, ना बन पाया मीठा गन्ना.
बाँस काट जब बनी बंसुरिया, गाये जय-जय राधे-कृष्णा ..
टोपी पर लिख देने से क्या , हो जाएगा तू भी "अन्ना".

Simply shekhar's said...

negative lekin achha role play kiya apne aarakshan mein.. dekhi maini sequel banani chaye

Anupam Kumar said...

thnxxx.....to good acting in better movie on best time.

सुनील गज्जाणी said...

प्यारे मनोज जी !
नमस्कार !
आरक्षण '' के लिए आप को बच्चन साब के साथ आप को निरन्तर सुना टी वी पे . अब आप को सुनना अच्छा भी लगता है क्यूकि कि लगता है कि आप से जुड़ने की बाद ( अंतर जाल ) द्वार्रा एक अपना पन लगता है , खैर आपको '' आरक्षण '' कि सफलता कि बहुत बहुत बधाई . आप के अभिनय के बारे में क्या कहे ... बस लाजवाब ! अन्ना जी के आन्दोलन के कदम सही है मगर मेरा ये मत है कि जब तक इंसान अपनी अंतर आत्मा को झंकझोर कर नहीं कहेगा कि अब हू भष्टाचार नहीं करना है एक पायी भी नहीं लेणी है ये हम अपनी आत्मा को साक्षी मान कसम खाते है '' तो ही श्याद हम इसे जड़ से मिटा सकते है वरना नहीं , चाहे कितने ही अन्ना जी आये और आंदोलन करते रहे ! खैर .. आप को '' आरक्ष कि बहुत बहुत बधाई ! बीत्या रानी को हमारा ढेरों प्यार ! अब आप कि नयी एक और उम्दा फिल्म कि प्रतीक्षा है !
जय श्रे कृष्णा !

सुनील गज्जाणी said...

प्यारे मनोज जी !
नमस्कार !
आरक्षण '' के लिए आप को बच्चन साब के साथ आप को निरन्तर सुना टी वी पे . अब आप को सुनना अच्छा भी लगता है क्यूकि कि लगता है कि आप से जुड़ने की बाद ( अंतर जाल ) द्वार्रा एक अपना पन लगता है , खैर आपको '' आरक्षण '' कि सफलता कि बहुत बहुत बधाई . आप के अभिनय के बारे में क्या कहे ... बस लाजवाब ! अन्ना जी के आन्दोलन के कदम सही है मगर मेरा ये मत है कि जब तक इंसान अपनी अंतर आत्मा को झंकझोर कर नहीं कहेगा कि अब हू भष्टाचार नहीं करना है एक पायी भी नहीं लेणी है ये हम अपनी आत्मा को साक्षी मान कसम खाते है '' तो ही श्याद हम इसे जड़ से मिटा सकते है वरना नहीं , चाहे कितने ही अन्ना जी आये और आंदोलन करते रहे ! खैर .. आप को '' आरक्ष कि बहुत बहुत बधाई ! बीत्या रानी को हमारा ढेरों प्यार ! अब आप कि नयी एक और उम्दा फिल्म कि प्रतीक्षा है !
जय श्रे कृष्णा !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

दोहरी बधाई हो!

SKT said...

मनोज भाई, आरक्षण में आपने अपना किरदार बहुत दमदार तरीके से निभाया...कोई शक नहीं, आप कईयों पर भारी पड़े!! बधाई.

Amritanshu said...

Manoj jee, Kal ham apne parivar ke saath baith kar baatien kar rahe the ki aapki charcha hui. Mere bhatije ne bataya ki aap blogs likte hain, man me utsukta hui ki aapki baaton ko padhu parantu yahan aa kar ye nirasha hui ki aap niyamit roop se ise samay nahi de paate hain. Khair koi baat nahi, ye aapka prathmik karya nahi hai.

सुनील गज्जाणी said...

प्रिय मनोज जी !
नमस्कार !
कल 9x चेनल में आप को '' जीना इसका नाम है '' कार्यक्रम देखा .हाले कि बहुत पुराना था मगर फिर भी आप से लागाव के करण पूरा देख आप के प्यारे माँ और बाबू जी के भी दर्शा किये . ,,मेरी और से उन्हें सादर प्रणाम किजेयेगा . मनोज जी आप के कई छुए अनछुए पहलु हमे जाने को मिले , अच्छा लगा !आप निरंतर यूही अबिनय कि बुलंदियों को चुमते रहे माँ बाबूजी का सर गर्व से और उंचा करते रहे ये हम कामना करते है .!
सादर

Naughty Mummy said...

Dear Manoj Ji

I like your movies. Infact, there you are one of the 2 actors in India for me, for whom i would go to watch a movie (even if is flop or boring movie).. Govinda being other.

Your screen presence is awesome.

I still remember your dialog in Raajneeti ..'fall in line'. It was so funny the way you send it. I loved it.

You were really good in Aarakshan along with Saif Ali Khan

But i feel the second half of the movie just lost it plot and took easy way out by talking about private tuition. That was disappointing.

When you next meet Mr. Jha please convey my sentiments to him. It was like, he jumped into ring with bravery to tackle the bull and then when the time to grab the bull by horn came, he ended the game.