Wednesday, October 12, 2011

‘लंका’ से खुश हूं

पिछले दिनों मुंबई के बहुत सारे काम खत्म करना चाह रहा था ताकि मैं अपने घर जा सकूं। अपनी पत्नी और बेटी के साथ अपने माता पिता और भाई बहनों के पास। काम खत्म करने की ऊहापोह और भागदौड़ में ऐसा फंसा कि कुछ याद ही नहीं रहा। कई सारी चिंताएं एकाएक मस्तिष्क में समा गईं। इसमें से एक चिंता इस बात की थी कि मेरी एक फिल्म के निर्माता और मेरे दोस्त विक्रम भट्ट ने मेरी फिल्म ‘विभीषण’ का नाम बदलकर कुछ और रख दिया था। उनके रखे नाम से मैं बिलकुल भी सहमत नहीं था। चूंकि वह निर्माता थे इसलिए मेरी मजबूरी थी कि मैं उनकी ज्यादा सुनूं और कम से कम अपनी प्रतिक्रिया दूं। सारी यूनिट इस नाम के पक्ष में नहीं थी। लड़ाई करने वाला सिर्फ मैं ही बचा था। इस संबंध में विक्रम भट्ट से कई बार फोन पर बातें हुईं। इस दौरान उस फिल्म का बचा खुचा अंश हमने मुंबई में पूरा किया। और फिर विक्रम भट्ट से मुलाकात होने के बाद मैंने उन्हें एक नया नाम सुझाया। यह नाम सुनकर वह उछल पड़े। मेरी बात से सहमत होते हुए इस नाम पर उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी। फिर उस नाम को रजिस्टर्ड करने के लिए दिया गया। भाग्य अच्छा था कि वो नाम भी हमें मिल गया। और अब विक्रम भट्ट की आने वाले फिल्म, जिसे मकबूल खान ने निर्देशित किया है, का नाम ‘लंका’ होगा। बहुत खुश हूं इस निर्णय से। विक्रम भट्ट के साथ जितनी भी गहमागहमी रही, जितनी भी बहस हुई, उसका अंत अच्छा हुआ। मैं ‘लंका’ को लेकर बहुत उत्साहित हूं। इसकी कथा पटकथा इसकी शूटिंग सारे पक्षों से मैं सहमत हूं। और फूले नहीं समा रहा।

मैं अपने घर आया हूं। अपने माता पिता के पास। अपने भाई बहनों के पास। वे लोग मेरी बच्ची के साथ समय बिता रहे हैं और हमें थोड़ा आराम दे रहे हैं। इन दिनों वक्त बड़ा आरामदायक है। परिवार वाले अलग अलग तरीके के व्यंजन बनाकर हमारे सामने रख देते हैं। हर दिन कुछ नया। बचपन में जिस स्वाद को चखा था, उसके फिर से वापस आने का लुत्फ ले रहा हूं। रिश्तेदारों का आना लगा है। सबके साथ भूली बिसरी यादों पर हंसते हंसते कभी कभी दम घुटा जा रहा है। ऐसा मौका मेरे जीवन में बहुत कम आता है। क्योंकि मैं बहुत में और वे बहुत दूर। न उनक काम मुंबई लेकर आता है और न मेरा काम उनके पास लेकर जाता है। समय मिलता है तो उनके साथ थोड़ा वक्त बीताकर वापस जाना होता है। अब जबकि पूरे दस दिन के लिए उनके साथ हूं तो ऐसा लगता है कि इस बडे शहर दिल्ली में ही गांव बस गया है।

अब यहां से निकल जाऊंगा। अपनी पत्नी और बच्ची को अपने ससुराल पहुंचाकर मुंबई की तरफ मेरी रवानगी हो जाएगी। क्योंकि ‘लंका’ का बचा खुचा काम भी मुझे खत्म करना है। बहुत सारी स्क्रिप्ट्स सुननी हैं और आगे आने वाले समय के लिए अपनी योजना तैयार करनी है। पहले दूर जाता था तो माता पिता पत्नी याद आती थी। अब बच्ची से पंद्रह बीस दिन दूर रहने का जो दर्द है, शायद मेरे लिए सह पाना थोड़ा मुश्किल होगा। और शायद यह दर्द हर माता पिता महसूस करते हैं। मैं अकेला ऐसा नहीं हूं। अब अहसास होता है कि आप कैसे अपने ही बनाए हुए परिवार में बसते चलते जाते हैं कि आपको न दाए कि सूझ रहती है और न बाएं की बूझ। लेकिन जाना तो है। कब तक अपने ही घर को बंद करके रखेंगे। मुंबई से वापस मैं कुछ न कुछ लिखता रहूंगा। तब तक आप लोगों को मेरी ढेर सारी दुआएं। आप सभी आपका आशीर्वाद मेरे व परिवार के ऊपर बनाए रखें।

इसकी आशा के साथ
आपका और सिर्फ आपका

मनोज बाजपेयी

10 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

लंका फ़तेह कीजीए यही हमारी भी दुआ है।

प्रवीण पाण्डेय said...

परिवार के साथ आनन्द उठायें।

Hitendra said...

प्रतीक्षा रहेगी हमें भी 'लंका' की!

-हितेन्द्र

Mithilesh Aditya. said...

Aadarniye Bhaiya jee,

Pranam.


aap se prabhawit hu.

aap ka blog padhkar khush hu.

aap ka

Mithilesh Aditya.

BANSAL said...

manoj ji aapki next movie kab aayegi

rahul aggarwal said...

pranaam manoj ji,

aapka blog padh kar acha lagaa..

parantu ek prashan dimaag mein aaya...lanka naam rakhne se film ka theme agar vibhishan per hai toh woh toh nahi change ho jayega na....film toh vibhishan per hi rahegi jabki naam lanka, jo ki raavan ke liye jaani jaathi thi usko direct karga...

fir bhi aapko all the best film ke liye...

dhanyavaad
rahul

kamlakar Mishra Smriti Sansthan said...

hum logo ki taraf se deepawali ki dher sari subhkamana aap ke pure parivar aur dosto ko bhi........aise hi shama jalye rakhiye........

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

मनोज जी,
आपको परिजनों तथा मित्रों सहित दीपावली पर मंगलकामनायें! ईश्वर की कृपा आप पर बनी रहे।
********************

साल की सबसे अंधेरी रात में*
दीप इक जलता हुआ बस हाथ में
लेकर चलें करने धरा ज्योतिर्मयी

बन्द कर खाते बुरी बातों के हम
भूल कर के घाव उन घातों के हम
समझें सभी तकरार को बीती हुई

कड़वाहटों को छोड़ कर पीछे कहीं
अपना-पराया भूल कर झगडे सभी
प्रेम की गढ लें इमारत इक नई
(अनुराग शर्मा)
********************

jitendrajha jitu(akshra arts) said...

family ke saath samay gujaar pana apne aap me ek sukhad pal hai..purani baato ko yaad karna..
hume ve lanka film ka intazaar hai...

अरूण साथी said...

आप है तो लंका पर विजय ही होनी है।
घर आने और शकुन के क्षण बिताने की बधाई।