Wednesday, November 16, 2011

'लंका' का इंतजार और कुछ दूसरी बातें

मेरी फिल्म ‘लंका’ प्रदर्शन के लिए तैयार है। फिल्म 9 दिसंबर को सिनेमाघरों में पहुंच जाएगी। उसी दिन एक बड़े निर्माता की फिल्म आ रही है, जिसका प्रचार अब जोर शोर से शुरु हो चुका है। मैं जिन फिल्मों में काम करता हूं और वे जिस बजट की होती हैं, तो वे चाहे जितनी भी आला दर्ज की हों, उनके प्रचार प्रसार के लिए हमारे पास सिर्फ तीन या चार हफ्ते का ही समय होता है क्योंकि उससे ज्यादा पैसा निर्माता खर्च करने के लिए तैयार नहीं होता। इतने वक्त में हमें सब करना होगा ताकि हम बता सकें कि हम भी हैं। और बड़े निर्माताओं ने दर्शकों की आदत इतनी बिगाड़ी दी है कि जब तक जोर शोर का प्रचार न हो तब तक वे फिल्म देखने सिनेमाघरों में जाते ही नहीं। इसका अंजाम मेरी कुछ फिल्मों को बुरी तरह से भुगतना पड़ा है। इसमें मेरी सबसे प्रिय फिल्म ‘1971’ भी है, जिसे उस साल का बेहतरीन फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। स्वामी, दस तोला और शिकार भी ऐसी बनीं कि अपने समय की बेहतरीन फिल्म होते हुए भी प्रचार प्रसार की कमी के कारण पीछे रह गईं।

मैं चाहता हूं कि लंका के साथ ऐसा कुछ न हो क्योंकि फिल्म बहुत की अनोखी बन पड़ी है। ये दुर्भाग्य उन फिल्मों के साथ हमेशा रहता है,जो छोटी होती है लेकिन बहुत अच्छी होती है। जो किसी भी बड़ी से बडी फिल्म को टक्कर देने के काबिल हैं। लेकिन दर्शक हैं कि जब तक हो- हंगामा न देंखे, किसी फिल्म का टिकट लेते ही नहीं। ऐसे में उत्साह कैसे बढ़े कि इस तरह की फिल्म की जाए। दर्शक नहीं मिलते तो निर्माता इन फिल्मों से भागना शुरु करता है और अगर वो बनाता भी है तो फिल्म शुरु करने से लेकर प्रदर्शित करने तक अपनी मजबूरियां ही गिनाता है। बहुत ही संकट का समय रहता है ऐसी फिल्मों को बनाकर प्रदर्शित करने में।

खैर, लंका जब प्रदर्शित होगी तब देखा जाएगा। अभी कई राज्यों में चुनाव की सरगर्मियां तेज होती जा रही हैं। टेलीविजन पर आरोप-प्रत्यारोप के दौर शुरु हो चुके हैं। नेतागण ज्यादा से ज्यादा बात कम समय में रखने की होड़ में लग चुके हैं। बस एक दूसरे को गाली देना ही बाकी है। ये सत्ता भी कमाल की चीज है। चाहे वो राजनीति हो या व्यक्तिगत जीवन-हर कोई उसे पाने में लगा हुआ है या दबोचने में। कोई उस कुर्सी पर बैठना चाहता है तो कोई उस कुर्सी को जाने नहीं देना चाहता। इस सारी खींचतान में अगर जनता का भला हो या उनके कल्याण पर काम होता रहे तो कोई समस्या नहीं है। लेकिन मुश्किल तो तब होती है जब राजनीति सिर्फ खींचतान से ही भरी रहती है। कल्याण कहीं पीछे छूट जाता है।

एक अच्छी बात यह रही है कि जनता के बीच से ही जनांदोलन छोटे से बड़े होते जा रहे हैं। जिससे राजनीतिक पार्टियों में एक जिज्ञासा भी है और हड़कंप भी मचा हुआ है। जनांदोलन अपने आप में प्रजातंत्र के होने का सबूत है। और ये जितना जोर पकड़े, इस डेमोक्रेसी को और आगे मजबूत ही करता जाएगा। नए से नए कानून बने, नए नए विचार सामने आएं, इससे अच्छी बात इस जनंतत्र के लिए कुछ हो ही नहीं सकती।

इस बीच मुझे अचानक याद आया कि मुंबई शहर के जिस इलाके में मैं रहता हूं,वहां पर आसपास बहुत सारी जगहों पर या यूं कहें कि खुले में खोमचों पर नकली फिल्म सीडी बिकती है। उसमें से छह खोमचे वालों को तो मैंने भगाया। पुलिसवालों से बात भी की। लेकिन ये अपने आप में चिंता का विषय है। ये नकली सीडी बड़ी फिल्मों से ज्यादा छोटी फिल्मों का नुकसान कर रही हैं। बड़ी फिल्में तो टेबल पर ही बिक जाती है या यूं कहें कि बनने से पहले ही वितरक उन्हें खरीद लेते हैं। छोटी फिल्मों के प्रदर्शन में सांस ऊपर नीचे हो जाती है। और अगर रिलीज भी होती है तो चुनिंदा दर्शक थिएटर में बैठे होते हैं क्योंकि ज्यादातर नकली सीडी पर ही उसे देखना पसंद करते हैं। ये एक सच्चाई है। और हर वो दर्शक, जो सीडी खरीद रहा है कही न कहीं गैरकानूनी काम में शरीक हो रहा है या उसे बढ़ावा दे रहा है। तो हम छोटी फिल्म के कलाकारों और तकनीशियनों की तरफ से मैं आप सभी से निवेदन करता हूं कि ऐसी गैरकानूनी गतिविधि को बढ़ावा न दें। नकली सीडी बिकने की सूचना पुलिस को दें ताकि हम जैसे लोग, जो छोटी और अच्छी फिल्मों में विश्वास रखते हैं, उनका उत्साह बना रहे और अच्छी फिल्म की एक नयी परंपरा हम बना सकें।

आपके सहयोग की अपेक्षा में
मनोज बाजपेयी

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

निश्चय ही आपकी मेहनत को दर्शकों से सम्मान मिलेगा, हार्दिक शुभकामनायें।

Deepak Madheshiya (Web Developer) said...

श्री मान जी, सच्चाई का रास्ता तो कठिन होता ही है लेकिन पक्का भी होता है

अशोक कुमार शुक्ला said...

मनोज जी
आपकी फिल्म की सफलता हेतु हार्दिक शुभकामनाऐं
पायरेसी के विरूद्ध जनचेतना बिगुल बजाना ही पडेगा तभी जाकर यह रूक पायेगी
मेरा वादा हे कि कि में अपने किसी परिचित को यह फिल्म पायरेटिेट सीडी पर नहीं देखने दूँगा
पुनः शुभकामनाऐं

jitendrajha jitu(akshra arts) said...

publicity ho ya na ho..apki film ka intazaar hamesha rahata hai..tab ye jaroor hai ki samne bade film ho aur uski publicity to darshak ki utshuakta ban jate hai..ek baat to aapne satya kaha ki 1971,swami.ise karan logo ke pas nahi aa payee.aur film industry ka jpo traend hai ...ise koi rok nahi sakta..khair..shubhkamna.....lanka ke lea..umeed hai ki aks ke bad pahlii bar thrill film me aap aa rahe hai..aapka acting to accha hi hoga..bhagvan kare ki film ve khoob acche bane ho aur khoob chale..