Wednesday, March 28, 2012

वीर सांघवी और तिग्मांशु से मुलाकात के बीच

सोमवार शाम को काम से फुर्सत पाने के बाद हिन्दुस्तान टाइम्स के ब्रंच मैग्जीन द्वारा आयोजित एक समारोह में शामिल होने का अवसर मिला। यहां मेरी अगली फिल्म ‘शूट आउट एट वडाला’ के मेरे सहभागी कलाकार जॉन अब्राहम और कंगना रानावत के साथ मंच पर वीर सांघवी संग बातचीत शामिल थी।

वीर सांघवी के लेखन का मैं बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं। वो अपने कॉलम के जरिए न सिर्फ तमाम राजनीतिक बल्कि अपनी खाने और तरह तरह के रेस्तरां के बारे में भी बहुत कुछ लिखते रहते हैं। इसमें वह उस जगह के इतिहास के बारे में भी बहुत कुछ बताते हैं। हर बार उनसे मिलकर ऐसा लगता है कि जैसे वो कुछ नहीं करते बल्कि सिर्फ पढ़ते हैं और लिखते हैं। इस तरह के व्यक्तित्व के प्रति हमेशा से मेरा रुझान रहा है। ऐसा लगता है कि दुनिया का कोई भी ऐसा हिस्सा नहीं है, जिसके बारे में ये लोग परिचित नहीं है। ऐसी कोई किताब नहीं है जिसे इन लोगों ने न पढ़ा हो। ऐसे व्यक्तित्व अपने आप में बहुत आकर्षक होते हैं।

कई दिनों से सोच रहा था कि मैं कुछ लिखूं। लेकिन, मन मस्तिष्क में ऐसा कोई विचार नहीं आ रहा था। आजकल जो राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियां चल रही हैं, उन्हें समाचार में देखकर कोफ्त होती है। कोई प्रतिक्रिया ही जन्म नहीं लेती। सस्ती भाषा में कहूं तो न्यूज चैनल पर इस तरह की ख़बरें देखकर मैं ‘चट’ गया हूं।

इधर ‘पान सिंह तोमर’ के जरिए तिग्मांशु धूलिया की सफलता से मुझे अति प्रसन्नता हुई। उनकी ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ और ‘पान सिंह तोमर’ के बॉक्स ऑफिर पर ठीक ठाक चलने से उन जैसे निर्देशकों को एक जगह मिलती दिख रही है, जो अपने आप में सुखद है। वे न सिर्फ पुराने मित्र रहे हैं बल्कि बहुत कम लोगों को पता होगा कि ‘बैंडिट क्वीन’ की कास्टिंग के दौरान किसी अभिनेता को पहली बार शेखर कपूर से से उन्होंने ही मिलवाया था।

मेरा और उनका साथ लंबा रहा है। मैंने उनके निर्देशन में एक सीरियल भी किया है। ‘हम बंबई नहीं जाएंगे’। यह किसी चैनल पर कभी आया ही नहीं। ये उन दिनों की बात है जब मैं पूरी तरह से टूट चुका था। तिंगमाशु और उनकी पत्नी मेरे अच्छे मित्र रहे हैं। लेकिन फिर मुंबई की भागा भाग में मिलना कम होता गया है। वैसे, सोमवार शाम को तिग्मांशु के साथ भी मुलाकात हुई और उनके साथ समय बिताना अच्छा लगा। अभी हाल फिलहाल में ही दिल्ली से मुंबई आने वाली हवाई यात्रा में भी वह मिल गए और आते हुए हम अगल बगल ही बैठे थे। उसी वक्त मुझे पता लगा कि हवाई यात्रा को लेकर उन्हें मुझसे भी ज्यादा डर लगता है। कहीं न कहीं सुखद अहसास हुआ कि कोई तो है,जो मुझसे ज्यादा डरता है।

लेकिन, उनके जीवन और उनके निर्देशन की उड़ान बदस्तूर जारी रहे, यही कामना है। यह कामयाबी की एक ऐसी उड़ान है, जो उन्हें बहुत पहले मिलनी चाहिए थी। लेकिन चलिए उन जैसे निर्देशक जब भी आते हैं तो अपने तौर पर कुछ न कुछ तो बदलते ही हैं। ये माध्यम ही निर्देशकों का है। शायद इसलिए मैं सिनेमा को लेकर इतना जुनूनी नहीं हू जितना अभिनय को लेकर हूं। कहीं न कहीं मुझे लगता है कि इस माध्यम में अभिनेता का बस नहीं चलता और इसे मानने में मुझे कोई संकोच भी नहीं होगा।

हम पूरी तरह से एक निर्देशक की बुदिमत्ता और दूरदर्शिता पर निर्भर करते हैं। और शायद मैं इसलिए इस माध्यम से जुड़ा कि दस साल के रंगमंच के बाद कहीं न कहीं ये अहसास हुआ कि जो भी काम करुं उसका मुझे पैसा मिले। थोड़ा बहुत जो भी मिलता है उससे मैं खुश हूं। लेकिन सिनेमा ऐसा ही फलता फूलता रहे। अच्छे निर्देशक आते रहें और अच्छी फिल्में बनती रहें-यही कामना है क्योंकि इसी से सभी का भला होगा।

इस बार के लिए इतना ही,

आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी

6 comments:

सतीश पंचम said...

साइड बार में आपने पूछा है कि इनमें से कौन सी फिल्म पसंद है - सत्या, शूल,पिंजर,अक्स...

अपन को तो पहली तीनों पसंद हैं, अक्स देखा नहीं :)

पान सिंह तोमर मुझे भी बहुत अच्छी लगी।

G.N.SHAW said...

बिलकुल सही कहा आपने ! यही तो जीवन के अनुभव और प्यार है !

Hanuman Mishrra said...

बाजपेयी जी !!! बातों बातों में आप लोगों का आभार व्यक्त करना नहीं भूलते, आप की ये अदा और बडप्पन कमाल का है !!!

RA said...

As always nicely said.
Agree with you on Tigmanshu Dhulia's creative yet entertaining and totally Indian film making. Here in NJ,we took our teenage son to watch his first Hindi film ( Paan Singh Tomar) in the theater.
Upon your recommendation will read more on (or by) Vir Sanghvi.
Stay well and hope you keep writing more often.

Deepak Madheshiya (Web Developer) said...

Jivan ke anubhav aur pyar me bda jhol jhal hai sir......!

Manish Kazi said...

shool movie mujhe bahut achhi lagi kuch din pahle hi mane ese drkha h